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Monday, February 23, 2026

February 23, 2026

कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का नक्षत्रों के आधार पर फलादेश सिद्धांत( The Krishnamurti system of astrology based on the constellations

 

कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का नक्षत्रों के आधार पर फलादेश सिद्धांत( The Krishnamurti system of astrology based on the constellations):-कृष्णमूर्ति पद्धति में ग्रहों के फल देने का आधार नक्षत्र एवं उप नक्षत्र का स्वामी माना गया है। इस पद्धति से फलादेश करने का सिद्धान्त सर्वप्रथम 'मीना' नामक लेखक ने प्रतिपादित किया। इसके बाद कृष्णामूर्ति जैसे विद्वान ने इस पर और अधिक खोज की। कृष्णामूर्ति ने खोज करते हुए पाया कि दो या तीन ग्रह जब एक ही राशि में एक ही नक्षत्र में स्थित होने के बावजूद भी अलग-अलग फल दे रहे हैं, तो उन्होंने इस पर और खोज की। उन्होंने खोज करते हुए नक्षत्र जो कि 13 डिग्री 20 अंश का होता है। उसे विशोंत्तरी दशा के कुल 120 वर्षों का आधार बनाकर प्रत्येक ग्रह में कुल वर्षों से भाग देकर नक्षत्र को नौ भागों में बांटा। इसे उन्होंने उप नक्षत्र या सब लॉड की संज्ञा दी। इसके आधार पर उन्होंने पाया कि दो या तीन ग्रह एक ही नक्षत्र में स्थित होते हुए भी उप नक्षत्र भिन्न-भिन्न होने के कारण अनुकूल-प्रतिकूल फल देते हैं।




The Krishnamurti system of astrology based on the constellations





कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति में फलादेश के सिद्धांत:-इस पद्धति में ग्रहों के फल देने के सिद्धांत में पांच बातें निम्न प्रकार है-




पहला सिद्धांत फलादेश:-ग्रह जिस भाव में बैठा है, उस भाव का फल वह ग्रह देगा जो कि उस भाव स्थित ग्रह के नक्षत्र में स्थित हैं।




उदाहरणार्थ:-मेष लग्न में सूर्य स्थित हैं, तो जो ग्रह सूर्य के तीन नक्षत्रों कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी एवं उत्तराषाढ़ा में क्रमशः मेष, सिंह अथवा धनु राशि में 26 डिग्री 40 कला से लेकर 30 डिग्री तक, इसी तरह वृषभ, कन्या व मकर राशि के 0 डिग्री से 10 डिग्री तक स्थित होगा, वह ग्रह सूर्य का फल देगा।




दूसरा सिद्धांत फलादेश:-यदि कोई अन्य ग्रह इन नक्षत्रों में स्थित नहीं होगा तो फिर सूर्य उस भाव का फल देगा।





तीसरा सिद्धांत फलादेश:-यदि मेष राशि में कोई ग्रह स्थित नहीं हो तो मेष राशि का स्वामी मंगल के तीनों नक्षत्रों क्रमशः मृगशिरा, चित्रा एवं धनिष्ठा में जो ग्रह स्थित है, वे ग्रह मेष राशि का फल देंगे।




चौथा सिद्धांत फलादेश:-यदि कोई अन्य ग्रह मंगल के मृगशिरा, चित्रा एवं धनिष्ठा नक्षत्रों में स्थित नहीं हैं, तो फिर मंगल स्वयं उस राशि का फल देगा।




पांचवां सिद्धांत फलादेश:-उपरोक्त चार प्रकार से फल निर्धारण के अलावा ऐसे ग्रह जो उस भाव एवं भाव में स्थित ग्रह से किसी प्रकार से संबंध स्थापित करते हों तो वे ग्रह भी उस भाव का फल देने में सहायक होंगे।




ग्रहों के फल देने के इन पांच सिद्धांतो के अलावा एक मुख्य बात:- यह है कि यदि राहु एवं केतु इन भावों से संबंध रखते हों अथवा उन राशियों में बैठे हैं तो वे उस ग्रह का फल लूट लेते हैं। उस ग्रह के स्थान पर स्वयं मुख्य रूप से फल देते हैं। उस ग्रह को फल नहीं देने देते।



उदाहरणार्थ:-मेष राशि में सूर्य, बुध एवं शुक्र स्थित है। यदि राहु एवं केतु इन ग्रहों के नक्षत्रों में स्थित हो अथवा सूर्य की राशि सिंह में स्थित हो तो सूर्य के स्थान पर राहु-सूर्य का फल देगा। 



◆इसी प्रकार राहु या केतु बुध की राशि मिथुन अथवा कन्या में स्थित होगा तो बुध के स्थान पर राहु या केतु देंगे।



◆इसी प्रकार शुक्र की राशि वृषभ या तुला में राहु या केतु स्थित होने पर शुक्र के स्थान पर राहु या केतु फल देंगे। शुक्र फल नहीं देगा।



कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का महत्त्व:-ग्रहों के फल देने की कृष्णमूर्ति की यह नवीन पद्धति है। फल अनुकूल होगा या प्रतिकूल यह उप नक्षत्र अथवा उप-नक्षत्र के स्वामी जिसके नक्षत्र में जो ग्रह स्थित होगा। उसके राशि स्वामी व राशि के आधार पर मूल्यांकन होगा। इस तरह नहीं कोई ग्रह खराब है व नहीं कोई ग्रह अच्छा हैं।

Saturday, December 27, 2025

December 27, 2025

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् अर्थ सहित और लाभ(Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits)

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् अर्थ सहित और लाभ (Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits):-माता दुर्गा के दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करके मनुष्य अपने जीवन को खुशियों से भर सकता है, क्योंकि माता दुर्गा ही समस्त तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली होती है और दुष्टों का संहार करने वाली होती हैं। दुर्गा माता की पूजा-अर्चना एवं साधना करके जो सिद्धि को पाते है, उनकी तरह जो भी मनुष्य दुर्गा माता की आराधना के रूप में अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का उच्चारण करते है, उनको भी उसी तरह ही सिद्धि मिलती है, जो मनुष्य कठोर तपस्या करते है। इसलिए माता दुर्गा की अनुकृपा पाने का सर्वोत्तम उपाय एक ही दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करना होता हैं। मनुष्य को अपने जीवननकाल में समस्त तरह के सुख-सम्पत्ति एवं समृद्धि को पाने के लिए माता इस स्तोत्र का वांचन करना चाहिए, जिससे मनुष्य को अपने किए गए बुरे कर्मों से मुक्ति मिल जाये। दुर्गा माता के नवरुपों के रूप में नवरात्रि को मनाया जाता है।


Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits





अथ श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन:-दुर्गा माता के श्री दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करने से पूर्व उनके जो मन्त्रों का वर्णन किया गया है, उन मन्त्रों के भावों को समझते हुए उच्चारण करना चाहिए, जिससे अर्थों को समझकर सही उच्चारण करने से मनुष्य को उचित फल की प्राप्ति हो सके, इसलिए श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन इस तरह हैं: दुर्गा माता की अरदास "ॐ श्री दुर्गायै नमः" के द्वारा करते हुए, श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन कर रहा हूँ:।




शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।


यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती।।१।।


अर्थात्:-भगवान श्रीशिवशंकरजी से जब पार्वतीजी पूछती है, तब शिवजी बोलते है-हे देवी भगवती! आप ध्यानपूर्वक सुनिए। मैं आपको अष्टोत्तर शतनामों अर्थात् एक सौ आठ दुर्गाजी के नामों के बारे में बताता हूँ, इन एक सौ आठ नामों के वांचन या सुनने से ही उत्तम विनम्र, पवित्र एवं सदाचार से युक्त भगवती दुर्गा खुश हो जाती हैं।



ऊँ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।


आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी।।२।।


अर्थात्:-अष्टोत्तर शतनामों में सबसे पहले प्रजापति दक्ष की तनुजा सती, आशावादी के रूप में साध्वी, भगवान शिवजी पर प्रेम रखने वलु भवप्रीता, ब्रह्माण्ड में रहने वाली भवानी, जगत में जीवन-मरण के बंधनों से आजादी दिलाने वाली भवमोचनी, परोपकारी एवं विनम्र के रूप में आर्या, आदि शक्ति के रूप में दुर्गा, सब पर विजय पाने वाली के रूप में जया, प्रारम्भ के वास्तविक होने के भाव के रूप में आद्य, तीन चक्षुओं के रुप में त्रिनेत्रा एवं विकट पीड़ा को धारण करने की शक्ति वाली शूलधारिणी के रूप में नामों का उच्चारण करें।



पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।


मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः।।३।।


अर्थात्:-जो भोलेनाथजी के पिनाक को अपने हाथों में संभालने वाले होती हैं, अत्यंत मनोरम एवं रमणीय के समान, जो बहुत ही तेज आवाज से घण्टानाद करने वाली, कठिन अभीष्ट की सिद्धि के लिए किया जानेवाले कठोर एवं कष्टदायक आचरण करने वाली, चिंतन शक्ति और अंतः कर्ण की निश्चयात्मक वृत्ति वाली वाले होते हैं।



सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी।


अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः।।४।।


अर्थात्:-समस्त तरह के मन्त्रों से युक्त, जिनका स्थान समस्त देवी-देवताओं में उच्च हैं, जिनके स्वरूप के दर्शन से समस्त तरह की वास्तविक खुशी प्रदान करने वाली, जिनके स्वरूप का कभी अंत नहीं होता है, समस्त की पैदायश करनी वाली सबको अपनी तरफ खींचने के भाव वाली सौन्दर्य से युक्त स्त्री स्वरूप वाली हैं, जिनका रूप शानदार हैं, चित्त की एकाग्रता से गुणगान करने वाली हैं, जिनमें बहुत सारे गुणों का भंडार भरा हुआ हैं, जिनके अलावा कुछ सुंदर स्वरूप नहीं हैं और जीवन-मरण के मार्ग से मुक्ति देने वाली हैं।



शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।


सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी।।५।।


अर्थात्:-जो भगवान शिवजी को बहुत ही प्यारी हैं और उनकी अर्धागिनी भी हैं, देवताओं की माता हैं, चिंतन करने का कार्य करने वाली, बहुमूल्य और चिकने पदार्थ से लगाव रखने वाली, प्रजापति की तनुजा हैं, प्रजापति के कारण हवन पूजन युक्त वैदिक कृत्य को नष्ट करने वाली हैं।



अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।


पट्टाम्बरपरिधाना कमलञ्जरीरञ्जिनी।।६।।


अर्थात्:-जो अभीष्ट सिद्धि के लिए किए जाने वाले कठोर एवं दुःखदायक आचरण को करते हुए पल्लवों को भी ग्रहण नहीं करती हैं, जो तरह-तरह के वर्ण से युक्त हैं, रक्त वर्ण से युक्त, जो वृत्तपुष्प को हाथों में सम्भालने वाली, कौशा से बने कपड़े को  वर्ण या रक्तवर्ण से युक्त पट को पहनने धारण करने वाली हैं, जो पैरों में घुँघरुदर नूपुर को पहनकर आकर्षक ताल को करते हुए खुश रहने वाली है।



अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।


वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता।।७।। 


अर्थात्:-जिसकी सीमा न हो उस शौर्य से युक्त हो, जो असरों के अनुकृति के लिए बहुत निष्ठुर हैं, जो बहुत ही रूपवती हैं, बहुत ही सुंदर हैं, जिनका नाम वनदुर्गा हैं, जिनका एक रूप मातङ्गी देवी का भी हैं, जिनको मतङ्ग मुनि पूजन करते हैं।



ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।


चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः।।८।।


अर्थात्:-जिनको ब्रह्मा की शक्ति या ब्राह्म विधि से विवाहित स्त्री का रूप वाली ब्राह्मी हैं। जो कि शिवजी की अर्धांगिनी के रूप में माहेश्वरी के रूप में जानी जाती है। जिनका एक नाम चैन्द्री भी हैं, जो कि पांच वर्ष की उम्र से युक्त सुंदर किशोरी हैं, इसलिए कौमारी कहते हैं। जो कि विष्णुजी के शक्ति के रूप में वैष्णवी भी होती हैं, जो कि चण्ड एवं मुण्ड का वध करके चामुंडा के नाम से जानी जाती है, जो कि वराह की सवारी करने से वाराही कहलाती हैं। जो कि लक्ष्मीजी के रूप में भी जानी जाती है। पुरुष के रुप को भी ग्रहण करने वाली पुरुषाकृति हैं।



विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।


बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना।।९।।


अर्थात्:-जो समस्त तरह से खुशी देने वाली हैं, जो ऊपर की तरफ खींचने वाली हैं अर्थात् मोक्ष देने वाली हैं, जिनमें बहुत ही ज्ञान का भंडार भरा हुआ हैं। जो धार्मिक कर्म को करने वाली हैं, जो कि लगातार होने वाली हैं, जो अंतःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति से युक्त हैं। जो बहुला के नाम वाली गौ की तरह सत्यनिष्ठ हैं, जो बहुत ही स्नेह रखने वाली हैं, जो समस्त तरह के वाहन की सवारी करने वाली हैं।



निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।


मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी।।१०।।


अर्थात्:-जो निशुम्भ एवं शुम्भ नामक दैत्यों का संहार करने वाली हैं, जो महिषासुर नाम के दैत्य का वध करने वाली हैं, मधु एवं कैटभ नाम के दो दैत्य भाइयों का वध करने वाली हैं। जो चण्ड एवं मुण्ड नामक दो दैत्य भाइयों का संहार करने वाली हैं।



सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।


सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा।।११।।


अर्थात्:-जो समस्त दैत्यों का संहार करने वाली हैं, जो हमेशा दुराचारों एवं अत्याचारों से परेशान करने वालों का विनाश करने के लिए तत्पर रहने वाली हैं, जो समस्त तरह के शास्त्रों की जानकर हैं, जो सत्यनिष्ठ पर कायम रहने वाली हैं। जो समस्त तरह अस्त्र-शस्त्र को हाथों में धारण करने वाली हैं।



अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।


कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः।।१२।।


अर्थात्:-जो तरह-तरह के शस्त्रों को अपने हाथ में पकड़ने रखने वाली हैं, जो तरह-तरह के अस्त्रों को अपने हाथ में पकड़ने रखने वाली हैं, जो कि बारह वर्ष तक कि कन्या रूप में हैं, जो एक अविवाहित बालिका भी हैं, जो दस से पंद्रह वर्ष के मध्य की उम्र वाली बालिका भी हैं, जो जवानी से भरी हुई एक स्त्री के रूप में भी हैं। जो समस्त तरह के मनोविकारों से रहित हैं।



अप्रौढ़ा चैव प्रौढ़ा च वृद्धमाता बलप्रदा।


महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला।।१३।।


अर्थात्:-जो दीर्घकाल तक रहने वाली स्त्री भी हैं, जो बहुत ही समय पहले की  स्त्री भी हैं, जो एक बूढ़ी माता के रूप में भी हैं, जो ताकत या शक्ति से युक्त भी हैं, जो कि बहुत बड़े पेट से युक्त हैं, जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड संग्रहीत रखने वाली हैं, जो खुले बालो के रूप वाली भी हैं, जो डरावने रूप को धारण करने वाली भी हैं, जो भूत-प्रेत बाधा को दूर करने वाली हैं।



अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।


नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी।।१४।।


अर्थात्:-जो अपने क्रोध की आग की ज्वाला से युक्त होकर तेज ज्वाला आसमान को भी नष्ट करने का सामर्थ्य रखने वाली हो, जो विध्वंसक रुद्र की तरह एक भयंकर चेहरे वाली हो, जो प्रलय की तरह अंधेरी एवं भयानक रात की तरह के स्वरूप वाली हैं, जो बहुत ही कठिन तपस्या करने वाली हैं, जिनमें विष्णुजी की पत्नी के रूप लक्ष्मीजी का रूप भी समाहित होता हैं, जो कि दुर्गा माता एक कात्यायनी रूप वाली हो, जो कि शिवजी की पत्नी पार्वतीजी का रुप भी समाहित रखने वाली हैं, जो वायव्य ब्रह्माण्ड के लोक वाली है।



शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।


कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी।।१५।।


अर्थात्:-जो भगवान शिवजी के राजदूत के रूप में हैं, जो मुक्त रूप वाली स्त्री हैं, जो शाश्वत विनाश से रहित हो, जो सर्वोच्च देवी के रूप वाली हैं, जो माता पार्वती का एक रूप रखने वाली हैं, मत्स्य देश के राजा अश्वपति की तनुजा के समान पतिव्रता रूप में होती हैं, जो स्पष्ट दिखाई देने वाली या इंद्रिय के द्वारा ज्ञान को स्पष्ट रूप में रखने वाली हैं, जो ब्रह्माजी की भार्या गायत्रीजी के रूप में भी समाहित रहने वाली होती हैं।




य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।


नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति।।१६।।


भावार्थ्:-देवी पार्वती! माता देवी के श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं के मन्त्रों को जो कोई भी नियमित रूप से वांचन करते हैं, उनके लिए पृथ्वी लोक, आकाश लोक और पाताललोक में कुछ भी साधने योग्य नहीं हैं।



धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।


चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्।।१७।।


भावार्थ्:-जो भी इसके मन्त्रों का वांचन करते हैं, वे धन, धान्य, पुत्र, औरत, अश्व, हस्ती, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चार पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेते हैं। आखिर में जिसका आदि है न अन्त अर्थात् जो हमेशा बना रहने वाले होता हैं। जो परम्परानिष्ठ शाश्वत जीवन-मरण के चक्कर से मुक्त होकर मोक्ष गति को प्राप्त कर लेता हैं।



कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।


पूजयेत् पराया भक्त्या पठेन्नामशताष्टाकम्।।१८।।


भावार्थ्:-जो मनुष्य बारह वर्ष की उम्र की कन्या का विधि-विधान से पूजा करता हैं, उसके बाद में देवताओं की देवी दुर्गा जी की छवि को मन में बनाकर मन ही मन में उनको याद करते हुए उनका ध्यान करना चाहिए, फिर अपने विश्वास एवं श्रद्धाभाव से मन में किसी भी तरह के बुरे विकारों के बिना अपने स्वार्थ या हित की कुछ भी कामना नहीं रखते हुए देवी दुर्गाजी का पूजन करना चाहिए, उसके बाद में अष्टोत्तरशत नाम के स्तोत्रं के मन्त्रों का वांचन करना चाहिए।



तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैं सुरवरैरपि।


राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्।।१९।।


भावार्थ्:-जो भी इस तरह वांचन करते हैं, उसको समस्त अति उत्तम देवताओं से भी सफलता मिलती है, महीपति भी उसके  भृत्य बनकर उसकी सेवा करते हैं, और वह समस्त धन को प्राप्त करके उस धन का स्वामी बन जाता हैं, जिस तरह राज्यलक्ष्मी जी को धन की देवी कहा जाता हैं।



गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूकर्पूरमधुत्रयेण।


विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।२०।।


भावार्थ्:-जो मनुष्य गोरोचन, लाक्षा लाह, कुङ्कुम, सिन्दूर, कपूर या घनसार घृत या दुग्ध, शक्कर या शर्करा और मधु या कुसुमासव आदि चीजों को जब एक पात्र में इकट्ठा करके उनको मिश्रित करने से जो मिश्रित लेप बनता हैं, उस लेप को स्याही के रूप में उपयोग करते हुए मन्त्रों के पाठ के द्वारा जब किसी यन्त्र को पूजा-अर्चना एवं विधि-विधान से पूर्वक लिखा जाता हैं, उस लिखे गए यन्त्र को जब कोई विधि-विधान आदि को अच्छा जानकर मनुष्य उस यन्त्र को हमेशा अपने पास रखते हैं और पहनता हैं, तब वह मनुष्य भगवान शिवजी की तरह ही बन जाता हैं या उस मनुष्य को जीवन के जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिलकर मोक्ष रूप को प्राप्त कर लेता हैं।



भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।


विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम्।।२१।।


भावार्थ्:-जब भौमवती अमावस्या तिथि की अर्धरात्रि के समय में जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र में परिभ्रमण करता है, तब उस समय जो भी मनुष्य श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् को अपने हाथ के द्वारा लिखकर उस लिखे गए स्तोत्रं के मन्त्रों का उच्चारण उचित तरह से वांचन करते है, तब वे मनुष्य अपने जीवनकाल में बहुत ही सुख-समृद्धि एवं अनेक तरह की सम्पदा को प्राप्त करता हैं।



।।इति श्री विश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं संपूर्णम्।।

















Wednesday, October 22, 2025

October 22, 2025

अन्नकूट गोवर्धन पूजा कब हैं? जानें अन्नकूट पूजा विधि, कथा और महत्व (When is Annakut Govardhan Puja? Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance)

अन्नकूट गोवर्धन पूजा कब हैं? जानें अन्नकूट पूजा विधि, कथा और महत्व (When is Annakut Govardhan Puja?  Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance):-हिन्दू धर्म में कार्तिक मास में दिवाली पूजन के दूसरे दिन के पर्व को अन्नकूट पूजा या गोवर्धन पूजा और बाली प्रतिपदा का पर्व को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन मनाया जाता हैं। कार्तिक शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट का उत्सव भी मनाया जाता है।




अन्When is Annakoot Puja?  Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance



अन्नकूट का अर्थ:-जिनमें तरह-तरह के अन्न को इकट्ठा करके तरह-तरह की सब्जियों के साथ में मिलाकर एक किया जाता हैं, उसे अन्नकूट कहते हैं। इस तरह अन्नकूट के शब्दों को अलग करने पर दो शब्द प्राप्त होते है, जिनमें एक होता है अन्न एवं दूसरा शब्द कूट होता हैं।


अन्न का अर्थ समस्त तरह के धान्य पर्दाथ होता हैं।


कूट का अर्थ सभी को इक्कठा करके एक समूह बना होता हैं।


इस दिन खरीफ फसलों से प्राप्त अनाज एवं नई सब्जियों को बनाकर भगवान विष्णु का भोग लगाया जाता हैं। ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते है:



कार्तिकस्य सिते पक्षे अन्नकूटं समाचरेत्।


गोवर्धनोत्सवं चैव श्रीविष्णुः प्रिवनामिति।।



अन्नकूट पूजा विधि:-इस दिन की पूजा विधि इस तरह हैं।


◆प्रातःकाल घर के द्वार पर गौ के गोबर का गोवर्धन बनाये तथा उसे शिखर युक्त बनाकर वृक्ष शंखादि से संयुक्त और पुष्पों से सुशोभित करें। 



◆इस दिन यथा सामर्थ्य छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन रूप श्री भगवान को भोग लगाया जाता है। इसको प्रसाद रूप में भक्तों में वितरीत किया जाता हैं। 



◆रात में गौ से गोवर्धन का उपमर्दन करवाया जाता हैं। 



◆मन्दिरों में विविध प्रकार के पकवान, मिठाईयां, नमकीन और अनेक प्रकार की सब्जियां, मेवे, फल आदि भगवान के समक्ष भोग के लिए सजाये जाते हैं तथा सभी अन्नकूट का दर्शन कर भोग लगाकर आरती करते हैं। 



◆फिर भक्तों को प्रसाद रूप में अन्नकूट वितरण करते हैं। ब्रज में इसकी विशेष विशेषता हैं। 



◆काशी, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, बरसाना, नाथद्वारा आदि भारत के प्रमुख मन्दिरों में लड्डुओं तथा पकवानों के पहाड़ या कूट बनाये जाते हैं। जिनके दर्शन के लिए विभिन्न स्थानों से यात्री पधारते हैं। 



◆एक-एक करके सभी मन्दिरों में अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है और दीपावली से कार्तिक पूर्णिमा तक सभी मन्दिरों में ये महोत्त्सव चलता रहता हैं।





अन्नकूट पूजा की पौराणिक कथा:-द्वापर में ब्रज में अन्नकूट के दिन इन्द्र की पूजा होती थी। एक दिन श्रीकृष्ण ने गोप-ग्वालों को समझाया कि गायें व गोवर्धन प्रत्यक्ष देवता हैं। अतः तुन्हें इनकी पूजा करनी चाहिए। क्योंकी इन्द्र तो कभी यहां दिखाई भी नहीं देते। अब तक उन्होंने कभी आप लोगों के बनाये हुए पकवान ग्रहण भी नहीं किये। फलस्वरूप उनकी प्रेरणा से सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन की पूजा की। स्वयं भगवान श्री कृष्णजी ने गोवर्धन का रूप धारण करके सभी पकवानों या अन्नकूट को ग्रहण किया। जब इन्द्र को यह बात पता चली तो वे अत्यन्त क्रोधित होकर प्रलयकाल के सदृश मूसलाधार वर्षा करने लगे। यह देखकर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी चिटुडी अंगुली पर धारण किया। उसके नीचे सब ब्रजवासी ग्वाल-बाल, गायें-बछड़े आदि आ गये। लगातार सात दिन की वर्षा से जब ब्रजवासी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो इन्द्र को बड़ी ग्लानि हुई। ब्रह्माजी ने इन्द्र को श्री कृष्ण के परमब्रह्म परमात्मा होने की बात बतायी तो लज्जित होकर इन्द्र ने ब्रज में आकर श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। इस अवसर पर ऐरावत ने आकाश गंगा के जल से और कामधेनु ने अपने दुग्ध से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। जिससे वे गोविन्द कहे जाने लगे। इस प्रकार गोवर्धन पूजन स्वयं श्री भगवान का पूजन हैं। "गोविन्द मेरो हैं, गोपाल मेरो हैं, श्री बांके बिहारी नन्दलाल मेरो हैं।"





अन्नकूट पूजा की पौराणिक कथा:-भगवान की प्रेरणा से शाल्गलीद्वीप में द्रोणाचल की पत्नी से गोवर्धन का जन्म हुआ। भगवान के जाग रूप से वृन्दावन और उनके बावन स्कन्ध से यमुना प्रकट हुई। गोवर्धन को भगवद् रूप जानकर ही सुमेरु हिमालय आदि पर्वतों ने उसकी पूजा की और उसे गिरिराज बनाकर उसका स्तवन भी किया। एक समय तीर्थ यात्रा के प्रसंग में पुलस्त्यजी वहां आये। वे गिरिराज गोवर्धन को देख कर मुग्ध हो उठे और द्रोण के पास जाकर उन्होंने कहा कि मैं काशी निवासी हूँ। एक याचना लेकर आपके पास आया हूँ। आप अपने इस पुत्र को मुझे दे दो। मैं इसे काशी में स्थापित कर वहीं तप करूंगा। इस पर द्रोण पुत्र के स्नेह से कातर तो हो उठे, पर वे ऋषि मांग को ठुकरा न सके। तब गोवर्धन ने मुनि से कहा। "मैं दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा हूँ। आप मुझे कैसे ले चलेंगे।" मुनि ने कहा-मैं तुम्हें हाथ पर उठाये ले चलूंगा। गोवर्धन ने कहा-महाराज एक शर्त हैं। यदि आप मार्ग में मुझे कहीं रख देंगे तो मैं उठ नहीं सकूंगा। मुनि ने यह शर्त स्वीकार कर ली। ततपश्चात पुलस्त्यजी मुनि ने हाथ पर गोवर्धन उठा कर काशी के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में ब्रजभूमि मिली। जिस पर गोवर्धन की पूर्व स्मृतियां जाग उठी। वह सोचने लगा कि भगवान श्री कृष्ण राधा के साथ यही अवतीर्ण होकर बाल्य और किशोर आदि की बहुत सी मधुर लीलाऐं करेंगे। उस अनुपम रस के बिना मैं न रह सकूंगा। ऐसे विचार उत्पन्न होते ही वह भारी होने लगा। जिससे मुनि थक गये। इधर लघुशंका की भी प्रवृत्ति हुई। स्नान आदि से निवृत्त होकर जब वे गोवर्धन को पुनः उठाने लगे। तब वह न उठा। गोवर्धन ने मुनि को अपनी शर्त की याद दिलवाई और कहा-अब मैं यहां से नहीं हटूंगा। इस पर मुनि को क्रोध आया और वे शाप दे बैठे। तुमने मेरे मनोरथ पूर्ण नहीं किया। इसलिए तुम प्रतिदिन तिल-तिल घटते जाओगे। उसी शाप से गिरिराज गोवर्धन आज भी तिल-तिल घटता जा रहा हैं।




अन्नकूट पूजा का महत्त्व:-अन्नकूट पूजा करने से भगवान श्री कृष्णजी की अनुकृपा प्राप्त होती हैं।


1.अन्नकूट व्रत करने से मनुष्य के जीवनकाल के समस्त संकटों का निवारण हो जाता हैं।


2.मनुष्य के पारिवारिक जीवन में अन्न भण्डार भरा रहता हैं।


Wednesday, August 20, 2025

August 20, 2025

बटुक भैरव स्तोत्रं अर्थ सहित और महत्त्व(Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance)

बटुक भैरव स्तोत्र अर्थ सहित और महत्त्व (Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance):-श्रीबटुक भैरवजी को ही शिवजी के रूप में समस्त जगत में जाना जाता हैं, श्रीबटुक भैरवजी की पूजा-अर्चना एवं गुणगान करके भगवान शंकरजी को खुश किया जा सकता हैं। इसलिए मनुष्य को नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, जिससे भगवान शिवजी का आशीर्वाद श्रीबटुक भैरवजी की पूजा के रूप में मिल सके। 



Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance



बटुक भैरव स्तोत्र अर्थ सहित और महत्त्व (Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance):-श्रीबटुक भैरवजी को ही शिवजी के रूप में समस्त जगत में जाना जाता हैं, श्रीबटुक भैरवजी की पूजा-अर्चना एवं गुणगान करके भगवान शंकरजी को खुश किया जा सकता हैं। इसलिए मनुष्य को नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, जिससे भगवान शिवजी का आशीर्वाद श्रीबटुक भैरवजी की पूजा के रूप में मिल सके।





भैरव का अर्थ:-जो जीवनकाल में समस्त तरह के डरावनें डर से मुक्त कराने के कारण भैरव कहलाते हैं।


वट्यते वेष्टयते सर्व जगत् प्रलयेअनेनेति वटुकः' 

अर्थात्:-जब समस्त संसार को चारों तरफ से घेरते हुए समस्त तरह से संसार को नाश करने के कारण अथवा सभी जगहों पर अपनी नजर दृष्टि रखते हुए अपना वर्चस्व से युक्त होने से भैरव 'बटुक' कहलाते हैं।



'बटून् ब्रह्मचारिणः कार्यमुपदिशनीति बटुको गुरूरूपः'


अर्थात:-ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए एवं सात्विक जीवन को जीने से सम्बंधित ज्ञान देने वाले गुरु के रूप में होने से भैरव 'बटुक' कहे जाते हैं।



श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् अर्थ सहित:-मनुष्य को श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन करने से पूर्व निम्नलिखित तरीके से पूजा करते हुए इस स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, जो इस तरह हैं- अर्थ सहित



श्रीबटुक भैरव ध्यान:-श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं के वांचन से पूर्व श्रीबटुक भैरवजी को मन में मन रखते हुए उनको आंखे मूंदकर उनका ध्यान करना चाहिए।


वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।


दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः।।


दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।


हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्।।



श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं से पूर्व भैरव मानस पूजन:-श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं के पूर्व भैरवजी का मानस पूजन करना चाहिए, जो निम्नलिखित प्रकार से करनी चाहिए।


ऊँ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ हं आकाश-तत्त्वात्मक पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ यं वायु-तत्त्वात्मक धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ रं अग्नि-तत्त्वात्मक दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ सं सर्व-तत्त्वात्मक ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।



बटुक भैरव मूल स्तोत्रं:-बटुक भैरव मूल स्तोत्रं का वांचन करने से पहले बटुक भैरव के मूल स्तोत्रं के श्लोकों में वर्णित मन्त्रों के अर्थ को जानना चाहिए, जिससे स्तोत्रं में जो वर्णित देव के बारे में बताया हैं, उनके स्वरूप एवं गुणों के बारे में जानकारी मिल सके। बटुक भैरव के मूल स्तोत्रं का अर्थ इस तरह हैं-


ऊँ भैरवो भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः।


क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्।।


श्मशान-वासी मासांशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।


रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः।।


कंकालः कालः शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।


त्रि-नेत्रो बहु-नेत्रश्च, तथा पिंगल-लोचनः।।


शूलपाणि खड्गपाणि, कंकाली धूम्र-लोचनः।


अभीरुर्भैरवीनाथो, भूतपो योगिनीपतिः।


धनदोsधनहारी च, धनवान् प्रतिभागवान्।


नागहारो नागकेशो, व्योमकेशः कपालभृत्।।


कालः कपालमाली च, कमनीयः कलानिधिः।


त्रिनेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रिशिखी च त्रिलोकभृत्।।


त्रिवृत्ततनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रिय।


बटुको बटुवेषश्च, खट्वांगवरधारकः।।


भुताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः।


धूर्तो दिगम्बरः शौरीर्हरिणः पाण्डुलोचनः।


प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शंकरप्रियबान्धवः।।


अष्टमूर्तिर्निधीशश्च, ज्ञानचक्षुस्तपोमयः।


अष्टाधारः षडाधारः, सर्पयुक्तः शिखीसखः।।


भूधरो भूधराधीशो, भूपतिर्भुधरात्मजः।।


कपालधारी मुण्डी च, नागयज्ञोपवीतवान्।


जृम्भणो मोहनः स्तम्भ, मारणः क्षोभणस्तथा।।


शुद्द नीलाञ्जनप्रख्यदेहः मुण्डविभूषणः।


बलिभुग्बलिभुङ्नाथो, बालोबालपराक्रम।।


सर्वापत्-तारणो दुर्गों, दुष्टभूतनिषेवितः।


कामीकलानिधिः कान्त, कामिनी वशकृद्वशी।।


जगद्-रक्षाकरोsनन्तो, मायामन्त्रौषधीमयः।


सर्वसिद्धिप्रदो वैद्य, प्रभविष्णुरितीव हि।।



फलश्रुति का अर्थ:-फलश्रुति में समस्य तरह के रचित श्लोक या किसी भी तरह के स्तोत्रम् के बारे में मिलने वाले नतीजों को बताया जाता हैं, जिससे मनुष्य उन स्तोत्रम् को पाठन करके उन नतीजों को प्राप्त कर सके। फलश्रुति का अर्थ सत्कर्म विशेष का फल देने का भाव होता हैं।


अष्टोत्तरशतं नाम्नां, भैरवस्य महात्मनः।


मया ते कथितं देवि, रहस्य सर्वकामदम्।।


अर्थात्:-

य इदं पठते स्तोत्रं, नामाष्टशतमुत्तमम्।


न तस्य दुरितं किंञ्चिन्न च भूतभयं तथा।


न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित्, प्राप्नुयान्मानवः क्वचिद्।


पातकेभ्यो भयं नैव, पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः।।


मारीभये राजभये, तथा चौराग्निजे भये।


औत्पातिके भये चैव, तथा दुःस्वप्नजे भये।।


बन्धने च महाघोरे, पठेत् स्तोत्रमनन्यधीः।


सर्वं प्रशममायाति, भयं भैरवकीर्तनात।।


क्षमा प्रार्थना:-देवी-देवता के मन्त्रों के उच्चारण में किसी भी तरह के उच्चारण में भूल के लिए क्षमा करनी चाहिए, जिससे मन्त्रों का फल मिल सके, इसे ही क्षमा प्रार्थना कहते हैं।


आवाहन न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।


पूजाकर्म न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर।।


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं, भक्तिहीनं सुरेश्वर।


मया यत्-पूजितं देव परिपूर्णं तदस्तु में।


अर्थात्:-हे इष्टदेव या इष्टदेवी! मैं न तो आपको मन्त्रों के द्वारा बुलाना जानता हूँ, न तो ही मैं आपको पूजा आदि के बाद आपकी मूर्ति को जलाशय में प्रवाहित करना जानता हूँ। हे परमेश्वर! मैं आपकी विधिवत पूजा-अर्चना नहीं जानता हूँ, परमेश्वर आप मुझे क्षमा करें।


हे सुरेश्वर! वैदिक रीति से करने वाले कार्यों के मन्त्रों के रहित, नित्य कर्म नियम और विधि से होने वाले कार्यों से रहित और आस्था से रहित हूँ। हे देव! मैं जिस तरह से आपकी भक्ति के रूप में पूजा-उपासना करता हूँ आप उस पूजा को पूर्ण मानते हुए, मेरी पूजा को स्वीकार करते हुए मेरी पूजा को पूर्ण कीजिए।



बटुक भैरव स्तोत्रं वांचन करने की विधि (Method of reciting Batuk Bhairav ​​Stotra):-बटुक भैरव स्तोत्रं वांचन को करते समय विधिपूर्वक भैरवजी को अपने मन मन्दिर में स्थापित करते हुए स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, बटुक भैरव स्तोत्रं के वांचन की इस तरह हैं-


◆लकड़ी का एक बाजोट लेकर उसको शुद्ध करके स्वच्छ काले रंग के कपड़े को उस पर बिछाना चाहिए।



◆शुभ अवसरों पर पूजन के लिए आटा आदि से बनाया गया छोटा चौकोर स्थान जहाँ शादियों और अन्य खुशी के अवसरों पर मिठाई रखी जाती है जो पूजा के बाद लोगों में बाँटी जाती हैं। या जमीन पर चित्रांकन करना या बनाना को चौक पूरें करना कहते हैं।



◆फिर एक सरसों के तेल के दिये में बाती डालकर उसको प्रज्वलित करना चाहिए।



◆फिर कालभैरवजी को पूजा में बुलाने के लिए हाथ में हल्दी से मिश्रित अक्षत को उनको मन ही मन में याद करते हुए उनका आह्वान करना चाहिए।



◆इक्कीस बार ॐ भैरवायः नमः मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।


◆फिर उनका षोडशोपचार कर्म से पूजन करना चाहिए।


◆स्नान, अर्ध्य के लिए जल को अर्पण करना, चन्दन, फूल, अगरबत्ती, फल, नीबू, लौंग, उड़द, मिठाई, धूप, दिप आदि को अर्पण करना चाहिए।


◆सायंकाल के समय मनुष्य को साबुत माष या धान्यवीर से बड़े  एवं ग्यारहा कचौरी बनानी चाहिए।


◆फिर उनके साथ में रक्तवर्ण के पुष्पों के साथ, रक्ताभ वर्ण की बनी हुई मिठाई भी होनी चाहिए।


◆ततपश्चात एक मिट्टी का बना हुआ कुल्हड़ लेकर उसमें जल को भरें एवं एक हरे रंग या पिले रंग का अम्लसार आदि को साथ लेना चाहिए।


◆फिर सायंकाल के समय भैरवजी के मन्दिर जाकर "ऊँ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ऊँ" मंत्रों का उच्चारण करते हुए पूजन में उपर्युक्त समस्त वस्तुओं को अर्पण करना चाहिए। 


◆फिर अपने घर आते समय पीछे की तरफ नहीं देखे।



श्री बटुक भैरव स्तोत्रं के वांचन से होने वाले महत्त्व:-श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन मनुष्य हमेशा करना चाहिए, जिससे मनुष्य को स्तोत्रम् के वांचन से निम्नलिखित लाभ मिल सके। 


उम्र में बढ़ोतरी हेतु:-जो मनुष्य के द्वारा हमेशा श्री बटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन करने से बिना पूर्ण उम्र के भोगने से पहले होने वाली मृत्यु से रक्षा होती हैं।


व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए:-जिन मनुष्य का शरीर बीमारियों के द्वारा घिरे रहने पर इलाज करने पर भी ठीक नहीं हो रही बीमारियों से मुक्ति का उपाय यह स्तोत्रं हैं। 


जन्मकुंडली में ग्रहों के बुरे हालात में होने से मुक्ति हेतु:-जन्मकुंडली या ग्रह गोचर में बुरे ग्रह जैसे-सेंहिकीय एवं शिखी ग्रह के द्वारा अच्छे ग्रहों के साथ बैठकर अच्छे ग्रहों के फलों को कमजोर कर देते हैं, उन शुभ ग्रहों के शुभ फल को पाने हेतु श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन हमेशा करना चाहिए, जिससे शुभ ग्रहों का उचित फल मिल जाता हैं। 


न्यायालय के मामलों से राहत पाने हेतु:-मनुष्य को अपने जीवनकाल में बिना मतलब या किसी भी कारण से न्यायालय में किसी के द्वारा फसाने पर उसको न्यायालय के चक्कर काटने पड़ते हैं, इस तरह फसे न्यायालय के मामले से राहत दिलाने यह स्तोत्रं सहायक होता हैं।


भूत-प्रेत से सम्बंधित डर से राहत पाने हेतु:-मनुष्य को अपने रात्रिकाल भूत-प्रेत से सम्बंधित नकारात्मक शक्तियों का डर रहता हैं, उस डर से राहत के लिए मनुष्य को नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन शुरू कर देने पर राहत मिल जाती हैं।


खुद पर विश्वास बढ़ाने हेतु:-मनुष्य को अपनी काबिलियत पर विश्वास नहीं रहता हैं, जिससे मनुष्य को अपने जीवन में सफलता नहीं मिल पाती हैं, इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में सफलता पाने के लिए नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए।

 

निवास स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने हेतु:-मनुष्य को अपने निवास स्थान में नकारात्मक ऊर्जा के कारण निवास स्थान में निवास करने के वाले सदस्यों के बीच में होने वाले झगड़ो से मुक्ति दिलवाकर सुख-शांति बढ़ाने में यह स्तोत्रं सहायक होता हैं।


तंत्र-मंत्र के द्वारा मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले बुरे असर से मुक्ति पाने हेतु:-मनुष्य की तरक्की को देखकर दूसरे मनुष्य को ईर्ष्या के भाव उत्पन्न होने से मनुष्य दूसरे मनुष्य को हर तरह से गिराने के लिए तंत्र-मंत्र शक्तियों का सहारा लेते हैं, उन शक्तियों से मुक्ति दिलाने में यह स्तोत्रं सहायक होता हैं।


रुपयों-पैसों से सम्बंधित परेशानी से मुक्ति हेतु:-मनुष्य को अपने जीवनकाल में रुपयों-पैसों की हर जगह पर आवश्यकता होती हैं, वह दिन-रात मेहनत करते रहते हैं, लेकिन उनको रुपयों-पैसों की तंगी का सामना करना पड़ता हैं, उस तंगी से मुक्ति हेतु नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए।










Sunday, June 29, 2025

June 29, 2025

बटुक भैरव स्तोत्र अर्थ सहित और महत्त्व (Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance)

बटुक भैरव स्तोत्र अर्थ सहित और महत्त्व (Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance):-श्रीबटुक भैरवजी को ही शिवजी के रूप में समस्त जगत में जाना जाता हैं, श्रीबटुक भैरवजी की पूजा-अर्चना एवं गुणगान करके भगवान शंकरजी को खुश किया जा सकता हैं। इसलिए मनुष्य को नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, जिससे भगवान शिवजी का आशीर्वाद श्रीबटुक भैरवजी की पूजा के रूप में मिल सके।




Batuk Bhairav ​​Stotra with meaning and importance






भैरव का अर्थ:-जो जीवनकाल में समस्त तरह के डरावनें डर से मुक्त कराने के कारण भैरव कहलाते हैं।


वट्यते वेष्टयते सर्व जगत् प्रलयेअनेनेति वटुकः' 

अर्थात्:-जब समस्त संसार को चारों तरफ से घेरते हुए समस्त तरह से संसार को नाश करने के कारण अथवा सभी जगहों पर अपनी नजर दृष्टि रखते हुए अपना वर्चस्व से युक्त होने से भैरव 'बटुक' कहलाते हैं।



'बटून् ब्रह्मचारिणः कार्यमुपदिशनीति बटुको गुरूरूपः'


अर्थात:-ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए एवं सात्विक जीवन को जीने से सम्बंधित ज्ञान देने वाले गुरु के रूप में होने से भैरव 'बटुक' कहे जाते हैं।



श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् अर्थ सहित:-मनुष्य को श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन करने से पूर्व निम्नलिखित तरीके से पूजा करते हुए इस स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, जो इस तरह हैं- अर्थ सहित



श्रीबटुक भैरव ध्यान:-श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं के वांचन से पूर्व श्रीबटुक भैरवजी को मन में मन रखते हुए उनको आंखे मूंदकर उनका ध्यान करना चाहिए।


वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।


दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः।।


दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।


हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्।।


श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं से पूर्व भैरव मानस पूजन:-श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं के पूर्व भैरवजी का मानस पूजन करना चाहिए, जो निम्नलिखित प्रकार से करनी चाहिए।


ऊँ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ हं आकाश-तत्त्वात्मक पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ यं वायु-तत्त्वात्मक धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ रं अग्नि-तत्त्वात्मक दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ऊँ सं सर्व-तत्त्वात्मक ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भैरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।



बटुक भैरव मूल स्तोत्रं:-बटुक भैरव मूल स्तोत्रं का वांचन करने से पहले बटुक भैरव के मूल स्तोत्रं के श्लोकों में वर्णित मन्त्रों के अर्थ को जानना चाहिए, जिससे स्तोत्रं में जो वर्णित देव के बारे में बताया हैं, उनके स्वरूप एवं गुणों के बारे में जानकारी मिल सके। बटुक भैरव के मूल स्तोत्रं का अर्थ इस तरह हैं-


ऊँ भैरवो भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः।


क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्।।


श्मशान-वासी मासांशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।


रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः।।


कंकालः कालः शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।


त्रि-नेत्रो बहु-नेत्रश्च, तथा पिंगल-लोचनः।।


शूलपाणि खड्गपाणि, कंकाली धूम्र-लोचनः।


अभीरुर्भैरवीनाथो, भूतपो योगिनीपतिः।


धनदोsधनहारी च, धनवान् प्रतिभागवान्।


नागहारो नागकेशो, व्योमकेशः कपालभृत्।।


कालः कपालमाली च, कमनीयः कलानिधिः।


त्रिनेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रिशिखी च त्रिलोकभृत्।।


त्रिवृत्ततनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रिय।


बटुको बटुवेषश्च, खट्वांगवरधारकः।।


भुताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः।


धूर्तो दिगम्बरः शौरीर्हरिणः पाण्डुलोचनः।


प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शंकरप्रियबान्धवः।।


अष्टमूर्तिर्निधीशश्च, ज्ञानचक्षुस्तपोमयः।


अष्टाधारः षडाधारः, सर्पयुक्तः शिखीसखः।।


भूधरो भूधराधीशो, भूपतिर्भुधरात्मजः।।


कपालधारी मुण्डी च, नागयज्ञोपवीतवान्।


जृम्भणो मोहनः स्तम्भ, मारणः क्षोभणस्तथा।।


शुद्द नीलाञ्जनप्रख्यदेहः मुण्डविभूषणः।


बलिभुग्बलिभुङ्नाथो, बालोबालपराक्रम।।


सर्वापत्-तारणो दुर्गों, दुष्टभूतनिषेवितः।


कामीकलानिधिः कान्त, कामिनी वशकृद्वशी।।


जगद्-रक्षाकरोsनन्तो, मायामन्त्रौषधीमयः।


सर्वसिद्धिप्रदो वैद्य, प्रभविष्णुरितीव हि।।



फलश्रुति का अर्थ:-फलश्रुति में समस्य तरह के रचित श्लोक या किसी भी तरह के स्तोत्रम् के बारे में मिलने वाले नतीजों को बताया जाता हैं, जिससे मनुष्य उन स्तोत्रम् को पाठन करके उन नतीजों को प्राप्त कर सके। फलश्रुति का अर्थ सत्कर्म विशेष का फल देने का भाव होता हैं।


अष्टोत्तरशतं नाम्नां, भैरवस्य महात्मनः।


मया ते कथितं देवि, रहस्य सर्वकामदम्।।


अर्थात्:-

य इदं पठते स्तोत्रं, नामाष्टशतमुत्तमम्।


न तस्य दुरितं किंञ्चिन्न च भूतभयं तथा।


न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित्, प्राप्नुयान्मानवः क्वचिद्।


पातकेभ्यो भयं नैव, पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः।।


मारीभये राजभये, तथा चौराग्निजे भये।


औत्पातिके भये चैव, तथा दुःस्वप्नजे भये।।


बन्धने च महाघोरे, पठेत् स्तोत्रमनन्यधीः।


सर्वं प्रशममायाति, भयं भैरवकीर्तनात।।


क्षमा प्रार्थना:-देवी-देवता के मन्त्रों के उच्चारण में किसी भी तरह के उच्चारण में भूल के लिए क्षमा करनी चाहिए, जिससे मन्त्रों का फल मिल सके, इसे ही क्षमा प्रार्थना कहते हैं।


आवाहन न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।


पूजाकर्म न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर।।


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं, भक्तिहीनं सुरेश्वर।


मया यत्-पूजितं देव परिपूर्णं तदस्तु में।


अर्थात्:-हे इष्टदेव या इष्टदेवी! मैं न तो आपको मन्त्रों के द्वारा बुलाना जानता हूँ, न तो ही मैं आपको पूजा आदि के बाद आपकी मूर्ति को जलाशय में प्रवाहित करना जानता हूँ। हे परमेश्वर! मैं आपकी विधिवत पूजा-अर्चना नहीं जानता हूँ, परमेश्वर आप मुझे क्षमा करें।


हे सुरेश्वर! वैदिक रीति से करने वाले कार्यों के मन्त्रों के रहित, नित्य कर्म नियम और विधि से होने वाले कार्यों से रहित और आस्था से रहित हूँ। हे देव! मैं जिस तरह से आपकी भक्ति के रूप में पूजा-उपासना करता हूँ आप उस पूजा को पूर्ण मानते हुए, मेरी पूजा को स्वीकार करते हुए मेरी पूजा को पूर्ण कीजिए।



बटुक भैरव स्तोत्रं वांचन करने की विधि (Method of reciting Batuk Bhairav ​​Stotra):-बटुक भैरव स्तोत्रं वांचन को करते समय विधिपूर्वक भैरवजी को अपने मन मन्दिर में स्थापित करते हुए स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए, बटुक भैरव स्तोत्रं के वांचन की इस तरह हैं-


◆लकड़ी का एक बाजोट लेकर उसको शुद्ध करके स्वच्छ काले रंग के कपड़े को उस पर बिछाना चाहिए।



◆शुभ अवसरों पर पूजन के लिए आटा आदि से बनाया गया छोटा चौकोर स्थान जहाँ शादियों और अन्य खुशी के अवसरों पर मिठाई रखी जाती है जो पूजा के बाद लोगों में बाँटी जाती हैं। या जमीन पर चित्रांकन करना या बनाना को चौक पूरें करना कहते हैं।



◆फिर एक सरसों के तेल के दिये में बाती डालकर उसको प्रज्वलित करना चाहिए।



◆फिर कालभैरवजी को पूजा में बुलाने के लिए हाथ में हल्दी से मिश्रित अक्षत को उनको मन ही मन में याद करते हुए उनका आह्वान करना चाहिए।



◆इक्कीस बार ॐ भैरवायः नमः मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।


◆फिर उनका षोडशोपचार कर्म से पूजन करना चाहिए।


◆स्नान, अर्ध्य के लिए जल को अर्पण करना, चन्दन, फूल, अगरबत्ती, फल, नीबू, लौंग, उड़द, मिठाई, धूप, दिप आदि को अर्पण करना चाहिए।


◆सायंकाल के समय मनुष्य को साबुत माष या धान्यवीर से बड़े  एवं ग्यारहा कचौरी बनानी चाहिए।


◆फिर उनके साथ में रक्तवर्ण के पुष्पों के साथ, रक्ताभ वर्ण की बनी हुई मिठाई भी होनी चाहिए।


◆ततपश्चात एक मिट्टी का बना हुआ कुल्हड़ लेकर उसमें जल को भरें एवं एक हरे रंग या पिले रंग का अम्लसार आदि को साथ लेना चाहिए।


◆फिर सायंकाल के समय भैरवजी के मन्दिर जाकर "ऊँ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ऊँ" मंत्रों का उच्चारण करते हुए पूजन में उपर्युक्त समस्त वस्तुओं को अर्पण करना चाहिए। 


◆फिर अपने घर आते समय पीछे की तरफ नहीं देखे।



श्री बटुक भैरव स्तोत्रं के वांचन से होने वाले महत्त्व:-श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन मनुष्य हमेशा करना चाहिए, जिससे मनुष्य को स्तोत्रम् के वांचन से निम्नलिखित लाभ मिल सके। 


उम्र में बढ़ोतरी हेतु:-जो मनुष्य के द्वारा हमेशा श्री बटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन करने से बिना पूर्ण उम्र के भोगने से पहले होने वाली मृत्यु से रक्षा होती हैं।


व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए:-जिन मनुष्य का शरीर बीमारियों के द्वारा घिरे रहने पर इलाज करने पर भी ठीक नहीं हो रही बीमारियों से मुक्ति का उपाय यह स्तोत्रं हैं। 


जन्मकुंडली में ग्रहों के बुरे हालात में होने से मुक्ति हेतु:-जन्मकुंडली या ग्रह गोचर में बुरे ग्रह जैसे-सेंहिकीय एवं शिखी ग्रह के द्वारा अच्छे ग्रहों के साथ बैठकर अच्छे ग्रहों के फलों को कमजोर कर देते हैं, उन शुभ ग्रहों के शुभ फल को पाने हेतु श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन हमेशा करना चाहिए, जिससे शुभ ग्रहों का उचित फल मिल जाता हैं। 


न्यायालय के मामलों से राहत पाने हेतु:-मनुष्य को अपने जीवनकाल में बिना मतलब या किसी भी कारण से न्यायालय में किसी के द्वारा फसाने पर उसको न्यायालय के चक्कर काटने पड़ते हैं, इस तरह फसे न्यायालय के मामले से राहत दिलाने यह स्तोत्रं सहायक होता हैं।


भूत-प्रेत से सम्बंधित डर से राहत पाने हेतु:-मनुष्य को अपने रात्रिकाल भूत-प्रेत से सम्बंधित नकारात्मक शक्तियों का डर रहता हैं, उस डर से राहत के लिए मनुष्य को नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रम् का वांचन शुरू कर देने पर राहत मिल जाती हैं।


खुद पर विश्वास बढ़ाने हेतु:-मनुष्य को अपनी काबिलियत पर विश्वास नहीं रहता हैं, जिससे मनुष्य को अपने जीवन में सफलता नहीं मिल पाती हैं, इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में सफलता पाने के लिए नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए।

 

निवास स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने हेतु:-मनुष्य को अपने निवास स्थान में नकारात्मक ऊर्जा के कारण निवास स्थान में निवास करने के वाले सदस्यों के बीच में होने वाले झगड़ो से मुक्ति दिलवाकर सुख-शांति बढ़ाने में यह स्तोत्रं सहायक होता हैं।


तंत्र-मंत्र के द्वारा मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले बुरे असर से मुक्ति पाने हेतु:-मनुष्य की तरक्की को देखकर दूसरे मनुष्य को ईर्ष्या के भाव उत्पन्न होने से मनुष्य दूसरे मनुष्य को हर तरह से गिराने के लिए तंत्र-मंत्र शक्तियों का सहारा लेते हैं, उन शक्तियों से मुक्ति दिलाने में यह स्तोत्रं सहायक होता हैं।


रुपयों-पैसों से सम्बंधित परेशानी से मुक्ति हेतु:-मनुष्य को अपने जीवनकाल में रुपयों-पैसों की हर जगह पर आवश्यकता होती हैं, वह दिन-रात मेहनत करते रहते हैं, लेकिन उनको रुपयों-पैसों की तंगी का सामना करना पड़ता हैं, उस तंगी से मुक्ति हेतु नियमित रूप से श्रीबटुक भैरव स्तोत्रं का वांचन करना चाहिए।