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Wednesday, April 10, 2024

April 10, 2024

एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाए जाते हैं, जानें वैज्ञानिक और धार्मिक कारण(Why rice is not eaten on Ekadashi, know scientific and religious reasons)


एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाए जाते हैं, जानें वैज्ञानिक और धार्मिक कारण (Why rice is not eaten on Ekadashi, know scientific and religious reasons):-पद्मपुराण के अनुसार:-महीने में वर्णित तीस तिथियों में से एकादशी तिथि का स्वामी भगवान श्रीविष्णुजी के स्वरूप को माना जाता है। भगवान श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना एकादशी तिथि को करना एक तरह से पुण्य कार्य होता हैं, जिससे भगवान श्रीविष्णुजी का आशीर्वाद मिल सके और पूर्ण श्रद्धा भाव रखते हुए जो भी मनुष्य अपने मन मन्दिर में भगवान श्रीविष्णुजी की छवि को धारण करते हुए सच्चे मन से विश्वास से पूजा-अर्चना करते हैं, उन पूजा-अर्चना करने वाले मनुष्य को जीवन के जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती हैं और उनका उद्धार भी हो जाता है। जो मनुष्य एकादशी तिथि को अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को दान के रूप में अन्न, गोदान, दक्षिणा आदि करते हैं, उनको हजारों अश्वमेघ यज्ञों के समान पुण्य का फल मिल जाता हैं, जो इस दिन बिना पानी को पिये हुए व्रत को करते है, उनको ज्यादा पुण्य मिलता हैं।



Why rice is not eaten on Ekadashi, know scientific and religious reasons







एकादशी तिथि के दिन नहीं करने योग्य कार्य:-मनुष्य को एकादशी तिथि के दिन निम्नलिखित कार्य नहीं करना चाहिए-



◆जिन मनुष्य के द्वारा उपवास करने से सम्बंधित परेशानी होती हैं, उन मनुष्य को शुद्ध सदाचार आचरणों को रखना चाहिए।



◆मनुष्य को धर्म एवं नीति के विरुद्व आचरणों को करना चाहिए।



◆मनुष्य को किसी दूसरे मनुष्य की वस्तुओं जैसे-धनादि का हरण नहीं करना चाहिए।



◆मनुष्य को नीति के विरुद्ध असत्य वचनों को नहीं बोलना चाहिए।



◆दूसरों के द्वारा व्यापक नियमों के विरुद्ध कार्य को मनुष्य को नहीं करना चाहिए।



◆मनुष्य को वेद, देवता और ब्राह्मणों की बुराई नहीं करनी चाहिए।



◆मनुष्य को निंद्रा और स्त्री के साथ कामवासना में लिप्त नहीं रहना चाहिए।



◆मनुष्य को मछली, सुआ, प्याज, लहसून, मांस, अंडा आदि को भोजन के रूप में एकादशी तिथि के दिन नहीं खाना चाहिए। 



◆अन्न को भी नहीं ग्रहण करना चाहिए।



◆मनुष्य एकादशी तिथि के दिन किसी दूसरे मनुष्य के साथ छल-कपट भाव नहीं रखना चाहिए।



◆मनुष्य को एकादशी तिथि के दिन चावल से बनी हुई कोई भी वस्तु एवं चावल का भोजन के रूप में उपयोग नहीं करना चाहिए।




प्राचीन समय से मनुष्यों के द्वारा:-बताया गया है कि चावल या चावल से बनी हुई कोई भी वस्तु को भोजन के रूप में एकादशी तिथि के दिन ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस तरह के पुराने विचारों को आज तक भी मनुष्यों अनुसरण करते हैं, इस तरह की विचारधारा के पीछे क्या कारण हैं? उसको जानने की इच्छा प्रत्येक मनुष्यों को होती है।




चावल की उत्पत्ति के विषय में पौराणिक कथा:-प्राचीन समय में महर्षि मेधा के द्वारा किये गए कार्यों से संसार में बहुत त्राहि-त्राहि होने से माता आदिशक्ति की आराधना करने से आदिशक्ति ने अपना उग्र रूप को धारण किया था, इस तरह अपने क्रोधरूपी उग्र रूप से डरकर भागने लगते हैं, इस तरह माता आदिशक्ति के गुस्से की ज्वाला के डर से भागते-भागते उनसे बचने के लिए जगह ढूंढने लगते हैं, अंत में उनकी बुद्धि कार्य करती हैं, महर्षि मेधा ने तपस्या शक्ति के प्रभाव से अपने देह को त्याग दिया और अपनी बुद्धि या धारणा शक्ति से पृथ्वी माता की गोद में विलीन हो गई।



वही मेधा या बुद्धि जौ और चावल के रूप में पृथ्वी पर उत्पन्न हुई थी। जिस दिन मेधा जौ एवं चावल के रूप में उत्पन्न हुई वह दिन एकादशी तिथि का दिन था। इस तरह महर्षि की मेधा शक्ति ही जौ एवं चावल हैं, जो चेतना एवं प्राण युक्त हैं। इसलिए एकादशी तिथि के दिन चावल को खाना महर्षि मेधा की देह के छोटे-छोटे हड्डियों और चमड़े के बीच का मुलायम और लचीला भाग के काट-छांटकर खाने की तरह ही माना गया हैं, इसलिए जीवनीशक्ति से युक्त जौ और चावल को माना गया है।




धर्मशास्त्रों के कारण:-चावल की पैदाइस जल में होती हैं। चावल की पैदाइस के लिए दूसरी धान्य फसलों की तुलना में बहुत ही जल की आवश्यकता होती हैं। इस तरह चावल का रंग सफेद होता हैं, जो कि ज्योतिष शास्त्र में सफेद रंग चन्द्रमा ग्रह का होता हैं और जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता हैं।




मन का प्रतिनिधित्व भी चन्द्रमा ग्रह करता हैं। इस तरह आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा आदि पाँच ज्ञानेंद्रियों के द्वारा भौतिक विषयों की जानकारी मिलती हैं और हाथ, पैर, वाणी, गुदा और उपस्थ आदि पाँच कर्मेन्द्रियों के द्वारा शरीर के कार्यों को किया जाता हैं। इस समस्त कार्यों को संपादित करने में मन का सहयोग होता हैं और मन के नियंत्रण से ही कार्य पूर्ण होते हैं। इस तरह शरीर के अंगों के प्रतिनिधि पर मन का पूर्ण स्वामित्व होता हैं। इस तरह चन्द्रमा जल, रस और मन की कल्पना के साथ स्पष्ट सम्बन्ध को करने वाले होते है, इस कारण से कर्क राशि, वृश्चिक राशि एवं मीन राशि आदि जलतत्त्व राशि प्रधान मनुष्य मन की कल्पना में खोये रहने वाले होते हैं, जिससे अक्सर दूसरे मनुष्य के द्वारा स्वार्थ पूर्ति करके मनुष्य को आश्वासन देकर मुकर जाते हैं।




मनुष्य को एकादशी तिथि के दिन व्रत को पूर्ण करने के लिए पूरे दिन भर बिना जल को ग्रहण करके पूर्ण करना होता हैं। इस तरह मनुष्य को अपने शरीर में जल की मात्रा को सीमित करना होता हैं, जिससे व्रत को पूर्ण करने में मदद मिल जावें। शरीर में जल की मात्रा कम होने पर मन में पवित्रता एवं अच्छी सोच को अपनाने में बढ़ोतरी होती हैं। जिससे व्रत पूर्ण रूप से संपन्न हो सके।




देवर्षि नारदजी के मतानुसार:-प्राचीन काल में ब्रह्माजी के मानस पुत्र श्रीदेवर्षि नारदजी ने बिना जल को पिये हुए एक हजार वर्षों तक भगवान श्रीविष्णुजी की पूजा-उपासना करते हुए व्रत को किया था। इस तरह वैष्णव धर्म में सबसे उत्तम एकादशी व्रत को माना जाता है। मन की प्रवृत्ति चंचल होती हैं, जिससे मनुष्य का ध्यान को भटका सकता हैं और मन की गति को नियंत्रित करने के लिए एकादशी व्रत के दिन मनुष्य को चावल नहीं खाने को शास्त्रों में बताया हैं।





वैज्ञानिक आधार:-वैज्ञानिक आधार पर एकादशी तिथि के दिन चावल नहीं खाना चाहिए, वैज्ञानिक आधार पर चावल की पैदाइश का आधार जल होता हैं और चावल जल के द्वारा परिपूर्ण होने से जल की मात्रा में अधिकता होती हैं। जलतत्व पर चन्द्रमा को कारक माना जाता हैं, जिससे जलतत्व पर ज्यादा असर चन्द्रमा का पड़ता है। चावल जल से परिपूर्ण होने से मनुष्य की देह में जल की मात्रा ज्यादा बढ़ोतरी होने लगती हैं और मनुष्य का अस्थिर मन पर नियंत्रण नहीं होता हैं, इस तरह मनुष्य के अस्थिर मन के भटकने से अनेक तरह के विचारों की उत्पत्ति होने लगती हैं और मनुष्य का मन एकादशी तिथि के व्रत के आचार-व्यवहार का शास्त्रानुसार विधानों को करने में विघ्नों को उत्पन्न करके उन विधानों को पूर्ण नहीं करने देता है।




चित्त की एकाग्रता के आवेग पर पूर्णरूपेण नियंत्रण करते हुए वास्तविक या सत्वगुण प्रधान मन में उत्पन्न होने वाली चेष्टा का निर्वाह करना बहुत ही जरूरी होता हैं, इसलिए मनुष्य को एकादशी तिथि के व्रत के दिन चावल को एवं चावल से बनी हुई वस्तुओं को खाना मना किया गया हैं। 




Thursday, December 7, 2023

December 07, 2023

तिलक में चावल के दानें का क्या महत्त्व हैं?(What is the importance of rice grains in Tilak?)


तिलक में चावल के दानें का क्या महत्त्व हैं?(What is the importance of rice grains in Tilak?):-हिन्दुधर्म में प्रत्येक पूजाकर्म को करते समय हर कर्म का विशेष रूप से महत्व होता हैं, जिससे मनुष्य को उस कर्म को करते समय उस कर्म का फल मिल सके। हिन्दुधर्म में मनुष्य के मस्तकं के बीच का भाग खाली होने से मनुष्य के द्वारा किये गए समस्त मांगलिक कार्य जैसे-पूजा, हवनादि का पूर्ण फल नहीं मिल पाता है। सुषुम्ना नाड़ी को केन्द्रीयभूत मानते हुए भृकुटि और ललाट के बीच के भाग पर तिलक धारण किया जाता है, जिससे मनुष्य के मस्तकं को अच्छी सोच को उत्पन्न करके बुरे विचारों का अंत हो सके। पूजा-कर्म करते समय पुरोहित या स्वयं मनुष्य के द्वारा मस्तकं पर तिलक लगाने का विधान होता हैं, क्योंकि मस्तक को पूजा-कर्म के समय खाली रखना अशुभ माना जाता हैं।




What is the importance of rice grains in Tilak?






कठोपनिषद के मतानुसार:-कठोपनिषद ग्रन्थ में वर्णित विचारों के अनुसार मस्तकं के सम्मुख जगह से एक मुख्य सुषुम्ना नाड़ी जो कि ऊपर ओर गति करते हुए जीवन-मरण के बंधन से से मुक्ति का पथ देती हैं, दूसरी नाड़ियों से प्राण के निकलने के बाद शरीर में एक जगह से गति कर सके और आज्ञाचक्र में जागृत के भाव को उत्पन्न कर सके और मस्तकं में सक्रियता और मन की भीतरी चेतना को शीघ्रता से अचानक रूप से बढ़ोतरी करने में सहायक होने से तिलक के बाद मस्तकं पर दाने लगाने के महत्त्व की जानकारी मिलती हैं। अपने निवास स्थान या धार्मिक पूजा कर्म करते समय तिलक लगाने के बाद हमेशा चावल के दाने तिलक के ऊपर लगाएं जाते हैं।  


वैज्ञानिक तौर पर:-जब मनुष्य के द्वारा अपने निवास स्थान या धार्मिक पूजा कर्म करते समय पहले तिलक मस्तक पर लगाया जाता हैं, जिससे मस्तक में उत्पन्न तीक्ष्ण ऊष्मा से राहत मिल जावें और मनुष्य के मस्तक के द्वारा सोच-विचार के किये गए कार्य से शांति एवं शीतलता मिल सके।



जब मस्तक पर तिलक करके चावल को लगाते है क्योंकि चावल को पूजा-कर्म में पवित्रता एवं शुद्धता का स्वरूप माना जाता है।



धर्म शास्त्रों के अनुसार:- समस्त तरह के यज्ञ-हवनादि में देवी-देवताओं को अर्पण करने वाला शुद्ध एवं निर्मल धान्य रूप में माना गया है।



पूजा-पाठ कर्म करते समय:-चावल को पूजा-पाठ कर्म करते समय अक्षत कहा जाता हैं।



अक्षत का मतलब:-जिसका स्वरूप क्षत या खंडित न हुआ हो, जो टूटा-फूटा स्वरूप में न होकर सर्वांग रूप के अस्तित्व में होता हैं या जो अपने अस्तित्व से युक्त होता हैं, उसे अक्षत कहते हैं। 



जब तिलक करने के बाद कच्चे चावल के दाने को मस्तकं पर लगाने से निश्चित एवं स्थिर स्वरूप वाले सार्थक सोच-विचार को उत्पन्न करके संचलन की क्षमता प्रदान करते हैं। इसलिए मनुष्य के मन में अच्छी बातों को अपने कर्म में कामयाबी के भाव को उत्पन्न करने में सहायक होने से चावल के दाने का उपयोग किया जाता है।



पूजा कर्म की थाली में तिलक लगाने के लिए कुमकुम, चन्दन आदि, कुसुम, मीठी वस्तु जैसे-गुड़ या मिठाई, पांच धान्य, मौली और चावल आदि होते हैं। इस तरह कोई भी पूजाकर्म करते समय पूजा बिना चावल के अधूरी समझी जाती हैं। चावलों को शुद्धता का स्वरूप मानते हुए पूजा कर्म में तिलक लगाने के बाद मस्तकं पर चावल दानों का उपयोग लिया जाता हैं। 



पूजा कर्म में कुमकुम के तिलक को लगाने के बाद में चावल के दानों को लगाने से आस-पास के वातावरण में उत्पन्न निराशाजनक सोच की क्षमता पर अंकुश लग सके और मनुष्य के मन में आशावादी सोच की क्षमता का विकास हो सके। इस तरह से चावल के दानों को तिलक लगाने के बाद मस्तकं में लगाने पर आशावादी सोच क्षमता का संचार होकर निराशाजनक सोच की क्षमता पर विजय पा सके और अपने मन को एक जगह पर केंद्रित कर पावे।



ज्योतिष शास्त्र के अनुसार:-ज्योतिष शास्त्र में चावल व मन का कारक चन्द्रमा ग्रह को माना जाता हैं, चावल की उत्पत्ति जल में होती हैं, उसी तरह मन की गति भी पानी की तरह चंचल होती हैं, जो कि हर समय चलायमान होता हैं, जिससे मन में कई तरह के विचारों का जन्म होता हैं। जब चावल के दाने को मस्तकं पर धारण करने पर मन में जल के भाव से शीतलता मिल जाती हैं।




चावल के दाने को मस्तकं पर नहीं लगाने पर:-जब पूजा-कर्म करते समय केवल कुमकुम का तिलक मस्तकं और चावल के दाने को मस्तकं पर नहीं लगाते है, तब यह पूजा-कर्म के विपरीत होता हैं, मनुष्य के मन में आशावादी भावना जागृत नहीं हो पाती हैं और मन के अंदर बुरे विचारों का जन्म होने लगता हैं, जिससे मनुष्य का मन भटकने लगता हैं और उसको शांति नहीं मिल पाती हैं, इसलिए पूजा-कर्म करते समय मस्तकं पर तिलक लगाने के बाद में चावल के दानों को लगाना चाहिए। मनुष्य को पूजा-कर्म करते समय अपने मस्तकं पर तिलक लगाने के बाद में अवश्य ही चावल के दानों को लगाना चाहिए।



उपरोक्त बातों की जानकारी के आधार पर तिलक में चावल के दाने को माथे पर लगाने का महत्त्व सिद्ध होता हैं।



Saturday, November 4, 2023

November 04, 2023

श्री सालासर बालाजी की आरती अर्थ सहित(Shri Salasar Balaji ki Aarti With Meaning)

श्री सालासर बालाजी की आरती अर्थ सहित(Shri Salasar Balaji ki Aarti With Meaning):-श्री सालासर बालाजी का मुख्य स्थान राजस्थान राज्य में स्थित चुरू जिले के सालासर गांव में है। श्री सालासर बालाजी की प्रतिमा दाढ़ी-मूँछो वाली है। जो कि अपनी शक्तियों के द्वारा अपने भक्तों की समस्त मन की कामनाओं को पूरा करते है। 



Shri Salasar Balaji ki Aarti With Meaning



श्री सालसर बालाजी की आरती अर्थ सहित:-श्री सालासर बालाजी को हनुमानजी के रूप में जाना जाता है, उनको अनेक रूपों का वर्णन मिलता है, इनके अनेक नाम भी हैं जिनमें एक नाम सालासर बालाजी है, तो इनको खुश करने के लिए इनकी आरती को करने से पूर्व आरती के भावों का ज्ञान होना चाहिए। उसके बाद ही आरती को करना चाहिए।



जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! जय-जयकार हो, बजरंगबली जी की, आप सब पर कृपा दृष्टी कर दीजिए। हे सालासर के श्री हनुमानजी आपकी अरदास करता हूँ।



चैत सुदी पूनम को जन्मे,


अंजनी पवन खुशी मन में।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! चैत्र मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को आपका जन्म हुआ था। तब अंजनी माता और पवन जी बहुत खुश होकर मन से खुशी मनाने लगे थे।



प्रकट भये सुर वानर तन में,


विदित यस विक्रम त्रिभुवन में।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! आपके शरीर में देव के रूप वानर रूप प्रकट हुआ था, चारों तरफ इस रूप की जानकारी तीनों लोकों में हो गई और आपकी शक्ति की जानकारी हो गई।



दूध पीवत स्तन मात के,


नजर गई नभ ओर।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! आप अपनी माता अंजनी की गोद में उनके स्तनों से दूध पी रहे थे, तब आपकी नजर आकाश की ओर गई।



तब जननी की गोद से पहुंचे,


उदयाचल पर भोर।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! तब आप अपनी माता अंजनी की गोद से उतर कर जहां से सूर्य उदय होता है उस पर्वत पर आप प्रातःकाल ही पहुंच गए।



अरुण फल लखि रवि,


मुख डाला कृपा कर।।1।।


तिमिर भूमण्डल में छाई,


चिबुक पर इन्द्र बज्र बाए।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! जब आप उदयाचल पर्वत पर पहुंचे तब आपने लाल रंग का सूर्य को फल समझकर अपने मुहं में ले लिया था। समस्त तीनों लोकों में अंधेरा छा गया तब इंद्रदेव ने आपसे कहा कि उस लाल रंग के फल के रूप में सूर्यदेव है उनको अपने मुख से आजाद करो तब आप नहीं माने तब इंद्रदेव ने अपने वज्र का प्रहार किया था तब आपकी ठोड़ी पर वज्र का प्रहार हो गया था।



तभी से हनुमत कहलाए,

द्वय हनुमान नाम पाये।।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! इस तरह व्रज के प्रहार से आपकी ठोड़ी खण्डित हो गई थी, तब से आपका नाम हनुमत पड़ा था। इस तरह से आपको हनुमान का नाम प्राप्त हुआ था।


जयति जय जय बजरंग बाला,

कृपा कर सालासर वाला।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! जय-जयकार हो, बजरंगबली जी की, आप सब पर कृपा दृष्टी कर दीजिए। हे सालासर के श्री हनुमानजी आपकी अरदास करता हूँ।



।।इति श्री सालासर बालाजी की अर्थ सहित संपूर्ण।।


।।अथ श्री सालासर बालाजी की आरती।।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


चैत सुदी पूनम को जन्मे,


अंजनी पवन खुशी मन में।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


प्रकट भये सुर वानर तन में,


विदित यस विक्रम त्रिभुवन में।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


दूध पीवत स्तन मात के,


नजर गई नभ ओर।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


तब जननी की गोद से पहुंचे,


उदयाचल पर भोर।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


अरुण फल लखि रवि,


 मुख डाला कृपा कर।।1।।


तिमिर भूमण्डल में छाई,


चिबुक पर इन्द्र बज्र बाए।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


तभी से हनुमत कहलाए,


द्वय हनुमान नाम पाये।।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


।।इति श्री सालासर बालाजी की आरती।।


।।जय बोलो श्री सालासर बालाजी की जय हो।।


।।जय बोलो पवनपुत्र श्री बजरंगबली की जय हो।









Tuesday, October 17, 2023

October 17, 2023

आरती गिरधारी जी की अर्थ सहित(aarti girdhari ji ki with meaning)

आरती गिरधारी जी की अर्थ सहित(aarti girdhari ji ki with meaning):-भगवान श्रीकृष्ण जी को अनेक तरह के नामों से जाना जाता है, उनके नाम जैसे वासुदेव, कृष्ण, गोपालक, गिरिधरी, कान्हा, मुरारी, केशव, माधव, यशोदापुत्र आदि हैं। उन नामों में से एक नाम गिरधारी भी है, जिसमें भगवान कृष्ण अपनी लीलाओं के द्वारा समस्त गोकुलधाम को आनन्दित किया था। श्रीकृष्णजी का नाम गिरिधर पड़ने का कारण था। भगवान श्रीकृष्णजी ने अपनी उंगलियों से गोवर्धन पर्वत को उठाया था, इसलिए उनको गिरिधर भी कहते है। जब इंद्रदेव को अपने ऊपर अभिमान हो गया। उनके बिना संसार नहीं चल सकता है, वे अपने-आपको ईश्वर तुल्य मानने लगे। समस्त जगत के निवासियों से अपनी पूजा करवाना चाहते थे। क्योंकि इंद्रदेव को वर्षा ऋतु एवं बारिश का स्वामी माना जाता है, वे अपनी पूजा मानव जाति को करवाने के लिए बाध्य करने लगे। जिससे उनके भय से मानव उनकी पूजा करते थे। 



Aarti with Girdhari ji's meaning



इस तरह उनकी इस जबर्दस्ती की पूजा का जब कृष्णजी को पता चलता है, तब कृष्णजी ने अपने समस्त गोकुलवासियों को कहा कि आप सब इंद्रदेव की पूजा की बजाएं गोवर्धन पर्वत को पूजन किया करे, क्योकि यह गोर्वधन पर्वत समस्त मानव जाति की रक्षा करते है। जो कि प्रकृति की विभिन्न तरह की मुशीबतों से बचाता है। इस तरह गोकुलवासियों ने श्रीकृष्णजी की बातें के अनुसार इंद्रदेव की पूजा करना छोड़ दिया और गोर्वधन पर्वत की पूजा करने लगे जब इंद्रदेव को पता चला तो उन्होंने इतनी तेज वर्षा की चारों तरफ सब कुछ पानी से लबालब हो गया, इस तरह की भारी वर्षा से बचने के लिए सब परेशान हो गए अपने जीवन को किस तरह बचाए। तब श्रीकृष्णजी ने अपनी उंगली पर गोर्वधन पर्वत को उठाई उनके नीचे समस्त गोकुलवासियों को आने के लिए कहा था। इस तरह इंद्रदेव को आखिर में अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी और इंद्रदेव का घमंड चूर-चूर हो गया। इस तरह श्रीकृष्णजी का नाम गिरिधर पड़ा था। तब से गोर्वधन पर्वत की पूजा विधान शुरू हुआ था। जो आज के युग तक चल रहा हैं।




इसलिए भगवान श्रीकृष्णजी की आरती को हमेशा करते रहने पर समस्त तरह के दुःखो का अन्त हो जाता हैं और अंत मोक्ष गति मिल जाती है। भगवान कृष्णजी को सच्चे मन से उनकी आराधना करनी चाहिए।



आरती श्री गिरधारी जी की अर्थ सहित:-भगवान गिरधारी की आरती करने से पूर्व आरती में लिखे गए शब्दों के अर्थ को समझकर आरती करने से आरती के बारे में जानकारी मिल जाती हैं। इसलिए आरती के अर्थ को समझकर करने से शुभ फल मिलता है, जो आरती का अर्थ इस तरह है:


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।


भावार्थ्:-हे श्रीकृष्णजी! आपको कृष्ण के नाम, हरि का नाम और गिरधारी के नाम से जाना जाता है। आपकी जय-जयकार हो। राक्षस की शक्ति को नष्ट करके उनको को मारने वाले एवं गायों एवं ब्राह्मणों का हित करने वाले हो।



जय गोविन्द दयानिधि, गोवर्धन धारी।


वंशीधर बनवारी, ब्रज जन प्रियकारी।।


भावार्थ्:- हे गोविन्द! आपकी जय-जयकार करें, आप तो दया के सागर हो, आपने तो उंगली पर गोर्वधन पर्वत को उठाने वाले, वंशी को अपने हाथ में धारण करने वाले बनवारी और ब्रज वासियों के दुलारे हो।



गणिका गोध अजामिल गणपति भयहारी।


आरत-आरति हारी, जय मंगल कारी।।


भावार्थ्:-हे गिरधारी! आपके नाम में भी इतना बल होता है, जिस तरह चमेली के फूल दूर होने पर भी अपनी सुंगध से महकाता है। आप तो मादा घड़ियाल, गिरगिट या छिपकली आदि के डर को हरने वाले एक पापी ब्राह्मण अजामिल था, जिसका उद्धार उसके पुत्र नारायण की मृत्यु होने पर उसकी याद में नारायण नाम का उच्चारण करते-करते मोक्ष को पाया, जो गणपति जी के डर को हरण करने वाले और शांति पूर्वक अपने विराग का हरण करने वाले और जो सभी तरह कल्याण करने वाले होते है, उनकी जय-जयकार हो।



गोपालक गोपेश्वर, द्रौपदी दुखहारी।


शबर-सुता सुखकारी, गौतम-तिय तारी।।


भावार्थ्:-हे माधवजी! आपका नाम गायों को पालने के कारण गोपालक पड़ा था, गोपियों के स्वामी हो, द्रौपदी के दुःखो को दूर करने वाले हो, शबरी का उद्धार करके उसको सुख देने वाले हो एवं गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के दुःख को दूर करके उसका उद्धार करने वाले होते हो।



जन प्रहलाद प्रमोडक, नरहरि तनु धारी।


जन मन रंजनकारी, दिति-सुत संहारी।।


भावार्थ्:-हे गिरिधारी! आप तो सभी मनुष्य को एवं प्रहलाद के दुःखो को दूर करने के लिए नृसिंह रूप को धारण करने वाले हो, समस्त मनुष्य को मनभावन सुख को देने वाले हो और दक्ष की सुंदर पुत्री एवं ऋषि कश्यप की पत्नी के द्वारा उत्पन्न पुत्र की आभा का संहार करने वाले होते हो।



टिट्टिभ-सुत संरक्षक, रक्षक मंझारी।


पाण्डु सुवन शुभकारी, कौरव मद हारी।।


भावार्थ्:-हे केशवजी! आप तो जमींनपर घोंसला बनाने वाले टिटिहरी पक्षी या टिड्डी को पुत्र के रूप में मानकर उनका पालन-पोषण करने वाले हो और उनकी रक्षा करने की स्वीकृति देने वाले होते हो। जिस तरह से पाण्डु जो की एक पीले रंग की मिट्टी होती है उसका उपयोग आभूषण आदि बनाने में किया जाता है, वह मिट्टी फायदेमंद होती है और कौरव वंश में जब घमंड में चूर हो जाते है तब उनके घमंड को तोड़ने वाले हो।




मन्मथ-मन्मथ मोहन, मुरली-रव कारी।


वृन्दाविपिन बिहारी, यमुना तट चारी।।


भावार्थ्:-हे श्रीकृष्णजी! आपके मुरली की ध्वनि इतनी मधुर होती है कि आप तो कामदेव के समान सभी को मोहित कर देते हो। वृन्दा जंगल में भृमण करने वाले आपको बिहारी भी कहते हैं और अपनी इच्छानुसार यमुना के किनारों पर घूमने वाले ही।



अघ-बक-बकी उधारक, तृणावर्त तारी।


बिधि-सुरपति मदहारी, कंस मुक्तिकारी।।


भावार्थ्:-हे केशव जी! आप तो पापिओं के द्वारा बिना मतलब के बोलने पर ध्यान नहीं देते हो, लेकिन पापियों के माफी मांगने पर उनके बचे हुए जीवन का उद्धार कर देते हो, बवंडर के समान विशाल दैत्य का भी आप तारण कर देते हो, जब इंद्रदेव जब मद में चूर हो जाते है तब उनकी मद के नशे को हरके उनको अनुकूलता प्रदान करते हो और कंस जैसे दैत्य से भी मुक्ति दिलवाने वाले हो।



शेष, महेश, सरस्वती, गुन गावत हारी।


कल कीरति विस्तारी, भक्त भीति हारी।।


भावार्थ्:-हे नारायण! आपके गुणों का बखान तो शिवजी, माता सरस्वती जी एवं शेषनाग करते रहते है, आपकी कीर्ति तो कल भी थी और आज भी है। आप तो अपने भक्तों के डर को हरने वाले हो।



'नारायण' शरणागत, अति अघ अघहारी।


पद-रज पावनकारी, चाहत चितहारी।।


भावार्थ्:-हे नारायण! आप तो आपके शरण में आये हुए शत्रु की भी रक्षा करने वाले होते है, आपके शरण में आये हुए बहुत ही पापी एवं दुष्कर्मी को भी माफ कर देते हो। आपके पैरों की धूल भी पावन करने वाली होती है और आप तो सभी का हित करना चाहते हो।



      ।।इति श्री गिरधारी जी की आरती।।


    ।।अथ आरती श्री गिरधारी जी की।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



जय गोविन्द दयानिधि, गोवर्धन धारी।


वंशीधर बनवारी, ब्रज जन प्रियकारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



गणिका गोध अजामिल गणपति भयहारी।


आरत-आरति हारी, जय मंगल कारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



गोपालक गोपेश्वर, द्रौपदी दुखहारी।


शबर-सुता सुखकारी, गौतम-तिय तारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



जन प्रहलाद प्रमोडक, नरहरि तनु धारी।


जन मन रंजनकारी, दिति-सुत संहारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



टिट्टिभ-सुत संरक्षक, रक्षक मंझारी।


पाण्डु सुवन शुभकारी, कौरव मद हारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



मन्मथ-मन्मथ मोहन, मुरली-रव कारी।


वृन्दाविपिन बिहारी, यमुना तट चारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



अघ-बक-बकी उधारक, तृणावर्त तारी।


बिधि-सुरपति मदहारी, कंस मुक्तिकारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



शेष, महेश, सरस्वती, गुन गावत हारी।


कल कीरति विस्तारी, भक्त भीति हारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



'नारायण' शरणागत, अति अघ अघहारी।


पद-रज पावनकारी, चाहत चितहारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



      ।।इति आरती श्री गिरधारी जी की।।


।।जय बोलो गिरधारी बांके बिहारी जी की जय हो।।


        ।।जय बोलो केशवजी की जय हो।।



Monday, September 11, 2023

September 11, 2023

जानें मकान की नींव में सर्प और कलश क्यों गाड़ा जाता हैं? (Know Why are snakes and urns buried in the foundation of the house?)

जानें मकान की नींव में सर्प और कलश क्यों गाड़ा जाता हैं? (Know Why are snakes and urns buried in the foundation of the house?):-प्राचीनकाल में जब मनुष्य अपना जीवन पेड़-पौधों के नीचे ही व्यतीत करते थे। उनको जब जीव-जंतुओं का भय होने लगा तब उन्होंने अपने जीवन की सुरक्षा के लिए उन्होंने मकान बनाने लगे। तब हमारे ऋषि-मुनियों ने मकान को मजबूती प्रदान करने के मकान की नींव भरते समय पूजा पद्धति को शुरू किया। इस पूजा पद्धति में उन्होंने भगवान के रूप में रजत धातु से बने सर्प एवं ताम्र धातु से बने कलश को नींव में रखने का विधान शुरू किया, जिस तरह से भगवान श्रीविष्णुजी की शेषनाग अपने फणों की छत करते हैं, उसी तरह शेषनाग के प्रतिनिधित्व के रूप में नींव में रजत से बने सर्प को भूमि में गाड़ने से मकान मजबूती से स्थिर रहता हैं। मकान समस्त जगत के प्राणियों के रहने का स्थान होता हैं, उस मकान में रहते हुए अपनी समस्त क्रियाकलापों को सम्पन्न करते हैं। मकान एक तरह से सुरक्षा कवच होता हैं। समस्त प्राणी अपनी सुरक्षा करने एवं समस्त तरह की आपदाओं से बचने के लिए मकान बनाते हैं। 




Know Why are snakes and urns buried in the foundation of the house?


 

श्रीमद्भागवत पुराण के पांचवे स्कंध के अनुसार:-हिन्दुधर्म के पुराणों में पृथ्वी पर सात पातालों के बारे में विवरण मिलता हैं, वे सात पाताल अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल आदि तरह के होते हैं। इन समस्त पातालों की लम्बाई-चौड़ाई दस-दस हजार योजन की बताई गई है। पृथ्वी में जो भी खोदे गए लंबे छेद या सुराख या कोटर भी एक तरह से स्वर्ग के समान माने गए हैं। इनमें से एक पाताल लोक होता हैं, जो कि पृथ्वी के बहुत ही नीचे का लोक होता है, इस लोक के स्वामी शेषनाग होते हैं। 



पृथ्वीलोक:-पृथ्वीलोक सबसे ऊपर स्थित होता हैं, उसके बाद सात लोक होते हैं, जो निम्नलिखित हैं-


१.अतललोक:-दस हजार योजन पृथ्वी से नीचे की तरफ अतल होता हैं।


२.वितललोक:-दस हजार योजन अतल से नीचे की तरफ वितल होता हैं।


३.सतललोक:-दस हजार योजन अतल से नीचे की तरफ वितल होता हैं।


४.तलातललोक:-दस हजार वितल अतल से नीचे की तरफ तलातल होता हैं।


५.महातललोक:-दस हजार योजन तलातल से नीचे की तरफ महातल होता हैं।


६.रसातललोक:-दस हजार योजन महातल से नीचे की तरफ रसातल होता हैं।


७.पाताललोक:-दस हजार योजन रसातल से नीचे की तरफ पाताल होता हैं।


समस्त सात लोकों में इच्छा, उपयोग में लाने, आनन्द अलौकिक खुशी का अनुभव, विपुलता और आधिपत्य आदि होते हैं।



समस्त सात लोक में:-समस्त सात लोकों में दैत्य, दानव और नाग आदि प्राणी निवास करते हैं। इन प्राणियों का जीवन भोग-विलास से युक्त होकर खुशी से रहते हैं। इस तरह इन लोकों में किसी भी तरह से सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती हैं, जिससे इन लोकों में अंधकार ही रहता है और रात-दिन नहीं होती हैं। इन लोकों में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचने से अंधेरा को दूर करने के लिए नागों के द्वारा अपनी मणियों की रोशनी से उजाला करते हैं, ये मणियाँ नागों के मस्तिष्क पर होती हैं। जो कि थोड़ी सी चमकने पर समस्त जगहों पर उजाला की किरणों को प्रकट कर देते हैं, जिससे समस्त जगह पर प्रकाश फैल जाता हैं और देवलोक की तरह इन लोकों में अनेक तरह के उपवन एवं वाटिकाऐं होती हैं, जो कि बहुत ही आकर्षण प्रदान करते हुए चारों के माहौल को खुशामद बना देते हैं। सातवां लोक पाताललोक होता हैं, इस पाताललोक का स्वामी नागों के राजा वासुकी को माना जाता हैं, वे अपनी नागलोक के समस्त नागों के साथ रहते हैं।




श्री शुकदेवजी प्राचीन मान्यता के अनुसार:-शेषनाग तीस हजार योजन पाताललोक से नीचे रहते है। शेषनाग अपने मस्तक के ऊपर पृथ्वी को सम्भाले रखते हैं और संतुलन एक तरह का बनाने की कोशिश करते हैं। जब विस्तृत भू-भाग में होने वाली भयंकर बर्बादी का समय आता है तो जगत को नाश करने की इच्छा को रखते हुए शेषनाग अपना आपा खो बैठते हैं और बहुत ही गुस्से के भाव से अपनी भृकुटियां तान लेते हैं। फिर उन तनी हुई भृकुटियां के बीच से तीन चक्षुओं से युक्त ग्यारहा रुद्र त्रिशूल लेकर सामने जाहिर हो जाते हैं।



महाभारत के अनुसार:-महाभारत में भी इसी बात को इस तरह से वर्णित किया हैं-


शेषं चाकल्पयद्देवमनन्तं विश्वरूपिणम्।


यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम्।।


(महाभारत/भीष्मपर्व ६७/१३)



अर्थात्:-विश्वरूप का मतलब दो शब्दों से अर्थात् संसार और रूप मिलकर बना हैं। इसका अर्थ विराट रूप भगवान श्रीविष्णुजी एवं श्रीकृष्णजी के सार्वभौमिक स्वरूप हैं, इस सार्वभौमिक स्वरूप ने अनंत नामक देवस्वरूप शेषनाग को एक ईश्वरीय शक्ति ने उत्पन्न किया। यही शेषनाग ने समस्त पर्वतों के साथ सम्पूर्ण पृथ्वीलोक और सूक्ष्म रूप मात्र या भूत मात्र को अपने मस्तक पर धारण किए हुए हैं।


 

भवन की नींव में सर्प-स्थापना:-भवन को बनाने से पहले नींव में सर्प को स्थापित करने का कारण यह हैं, की सर्प को भगवान का विष्णुजी का स्वरूप माना गया है। इस प्रकार भवन की सम्पूर्ण सुरक्षा का भार स्वयं भगवान के ऊपर छोड़ दिया जाता हैं।



पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार:-प्राचीन समय में रचित पुराणों के गर्न्थो के अनुसार शेषनाग का महत्व बताया गया हैं, की समस्त पृथ्वीलोक के समस्त वजन को शेषनाग अपने फणों या मस्तक पर धारण करते हुए समस्त पृथ्वी का वजन सहन करते हुए पृथ्वीलोक का संतुलन को बनाए रखते हैं। इस प्रकार समस्त पृथ्वीलोक के वजन को सहन करते हुए पृथ्वीलोक को अपने फणों पर नियंत्रण करते हुए पृथ्वीलोक के निवासियों की सुरक्षा करते हैं, उसी तरह भवन की नींव को मजबूती को बनाये रखने के लिए नींव में चांदी का सर्प स्थापित किया जाता हैं, जिससे भवन का संतुलन बना रहे। 



शेषनाग हजार फणों को धारण किए हुए होते हैं, समस्त नागलोक के स्वामी शेषनाग को माना जाता हैं। भगवान श्रीविष्णुजी के शयन के लिए बिछावन के रूप में आधार देने वाले शेषनाग होते है और अपने फणों के द्वारा भगवान श्रीविष्णुजी की छत्र के रूप में छाया प्रदान करते हैं, इस तरह भगवान श्रीविष्णुजी को शेषनाग अपने शरीर रूपी बिछावन से आराम देते हुए उनको आनन्द देने वाले उनके बहुत एकनिष्ठ अनुरागी होते हैं। समय-समय पर भगवान श्रीविष्णुजी के द्वारा जगत में लोक कल्याण करने के लिए उनको अवतार लेना पड़ता है, तब बहुत बार शेषनाग ने भी श्रीहरि के सानिध्य को पाने के लिए उनके साथ अवतार लेते हैं और श्रीहरि की सेवा करते हुए उनकी के द्वारा की जाने वाली क्रीड़ाओं में साथ भी देते हैं।




श्रीमदभगवद गीता के दशवें अध्याय के उनतीस वें श्लोक में:-'मैं स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इस बात को इस प्रकार कहते हैं-


'अनन्तश्चास्मि नागानां' 


अर्थात्:-श्रीकृष्णजी कहते हैं, की समस्त लोकों में नागों में शेषनाग का स्वरूप मेरा ही हैं और मैं ही शेषनाग हूं।




नींव पूजन में मनोवैज्ञानिक विचारधारा के आधार पर रजत धातु के सर्प को नींव में रखना:-नींव पूजन को मनुष्य के द्वारा बहुत ही श्रद्धापूर्वक किया जाता हैं, जिसमें मनुष्य के मन में प्राचीन विचारधारा के अनुसार बनी धारणा को मानते हुए मानसिक या भावुकता मय श्रद्धा एवं आस्था भाव नींव में सर्प को रखते हैं, जिससे मनुष्य का आवास एकदम मजबूती के साथ कायम रहे, किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहें और नींव के द्वारा आवास का संतुलन बना रहे, जिस तरह से शेषनाग अपने फणों पर पृथ्वीलोक को टिकाकर रखे हुए और पृथ्वीलोक का संतुलन बनाकर रखते है। जिससे पृथ्वीलोक में किसी भी तरह का व्यधान नहीं हो पावें। रजत धातु के बने हुए सर्प को नींव में रखा जाता है, क्योंकि शेषनाग का निवास क्षीर सागर होता हैं, वे उस क्षीरसागर में रहते हुए अपना संतुलन को बनाकर रखते हैं। यही कारण है कि पूजन के समय विष्णुजी के स्वरूप कलश में दूध, दही और घृत आदि डाले जाते हैं, फिर मन्त्रों के द्वारा शेषनाग को उस नींव के पूजन के जगह पर आने का नियंत्रण देने हेतु उनकी अरदास करते हैं और उनसे प्रार्थना भी करते हैं आप यहां पर प्रत्यक्ष आकर भवन की रक्षा करने को अपने ऊपर लेकर उस भवन के भार का निर्वाह करें।



पूजन करते समय विष्णुजी के स्वरूप में कलश देव में लक्ष्मीजी के स्वरूप में सिक्का, फूल, दुग्ध, दही और घृत आदि को अर्पण करते हैं, यह समस्त वस्तुएं नागलोक के समस्त नागों को बहुत ही प्यारी होती हैं। नागदेव को भगवान शिवजी ने अपने गले में धारण किए रहते हैं और नाग को अपने गले का भूषण मानते हैं। शेषनाग के अवतार के रूप लक्ष्मणजी ने रामायण में भगवान रामजी की सेवा करने के लिए अवतार लिया और भगवान श्रीविष्णुजी ने कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए श्रीकृष्ण के रूप एवं श्रीकृष्ण की सहायता करने के लिए शेषनाग ने उनके बड़े भाई बलराम के रूप में अवतार लिया था। इस तरह भगवान के अवतार के साथ जुड़ी हुई घटनाओं के आधार पर यह विचाधारा चल रही हैं।




 



Tuesday, August 15, 2023

August 15, 2023

सूर्यदेव को अर्घ्यं जल क्यों दिया जाता है? जानें विधि, मंत्र, समय, लाभ और महत्त्व(Why is Arghya water offered to the Suryadev? Know the vidhi, mantra, timing, benefits and importance)

सूर्य को अर्घ्यं जल क्यों दिया जाता है? जानें विधि, मंत्र, समय, लाभ और महत्त्व (Why is Arghya water offered to the Surya? Know the vidhi, mantra, timing, benefits and importance):-धार्मिक रूप से उपास्य पाँच देव-सूर्यदेव, शिवदेव, विष्णुदेव, भगवान गणेशजी और दुर्गा माताजी को धर्म शास्त्रों में सबसे पहले पूजनीय बताया गया हैं, जबसे सृष्टि की रचना हुई हैं, तब से इनकी वंदना की जाती हैं और आज के युग में वंदित हैं। इन पंचदेव में से भी सूर्य को देव के रूप में पूजन किया जाता हैं। इस तरह जबसे सृष्टि की रचना हुई हैं, तब से सूर्य का अस्तित्व हैं। इस तरह सूर्य को एक देव के रूप में पूजन किया जाता हैं। समस्त जगत में भास्कर देव के द्वारा चारों ओर के अंधेरे को हरण करके अपनी प्रखर किरणों से जगत में उजाला प्रदान करते हैं। इस तरह से सूर्यदेवजी को स्पष्ट रूप से अपनी आंखों से दिखाई देने वाले देव कहा जाता हैं। सूर्यदेव विशेष रूप से रविवार के दिन बहुत प्रसन्न रहते है और सप्तमी तिथि के दिन को बहुत प्रसन्न होते हैं, इसलिए रविवार एवं सप्तमी तिथि सूर्यदेव की प्रिय तिथि एवं वार होते हैं।







Why is Arghya water offered to the Surya? Know the vidhi, mantra, timing, benefits and importance





सूर्यषष्ठी और संक्रांतियों के अवसर पर सूर्योपासना का विशेष विधान या विधि:-बताया गया है। जो इस तरह हैं-सामान्यतः प्रत्येक रविवार को सूर्योपासना की जाती हैं। प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योपासना करने के लिए रक्त चंदन से मंडल बनाकर तांबे के कलश में जल, लाल चंदन, अक्षत, लाल फूल और कुश आदि रखे जाते हैं। फिर घुटने टेककर प्रसन्न मन से सूर्यदेव की ओर मुंह करके कलश को छाती के सामने बीचो-बीच लाकर गायत्री मंत्र, सूर्य मंत्र का जप करते हुए जल की धारा धीरे-धीरे प्रवाहित की जाती हैं। सूर्यदेव को अर्ध्य जल देकर फिर पुष्पांजलि अर्पित की जाती हैं। सूर्यदेवजी को तीन बार जल से अर्घ्यं को अर्पण करना चाहिए। फिर नतमस्तक होकर उनकी वंदना करनी चाहिए।




सूर्यदेव को अर्घ्यं अर्पण करते समय उच्चारण करने का मंत्र:-सूर्य भगवान को अर्घ्यं देते समय मनुष्य को निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए-



एहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।


अनुकम्पय मां देवी गृहाणार्घ्यं दिवाकर।।


अर्थात्:-हे सूर्यदेवजी! आप अपनी असंख्य अग्नि के समान किरणों के द्वारा समस्त लोकों में उजाला करने वाले जगपती हो। जिस तरह मां देवी अपने भक्तों पर अपनी अनुकम्पा रखती हैं, उसी तरह से जो भक्त आपको अर्घ्यं का जल अर्पण करता हैं उस पर अपनी अनुकम्पा बनाकर रखना दिवाकर जी।



शिव पुराण के अनुसार अर्घ्य देते समय प्रभावशाली मंत्र का वांचन करना:-सूर्य मंत्र अथवा गायत्री मंत्र के स्थान पर शिव पुराण में वर्णित निम्नलिखित मंत्र का भी जाप किया जा सकता हैं-


सिन्दूरवर्णाय सुमण्डलाय नमोस्तुते वज्राभारणाय तुभ्यम्।


पद्माभनेत्राय सुपंकजाय ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय।।


सरक्तचूर्ण ससुवर्णतोयंस्त्रककुंकुमाढ्यं सकुश सपुष्पम्।


प्रदत्तमादायसहेमपात्रं प्रशस्तमर्घ्यं भगवन् प्रसीद्।।



अर्थात्:-सिंदूर वर्ण के समान सुंदर मंडल वाले, हीरा नामक रत्न, बहुमूल्य पत्थर जैसे-मणि, नगीना आदि आवरणों से सुसज्जित कमल के समान नेत्र वाले, हाथ में कमल धारण करने वाला ब्रह्मा, विष्णु और इंद्रादि या सम्पूर्ण सृष्टि के मूल कारण हे प्रभु! हे आदित्य!! आपको नतमस्तक नमन है। भगवन! आप सुवर्ण पात्र में रक्तवर्णी चूर्ण कुमकुम, कुश, पुष्पांजलादि से युक्त रक्तवर्णिम जल द्वारा प्रदान किए गये श्रेष्ठ अर्घ्य को ग्रहण करके प्रसन्न हों। 




सूर्यदेव की आराधना या अर्घ्यं जल देने या चढ़ाने का उपयुक्त समय:-सूर्य भगवान को अपनी पूजा-अर्चना से संतुष्ट करने एवं अपने पर उनकी कृपा की बारिश करवाने के लिए उनकी पूजा का सबसे अच्छा समय सूर्यदेव के उदय का समय होता हैं और जब सूर्यदेवजी कि पहली-पहली किरणें पड़ने लगती हैं, तब जल अर्घ्यं देना चाहिए। सूर्यदेवजी की किरणें जब तीव्र रूप में हो और मनुष्य को सूर्यदेव की किरणों से देह पर सुई की तरह चुभन की तरह महसूस होने पर जल देने पर कोई मतबल नही होता हैं। 



सूर्यदेवजी को अर्घ्यं जल देते समय मनुष्य का मुख कौनसी दिशा में होना चाहिए?:-सूर्यदेवजी को अर्घ्यं जल देते समय मनुष्य का मुहं पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।



सूर्यदेवजी को अर्घ्यं जल देते समय कौनसा पैर उठाना चाहिए?:-मनुष्य के द्वारा जब भी अर्घ्यं का जल सूर्यदेवजी को चढ़ाए जाता हैं, तब वे अपना दायाँ पैर ऊपर उठाकर बाएँ पैर पर रखते हुए जल अर्पण करना चाहिए।



सूर्यदेवजी को अर्घ्य देने से मिलने वाले लाभ:-जब मनुष्य के द्वारा सूर्यदेवजी को नियमित रूप से अर्घ्य देने पर निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं, जो इस तरह हैं-



1.अपने समान गुणों को प्रदान करते:-मनुष्य के द्वारा जब सूर्यदेवजी कि आराधना की जाती हैं, तब मनुष्य को सूर्यदेवजी अपने समान ही गुणों को प्रदान करते हैं।



2.मनुष्य के चेहरे की चमड़ी या त्वचा की सिकुड़न होने से मुक्ति:-मनुष्य को अपने चेहरे की चमड़ी या त्वचा की सिकुड़न से मुक्ति मिल जाती है और झुर्रियां खत्म हो जाती हैं, जिससे चेहरा खिला-खिला दिखाई पड़ता है और चेहरे पर एक तरह की आभा दिखाई पड़ती हैं।



3.मनुष्य में अपनी तरफ आकर्षित करने की शक्ति हेतु:-मनुष्य में दूसरे मनुष्य को अपनी तरफ खींचने के भाव आ जाते है। जिससे दूसरे मनुष्य प्रभावित होते हैं।



4.मनुष्य की आंखों की दृष्टि सम्बन्धित परेशानी से मुक्ति हेतु:-मनुष्य को यदि आंखों से कम दिखाई देता हैं और नेत्र ज्योति कमजोर हो गई हो तो उन मनुष्य को सूर्यदेवजी के मंत्रों का वांचन करना चाहिए। जिससे मनुष्य के नेत्रों की ज्योति में बढ़ोतरी होती है।




5.कमजोर सूर्यग्रह को मजबूत बनाने हेतु:-जब मनुष्य की जन्मकुंडली एवं ग्रह गोचर के समय सूर्य ग्रह कमजोर हालात में हो तो सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए सूर्यदेवजी के मंत्रों का वांचन करना चाहिए।




6.मनुष्य को रुपये-पैसों की तंगी से मुक्ति हेतु:-मनुष्य को अपने जीवन के रुपयों-पैसों की तंगी को दूर करने हेतु नियमित रूप से सूर्यदेवजी को अर्घ्य देना चाहिए, जिससे आर्थिक स्थिति में सुधार होता हैं। 




7.मनुष्य को अपने आप पर विश्वास को बढ़ाने हेतु:-मनुष्य में सभी तरह की योग्यता होने पर भी अपने आप पर विश्वास नहीं रहता हैं, जिससे मनुष्य को अपनी योग्यता के अनुसार फल प्राप्त नहीं हो पाता है, इसलिए मनुष्य सूर्यदेवजी को अर्घ्य नियमित रूप से देने पर अपने आप पर विश्वास बढ़ जाता हैं।



8.सकारात्मक भाव जागृत करने हेतु:-मनुष्य के मन में हर समय नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगते है, उन नकारात्मक भावों से मुक्ति पाने हेतु मनुष्य को हमेशा अर्घ्य देना चाहिए।




9.मनुष्य को मान-सम्मान पाने हेतु:-मनुष्य में योग्यता एवं कार्य कुशलता होने पर भी मान-सम्मान नहीं मिलने पर नियमित रूप से अर्घ्य देने पर हर जगह पर मान-सम्मान मिलने लग जाता हैं। मिलता है। 





सूर्योपासना में अर्घ्य या जल देने का महत्त्व:-समस्त तरह के पुराणों, वेदों, उपनिषदों, आयुर्वेद शास्त्र और वैज्ञानिक रूप से महत्त्व बताया हैं, जो इस तरह हैं- 




स्कंदपुराण के काशीखंड के अनुसार:-सूर्यदेवजी की आराधना से मनुष्य को चारों पुरुषार्थ जैसे-मनुष्य के द्वारा जो भलाई से सम्बंधित एवं अपने ईश्वर, परलोक आदि के सम्बंध में विशेष तरहसे विश्वास एवं उपासना पद्धति को ही धर्म कहते हैं, इंद्रियों के विषय-रूप, रस, गन्ध, शब्द एवं स्पर्श से सम्बंधित एवं रुपये-पैसों से सम्बंधित भाव को अर्थ कहते हैं, इन्द्रिय या विषय-सुख से सम्बन्धित भाव को काम कहते हैं और जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति पाने को मोक्ष कहते हैं। इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही धन-धान्य, आयु, स्वास्थ्य, पशु, धन, विविध भोग और स्वर्ग आदि भी सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।




सूर्योपासना का महत्त्व ब्रह्मपुराण के अनुसार:-'ब्रह्मपुराण' में सूर्यदेव की उपासना के महत्त्व के बारे में इस तरह बताया है-



मानसं वाचिकं वापि कायजं यच्च दुष्कृतम्।


सर्व सूर्यप्रसादेन तदशेषं व्यपोहति।।



अर्थात्:-जो मनुष्य श्रद्धा-भक्ति से सूर्यदेव की उपासना करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। सूर्यदेव स्वयं उपासक के सम्मुख प्रकट होकर उसकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। सूर्यदेव की कृपा से मनुष्य मानसिक, शारीरिक और वाणी सम्बन्धी सभी धर्म एवं नीति के विरुद्ध किये गए आचरण विनष्ट हो जाते हैं।



ऋग्वेद के अनुसार:-सूर्यदेव में पापों से मुक्ति, रोगों का नाश करने, आयु एवं सुखों में वृद्धि करने वाले तथा दरिद्रता निवारण की अपार क्षमता है। इसी कारण ऋग्वेद में इनके संतुलन हेतु सूर्यदेव से प्रार्थना की गई है। वेदों में भी ओजस्, तेजस और ब्रह्मवर्चस्व कि प्राप्ति के लिए सूर्योपासना करने का विधान दिया गया हैं।



यजुर्वेद के अनुसार:-सूर्यदेव की आराधना इसलिए कि जानी चाहिए कि वह मानव मात्रक सभी शुभाशुभ कार्यों के साक्षी हैं और उनसे हमारा कोई भी कार्य-व्यवहार छुपा हुआ नहीं है।




ब्रह्मपुराण के अनुसार:-सूर्यदेव सर्वश्रेष्ठ देवता हैं और सभी देवता इन्हीं के प्रकाशरूप हैं। सूर्यदेव की उपासना करने वाले उपासक जो भी सामग्री इन्हें अर्पित करते हैं, सूर्यदेव उसे लाख गुणा करके लौटा देते हैं।




अग्निपुराण के अनुसार:-गायत्री मन्त्र के द्वारा सूर्योपासना करने पर वे प्रसन्न होते हैं और उपासक को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।



स्कन्दपुराण के अनुसार:-सूर्यदेवजी को अर्ध्य जल दिए बिना भोजन करना पाप-भक्षण के समान हैं।



सूर्योपनिषद् के अनुसार:-समस्त देव, गंधर्व और ऋषि भी सूर्य-रश्मियों में वास करते हैं। सूर्योपासना के बिना किसी का भी कल्याण संभव नहीं हैं। चाहे कोई अमरत्व के गुणों से भरपूर देवता ही क्यों न हो।




सूर्यदेवजी को अर्घ्य देने के विषय से सम्बंधित ध्यान रखने योग्य बातें एवं सावधानियां:-मनुष्य सूर्यदेवजी को अर्घ्य देते समय निम्नलिखित बातों एवं सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए। जो इस तरह हैं-



1.मनुष्य को नियमित रूप से 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का वांचन करना:-मनुष्य को हमेशा सूर्यदेवजी को खुश करने के लिए उनका 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का वांचन करना चाहिए।



2.मनुष्य को अपने शरीर पर एवं आहार में उपयोग में नहीं लेना:-मनुष्य को रोगन एवं नमक को रविवार के दिन अपने भोजन में शामिल नहीं करना चाहिए।




3.मनुष्य को रविवार के व्रत में एक समय आहार को ग्रहण करना:-मनुष्य को रविवार के दिन व्रत करते हुए एक बार ही भोजन को करना चाहिए।




4.मनुष्य को समस्त नियमों का पालन करने से सम्बंधित बातें:-इस तरह से मनुष्य के द्वारा रविवार को नियमों का पालन करते हुए सूर्यदेवजी को अपनी पूजा-अर्चना से सन्तुष्ट करते हैं, तो सूर्यदेवजी का आशीर्वाद मिल जाता हैं।




5.मनुष्य को अपने मन की कामनाओं को पूर्ण करने हेतु:-मनुष्य को किसी महीने के शुक्लपक्ष में पड़ने वाले रविवार से संकल्प करते हुए अपने जीवनभर के लिए या अपनी इच्छा पूर्ति के निमित पांच, सात, नो, ग्यारहा, इक्कीस, इकतीस या इक्यावन रविवार आदि में से जो इच्छा होती हैं, उतने रविवार तक यह प्रयोग करना चाहिए।



6.मनुष्य को अपने शरीर के वजन के अनुसार वस्तुओं को जल में प्रवाहित करना:-मनुष्य को गुड़ एवं चावल को अपने शरीर वजन के अनुसार में मात्रा में लेकर रविवार के दिन किसी भी नदी, सरोवर या बहते हुए पानी में बहाया जाने पर उचित फल मिलता हैं।



7.मनुष्य को ताम्र धातु से बनी वस्तुओं को जल में प्रवाहित करना:-मनुष्य को ताम्र धातु से बने सिक्कों को भी नदी, तालाब या बहते हुए जल में बहाया जाते है तब मनुष्य को सूर्य ग्रह से होने वाली परेशानी से मुक्ति मिल जाती हैं।




8.मनुष्य को सूर्यदेवजी को खुश करने हेतु मीठे चीजों को निवास स्थान पर बनाना:-मनुष्य को सूर्यदेवजी को प्रसन्न करने के लिए उनके दिन रविवार को अपने निवास स्थान में मीठा भोजन या मीठे लाल रंग से बने हुए चावल को बनाना चाहिए एवं निवास स्थान के समस्त मनुष्यों को उस मीठे भोजन या गुड़ से बनी वस्तुओं को आहार के रूप में सेवन भी करना चाहिए। जिससे सूर्यदेवजी का आशीर्वाद निवास स्थान के समस्त मनुष्यों पर बना रहता हैं और निवास स्थान में सुख-शांति बनी रहती हैं।




9.यदि मनुष्य अपने निवास स्थान पर मीठा नहीं बना पाने की स्थिति में:-मनुष्य को अपने निवास स्थान में मीठा नहीं बना पाते हैं, तो उस रविवार को गुड़ को सूर्यदेवजी को अर्पण करना चाहिए। फिर उस गुड़ को समस्त सदस्यों के द्वारा प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाहिए।



10.राजसेवा करने एवं उच्च पद पाने हेतु:-मनुष्य को नियमित रूप से सूर्यदेवजी को अर्घ्य देने पर राजसेवा एवं उच्च पद की प्राप्ति होती हैं।



11.उम्र में बढ़ोतरी पाने हेतु:-मनुष्य को उम्र में बढ़ोतरी के लिए नियमित रूप से अर्घ्य को अर्पण करना चाहिए।




12.शरीर की निरोग्यता पाने हेतु:-मनुष्य के द्वारा सूर्यदेवजी को नियमित रूप से अर्घ्य देते रहने पर शरीर में किसी भी तरह की व्याधि नहीं हो पाती हैं, जिससे मनुष्य की निरोग्यता बनी रहती हैं।




13.सूर्यदेव की किरणों को देखना:-जब भी मनुष्य के द्वारा अर्घ्य दिया जाता हैं, तब उन मनुष्य को सूर्यदेव की पड़ने वाली रश्मियों को जल गिराते समय देखना चाहिए।



14.पैर को अर्घ्य जल नहीं छूना:-मनुष्य को अर्घ्य देते समय गिरने वाला जल पैरों को नहीं छूना चाहिए।



15.बिना पैरों में कुछ धारण किये:-मनुष्य को अपने पैरों में बिना कुछ पहने हुए ही जल अर्घ्यं देना चाहिए।



16.मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना:-मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। 



17.लाल वस्त्र को पहनना:-जब मनुष्य सूर्यदेवजी को अर्घ्यं जल देते समय लाल रंग के वस्त्र को धारण करना चाहिए।



18.नियमित रुप से जल चढ़ाएं:-मनुष्य को नियमित रूप से जल चढ़ाना चाहिए।



सूर्यदेवजी को खुश करने हेतु एवं अपने जीवन में सफलता पाने हेतु करने योग्य उपाय:-निम्नलिखित हैं-



1.किसी दूसरे मनुष्य को दिया हुए रुपये-पैसों एवं आभुषण को वापस पाने हेतु:-जब मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य की मदद के फलस्वरूप उस मनुष्य को उधार के रुपये-पैसे दे देता हैं और किसी कारणवश मनुष्य को अपने आभूषण की किसी दूसरे मनुष्य को हिपाजत के लिए देना पड़ता है, जब मनुष्य को जरूरत पड़ती हैं, तब उस मनुष्य के द्वारा वापस देने में मना करना या आनाकानी करने लगता हैं। इस तरह की परेशानी से बचने एवं वापस धन-सम्पत्ति को पाने के लिए निम्नलिखित सूर्यदेवजी का उपाय करने से निश्चित परिणाम मनुष्य के पक्ष में मिलते हैं-



1.मनुष्य को एक ताम्र धातु से बना छोटा कलश या लोटा लेकर उसमें जल भर लेवे।



2.फिर गुड़, चावल, लाल रंग के पुष्प, रक्त चंदन, कुमकुम और सुखी साबुत लाल रंग की मिर्च आदि लेवे। इन सभी वस्तुओं को उस ताम्र पात्र में डालकर उसमें उस साबुत लाल मिर्च में से निकाले गए ग्यारहा दानों को भी मिलाकर सुबह सूर्य उदय के समय नियमित रूप से अर्घ्य देने से निश्चित फल मिल जाता हैं। 



3.लाल मिर्च की जगह पर साबुत इलायची के ग्यारहा दाने ले सकते हैं। इस तरह से अर्घ्य देते हुए सूर्यदेवजी से अरदास करनी चाहिए। इस तरह से अर्घ्य देने से मनुष्य को अपने आप पर विश्वास बढ़ता हैं और सकारात्मक भाव जागृत होते हैं। मनुष्य की आभा बढ़ती है और मनुष्य को मान-सम्मान मिलता है। मनुष्य को आर्थिक स्थिति से सम्बंधित परेशानी से मुक्ति मिल जाती हैं।




2.मनुष्य को अपने मन की मुराद को प्राप्त करने हेतु:-मनुष्य को अपने इच्छित मन की मुराद को पूर्ण करने के लिए निम्नलिखित मंत्रो का वांचन करना चाहिए-



1.मनुष्य को जो भी सूर्यदेवजी से सम्बंधित मंत्र जो वांचन करने में सरल लगे, उस मंत्र को पूर्ण विश्वास भाव से नियमित रूप से पाठन करना चाहिए। जिससे मनुष्य को सूर्यदेवजी की अनुकृपा मिल सके।



1.ऊँ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।


2.ऊँ घृणिं सुर्य्यः आदित्यः।


3.ऊँ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।


4.ऊँ घृणि सूर्याय नमः।


5.ऊँ घृणिं सुर्य आदित्य श्रीं ओम्। 


6.ऊँ ह्रीं घृणिः सुर्य आदित्यः क्लीं ऊँ। 


7.ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सुर्याय नमः।


8.ऊँ आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्न सुर्यः प्रचोदयात्।


9.ऊँ ऐहि सुर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपये मां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकरः।


2.सूर्यदेवजी से सम्बंधित मंत्रों को जब भी वांचन करना होता हैं, तब मनुष्य को किसी भी महीने के कृष्णपक्ष में पड़ने वाले पहले रविवार को ही शुरू करना चाहिए।


3.मनुष्य को सूर्य उगने के समय पर मंत्रों का वांचन करने का सही समय होता हैं।


4.मनुष्य को जब भी सूर्यदेवजी की आराधना से सम्बंधित मंत्रों का वांचन करना होता हैं, तब उनको लाल रंग का ऊन से बनी हुई बिछावन का उपयोग करना चाहिए।


5.फिर सूर्यदेवजी के उदय होने की दिशा अर्थात् पूर्व दिशा के सामने की तरफ मुख को करके मन ही मन में मंत्रों का वांचन करना चाहिए।