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Saturday, December 7, 2024

December 07, 2024

गार्डन लगाने के वास्तु नियम व वास्तु टिप्स से लगाये घर के गार्डन में पेड़-पौधे (Plant trees and plants in your home garden using Vastu rules and Vastu tips)

गार्डन लगाने के वास्तु नियम व वास्तु टिप्स से लगाये घर के गार्डन में पेड़-पौधे (Plant trees and plants in your home garden using Vastu rules and Vastu tips):-मनुष्य के जीवन को सभी तरह के सुख-आराम को प्रदान करने वाला उसका निवास स्थान होता हैं, जिसमें वह अपने पूरे दिन की थकावट से राहत पाता हैं। निवास स्थान की अंदरूनी साज-सज्जा एवं रंग-रोगन के अलावा पेड़-पौधों एवं गृहवाटिका का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। गृहवाटिका (गार्डन) लगाने से उसमें लगे हुए विभिन्न पेड़-पौधों से आवास स्थान की खूबसूरती में बढ़ोतरी, मन की सभी तरह परेशानियों से मुक्ति एवं आनंद की प्राप्ति, थकावट से राहत, उत्साह में बढ़ोतरी, कुदरती खूबसूरती, वातावरण की स्वच्छता और वास्तुदोषों के नाश आदि के फल मिलते हैं। मनुष्य की आंखों को हरियाली से भरे हुए पेड़-पौधे राहत एवं तन्दुरुस्ती के हिसाब से भी बहुत फायदेमंद प्रदान करते हैं। जिस तरह बहुत सारे भलाई कार्य करने, बहुत अधिक लोकहित सोच से हवन-पूजन करवाने अथवा तड़ाग खुदवाने या फिर देवताओं की पूजा-अर्चना से प्राप्त नहीं होते हैं, वह भलाई केवल एक पौधे को लगाने से सरलता से मिल जाती हैं। इस तरह एक वृक्ष लगाकर जीवधारी प्राणियों को नया जीवन मिलता हैं। वास्तुशास्त्र में भी वृक्षों का मनुष्य से गहरे संबंध के बारे में व्याख्या की गई हैं। जब भी अपने निवास स्थान की जगह पर पेड़-पौधों को लगाते समय वास्तु का भी ख्याल रखना चाहिए अन्यथा ये प्रदूषण दूर करने की अपेक्षा वास्तुदोष भी उत्पन्न करते हैं।




Plant trees and plants in your home garden using Vastu rules and Vastu tips




गृह वाटिका या बगीचा में पौधरोपण के नक्षत्र (Constellations for planting saplings in the home garden or garden):-जब भी गृहवाटिका में पेड़-पौधों को लगाने का ख्याल आने पर  नक्षत्रों का विचार अवश्य करना चाहिए जैसे- उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढ़ा, स्वाति, हस्त, रोहिणी और मूल आदि नक्षत्र पेड़-पौधों को लगाने में अच्छे होते हैं। इन नक्षत्रों के समय में लगाएं गए पेड़-पौधे जल्दी बढ़ोतरी करते हैं। 





घर में बगीचा या गार्डन कहां होना चाहिए और कौन दिशा सबसे अच्छी रहती हैं? (Where should be the garden or garden in the house and which direction is best?):-आवास में से गार्डन के लिए स्थान को निकालते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।



१.आवास स्थान के बायीं ओर की जगह में ही बगीचा लगाना चाहिए।



२.जो मनुष्य अपने निवास की जगह से पूर्व, उत्तर, पश्चिम या ईशान दिशा में फूल-फल आदि के पेड़ से युक्त फुलबगिया बनाता है, वह मनुष्य हमेशा गायत्री से युक्त, धर्म एवं श्रद्धा से दोनों हाथों से देने वाला और लोकहित के विचार से हवन-पूजन युक्त शुभ काम को करने वाला होता हैं।



3.लेकिन जो मनुष्य अपने निवास की जगह से आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य या वायव्य में फूल-फल आदि के पेड़ से युक्त गार्डन बनाता है, वह मनुष्य हमेशा रुपये-पैसे की तंगी एवं नुकसान भोगने वाले, सन्तान के रूप में पुत्र उसके मान-सम्मान को ठेस पहुँचाने वाले तथा परलोक में निंदनीय लोकचर्चा प्राप्त होती है। वह मृत्यु को प्राप्त होता है। वह वंश-परम्परा आदि समाज में खराब चाल-चलन वाला और ओछा-दूसरे की बुराई करने वाला होता हैं। इसलिए निवास स्थान के नैऋत्यकोण अथवा अग्निकोण में गृहवाटिका नहीं लगानी चाहिए।




गार्डन में दिशा-विशेष में स्थित होने पर शुभ अथवा अशुभ फल:-कई वृक्ष ऐसे हैं, जो दिशा-विशेष में लगे होने पर शुभ अथवा अशुभ फल देने वाले हो जाते हैं, जैसे-



फसलों के लिए दिशाओं हेतु चुनाव:-जब भी कोई किसान या गृहवाटिका में अनाज और फल या फसलों या पेड़-पौधे को लगाना हो, तो उनको निम्नलिखित दिशाओं का चुनाव करके लगाने पर फायदा होता हैं।


 

1.नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) में:-जब बहुत वजन वाले बड़े फल या दाने वाली, गूढ़ बलदायक गुण वाले फसलों या पेड़-पौधे को लगाना हो, तो उनको नैर्ऋत्य कोण में लगाना चाहिए।



2.वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) में:-जब लम्बे कद, लम्बाकार दानों या फलों, कम शाखाओं के फैलाव वाले, वायवीय गुणों वाले अनाज और फल या फसलों या पेड़-पौधे को लगाना हो, तो उनको वायव्य कोण में लगाना चाहिए।



3.आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा):-जब गर्म, चरपरे, कम जल वाले, कड़वे, कटु भूख को बढ़ाने वाले मिर्च, अदरक आदि फसलों या पेड़-पौधे को लगाना हो, तो उनको आग्नेय कोण में लगाना चाहिए।



4.ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में:-जब जलीय गुणों वाले (जल के अंश से युक्त रसवाले स्वादिष्ट) रसदार फल या फसलों या पेड़-पौधे को लगाना हो, तो उनको ईशान कोण में लगाना चाहिए।


 


गार्डन के लिए फल-फूल वाले पेड़-वृक्षों की दिशा का चुनाव:-शास्त्रों में पेड़-पौधों या वृक्षों को सही दिशा में लगाने को बहुत जरूरी बताया हैं, जिससे सही दिशा में लगे पेड़-पौधों का फायदा मिल सके। इसलिए निम्नलिखित तरह के अनाज और फल या फसलों या पेड़-पौधे को या वृक्षों को जब भी कोई किसान या गार्डन में लगाने वाला हो, तो उनकी आकृति को ध्यान रखते हुए सही दिशाओं का चुनाव करके लगाने पर फायदा होता हैं। 



1.पूर्व दिशा:-जब मनुष्य के निवास स्थान की पूर्व दिशा में पीपल का वृक्ष लगा होता हैं या लगाया जाता हैं, तब उससे मनुष्य के आवास में रहने वाले सदस्यों को हर समय खौफ सतता रहता हैं और समाज में निम्न आर्थिक जीवन स्तर से जीवन को जीने वाले होते हैं। लेकिन पूर्व दिशा में बरगद का वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह की मन की इच्छाओं की पूर्ति होती हैं।



2.पश्चिम दिशा:-जब मनुष्य के निवास स्थान की पश्चिम दिशा में वट का वृक्ष लगा होता हैं या लगाया जाता हैं, तब उससे मनुष्य के आवास में रहने वाले सदस्यों को राजकीय शासित सत्ता से संकट एवं तकलीफे औरत और खानदान की बरबादी होती हैं और आम, कैथ, अगस्त्य तथा निर्गुण्डी रुपये-पैसों एवं जमीन-जायदाद की बरबादी करवाते हैं। लेकिन पश्चिम दिशा में पीपल का वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।




3.उत्तर दिशा:-जब मनुष्य के निवास स्थान की उत्तर दिशा में गूलर का वृक्ष लगा होता हैं या लगाया जाता हैं, तब उससे मनुष्य के आवास में रहने वाले सदस्यों को मन की कल्पना से उत्पन्न विचारों से कष्ट व झंझट और ऑंखों में होने वाले रोग से कष्ट होता हैं। लेकिन उत्तर दिशा में कैथ और पाकर (पाकड़) का वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।




4.दक्षिण दिशा:-जब मनुष्य के निवास स्थान की दक्षिण दिशा में पाकर (पाकड़) का वृक्ष लगा होता हैं या लगाया जाता हैं, तब उससे मनुष्य के आवास में रहने वाले सदस्यों को व्याधि और सभी तरह से नाकामयाबी मिलती हैं। लेकिन उत्तर दिशा में गूलर और गुलाब का वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।



5.आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा):-जब मनुष्य के निवास स्थान की आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में वट, पीपल, सेमल, पाकर तथा गूलर का वृक्ष लगा होता हैं या लगाया जाता हैं, तब उससे मनुष्य के आवास में रहने वाले सदस्यों को कष्ट और मरण के समान कष्ट होता हैं। लेकिन आग्नेय कोण में अनार का वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।



6.नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) में:-जब मनुष्य के निवास स्थान की नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) में जामुन, कदम्ब और इमली वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।



7.वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) में:-जब मनुष्य के निवास स्थान की वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) में बेल (बिल्व) वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।



8.ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में:-जब मनुष्य के निवास स्थान की ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में आँवला, कटहल एवं आम वृक्ष लगा हुआ होता हैं, तो सभी तरह हितकारी और फलदायक होता हैं।



घर में बगीचा या गार्डन लगाते समय विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए:- 



1.यदि निवास स्थान की जगह के पास में कोई अनिष्टकारी पेड़-वृक्ष लगे हो और उन पेड़-वृक्ष को वहां से काटने में बाधा आ रही हो, तो उन अनिष्टकारी पेड़-वृक्ष और निवास स्थान की जगह के बीच में हितकारी या मंगलकारी पेड़-वृक्ष को लगा देना चाहिए।




2.यदि मनुष्य के आवास के नजदीक पीपल का वृक्ष लगा हो, तो उस पीपल के वृक्ष की नियमित रूप से विनय, श्रद्धा और समपर्ण की सोच से जल, फूल, फल, अक्षत आदि चढाकर पूजा एवं देखभाल करते रहना चाहिए।



3.यदि किसी वृक्ष, मन्दिर आदि की अनुकरण रूपी प्रतिकृति दिन के दूसरे और तीसरे पहर (सूर्योदय से लेकर तीन-तीन घण्टे का एक पहर) में निवास स्थान पर पड़ती हैं, तो उस निवास स्थान के सदस्य हमेशा तकलीफ और व्याधि से पीड़ित रहते हैं।




4.अक्सर नगरों में जमीन का भाग कम होता हैं, अतः आवास स्थान में वट, पीपल, गूलर, आम, नारियल आदि बड़े वृक्षों का लगाना अच्छा नहीं होता है। यह वृक्ष आकार में बहुत बड़े और फैलने वाले होते हैं एवं इसी कारण इनकी जड़ें भी जमीन के बहुत गहराई तक जाती हैं।



5.जमीन के छोटे भाग पर जब इन बड़े आकार एवं गहराई तक फैलने वाले वृक्ष को लगाया जाता हैं, तो इनके जड़ें गहराई में जाने पर आवास की दीवारों में दरज उत्पन्न होने लगती हैं, जिससे आवास को नुकसान की संभावना हो सकती हैं। इस तरह उपरोक्त सभी तरह बड़े आकार वाले वृक्ष अमंगलकारी होते हैं, लेकिन भूमि का टुकड़ा ज्यादा होने पर या जोतने-बोने की जमीन वाले कृषिक्षेत्र आदि में इन्हें लगाया जा सकता हैं।



6.बहुत सारे मनुष्य अपने आवास में किचन गार्डन लगाने लग गए हैं, इस तरह आवास में किचन गार्डन लगाने में किसी विशेष वास्तु सहमति के कायदे नहीं हैं।



7.निवास स्थान की छत पर भी यदि पौधे लगाए जा रहे हैं, तो कोई विशेष नियम नहीं है। बस यह ध्यान रखना चाहिए कि काँटेदार पौधे नहीं हों।



8.जब आवास स्थान में कैक्टस जैसे रेतीली भूमि में उगने वाले रेगिस्तानी पौधे उगाये जाते हैं, तब उस आवास के सदस्यों में बेचैनी, दुश्मनों के द्वारा परेशानी और रुपये-पैसों का नुकसान होता रहता हैं।



9.लॉन या दूब लगाना:-जब निवास स्थान की जगह में खुला घासयुक्त मैदान वाला लॉन या दूब को लगाना हो, तो आवास के पूर्वी अथवा उत्तरी दिशा में हितकारी रहता हैं।



10.यदि आवास के पूर्व दिशा में बड़े एवं फैलाव वाले वृक्षों का न होना या कम होना हितकारी होता हैं। यदि उन वृक्षों को नहीं काट पाने की स्थिति में आवास के उत्तर दिशा की ओर उनके बुरे प्रभावों को ठीक तरह करने के लिए आंवला, अमलतास, हरश्रृंगार, तुलसी, वन तुलसी आदि पौधों में से कोई भी एक पौधों को लगाया जा सकता है।



11.जब वृक्षों में किसी भी कारण से कम फल लगे या नहीं लगते हो, तब उड़द, मूंग, यव, तिल और कुलथी को एक साथ मिलाकर उनको पानी में डालकर उस पानी से उन वृक्षों को जल देना चाहिए।



12.शयनागार में:-मनुष्य अपने दिन भर की थकावट से अपने शरीर को राहत देने के लिए अपने निवास स्थान में  सोने के कक्ष का सहारा लेता है, जिससे उसके शरीर में पूरे दिन की नष्ट हुई ऊर्जा सोकर मिल सके। उस जगह पर भी पौधे लगाने की राह नहीं दे सकते हैं, क्योंकि रात्रिकाल में पेड़-पौधे या वृक्ष अपनी क्रियाविधि को चलाने के लिए कार्बनडाई ऑक्साइड को छोड़ते हैं और स्वयं ऑक्सीजन को उपयोग करते हैं, जिससे शयनागार के पास रहने से मनुष्य को शुद्ध ऑक्सीजन नहीं मिल पाती हैं और कार्बनडाई ऑक्साइड को ग्रहण करना पड़ता हैं जिससे मनुष्य की तन्दुरुस्ती बिगड़ने लगती है और कई रोगों का घर मनुष्य शरीर बन जाता हैं।



13.पुष्प वाले पौधे:-आवास में पुष्प वाले पौधे, मनीप्लान्ट अथवा तड़क-भड़कदार वाले शोभाकारी सजावटी, दीवार, पेड़ आदि पर फैलने वाले बिना तने की लता या बेलों को लगाना भी फलदायक होता है। मनी प्लान्ट अर्थात् रुपयों-पैसों को अपनी तरफ खींचकर धनवान वाला पौधा को हमेशा ईशान कोण या उत्तर दिशा में ही लगाना चाहिए।



14.कंटीले एवं दूध वाले वृक्ष:-वास्तु के अनुसार कंटीले एवं दूध वाले वृक्ष आवास के गार्डन में नहीं लगाने चाहिए।



आसन्नाः कन्टकिनो रिपू भयदाः क्षीरिणोSर्थनाशाय।


फलिनः प्रजाक्षय करा दारूण्यपि वर्जये देषाम्।। 


(बृहत्संहिता 53/86)


अर्थात्:-


काँटें वाले वृक्ष:-आवास के नजदीक टहनियों में सुई के आकार कंटक वाले वृक्ष जैसे-बेर, बबूल, गुलाब, कैक्टस को लगाने से आवास के लोगों हर समय दुश्मनों के द्वारा नुकसान पहुँचाने का डर सताता रहता हैं।




15.सफेद गाढ़े तरल युक्त दूध वाले वृक्ष या पेड़:-पत्तियों या डंठलों में स्थित सफेद तरल वाले पेड़ या वृक्ष को भी अपने आशियाना में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि इन पेड़ या वृक्ष की टहनियों या डंठलों या पत्तियों से निकलने वाला सफेद तरल पदार्थ बहुत ही विष से युक्त होता हैं और नेत्रों के लिए हानिकारक होते हुए जलन सहित पीड़ा देने वाला होता हैं। जो वृक्ष ज्यादा सफेद गाढ़े तरल युक्त दूध वाले हो, उनको लगाने से आवास वाले लोगों को रुपये-पैसों का नुकसान करवाते हैं, जिससे हर समय आर्थिक तंगी के हालात बने रहते हैं।




16.फलदार वृक्षों:-फलदार वृक्षों को अपने निवास स्थान में खुली रखी हुई जगह जिसका उपयोग अपने निवास स्थान के कामों में किया जाता हैं, उस जगह पर फलदार वृक्षों को लगाना अनिष्टकारी शास्त्रों में वर्णित किया गया हैं। क्योंकि इस स्थान में लगे हुए फलदार वृक्षों के फल को तोड़ने के लिए बच्चे वृक्ष पर चढ़कर गिरने का डर रहता हैं जिससे उनको चोट लग सकती हैं और फल तोड़ने के चक्कर में शिला का प्रयोग कर सकते हैं, जिससे निवास स्थान के दरवाजों या खिड़की आदि की जगहों पर लगे दर्पण या आईना को शिला मारकर तोड़ सकते हैं। जो वृक्ष फल वाले हो, उनको लगाने से आवास के लोगों को सन्तान और स्त्री सुख का नुकसान होता हैं। इन फल वाले वृक्षों की काष्ठ को आवास में नहीं लगाना चाहिए। यदि उपरोक्त वृक्षों को काटना संभव नहीं हो, तो इन वृक्षों और आवास के बीच में हितकारी वृक्ष को लगा देना चाहिए।



17.बेल बिना तना वाली लताएं:-जो जमीन, दीवार, पेड़ आदि पर फैलकर बिना तने की लताओं को अपने निवास स्थान के नजदीक नहीं लगाने की राय दी जाती हैं, क्योंकि ये लताएं जब फैलती हुई निवास स्थान की कई जगहों को अपना सहारा बनाकर निवास स्थान पर मकड़ी के झाले की तरह छा जाती हैं, जिससे इन फैली हुई लताओं के शेयर भुजंग, वृश्चिक, मूषक और जो पूरे शरीर को जमीन पर टेढ़ा-मेढ़ा करते हुए खिसकने वाले सरीसृपों या कीड़े-मकोड़े आदि विष से युक्त जीवात्मा निवास स्थान में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे उनके स्पर्श से खाने-पीने की चीजों की दूषित हो जाती है और उनके द्वारा काटने से मानव शरीर में विष के संचार से मृत्यु तक का डर रहता हैं, इसलिए अपने निवास स्थान की जगह पर बेल को नहीं लगाना चाहिए।





18.बड़े और बहुत विस्तृत वृक्षों को:-बड़े-ऊँचे और बहुत फैलाव वाले वृक्षों को लगाने के विषय में शास्त्रों में वर्णन मिलता हैं कि इस तरह के वृक्षों को सदैव दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा या दक्षिण-पश्चिम दिशा में से कोई भी दिशा जो आशियाने में फैले हुए जगह के अनुसार लगाना चाहिए। जिससे कि इन वृक्षों के द्वारा मनुष्य निवास स्थान पर मध्याह्न के समय पड़ने वाली सूर्य की तेज अग्नि के समान गर्मी और नुकसानदायक रश्मियों का प्रभाव मानव शरीर पर नहीं पड़ सके। क्योंकि जब पूर्व दिशा में बड़े पेड़ होंगे तो पौ फटने के समय सूर्य की आने वाली किरणें जो जोश एवं बल देने वाली, निश्चत एवं स्थिर स्वरूप और वास्तुदोषों को दूर करने वाली होती है, वे ठीक से नहीं आ पावेगी। जबकि पश्चिम दिशा में बड़े पेड़ होने पर संध्या के समय की नकारात्मक ऊर्जा एवं बुरे असर से रक्षा करेगी।




19.छोटे वृक्षों या पेड़-पौधों:-छोटे पेड़-पौधों या वृक्षों को हमेशा उत्तर दिशा या पूर्व दिशा या उत्तर-पूर्व या ईशान कोण में लगाने की राह शास्त्रों में वर्णित किया गया हैं, जिससे निवास स्थान पर सूर्य की किरणें सही तरीके से बिना किसी व्यधान से प्रवेश कर सके और सूर्य की गर्मी के द्वारा संचलन करने की शक्ति मानव को मिल सके और शरीर को आवश्यक सोलह विटामिनों में से विटामिन ए व विटामिन डी आदि की उचित मात्रा मिल सके और मनुष्य के शरीर की पुष्टि बनी रह सकें।  




लेकिन कुछ आचार्यों के अनुसार:-वास्तुशास्त्र के कुछ वास्तुशास्त्रियों के अनुसार गुलाब एवं सफेद आक लगाना नुकसान दायक नहीं होता हैं, बल्कि इनको लगाना फायदेमन्द होता हैं।




शास्त्रानुसार भवन के नजदीक वृक्ष होने का शुभाशुभ निर्णय:-निम्नलिखित रूप से लेना चाहिए।



कौनसे अशुभ पेड़ या वृक्ष नहीं लगाये:-मनुष्य को अपने घर के पास निम्नलिखित वृक्ष या पेड़ जैसे-पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा, पीपल, अगस्त्य, बेर, निर्गुण्डी, इमली, कदम्ब, केला, नींबू, अनार, खजूर, बेल आदि को नहीं लगाना चाहिए, अन्यथा अमंगलकारी और नुकसान होता हैं।


 

वास्तु सौख्यम् 39 के अनुसार:-


मालती मल्लिकां मोचां चिच्चां श्वेतां पराजिताम्।


वास्तुन्यां रोपयेद्यस्तु स शस्त्रेण निहन्यते।।



1.अर्थात्:-जब अपने आवास के गार्डन की जमीन में मालती, मल्लिका, मोचा (कपास), इमली, श्वेता (विष्णुक्रान्ता) और अपराजिता आदि पेड़-पौधों को लगाता हैं, वह मनुष्य किसी हथियार के आघात से मृत्यु को प्राप्त करता हैं। 




बदरी कदली चैव दाड़िमी बीजपूरिका।


प्ररोहन्ति गृहे यत्र तद्गृहं न प्ररोहति।। (समरांगण सूत्रधार 38/131)


2.अर्थात्:-जब किसी भी निवास स्थान की जगह पर जब कदली (केला), बदरी (बेर) एवं बांझ अनार आदि बिना बोये उग जाते हैं या बोये जाते हैं, जिससे उस निवास स्थान में रहने वाले सदस्यों के जीवन में बढ़ोतरी नहीं होती हैं। आवास की सरहद में कदली (केला), बदरी (बेर) एवं बांझ अनार के वृक्ष पड़ता है। बेर का वृक्ष ज्यादा दुश्मनी करवाता हैं। 



अश्वत्थं च कदम्बं च कदली बीज पूरकम्।


गृहे यस्य प्ररोहन्ति सगृही न प्ररोहति।। (बृहद्दैवज्ञ.87/9)



3.अर्थात्:-जब किसी भी निवास स्थान की जगह पर जब पीपल, कदम्ब, केला, बीजू नींबू आदि बिना बोये उग जाते हैं या बोये जाते हैं, जिससे उस निवास स्थान में रहने वाले सदस्यों की बढ़ोतरी नहीं होती हैं। 




4.जब आवास स्थान की हद में पलाश, कंचन, अर्जुन, करंज और लश्वेमांतक नामक वृक्षों में से कोई भी वृक्ष होता है, उस आवास स्थान में हमेशा बेचैनी बनी रहती है।




5.पीपल का वृक्ष:-जब आवास स्थान के पास या हद में पीपल का वृक्ष उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों का वंश आगे नहीं बढ़ता हैं, क्योंकि पीपल के वृक्ष पर पितृगणों, साँपों और आत्माओं का निवास होता है। 



6.शमी का वृक्ष:-जब आवास स्थान के पास या हद में शमी का वृक्ष उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों पर बुरी शक्तियों का असर होने लगता हैं। 



7.कीकर का वृक्ष:-जब आवास स्थान के पास या हद में कीकर के वृक्ष उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों पर नकारात्मक शक्ति अपने असर में ले लेती हैं।



8.इमली का वृक्ष:-जब आवास स्थान के पास या हद में पीपल के वृक्ष उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों का वंश आगे नहीं बढ़ता और शारीरिक व मानसिक व्याधि से ग्रसित रहते हैं, क्योंकि शमी, कीकर और इमली के वृक्षों में भी बुरी आत्माओं का निवास माना जाता है, अतः इन्हें घर में नहीं लगाना चाहिए।


9.चंदन का पेड़:-जब आवास स्थान के पास या हद में चंदन का पेड़ उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों को हर समय भय बना रहता हैं। क्योंकि चंदन के वृक्ष से सर्प आकर्षित होते हैं। अतः इन्हें घर में नहीं लगाना चाहिए।



10.नीम का वृक्ष:-जब आवास स्थान के पास या हद में नीम का वृक्ष उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों को हर समय बिना मतलब के क्लेश बना रहता और आवास को नुकसान हो सकता हैं। क्योंकि नीम की जड़े जमीन में गहराई तक जाती हैं, अतः इन्हें घर में नहीं लगाना चाहिए।



11.नारियल के वृक्ष:-जब आवास स्थान के पास या हद में नारियल का वृक्ष उगा हो, तो उस निवास स्थान के लोगों में बिना मतलब एक-दूसरे से श्रेष्ठ होने की और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति बनती हैं। क्योंकि नारियल का वृक्ष की ऊँचाई बहुत ज्यादा होती हैं और हितकारी भी नहीं होते हैं, अतः इन्हें शहरी घर में नहीं लगाना चाहिए।



कौनसे शुभ पेड़ या वृक्ष गार्डन में लगाये:-मनुष्य को अपने आवास में पेड़-वृक्ष जैसे-अशोक, पुन्नाग, मौलसिरी, शमी, चम्पा, अर्जुन, कटहल, केतकी, चमेली, पाटल, नारियल, नागकेशर, अड़हुल, महुआ, वट, सेमल, बकुल, शाल आदि को लगाना हितकारी रहता हैं।



1.अशोक का वृक्ष:-मनुष्य को अपने आवास में अशोक का वृक्ष लगाने पर सभी तरह के आत्मीय दुःख से उपजी वेदना से मुक्ति मिलती हैं और तकदीर का साथ मिलता हैं। यदि आवास स्थान की जमीन का भाग छोटा हैं, तो उसे घर के बाहर भी इसे लगाया जा सकता है।



2.वट या बरगद के वृक्षों:-जो मनुष्य को अपने निवास स्थान से खुली जगह में दो बड़ के वृक्षों का लगाना चाहिए, उस मनुष्य के सभी तरह के धर्म व नीति के खिलाफ किये बुरे अपराधों की माफी मिल जाती हैं। 



3.पलाश या ढाक के वृक्षों:-जो मनुष्य अपने आवास की हद से दूर पलाश के वृक्षों का लगाता है, उन दम्पत्तियों को कहना मानने वाला, सुंदर, सुशील और सभी तरह से आराम प्रदान करने वाला गुणवान पुत्र की प्राप्ति होती हैं। 




4.पारस का वृक्ष:-जो मनुष्य अपने आवास में पीपल से थोड़ा भिन्न छोटा पारस के वृक्ष का लगाता है, उन मनुष्य को जमीन-जायदाद की प्राप्ति होती हैं।



5.पीपल का वृक्ष:-जो मनुष्य अपने आवास की हद से दूर पीपल के वृक्ष को लगाता है, उन मनुष्य को सभी तरह आराम सहित वैभव की प्राप्ति होती हैं।



6.बिल्ब का वृक्ष:-जो मनुष्य को अपने निवास स्थान से खुली जगह में बिल्ब का एक वृक्ष लगाते हैं, उस मनुष्य को धन-संपत्ति की प्राप्ति होती हैं, क्योंकि बिल्व वृक्ष में लक्ष्मी जी का वास्तविक रूप से वास रहता हैं।



7.आँवला का पेड़:-जो मनुष्य अपने आवास की हद से दूर या किसी भी जगह पर आमलक के पेड़ को लगाता है, उस मनुष्य को जमीन-जायदाद, दौलत और सभी तरह की परेशानियों से मुक्ति मिल जाती हैं।



8.श्वेतार्क का पेड़:-जो मनुष्य अपने आवास की हद से दूर या किसी भी जगह पर श्वेतार्क के पेड़ को लगाता है, उस मनुष्य को गणेश एवं शिवजी की अनुकृपा से सोना-चाँदी और अन्य बहुमूल्य धातुएँ सहित द्रव्य की प्राप्ति होती हैं। 



9.केले का पेड़:-जो मनुष्य अपने आवास में या किसी भी जगह पर केले के पेड़ को लगाता है, उस मनुष्य पर भगवान सत्यनारायण जी की अनुकृपा सहित लक्ष्मीजी की कृपा भी मिल जाती हैं। 



10.गूलर का पौधा:-जो मनुष्य अपने आवास में या किसी भी जगह पर गूलर का पौधा को लगाता है, उस मनुष्य को चन्द्रमा ग्रह से मिलने वाली पीड़ा से मुक्ति मिल जाती हैं। ।



11.निर्गुडी का पौधा:-जिस आवास की हद में निर्गुडी का पौधा का लगा होता हैं, उस आवास में हमेशा वैयक्तिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती हैं।


 

12.दूसरे पौधे:-मनुष्य को आवास की हद से दूर अंगूर, पनस, पाकड़ तथा महुआ के पौधों को लगाना भी हितकारी होता हैं।

 


13.पुष्पदार पौधों में:-मनुष्य को आवास की हद से दूर या आवास स्थान में चंपा, गुलाब, चमेली, केतकी पुष्पदार के पौधों को लगाना भी हितकारी होता हैं।



14.नीम का वृक्ष:-जो मनुष्य अपने आवास की हद से दूर या किसी भी जगह पर अर्थात् सड़क के किनारे या जहां पर वह पनप सके उस स्थान पर नीम का वृक्ष को लगाता है, उस मनुष्य को मंगल ग्रह से मिलने वाले कष्टों से मुक्ति, बढ़े हुए कर्ज और खून की बीमारियों से मुक्ति मिल जाती हैं। लेकिन कुछ आचार्यों ने कुछ दूसरे पेड़ जैसे-नीम, चंदन एवं नारियल को लगाना भी हितकारी बताया है।



15.तुलसी का पौधा:-मनुष्य को अपने निवास की जगह के ईशान या ब्रह्म स्थान तुलसी का पौधा लगाना चाहिए, जिससे मनुष्य को सुबह दर्शन करने से सोने के दान की तरह फल मिल जावें, रुपये-पैसों, पुत्र सन्तान की प्राप्ति, सभी तरह परोपकार के कार्यों का फल, ईश्वर भक्ति में रुचि और कल्याण की प्राप्ति हो सकें। लेकिन तुलसी के पौधे को दक्षिण दिशा में में नहीं लगाना चाहिए, अन्यथा मरने के समय यम दूतों के द्वारा दी जाने वाले कष्टों को झेलना पड़ता हैं।

 


विशेष:-जब परिस्थिति वश किसी वृक्ष को काटना पड़े, तो उस स्थिति में दूसरे दश वृक्षों को कहीं पर लगाना चाहिए और उनकी देखभाल सभी तरह जैसे-पानी, खाद, जानवरों आदि से करनी चाहिए। इस तरह से वृक्षों की सेवा करने से जो वृक्षों को काटने से हुए बुरे कर्मों के दोष से मुक्त हो जाता हैं। मनुष्य को बिना वजह वृक्षों को काटना और उनकी डालों, पल्लवों को तोड़ना अनुचित एवं निंदनीय कर्म माना गया है, क्योंकि वृक्षों में भी जीवनी शक्ति होती हैं, क्योंकि यह बात को वैज्ञानिकों ने भी वास्तविक रूप से बिना विवाद के सिद्ध कर चुके हैं कि सुख-दुख और गर्मी, सर्दी व बरसात जैसी सभी चारों तरफ के हालातों से वृक्षों पर असर होता हैं और वे भी सही तरह से अहसास करते हैं। इसी कारण से वृक्षों को काटने और उनको नुकसान पहुँचाने के बारे में भर्त्सना की गई हैं। यही कारण है कि धर्मशास्त्रों में वृक्षों को नष्ट करने की निंदा की गई हैं।



ऋग्वेद के अनुसार:-वृक्षों को दुःख, काटने आदि करने के बारे में निम्नलिखित रूप से ऋग्वेद में कहा गया है-


मा काकम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिम् शस्तीर्वि हि नीनशः।


मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा अदद्यते वेः।।


अर्थात्:-जिस तरह अपनी ताकत के बल द्वारा कुटिल मनोवृत्ति वाला बाज पक्षी दूसरे कमजोर पक्षियों की गर्दन को मरोड़कर उन्हें तकलीफ सहित पीड़ा देता हैं, तुम भी उसी तरह मत बनो। इन वृक्षों को पीड़ा मत दो, उनको जड़ से उखाड़-पछाड़ मत करो। ये सभी संसार के पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं को शरण देते हैं।
















 







 




 





















 


















Thursday, May 19, 2022

May 19, 2022

नकारात्मक ऊर्जा संतुलित कीजिए और बचाएं घर को(Balance negative energy and save the house)

Balance negative energy and save the house





नकारात्मक ऊर्जा संतुलित कीजिए और बचाएं घर को(Balance negative energy and save the house):-ज्योतिष व वास्तु शास्त्र आज के वैज्ञानिक युग में भी उतना ही प्रमाणिक व फायदेमंद है, जितना प्राचीनकाल में हुआ करता था। हालांकि लोग इसे शंका की दृष्टि से देखते हैं और इसे अंधविश्वास मानते हैं। यह गलत है। ऐसा दावा इसलिए किया जा सकता है क्योंकि कोई भी कार्य को करने की रीति, वस्तुओं या विषयों की जानकारी जो मन या विवेक को होती हैं, सोच आदि प्रामाणिक नहीं होगा, तो लम्बे समय तक सदा स्थित रहने वाले रूप से मानने योग्य नहों हो सकता और फिर इस विज्ञान को तो आज पश्चिम देशों में भी प्रखर स्वीकृति मिल रही है।





प्राचीन काल में भारत में वास्तुशास्त्र के अनेक विशेष ज्ञान रखने वाले हुए हैं। मत्स्य पुराण में वास्तुशास्त्र के अठारह ज्ञाताओं का उल्लेख मिलता हैं। ये हैं-भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, यज्ञनिष्ठा, विशालाक्षा, पुरंधर, ब्रह्म कुमार, नदीम, शौनक, गार्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र व बृहस्पति। इसी प्रकार त्रेता युग में, द्वापर युग में तथा रामायण व महाभारत में भी वास्तुशास्त्र की चर्चा की गई हैं। बौद्ध धर्म ग्रंथों में भी वास्तुशास्त्र संबंधी तथ्य मिलते हैं।




पुराणों में स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण, नारद पुराण, अग्नि पुराण, लिंग पुराण आदि में वास्तुशास्त्र के महत्व को प्रतिपादित किया गया है।




चाणक्य के अर्थशास्त्र, शुक्र नीति, वृहत जातक, समरांगण-सूत्रधार जैसे धर्मग्रंथों में भी वास्तुशास्त्र की उपयोगिता तथा उपादेयता पर काफी चर्चा हुई है। वर्तमान में भी ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्र की महत्ता को राजनेता से लेकर व्यवसायी, वैज्ञानिक, चिकित्सक आदि सभी मानते हैं, लेकिन आखिर इसका क्या कारण है कि आज तक किसी भी कालखंड में कोई भी सत्ता इस प्रकार का नियम नहीं बना सकी की समस्त नगरों का विकास तथा समस्त भवनों का विकास वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुरूप होना चाहिए, ताकि चारों तरफसुख-समृद्धि हो। इतना ही नहीं राजभवन से लेकर तमाम प्रशासनिक भवन, वित्तीय व व्यावसायिक संस्थान, औद्योगिक इकाइयां और गांव, कस्बे व नगर तक का निर्माण वास्तुशास्त्र के आधार पर चारों तरफ से सबकुछ अपने में समाविष्ट कर लेने वाला विकास संभव है।




प्रत्येक व्यक्ति अपने नियति के कर्मानुसार जन्म लेता है और उसी के अनुरूप उसकी जन्म कुंडली में विभिन्न ग्रह स्थित होते हैं। जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति तथा उनके प्रभाव के अनुरूप जातक को पारिवारिक, आर्थिक व वैचारिक शक्तियां प्राप्त होती हैं और उसी के अनुरूप उसे वस्तु भी प्राप्त होती है।




एक समय ऐसा आता है जब किसी व्यक्ति के ग्रह इतने बलशाली हो जाते हैं कि उसे राष्ट्राध्यक्ष का पद प्राप्त होता है और उसके रहने का स्थान यानी वास्तु भी परिवर्तित हो जाता है, लेकिन एक निर्धारित समय के बाद जब उसी व्यक्ति की ग्रह दशा बदलती है, तो वह राष्ट्राध्यक्ष पद से मुक्त हो जाता है और एक बार फिर उसकी वास्तु बदल जाती है। ग्रहों की स्थिति की वजह से ही एक व्यक्ति अत्यंत साधारण परिवार में जन्म लेकर असाधारण प्रतिभा का धनी बन जाता है, जबकि कोई अतिप्रतिभाशाली व समृद्ध परिवार में जन्म लेकर भी जीवन भर सुखी जीवन व्यतीत नहीं कर पाता। 




वास्तु शास्त्र छोटी-छोटी बातों के बड़े-बड़े अर्थ:-सामान्यतः हम अपने जीवन में बहुत कुछ ऐसा करते हैं, जिन पर कभी गंभीरता से विचार नहीं करते। दरअसल, हम यह मानकर चलते हैं। की छोटी-छोटी बातें हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखतीं, जब कि ऐसा नहीं है। सही मायने में देखा जाए, तो छोटी-छोटी बातें मिलकर ही बड़ी होती हैं। 



उदाहरणस्वरूप:-हम भले ही एक क्षण को कोई महत्व न दें, लेकिन यही एक-एक क्षण मिलकर दिन, महीने, वर्ष एवं सम्पूर्ण जीवन में बदल जाते हैं। यदि हम एक-एक क्षण को संवारतें चलें, तो हमारा जीवन संवर जाएगा और बिगाड़ते चलें, तो बिगड़ जाएगा। इसीलिए वास्तुशास्त्र में इन छोटी-छोटी बातों को विशेष महत्व दिया गया है। इनमें से अनेक बातों को हमारे बड़े बुजुर्ग बताते भी हैं, लेकिन आज की इस भागमभाग भरी जिन्दगी में हम उन बातों को भूलते जा रहे हैं। वास्तु शास्त्र हमारे जीवन में हरेक पहलू को कल्याणकारी एवं प्रगतिशील बनाने की दिशा में काम करता है। यदि हम कुछ बातों का ख्याल रखें, तो हमारे जीवन में इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ये बातें इस प्रकार हैं-



◆पानी के नल से टपकता हुआ जल हमारी आर्थिक समृद्धि में समस्या पैदा कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि पानी के टपकने से घर या बिजनेश में तरक्की नहीं होती। इसलिए जैसे ही कोई नल खराब हो, तुरन्त उसे ठीक करवा लेना चाहिए।



◆अपने मकान के अन्दर या दफ्तर में दीवारों पर ज्यादा कीलों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जरूरी होने पर ही कील लगाएं, अनावश्यक कीलें न लगाएं।



◆किसी घड़ी, फोटो या कैलेंडर आदि के लिए जरूरी होने पर ही कील लगाएं, क्योंकि अनावश्यक कीलें नुकसान करती है। वास्तु के अनुसार इसे अच्छा नहीं माना जाता है। यही कारण है कि पुराने समय में कील की जगह लकड़ी की खूंटियों का इस्तेमाल किया जाता था।



◆भवन के भीतर मकड़ी के जाले न पनपनें दें। मकड़ी के जालों के होने से घर के सभी सदस्यों में सुस्ती, शिथिलता एवं लापरवाही बनी रहती है। मकड़ी के इन जालों में फंसे कीट-पतंगे एवं जहां-तहां झूलती मकड़ियां भवन के भीतर मनहूसियत पैदा करती हैं। इसलिए इससे बचने के लिए समय-समय पर जालों को साफ करते रहें।



◆घर के प्रत्येक कमरे में प्रतिदिन झाड़ू लगाएं। यह भी ध्यान रखें कि सारे घर या ऑफिस आदि की साफ-सफाई करने के बाद झाड़ू को इस प्रकार न रखें, जिससे उसका सीकों वाला हिस्सा ऊपर हो। ऐसा करने से घर में झगड़े बढ़ते हैं। झाड़ू भवन की दक्षिण यजे पश्चिम दिशा में जमीन पर लिटाकर रखें।



◆किसी भी बिल्डिंग में खिड़कियों पर एवं फर्नीचर आदि में इस्तेमाल किया जाने वाला शीशा टूटा हुआ या चटखा हुआ नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे घर में पूर्णता की कमी होती हैं। इससे परिवार को अनेक समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है। इसी प्रकार मुंह देखने वाला दर्पण भी साबुत होना चाहिए। 



◆हम लोग अपने घरों में तरह-तरह के जो समान इस्तेमाल करते हैं, उनमें कुछ देवी-देवताओं के चित्र भी बनें होते हैं। अनेक बार वे टूट जाते हैं। उन खंडित वस्तुओं का इस्तेमाल न करें।





उदाहरणस्वरूप:-इस संदर्भ एक निजी अनुभव का जिक्र करना चाहूंगा। कुछ समय पहले की बात है मुझे एक औद्योगिक इकाई का निरीक्षण करने के लिए आमंत्रित किया गया था। चूंकि उस औद्योगिक इकाई के स्वामी व कुछ निदेशक आदि भी दूसरे शहर से वहां आए थे। अतः हम सभी एक होटल में ठहरे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम लोगों को जो अलग-अलग कमरे आवंटित किए गए थे, उन सबका वास्तु अलग-अलग था। क्या आप जानना चाहेंगे कि इसका क्या रहस्य हैं? दरअसल जिन्हें जितना उत्तम वास्तु सम्मत कमरा आवंटित हुआ, उनकी ऊर्जा उतनी हीनाधिक समन्वित थी। इस वजह से उनकी कार्यदक्षता, उनका व्यक्तित्व अधिक प्रभावशाली रहा।




इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करके ही पूर्ण सुख पाना संभव नहीं हैं। यदि आप जीवन को पूर्णरूपेण सुखी बनाना चाहते हों, तो सबसे पहले आपको अपनी ऊर्जा को संतुलित करना होगा। अन्यथा आपको प्राप्त वास्तु में कोई न कोई परिवर्तन हो ही जाएगा।












 




Thursday, February 24, 2022

February 24, 2022

जानिए कैलेंडर को वास्तु शास्त्र के अनुसार किस दिशा में लगाना चाहिए?(Know in which direction the calendar should be placed according to Vastu Shastra?)





जानिए कैलेंडर को वास्तु शास्त्र के अनुसार किस दिशा में लगाना चाहिए?(Know in which direction the calendar should be placed according to Vastu Shastra?):-कैलेंडर या दिनदर्शिका का अर्थ:-वर्ष भर में एक विशेष कार्यक्षेत्र में होने वाले आयोजनों तथा उनसे संबंधित दिन, तारीख और महीनों की तिथियों आदि छपे हुए विवरण के बारे में जानकारी प्राप्त होती हैं, उसे कैलेंडर या तिथि-पत्र या पंचांग या दैनिक वृत्त की पुस्तक या रोजनामचा या दिनपत्रिका या दैनंदिनी कहते  हैं।

वास्तु शास्त्र में पुराने कैलेंडर को अपने निवास स्थान की किसी भी जगह पर लगाए रखना अच्छा नहीं माना गया है। पुरानी दिनदर्शिका को अपने निवास स्थान में लगाए रखने से मनुष्य की निरन्तर विकसित होने वाले मौकों को कम करते हैं, जिससे मनुष्य को अपने कार्य में आगे की ओर उन्नति रुक जाती हैं। इसलिए पुराने कैलेंडर को हटा देना चाहिए।

कैलेंडर कालचक्र की गणना का कार्य करता हैं, गणना का मालिक ग्रह बुध होता हैं, बुध ग्रह का चन्द्रमा ग्रह शत्रु हैं और मंगल ग्रह व गुरु ग्रह भी बुध ग्रह के शत्रु है, अतः कैलेंडर को उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) जिसके शंकरजी, दक्षिण दिशा जिसके यमराज और दक्षिण-पूर्व (अग्निकोण) जिसके स्वामी अग्निदेव हैं आदि दिशाओं में कैलेंडर नहीं लगाना चाहिए, शेष दिशाओं में लगाना शुभ होगा। 


मनुष्य को अपने निवास स्थान में प्रत्येक साल में नया कैलेंडर लगाना चाहिए। जिससे नए साल में पुराने साल से भी ज्यादा अच्छे व प्रगति युक्त मौके की प्राप्ति होती रहे। मनुष्य अगर सालभर में चारों तरफ अपने जीवनकाल में अच्छी तरह के हितकारी फायदों को प्राप्त करना चाहते हैं, उन मनुष्य को अपने निवास में वास्तुशास्त्र के अनुरूप ही कैलेंडर को लगाना चाहिए।

वास्तुशास्त्र के अनुरूप कहां पर कैलेंडर लगाना चाहिए?:-जो निम्नलिखित तरह हैं-


दिशाओं के आधार पर निवास स्थान या किसी भी जगह पर कैलेंडर को लगाने से मिलने वाले फायदे या लाभ:-मनुष्य को दिशाओं के आधार पर समस्त जगहों पर कैलेंडर को लगाने पर मनुष्य को निम्नलिखित फायदे या लाभ मिलते हैं, जो इस तरह हैं-


पूर्व दिशा में कैलेंडर लगाने से मिलने वाले फायदे या लाभ:-मनुष्य के द्वारा कैलेंडर को अपने निवास स्थान की जगह की पूर्व दिशा में लगाना चाहिए, जिससे मनुष्य को अपने प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति मिलती हैं, क्योंकि पूर्व दिशा के स्वामी सूर्यदेव एवं इंद्रदेव को माना जाता है, जो नेतृत्व करने वाले या लीडरशिप के देवता हैं। इस पूर्व दिशा में कैलेंडर को लगाने से मनुष्य के जीवनकाल में उन्नति के मार्ग खुल जाते हैं और अवश्य ही उन्नति करते हैं। मनुष्य को अपने जीवनकाल में सकारात्मक गुणों का विकास होता हैं।


पूर्व दिशा में लगाने वाले कैलेंडर के कागज का रंग एवं तस्वीरे:-मनुष्य को बाजार से कैलेंडर को खरीदकर लाते समय कैलेंडर सफेद, लाल या गुलाबी रंग के कागज वाला होना चाहिए, उस कैलेंडर पर उगते सूर्यदेव और भगवान आदि की तस्वीरों वाला होना चाहिए, क्योंकि पूर्व दिशा के स्वामी सूर्यदेवजी की होने से हमेशा श्वेत रोशनी एवं प्रकाश देते हैं।


पश्चिम दिशा में कैलेंडर लगाने से मिलने वाले फायदे या लाभ:-मनुष्य के द्वारा कैलेंडर को अपने निवास स्थान की पश्चिम दिशा में लगाना चाहिए, जिससे मनुष्य के पूर्व में और वर्तमान समय में अटके हुए कामों में प्रगति होने लगे, जिससे मनुष्य का जीवनकाल उन्नति की नई ऊंचाइयों को छू पावे, क्योंकि पश्चिम दिशा के स्वामी शनिदेव एवं वरुणदेव को माना जाता है, पश्चिम दिशा बहाव की दिशा अर्थात् अपने वेगपूर्ण गति से कार्यक्षेत्र एवं जीवनक्षेत्र में रुकावट को दूर कर सके। मनुष्य के द्वारा किये गए कार्यों में लगातार जल्दी से पूर्ण करने में मदद करके मनुष्य के कार्यक्षेत्र को बढ़ोतरी करती हैं। मनुष्य को पश्चिम दिशा में उत्तर दिशा वाले कोने में कैलेंडर को लगाना चाहिए। 


पश्चिम दिशा में लगाने वाले कैलेंडर के कागज का रंग एवं तस्वीरे:-मनुष्य को बाजार से कैलेंडर को खरीदकर लाते समय कैलेंडर नीले रंग के कागज वाला होना चाहिए, उस कैलेंडर पर वायु से युक्त नील बादलों आदि की तस्वीरों वाला होना चाहिए, क्योंकि पश्चिम दिशा के स्वामी शनिदेवजी की होने से हमेशा आकाशीय नीले रंग का प्रतिनिधित्व करता हैं।



उत्तर दिशा में कैलेंडर लगाने से मिलने वाले फायदे या लाभ:-मनुष्य के द्वारा कैलेंडर को उत्तर दिशा में लगाना चाहिए, जिससे मनुष्य के जीवनकाल में सुख-समृद्धि मिल सके और उसके घर में अन्न-धन के भंडार भरे रह सके। क्योंकि उत्तर दिशा के स्वामी कुबेरदेव एवं गुरुदेव होते हैं।

उत्तर दिशा में लगाने वाले कैलेंडर के कागज का रंग एवं तस्वीरे:-मनुष्य को बाजार से कैलेंडर को खरीदकर लाते समय कैलेंडर पर हरे व सफेद रंग के कागज का उपयोग अधिक किया हो। क्योंकि भगवान शंकर जी उत्तर दिशा में हिमालय स्थान में निवास करते हैं, इसलिए उत्तर दिशा में हरियाली, फव्वारा, नदी, समुद्र, झरने, विवाह आदि की तस्वीरों वाला कैलेंडर को लगाना चाहिए।  


दक्षिण दिशा में कैलेंडर लगाने से मिलने वाले फायदे-नुकसान या हानि-लाभ:-मनुष्य के द्वारा कैलेंडर को अपने कार्यक्षेत्र या निवास स्थान की दक्षिण दिशा में कभी नहीं लगाना चाहिए, जिससे मनुष्य के जीवनकाल में प्रगति रुक जाती हैं, क्योंकि दक्षिण दिशा के स्वामी यम या यमराज होते हैं, जो मृत्यु के देवता हैं। यह सूर्यपुत्र है एवं भगवान विष्णुजी के शत्रु हैं। मानव जीवन को क्षीण बनाने वाली यह दिशा हैं, जो शुभ कार्यों के मना मानी गई हैं। घर की दक्षिण दिशा में घड़ी और कैलेंडर दोनों ही समय के सूचक हैं। दक्षिण दिशा ठहराव की दिशा हैं। यहां समय सूचक वस्तुओं को ना रखें। ये घर के सदस्यों की तरक्की के अवसर रोकता हैं। घर के मुखिया के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।


कैलेंडर को लगाते समय रखने योग्य सावधानियां:-जो निम्नलिखित हैं-

◆मनुष्य के द्वारा खरीदे हुए नए कैलेंडर को अपने निवास स्थान की उत्तर, पश्चिम या पूर्वी दीवार पर लगाना चाहिए।

◆हिंसा युक्त जानवरो के चेहरे वाले कैलेंडर:-मनुष्य को अपने निवास स्थान में नए कैलेंडर को खरीदकर लाते समय विशेषकर ध्यान रखना चाहिए, की कैलेंडर पर हिंसा करने वाले असभ्य जानवरों के चेहरे से युक्त चित्र या फोटू युक्त कैलेंडर को नहीं लगाना चाहिए।

◆दूसरों का बुरा चाहने एवं कष्ट देने वाले चित्र वाले कैलेंडर:-कैलेंडर पर दुसरो का बुरा चाहने वाले एवं कष्ट देने वाले चित्रों से युक्त चेहरों वाले को रहने की जगह पर कभी नहीं लगाना चाहिए। इस तरह के चेहरों से चित्रों के कैलेंडर लगाने से मनुष्य के मन में किसी भी कार्य को करते समय निराशा के भाव उत्पन्न होने लगते हैं, जिससे मनुष्य के शरीर पर नकारात्मक ऊर्जा अपना नियंत्रण कर लेती हैं और मनुष्य किसी भी तरह के सही निर्णय नहीं ले पाते हैं। 

◆मुख्य दरवाजे से नजर आता कैलेंडर भी नहीं लगाएं 

◆मुख्य दरवाजे के सामने कैलेंडर नहीं लगाना चाहिए। दरवाजे से गुजरने वाली ऊर्जा प्रभावित होती हैं। साथ ही तेज हवा चलने से कैलेंडर हिलने से तेज उलट जाते हैं।

◆अगर कैलेंडर में संतों महापुरुषों तथा भगवान के श्रीचित्र लगे हो, तो ये अधिक पुण्यदायी और आनंददायी माना गया है।

Sunday, July 4, 2021

July 04, 2021

सोने की दिशा और वास्तु (Sleeping direction and vastu)

                     

सोने की दिशा और वास्तु(Sleeping direction and vastu):-प्राचीन काल के जमाने से मनुष्य को सोने के विशेष बातें को अपने ज्ञान-चक्षु से जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने निद्रा से सम्बंधित बहुत गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने मनुष्य को किस तरह अपने शरीर को स्वस्थ रखना चाहिए उससे सम्बन्धित मनुष्य को क्या-क्या बातों का ध्यान रखना चाहिए। मनुष्य के जीवन में भोजन करने के तरीके के समान ही शयन करने के तरीके और दिशा का बहुत ही महत्व है। सही दिशा की ओर नहीं सोने से उस दिशा का असर मनुष्य के स्वास्थ्य, आर्थिक एवं मानसिकता पर पड़ता है।



Sleeping direction and vastu




शयन विधान का परिचय:-आयुवेद शास्त्र में, धार्मिक धर्म ग्रन्थों, वास्तुशास्त्र और आधुनिक विज्ञान शास्त्र आदि में इस बात को सिद्ध किया है।



शयन विधान में शयन के विषय शयन सम्बन्धित बातें एवं नियम बताएं जो इस तरह है-



◆प्रत्येक मनुष्य को जल्दी प्रातःकाल के ब्रह्म मुहूर्त में उठाना चाहिए, जिससे ईश्वर की अनुकृपा प्राप्त हो सके।


◆मनुष्य को शाम के समय अपना भोजन ग्रहण करके सूर्य अस्त के एक प्रहर लगभग तीन घण्टे के बाद में ही अपने शयन की तैयारी करनी चाहिए।



सोने के तरीके या मुद्राऐं:-हमारे धार्मिक शास्त्रों में सोने के तरीके बताए गए वे चार तरह के बताए है जो इस तरह है-


उल्टा सोये भोगी।


सीधा सोये योगी।


दांये सोये रोगी।


बांये सोये निरोगी।


1.उल्टा सोना:-जो मनुष्य उल्टे सोते है वे मनुष्य अपने जीवन में भोग-विलास को ग्रहण करने वाले होते हैं।


2.सीधा सोना:-जो मनुष्य सीधा सोते है वे मनुष्य अपने जीवन में ईश्वर भक्ति और अच्छाई के कार्य करते हुए जीवन को व्यतीत करते है और अपने योग बल से सबकी भलाई की सोच रखने वाले होते है।


3.दायां सोना:-जो मनुष्य दायीं तरफ होकर सोते है वे अपने जीवन में अनेक तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर जीवन को बिताने वाले होते है और जीवन भर किसी न किसी तरह की बीमारी जैसे पेट सम्बन्धित, गैस, अपच आदि से ग्रसित होकर रोगी बन जाते हैं।


4.बायां सोना:-जो मनुष्य बायीं तरफ होकर सोते है वे अपने जीवन काल में स्वस्थ रहते है उन पर बिना मतलब की किसी भी तरह की बीमारी हावी नहीं होती हैं।



शास्त्रीय विधान के अनुसार:-विभिन्न शास्त्रों में शयन के विधान बताये है, जो इस तरह है-


आयुर्वेद शास्त्र:-आयुर्वेद शास्त्र में बताया गया है कि मनुष्य को 'वामकुक्षि' अर्थात बायीं तरफ होकर ही सोने से लाभ की प्राप्ति होती है और स्वास्थ्य निरोग रहता है।


शरीर विज्ञान के अनुसार:-शरीर विज्ञान के मतों के अनुसार जो मनुष्य उल्टे होकर अर्थात पेट के बल सोते है उनकी नेत्र ज्योति कमजोर हो जाती है और दायीं तरफ होकर अपने शरीर का वजन रखने से उनके रीढ़ की हड्डी अर्थात कशेरुकाओं पर जोर पड़ने से वे कमजोर होकर नुकसान होता है।


सोते व उठते समय मन्त्रों के अनुसार:-मनुष्य को सोते समय गायत्री मंत्र या नवकार मंत्र को कितनी संख्या रखनी चाहिए। धर्म शास्त्रों में बताया गया कि हमारे ऋषि-मुनियों ने सोते समय सात तरह के डर को दूर करने के लिए सात मन्त्र को  संख्या  ("सूतां सात") और उठते समय ("उठता आठ") में आठ कर्मों को दूर करने के लिए आठ मन्त्र की संख्या रखनी चाहिए।


सात भय:-धर्म शास्त्रों में सात तरह के भय इहलोक, परलोक, आदान, अकस्मात, वेदना, मरण और अश्लोक भय बताये है इन सभी तरह के भयों से मुक्ति के लिए सात बार गायत्री मंत्र का जप करके ही मनुष्य को अपने शयन के लिए जाना चाहिए।


दिशाओं के आधार पर शयन के बारे में जानकारी:-मनुष्य को दिशाओं के आधार उन दिशाओं के सम्बन्धित नियमों को ध्यान में रखते हुए दिशाओं के अनुसार दोष और फायदा को जानकारी शयन करना चाहिए-



मनुष्य का सिर पूर्व दिशा की ओर रखने के फल:-मनुष्य का सिर पूर्व दिशा की ओर रखकर सोने पर सही व बढ़िया तरीके से निंद्रा आती है। मनुष्य का मस्तिष्क तरोताजा एवं शरीर स्वस्थ रहता है। जो मनुष्य धार्मिक, आस्थावान एवं आध्यात्मिक फायदा की कामना करने वाले मनुष्यों को हमेशा पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोना चाहिए। मनुष्य पूर्व दिशा की सिर रखकर सोने पर विद्या में रुचि बढ़ती है और यादास्त शक्ति की प्राप्ति होती है।



मनुष्य का सिर दक्षिण दिशा की ओर रखने के फल:-दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से भी मनुष्य को सही तरीके से अच्छी नींद आती है और आवक में बढ़ोतरी होती है। मनुष्य को रुपये-पैसों की प्राप्ति होती है, रोजगार में बरकत होती है और शरीर एकदम स्वस्थ रहता है। 



मनुष्य का सिर पश्चिम दिशा की ओर रखने के फल:-मनुष्य के द्वारा पश्चिम दिशा की ओर सिर करके शयन करने से मनुष्य के जीवन की उम्र में कमी आती हैं, मनुष्य उम्र से पूर्व ही बूढ़ा दिखाई देने लगता है, बाल सफेद होकर गिरने लगते है जिससे मनुष्य को तनाव पैदा होता है। किसी तरह से मन नहीं लगता है, बहुत ही चिंता करने लगता हैं। 



मनुष्य का सिर उत्तर दिशा की ओर रखने के फल:-उत्तर दिशा की ओर सिर करके शयन करने से मनुष्य के जीवन की उम्र कम होने लगती है, वह उम्र से पूर्व ही कमजोर होकर बूढ़ा दिखाई देने लगता है, जिससे शारीरिक कमजोरी होने लगती है उसे मृत्यु के समान कष्ट को भोगना पड़ता हैं। 



◆मनुष्य को अपने घर में शयन कक्ष में सोते समय पूर्व दिशा की ओर सिर करके ही सोना चाहिए।



◆उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोने से उम्र कम होकर मनुष्य को तनाव बढ़ता है।



◆पश्चिम दिशा की ओर मुख करके सोने से चिंताएं उत्पन्न होती है।



◆मनुष्य को अपने ससुराल में दक्षिण दिशा की ओर मुहं करके शयन करना चाहिए। यदि इस तरह की दिशा नहीं मिलने पर मनुष्य को पूर्व दिशा में सिर करके सो सकते हैं।



◆यात्रा करते समय यात्रा में पश्चिम दिशा की ओर सिर करके शयन करना बढ़िया रहता है। 



◆यात्रा में उत्तर दिशा की ओर मुहं करके सोने से हानि हो सकती है।



शयन करने से पूर्व सावधानियां:-शयन करने से पूर्व शास्त्रों दिशाओं का ध्यान रखने के साथ-साथ अन्य दूसरे बातों का भी ध्यान रखना चाहिए जो कि निम्नलिखित है-


◆मनुष्य को घर में पूर्व-उत्तर या ईशानकोण में उपासना गृह बनाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके उपासना करने से जल्दी ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।



◆दिन में सोना वर्जित:-शास्त्र के अनुसार दिवास्वापं च वर्जयेत अर्थात दिन में नहीं सोना चाहिए।



आयुर्वेद भी यही कहता हैं कि दिन में सोना अनेक बीमारियों को आमंत्रित करता हैं। इससे आयु क्षीण होती है। अतः ग्रीष्म ऋतु में दिन के बड़े होने एवं सूर्य के ताप में वृद्धि हो जाने से थोड़ा बहुत आराम कर लेना ठीक हैं।



बाकी अन्य किसी ऋतु में दिन में सोना हानिप्रद होता हैं। इसका वैज्ञानिक आधार भी हैं।


आयुर्वेद में कहा गया है कि दिन में सोने से प्रायः जुकाम हो जाता हैं।



नित्य दिन में सोने से जुकाम शरीर में स्थायी जगह बना लेता है जिससे 'कास' रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।



कास रोग और बिगड़कर 'श्वास रोग' में परिवर्तित हो जाता है जिससे फेफड़े खराब होकर व्यक्ति को क्षय रोग हो जाता है। अतः दिन में सोने से परहेज करना चाहिए।



◆मनुष्य को दोपहर के बाद पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पेशाब करने से शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक हानि उठानी पड़ सकती है।



◆दिशा ध्यान दक्षिण दिशा को यमदेव और बुरे देवों की दिशा माना गया है इसलिए मनुष्य को कभी दक्षिण दिशा की तरफ पैर करके नहीं सोना चाहिए क्योंकि यदि ऐसा करेंगे तो यमदेवता व बुरी ताकते अपने ऊपर हावी होगी जिससे हमारे श्रवनेद्रिय तंत्र में हमारे श्रवण तंत्र के माध्यम से बुरे वातावरण और बुरी शक्तियों की वायु प्रवेश करके मस्तिष्क तन्त्र को प्रभावित करेगी जिससे मस्तिष्क तन्त्र में शोणित का संचार सही तरह नहीं होगा और मस्तिष्क तक शोणित उचित मात्रा में नहीं पहुंच पायेगा जिससे मनुष्य को अनेक तरह की व्याधियाँ जैसे यादास्त शक्ति की कमी, अनेक की तरह के भ्रम पैदा होकर भ्रमित करेगे और नेत्र रोग आदि हो सकते है।



◆मनुष्य को मस्तक और पाँव की ओर दीपक को नहीं रखना चाहिए।



मनुष्य को सोते समय यदि शयन कक्ष में दर्पण हो तो उस दर्पण को किसी कपड़े से ढ़ककर रखना चाहिए। बिना ढ़के नहीं सोना चाहिए।



◆यदि शयनकक्ष में ही ईश्वर का पूजा स्थल हो तो उस पूजा स्थल की जगह को ढ़ककर ही सोना चाहिए।



◆दीपक को बायीं तरफ या दायीं तरफ ज्यादा से ज्यादा पांच हाथ दूर होना चाहिए। 



◆शाम के समय में मनुष्य को कभी निद्रा नहीं लेनी चाहिए।


◆शैया पर कभी भी बैठेकर नींद नही लेनी चाहिए, क्योंकि इस तरह बैठकर सोने से रीढ़ की हड्डी पर असर पड़ता है।



◆सोने के बिस्तर पर भोजन को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योकिं अन्नदेवता नाराज होते है, मनुष्य शरीर से बीमार हो सकते है और बीमारी घर कर जाती हैं।



◆मनुष्य को विद्या देवी की पढ़ाई करते समय बिस्तर पर सोते सोते नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि इससे यादास्त शक्ति पर प्रभाव पड़ कर यादास्त शक्ति कम होती है।



◆मनुष्य को सूर्य अस्त के पूर्व नहीं शयन करना चाहिए क्योंकि इस समय दिया-बाती का समय होता है, इसलिए ईश्वर की पूजा के समय पर मनुष्य को नहीं सोना चाहिए।



◆मनुष्य को पूजा-पाठ करने के बाद मस्तिष्क के ललाट पर लगाये गए तिलक को लगाए हुए कभी नहीं सोना चाहिए। क्योंकि ईश्वर की पूजा में लगाये गए तिलक को लगाए हुए सोने से ईश्वर का अपमान समझा जाता है और ईश्वर की अनुकृपा भी कम हो जाती है।



◆मनुष्य को दरवाजे के सामने नहीं सोना चाहिए क्योंकि इस तरह सोने से नकारात्मक ऊर्जा का संचार शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है और शरीर में भारी पन व दुखावा होना शुरू हो जाता है, इसलिए मनुष्य को दरवाजे के सामने नहीं सोना चाहिए।



◆मनुष्य को हृदय पर अपना हाथ रखकर नहीं सोना चाहिए क्योकिं इस तरह सोने से हृदय का रक्त परिसंचरण में रुकावट होती है और शरीर में परेशानी शुरू हो जाती हैं।



◆मनुष्य को ब्रह्म स्थान की जगह पर, छत के पात या बीम के नीचे भी नहीं सोना चाहिए।



◆मनुष्य को पैर के ऊपर दूसरा पैर रखकर भी नहीं सोना चाहिए, इस तरह एक पैर के ऊपर दूसरा पैर रखकर सोने से शरीर के भाग में परेशानी और निद्रा सही तरह नहीं आती है।



◆मनुष्य को सोने के पलँग की चारों पायों को समान ऊंचाई होनी चाहिए शयन बेड ऊँचा भी नहीं होना चाहिए। इस तरह शयन बेड के पायों का ऊँचा होने पर शरीर में रक्त संचरण में बाधा पहुंचती है, केवल बीमारी के हालात में शयन बेड के पायों को ऊँचा रख सकते हैं।




 

Saturday, January 23, 2021

January 23, 2021

दिशा बदले मानव जीवन की दशा को(Change the direction of human life)


 

दिशा बदले मानव जीवन की दशा को(Change the direction of human life):-दिशाओं का मनुष्य के जीवन में बहुत ही ज्यादा महत्व है, सही चलने वाले जहाज,वाहन अपनी मंजिल तक पहुंचते है, जबकि गलत दिशा में चलने वाले जहाज व वाहन समय का बिना मतलब बेकार करने के साथ ही अपनी मंजिल को भी गुमा बैठते है तथा बिना जरूरत के कष्ट एवं कठिनाइयों को भी झेलते है। लेकिन यह बात जुदा तरह की है,की होशियार मनुष्य परिस्थितियों को जानकर दिशाओं का बदलाव करके अपना अभीष्ट को प्राप्त कर लेते है और जीवन भर खुशहाली से रहते है।मनुष्य जीवन में अनेक तरह के कष्ट और कठिनाइयां केवल दिशाओं के गलत उपयोग के कारण ही आती हर। मात्र दिशाओं में थोड़ा बदलाव करके जीवन में सुख-शांति,विकास, इच्छा पूर्ति आदि को पाया जा सकता है।


भोजन के विषय में शास्त्रों की बातें:-शास्त्रों में भोजन के विषय में साफतौर पर निर्देश बताया है कि किस कामना वाला मनुष्य किस दिशा की ओर मुख करके भोजन करें?


भोजन करते समय मुख को पूर्व दिशा की ओर रखने का नतीजा:-शास्त्र के मतानुसार जिन मनुष्य को अपनी उम्र की बढ़ोतरी करनी है और जिनको अपने शरीर में कोई भी तरह की बीमारी को नहीं रखना चाहते है,उन मनुष्य को सदैव पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन को करना चाहिए।

◆यदि रोगी मनुष्य को पूर्व दिशा की ओर मुख कराकर पथ्य भोजन दिया जाये तो उनके रोग में जल्दी सुधार होता है और जल्दी ही रोग से मुक्त होते है।


भोजन करते समय मुख को दक्षिण दिशा की ओर रखने का नतीजा:-शास्त्रानुसार जिनको यश प्राप्ति की चाह रखने वाले मनुष्यों को दक्षिण दिशा की ओर मुख रखकर भोजन को करना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुख करने से मनुष्य को मान-सम्मान की असाधारण बढ़ोतरी होती है।

◆लेकिन जिन मनुष्यों के माता-पिता जीवित होते है,उन मनुष्यों को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आहार को नहीं लेना चाहिए।

◆जीवित माता-पिता वाले मनुष्यों को पूर्व या पश्चिम दिशा की ओर मुख करके ही भोजन को करना चाहिए जिससे उनके स्वास्थ्य में बढ़ोतरी हुवे।


भोजन करते समय मुख को नैऋत्य कोण की दिशा की ओर रखने का नतीजा:-नैऋत्य कोण की दिशा की ओर मुख को रखकर भोजन करने वाले मनुष्य की पाचन शक्ति कमजोर होती है तथा पेट की अनेक बीमारियां हो सकती है।


भोजन करते समय मुख को आग्नेय कोण की दिशा की ओर रखने का नतीजा:-जो मनुष्य अपने मुख को आग्नेय कोण की दिशा में रखकर भोजन करते है उनको सेक्सगत अनेक तरह की गुप्त बीमारियां हो सकती है तथा स्वप्नदोष,प्रमेह,ल्यूकोरिया, प्रदररोग आदि में बढ़ोतरी हो सकती है।


भोजन करते समय मुख को वायव्य कोण की दिशा की ओर रखने का नतीजा:-जो वायव्य कोण की दिशा की ओर बैठकर करके भोजन करते है उनको वायु विकार दोष उत्पन्न हो सकते है।


भोजन करते समय मुख को पश्चिम दिशा की ओर रखने का नतीजा:-जिन मनुष्य की आर्थिक हालात कमजोर हो और अधिक धन की प्राप्ति की चाह हो तो पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भोजन को ग्रहण करना चाहिए।

पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से मनुष्य की आर्थिक हालात ठीक हो जाते है और लेकिन आर्थिक हालात की बढ़ोतरी धीरे-धीरे ही होती है।


भोजन करते समय मुख को उत्तर दिशा की ओर रखने का नतीजा:-जो मनुष्य अपना मुख उत्तर दिशा की ओर रखकर भोजन को ग्रहण करते है उनको रुपयों-पैसों का नुकसान भुगतना पड़ता है।

ऋषियों ने साफतौर पर बताया है कि जो मनुष्य उत्तर दिशा की ओर मुख करके भोजन के रूप में अपने लिए ऋण को बढ़ाने का भोजन ग्रहण करता है। जिससे वह मनुष्य दिन-प्रतिदिन ऋणी होता चला जाता है।


भोजन करने के नियम:-हमारे  ऋषियों-मुनियों ने जो नियम पुराने जमाने मे बनाये थे वे सभी नियम जीवन में भोजन करते समय अपनाने पर मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा और जीवन में धन-संपत्ति से युक्त होकर मनुष्य अपना जीवन सुख-शांति जीता है।

◆मनुष्य को भोजन करने से पूर्व हाथ-पैरों को धोककर ही करना चाहिए।

◆भोजन करते समय हमेशा पालथी मारकर आसन पर बैठकर ही करना चाहिए।

◆मनुष्य को कुर्सी पर बैठकर टांग हिलाते हुए भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है।

◆मनुष्य को भोजन करते समय बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।

◆मनुष्य को भोजन करते समय एकाग्रचित होकर ही करना चाहिए।

◆मनुष्य को भोजन का प्रत्येक ग्रास को अपने दांतो से चबा-चबाकर ही ग्रहण करना चाहिए।

◆मनुष्य को अपने इष्ट देव को याद करते हुए भोजन को ग्रहण करना चाहिए।

◆मनुष्य को भोजन की थाली में से चार ग्रास अलग-अलग निकाल लेना चाहिए।

◆मनुष्य को भोजन इतना ही करना चाहिए जितना वह पचा सके।

◆मनुष्य को अपने पेट में दो भाग ही भोजन को ग्रहण करना चाहिए,तीसरा भाग जल के लिए और चौथा भाग हवा के लिए खाली रखना जरूरी होता है।



शयन के तरीके और दिशा:-मनुष्य के जीवन में भोजन करने के तरीके के समान ही शयन करने के तरीके और दिशा का बहुत ही महत्व है।सही दिशा की ओर नहीं सोने से उस दिशा का असर मनुष्य के स्वास्थ्य,आर्थिक एवं मानसिकता पर पड़ता है।


मनुष्य का सिर पूर्व दिशा की ओर रखने के नतीजे:-मनुष्य का सिर पूर्व दिशा की ओर रखकर सोने पर अच्छी निंद्रा आती है। मनुष्य का मस्तिष्क तरोताजा एवं शरीर स्वस्थ रहता है। धार्मिक,आस्थावान एवं आध्यात्मिक फायदा की कामना करने वाले मनुष्यों को हमेशा पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोना चाहिए।


मनुष्य का सिर दक्षिण दिशा की ओर रखने के नतीजे:-दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से भी अच्छी नींद आती है और आवक में बढ़ोतरी होती है।


मनुष्य का सिर पश्चिम दिशा की ओर रखने के नतीजे:-मनुष्य के द्वारा पश्चिम दिशा की ओर सिर करके शयन करने से उम्र कम होती है और तनाव पैदा होता है।


मनुष्य का सिर उत्तर दिशा की ओर रखने के नतीजे:-उत्तर दिशा की ओर सिर करके शयन करने से उम्र कम होती है और तनाव उत्पन्न होता है।

◆मनुष्य को अपने घर में शयन करते समय पूर्व दिशा की ओर सिर करके ही सोना चाहिए।

◆उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोने से उम्र कम होकर मनुष्य को तनाव बढ़ता है।

◆पश्चिम दिशा की ओर मुख करके सोने से चिंताएं उत्पन्न होती है।

◆मनुष्य को अपने ससुराल में दक्षिण दिशा की ओर मुहं करके शयन करना चाहिए।

◆यात्रा करते समय यात्रा में पश्चिम दिशा की ओर सिर करके शयन करना बढ़िया रहता है। 

◆यात्रा में उत्तर दिशा की ओर मुहं करके सोने से हानि हो सकती है।

मनुष्य को घर में पूर्व-उत्तर या ईशानकोण में उपासना गृह बनाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके उपासना करने से जल्दी ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

मनुष्य को दोपहर के बाद पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पेशाब करने से शारीरिक,आर्थिक एवं मानसिक हानि उठानी पड़ सकती है।