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Sunday, September 20, 2026

September 20, 2026

पूजा से पहले संकल्प क्यों किया जाता हैं? जानें अर्थ, विधि, मंत्र और पौराणिक महत्व (Why resolution is done before puja? Know Meaning, vidhi, Mantra and Puranic importance)

पूजा से पहले संकल्प क्यों किया जाता हैं? जानें अर्थ, विधि, मंत्र और पौराणिक महत्व (Why resolution is done before puja?  Know Meaning, vidhi, Mantra and Puranic importance):-हिन्दुधर्म शास्त्रों में धार्मिक कर्म को करते समय सबसे पहले मनुष्य को संकल्प को लेना चाहिए, जिससे जिस पूजा-कर्म का संकल्प मनुष्य लेता है, उस पूजा-कर्म के बंधन में बंध जाता हैं और अपने मन को पूर्ण रूप से सम्बंधित पूजा-कर्म को समर्पित कर सके। यदि मनुष्य पूजा-कर्म को करते समय संकल्प को ग्रहण नहीं करते हैं, तो उस समन्धित पूजा-कर्म का फल प्राप्त नहीं हो पाता हैं।





Why resolution is done before puja?  Know Meaning, vidhi, Mantra and Puranic importance






प्राचीन रूढ़ि परम्पराओं के अनुसार:-जब मनुष्य के द्वारा पूजनादि कर्म को करते समय संकल्प को नहीं लिया जाता हैं, तो उस पूजाकर्म का सम्पूर्ण फल इंद्रदेव को मिल जाता हैं। इसलिए मनुष्य को पूजा करते समय संकल्प लेना चाहिए, जिससे मनुष्य को सम्बन्धित पूजा का फल मिल सके।


संकल्प सम एवं कल्प दो शब्दों से मिलकर बना हैं।


सम का अर्थ:-पूर्णता, साथ अच्छा होता हैं।


कल्प का अर्थ:-वेद के छह अंगों में से एक जिसमें यज्ञ, बलि आदि संस्कारों की विधियाँ बताई गई है, उसे कल्प कहते हैं।



संकल्प का मतलब या अर्थ:-मांगलिक धार्मिक कृत्य एवं शुभ कर्मों को जो कि वेद के छह अंगों में से एक जिसमें यज्ञ, बलि आदि संस्कारों की विधियाँ बताई गई हैं, उनको वाणी से शब्दों को उच्चारित विधि-विधान से करने की दृढ़ इच्छा या प्रतिज्ञा को संकल्प कहते हैं।



संकल्प का अर्थ:-धर्म शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के द्वारा स्वयं को अपने इष्टदेव को साक्षी मानते हुए अपने धार्मिक पूजा कर्म को मन में आये किसी बुरे विचारों को त्याग कर अपने इष्टदेव की पूजा में समर्पित करने को संकल्प कहा जाता हैं, जिससे मनुष्य की समस्त मन की मुराद को पूर्ण करने के लिए कर रहे पूजा कर्म को पूर्ण श्रद्धाभाव रखते हुए अपने मन को सम्बन्धित पूजाकर्म में पूर्णरूपेण समर्पित करते हुए उस पूजाकर्म को पूर्ण करना होता हैं।



सामान्यतयः किसी कार्य या उद्देश्य की पूर्ति के लिए दृढ़ता के साथ संकल्प किया जाता है। संकल्प में जितनी दृढ़ता, आशा और विश्वास होगा, उस कार्य अथवा उद्देश्य के पूर्ण होने की संभावना उतनी ही प्रबल होगी। इसी प्रकार धार्मिक कार्यों को पूर्ण करने हेतु संकल्प का विधान है।



वास्तव में धार्मिक कार्यों (पूजा-पाठ और कर्मकांडों) को श्रद्धा-भक्ति, विश्वास और तन्मयता के साथ पूर्ण करने वाली धारणा शक्ति का नाम ही 'संकल्प' है। यह तथ्य विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि दान एवं यज्ञ आदि सद्कर्मों का पुण्य फल तभी प्राप्त होता है, जबकि उन्हें संकल्प के साथ पूरा किया गया हो।



संकल्प मन्त्र एवं संकल्प मन्त्र का विवेचन:-हिन्दुधर्म में धार्मिक पूजाकर्म को करते समय मनुष्य को अपने इष्टदेव को साक्षी मानते हुए उस कार्य को पूर्ण करने के लिए एक बंधन में बंधना पड़ता हैं, जिससे उस कार्य को पूर्णरूपेण मन को केंद्रित करते हुए पूर्ण कर सके। 



प्राचीन ऋषि-मुनियों के द्वारा समय का मापन आकाशीय चाल को मूल फलक मानते हुए किया हैं, वही समय की कोई अंत न होने का सफर और जो समय चल रहा हैं, उस समय के साथ सम्बन्ध को स्थापित करके समाज में सभी को समानता के साथ मनुष्य इस कालावधि के स्वरूप को अपने विचार में रखते हुए उसका अनुसरण कर सके। इस कालावधि का अनुसरण करने के लिए विलक्षण प्रबंध को बनाया।



हिन्दुधर्म में किसी भी तरह के मांगलिक या धार्मिक कर्म जैसे-इष्टदेव या इष्टदेवी की पूजा कर्म, हवन-यज्ञादि कर्म, भूमिपूजन, वास्तुनिर्माण का प्रारंभ हो, गृह प्रवेश हो, जन्म से सम्बंधित, विवाह से सम्बंधित आदि को करने से पहले धर्म से सम्बंधित आस्था रखने वाले को शास्त्र सम्मत व्यवस्था को अपनाते हैं। इन सब धार्मिक कर्मों को करते समय सबसे पहले दृढ़ इच्छा रखते हुए अपने कर्म को कराया जाता हैं। जो प्राचीन समय नष्ट नही हो उस समय से लेकर चल रहे समय तक कि अवस्था को बनाए रखने के लिए संकल्प मंत्र का विधान है, जिसका अनुसरण करते हुए प्राचीन समय को याद भी करते-रहे।




संकल्प मंत्र में क्या कहा जाता हैं?:-धर्म शास्त्रों ने संकल्प का मन्त्र बनाया हैं, जो इस तरह हैं-


हाथ में गन्ध, अक्षत, जल और दक्षिणा लेकर निम्नलिखित मन्त्र को बोलना चाहिए।


ऊँ विष्णुः, विष्णुः, विष्णुः, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वित्तीये परार्धे श्रीश्वेतवाराह कल्पे सप्तमे वैवस्वत मन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे तत्रापि परम् पुनीते भारतवर्षे आर्यवर्तान्तर्गते-ब्रह्मावर्तैकदेशे कुमारिका नाम क्षेत्रे पुष्करारण्ये (पुष्करारण्यसमीपे वा) गंगायमुनयोः पश्चिमे तटे नर्मदायाः उत्तरे तटे।


अमुकानाम्नि नगरे(ग्रामे वा) अमुकविक्रमसंवत्सरे अमुक शालिः वाहन शकाब्दे अमुकमासे........ शुक्ल या कृष्ण पक्षे.......


अमुकतिथौ.....अमुकवासरे....अमुकनक्षत्रे...अमुकयोगे.....अमुककरणे च (अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकराशिस्थिते चन्द्र शेषेषु सर्वेषु ग्रहेषु यथाराशिस्थान स्थितेषु सत्सु) एवं गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुकवासरे, अमुकगौत्रोप्तन्नोः Sमुकनामाहं (अमुकनाम्नो यजमानस्य प्रतिनिधित्वेन वा) ममात्मनो रोग-दोष-कष्ट पीड़ा निवारनार्थं अलक्ष्मी निवारणार्थ (जल त्याग करके पुनः जल लेकर बोले) श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फल-प्राप्त्यर्थं सपरिवारस्य मम (यजमानस्य वा) द्विपद चतुष्पद-सहितस्य क्षेमाभयायुरा- रोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं समस्त मंगलावाप्त्यर्थं तदंगत्वेन दिक्-रक्षणं कलशर्चनम् दीपार्चनम् गणपतिपूजनं षोडशमातृका-नवग्रह.... पूजनं च करिष्ये (यजमान के लिए करे तो 'करिष्यामि' बोलना चाहिए।)



                       ।।इति संकल्पः।।


 

संकल्प मंत्र को जानने के लिए:-संकल्प मंत्र को जानने के लिए इस मंत्र में वर्णित शब्दों के उच्चारण को उनके अर्थ के साथ जानना भी जरूरी हैं, इसलिए संकल्प मंत्र में वर्णित मंत्रों को अर्थ सहित विवेचन इस तरह हैं-


ऊँ विष्णुः, विष्णुः, विष्णुः, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वित्तीये परार्धे


अर्थात:-सृष्टि के पालनहार श्रीमहाविष्णुजी के द्वारा नष्ट नहीं होने वाला आरम्भ किया हुआ कालचक्र का द्वितीय परार्ध हैं, जो कि वर्तमान ब्रह्मा की आयु का समय हैं, जिनमें से पचास वर्ष ब्रह्मा के वर्तमान आयु के पूर्ण हो गए हैं।


श्रीश्वेतवाराह कल्पे कल्प


अर्थात:-इक्यावन वें वर्ष का पहला दिन ब्रह्मा का हैं। 


सप्तमे वैवस्वत मन्वंतरे 


अर्थात:-ब्रह्मा के दिन में चौदहा मन्वंतर होते हैं, जिनमें से वैवस्वत नाम का सातवां मन्वंतर चल रहा हैं।


अष्टाविंशतितमे कलियुगे


अर्थात:-एक मन्वंतर में एकहोतर चतुर्युगी होती हैं,जिनमे से कलयुग नाम का अठाईस वां चतुर्युगी चल रहा है।


कलियुगे कलि प्रथम चरणे 



अर्थात:-कलि कलयुग का शुरुआती चरण या समय हैं।

कलिसंवते या युगाब्दे-कलिसंवत या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा हैं।



जम्बूद्वीपे भरतखण्डे तत्रापि परम् पुनीते भारतवर्षे आर्यवर्तान्तर्गते-ब्रह्मावर्तैकदेशे कुमारिका नाम क्षेत्रे पुष्करारण्ये (पुष्करारण्यसमीपे वा) गंगायमुनयोः पश्चिमे तटे नर्मदायाः उत्तरे तटे


अर्थात:-देश-प्रदेश के नाम एवं नदियों के किनारों के नाम हैं।


अमुकानाम्नि नगरे(ग्रामे वा)-नगर या गांव का नाम


अमुकविक्रमसंवत्सरे-विक्रम संवत का नाम 


अमुक शालिः वाहन शकाब्दे 


अमुक स्थाने-कार्य का स्थान


अमुक आयने-उत्तरायणे या दक्षिणायणे


अमुक ऋतौ-शिशिर, बसंत, हेमंत आदि छह ऋतू हैं।


अमुकमासे-चैत्र, वैशाख आदि बारह महीने हैं। 


अमुक पक्षे-शुक्ल या कृष्ण पक्ष।


अमुक तिथौ-प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा या अमावस्या तिथि हैं।


अमुकवासरे-रविवार से लेकर शनिवार तक सात वार का नाम हैं।


अमुकनक्षत्रे-अश्विनी नक्षत्र से रेवती नक्षत्र तक सताईस नक्षत्र हैं।


अमुकयोगे-विष्कुम्भ योग से लेकर।


अमुककरणे-बव, बालव आदि ग्यारहा करणों के नाम।


अमुककाले-प्रातःकाल आदि समय का नाम।


अमुकराशिस्थिते सूर्ये-मेषादि बारह राशियों में से चन्द्रमा स्थित राशि का नाम।


अमुकराशिस्थिते चन्द्र-मेषादि बारह राशियों में से सूर्य स्थित राशि का नाम।


शेषेषु सर्वेषु ग्रहेषु यथाराशिस्थान स्थितेषु सत्सु-


गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ-


अमुकवासरे-सात वार में से उस दिन जो वार हो, उस वार का नाम बोलना चाहिए।


अमुकगौत्रोप्तन्नो-जाती में गोत्र का नाम


Sमुकनामाहं-मनुष्य का नाम, बाद में पिता के नाम, गोत्र एवं जाति का नाम और जिस कार्य को करने से सम्बंधित पूजा आदि कर्म के निमित बोलते हुए संकल्प करना पड़ता हैं।


      (अमुकनाम्नो यजमानस्य प्रतिनिधित्वेन वा)


उपरोक्त में जिस जगह पर अमुक शब्द आता हैं, वहां पर क्रमशः नाम बोलना चाहिए।


उदाहरण स्वरूप:-महाराष्ट्र में पूजा करनी हैं, तो उस मनुष्य को अमुक स्थाने-की जगह पर महाराष्ट्र राज्य का नाम बोलते हुए उस मनुष्य को अपना नाम बोलना पड़ता हैं, जो उस तिथि, वार आदि को बोलना पड़ता हैं।


जिस समय पर संकल्प मनुष्य के द्वारा पूजकर्म को करते हैं, तो उस मनुष्य को सृष्टि के उत्पत्ति के समय से लेकर वर्तमान समय को याद करना पड़ता हैं, जो स्वाभाविक रूप से लोक-रीति का पालन करते हुए भारतीय जीवन शैली में इस प्रबंध के द्वारा आकर आज के समय में भी चल रहा हैं।



प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सृष्टि के उत्पत्ति होने पर:-अपनी ज्ञान-साधना के द्वारा सृष्टि के उत्पत्ति के बाद गहन अध्ययन किया। उनके द्वारा गहन अध्ययन से उन्होंने सृष्टि को चन्द्रमंडल, पृथ्वीमंडल, सूर्यमंडल, परमेष्ठि मंडल और स्वायम्भू मंडल आदि पंचोमंडल से युक्त बताया था। उन्होंने बताया कि सृष्टि पांच मण्डल पर चलती हैं, जो कि अपने क्रम से सृष्टि को चलाते हैं। इस तरह सृष्टि को चन्द्रमंडल, पृथ्वीमंडल, सूर्यमंडल, परमेष्ठि मंडल और स्वायम्भू मंडल आदि पंच मंडल एक के बाद एक करके अपना चक्कर लगा रहे हैं।


उदाहरण स्वरूप:-चन्द्रमा पृथ्वी के चारों तरफ, पृथ्वी मंडल सूर्य के चारों तरफ, सूर्य मंडल परमेष्ठी मंडल के चारों तरफ एवं परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल के चारों तरफ अपनी गति के द्वारा चक्कर लगाते हुए घूमते हुए अपना परिभ्रमण पूर्ण करते-रहते हैं। जिससे सृष्टि निरन्तर गतिशील बनी रहती हैं।


चन्द्रमा के द्वारा परिक्रमा का समय:-चन्द्रमा के द्वारा एक महीने में अपना पूरा चक्कर पृथ्वी के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं।


पृथ्वी के द्वारा परिक्रमा का समय:-पृथ्वी के द्वारा एक वर्ष में अपना पूरा चक्कर सूर्य के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं।


सूर्य के द्वारा परिक्रमा का समय:-सूर्य के द्वारा एक मन्वंतर में अपना पूरा चक्कर परमेष्ठी या आकाशगंगा के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं।


परमेष्ठी या आकाशगंगा के द्वारा परिक्रमा का समय:-परमेष्ठी या आकाशगंगा के द्वारा एक कल्प में अपना पूरा चक्कर स्वायम्भू या ब्रह्मलोक के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं। स्वायम्भू मंडल को ही ब्रह्मलोक कहा जाता हैं।


स्वायम्भू का अर्थ:-जिसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई हैं जो स्वयं अस्तित्व से प्रादुर्भाव हुए हो। इसको ही सम्पूर्ण विश्व का केंद्र बिंदु या उद्गम स्थल माना जाता है।


ऋषियों की विलक्षण शोध:-उपर्युक्त विवरण को जानने के बाद ऋषियों ने जो स्वरूप बताया हैं, वह स्वरूप ब्रह्मा के इक्यावन वें वर्ष के पहले दिन के सात वें मन्वंतर के अठाईस वें महायुग के कलियुग नाम के चौथे युग में हैं।



संकल्प की महत्ता:-पर प्रकाश डालते हुए मनु महाराज मनुस्मृति में इस प्रकार लिखते हैं-


संकल्पमूलः काम्यो वै यज्ञाः संकल्पसंभवाः।


व्रतानि यज्ञधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृतः।।



अर्थात्:-कामना या इच्छा की पूर्ति होने पर आंनद को देने का मूल फलक संकल्प ही हैं और यज्ञ या लोकहित के विचार से किए गए हवन-पूजन युक्त वैदिक कृत्य संकल्प से ही पूर्ण होते हैं। व्रत या दैहिक और आध्यात्मिक पवित्रता के लिए किया गया कार्य और यज्ञ या लोकहित के विचार से किए गए हवन-पूजन युक्त वैदिक कृत्य आदि सभी धार्मिक अभीष्ट प्राप्ति के लिए करने वाले कर्मों का मूल फलक संकल्प को ही महाराज मनुस्मृति में बताया गया है। 



प्रायः पुरोहित जन संकल्प के द्वारा ही यजमान को जल ग्रहण कराते हैं। अब क्योंकि अपने कर्म विशेष के प्रति संकल्पबद्ध हो गया है तो ईश्वर भी उनकी पूरी सहायता करते हैं। संकल्प के समय जल इसलिए ग्रहण कराया जाता हैं, क्योंकि जल में वरुण देव का निवास माना जाता है और जल लेकर संकल्प का पालन न करने वाले को वरुण देव कठोर दंड देते हैं।



जब पूजाकर्म में संकल्प को धारण करते समय सबसे पहले हाथ में जल को लिया जाता हैं, क्योंकि समस्त सृष्टि का निर्माण अग्नि, जल, वायु, आकाश एवं पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों से हुआ हैं, उन पंचमहाभूतों में जल तत्व को ग्रहण करते हुए भगवान श्रीगणपति जी का नाम लिया जाता हैं, क्योंकि जल तत्व के स्वामी श्रीगणपति जी को माना जाता है। इसलिए मनुष्य के द्वारा भगवान श्रीगणपतिजी को साक्षी मानते हुए उनके सम्मुख रखते हुए जल से संकल्प को लिया जाता हैं, जिससे पूजाकर्म को करते समय किसी भी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं हो पावें और पूजाकर्म सुख-शांतिपूर्वक सम्पन्न हो सके।




जब मनुष्य के द्वारा पूजाकर्म के निमित संकल्प का जल ग्रहण कर लिया जाता है, तब उस मनुष्य को उस सम्बन्धित पूजाकर्म को पूर्ण करना भी जरूरी होता हैं। इस तरह से मनुष्य की संकल्प शक्ति को बल मिलता हैं और मनुष्य बिना डर से अपने पूजाकर्म को उत्साह से पूर्ण करने की हिम्मत मिल जाती हैं।




दैनिक जीवन काल में हर कार्य को करते समय मनुष्य को अपने कार्य को शुरू करने से पूर्व उस कार्य को विधिवत योजना बनानी पड़ती हैं, यदि बिना योजना से कोई भी कार्य को करते हैं, तो उस कार्य में सफलता नहीं मिलती हैं। उसी तरह पूजा से सम्बंधित मांगलिक कार्य को शुरू करते समय मनुष्य को संकल्प लेना पड़ता हैं, यदि मनुष्य संकल्प को बिना धारण किए पूजादि कार्यों को करते हैं, तब उस मनुष्य के द्वारा पूजादि कर्म करना बेकार हो जाती हैं, क्योंकि उस पूजादि का मूल फलक नहीं प्राप्त हो सकेगा। 



शब्दों को मन में नहीं दोहराते हुए वाणी से उच्चारित करने पर वे वाणी के द्वारा उच्चारित शब्द सीधे रूप से संपूर्ण जगत में ध्वनि सुरक्षित विवरण में समा जाती हैं, जो कभी नहीं समाप्त होती हैं और मनुष्य के जीवन पर उस नष्ट नहीं होने वाली ध्वनि का असर भी होगा और उच्चारित ध्वनि की दृढ़ता से अंगीकार हो जाएगा अर्थात् मनुष्य के द्वारा पूजा के लिए मूल फलक मिल जाएगा।



Monday, July 27, 2026

July 27, 2026

लग्न के अनुसार जानिए अपना स्वभाव और व्यक्तित्व(Know your nature and personality according to the twelve ascendants)

             

लग्न के अनुसार जानिए अपना स्वभाव और व्यक्तित्व(Know your nature and personality according to the twelve ascendants):-जन्म पत्रिका निर्माण में सबसे पहले गणित के माध्यम से लग्न का ही निर्धारण किया जाता है, क्योंकि जन्म पत्रिका में लग्न का बड़ा महत्व है। राशियां बारह होती है और बारह राशियों के नाम से लग्न को पुकारा जाता है। यानी लग्नों की संख्या बारह होती है। व्यक्ति के जन्म के समय आभा मण्डल में पूर्वी क्षितिज में जो राशि उदित होती है, उस राशि का नाम लिखकर उसके अंक को जन्म पत्रिका के प्रथम भाव में लिख देते हैं। लग्न को प्रथम भाव, केंद्र एवं त्रिकोण भी कहते हैं।




Know your nature and personality according to the twelve ascendants






बारह लग्नों का सामान्य परिचय व स्वभाव और लग्न के अनुसार जानिए अपना स्वभाव और व्यक्तित्व(Know your nature and personality according to the twelve ascendants):-


मेष राशिगत लग्न:-मेष राशि के मालिक ग्रह भौम को माना जाता है। इस लग्न का व्यक्ति सामान्य लम्बाई या ऊँचाई से युक्त देह की गठन वाले, लम्बी गर्दन, गोल आंखे, घुंघराले बालों वाला होता हैं। व्यक्ति की कुछ न कुछ कार्य करते रहने की प्रवृत्ति से अपने आपको व्यस्त रखने वाला होता है। ये अपने दुश्मनों को चारों खाने चित करने वाले होते हैं, परिवार में बहुत सारे सदस्यों से युक्त होते हैं। इस लग्न वाले देखने में बहुत ही अकर्षल, बहुत सारी खूबियों वाले, किस्मत का साथ मिलता है जिससे किस्मत के द्वारा हर खुशी प्राप्त करने वाले और धर्म पर निष्ठा रखने वाली भार्या मिलती हैं। इस लग्न के व्यक्ति के पुत्र का चाल-चलन या चरित्र से बदनाम होते हैं, लेकिन तनुजा सरल स्वभाव वाली कला-कुशल होती हैं। ऐसे व्यक्ति की धन-दौलत स्थायी रूप से इनके पास नहीं टिकती हैं। मेष लग्न वाले को सूर्य सबसे ज्यादा फल देने वाला होता हैं।



वृषभ राशिगत लग्न:-वृषभ लग्न का स्वामी शुक्र ग्रह को माना गया है। यह राशि धरती तत्त्व की होती है। व्यक्ति प्रायः क्षीण शरीर वाला, छोटी गर्दन तथा हष्ट-पुष्ट सुंदर बदन वाला होता है। व्यक्ति अमनपसंद करने वाला, सोच-विचार करने में सक्षम, लेकिन मिजाज से थोड़ी-थोड़ी बातों पर बिगड़ने वाला होता है। किसी भी कार्य को करते समय सोच-समझकर अपने मन को एक जगह पर केंद्रित करके करने वाला होता है। इस लग्न के व्यक्ति के दोस्त बहुत अधिक होते हैं।  प्रारम्भिक जीवन में बहुत मेहनत करनी पड़ती हैं, जिससे वह निरन्तर अपनर जीवन के विकास में प्रयास करने वाला होता हैं लेकिन जीवन का मध्य व अंतिम भाग आंनद से व्यतीत करने वाला होता है। इनकी किस्मत एकाएक साथ देने लगती हैं। इनकी भार्या बहुत कंजूस और कला जानने वाली मिलती है। इस लग्न के व्यक्ति का झुकाव स्त्री के प्रति अधिक होता है। वृषभ लग्न वाले के लिए शनि उत्तम होता है और राजयोग प्रदान करने वाला होता है।



मिथुन राशिगत लग्न:-मिथुन लग्न का स्वामी ग्रह बुध है। यह राशि वायु तत्त्व की है। इस लग्न वाले व्यक्ति लम्बे-कमजोर शरीर वाले होते है। चेहरा खुशी से खिला-खिला होता है और बहुत जल्दी से सब बातें को समझ लेने वाले एवं बातचीत करने में दक्ष होते हैं। लेकिन इस लग्न के जातक अपना फायदे पहले सोचने वाले, रुपये-पैसों से युक्त और सोच-समझकर एवं सलीके से किसी भी काम को करने वाले होते हैं। कला व विज्ञान के प्रति रुचि रखते हैं। कठिन से कठिन विषय की भी सरलता से भली-भाँति परीक्षण करने में माहिर होते हैं। इनको कम बुद्धि वाली भार्या मिलती हैं। लेकिन इनके तनु सरल स्वभाव वाले होते हैं। मिथुन लग्न वाले के लिए शुक्र फलदायक होता हैं। शुक्र-बुध के योग से भाग्य की उन्नति होती हैं।



कर्क राशिगत लग्न:-कर्क लग्न का स्वामी ग्रह चन्द्रमा है। यह राशि जल तत्त्व की है। इस लग्न के व्यक्ति मध्यम कद के मोटी गर्दन व मांसल शरीर वाले, सबसे मेलजोल रखने वाले और साफ-सुथरे रहने वाले होते हैं। समझदार, दूसरों के हित के काम करने वाले, सुखयुक्त और रुपयों-पैसों से सम्पन्न होते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिकतर जन्म स्थान से दूर रहते हैं। इस लग्न वाले व्यक्ति की भार्या अपने पति के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठा व अनुराग रखने वाली, धर्म में आस्था रखने वाली और गुणवती होती है। इस लग्न वाले व्यक्ति को मगंल ग्रह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है।



सिंह राशिगत लग्न:-सिंह लग्न का स्वामी ग्रह सूर्य है। यह राशि अग्नि तत्त्व की है। इस लग्न वाले व्यक्तियों के मुख की आकृति चौड़ी व हड्डियां पुष्ट होती है। ऐसे व्यक्ति अपना जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत करते है। किसी भी बात को खरी-खरी कहने वाले और औरत से लगाव करने वाले होते है। लेकिन विद्या कम प्राप्त होती है और अपनी मर्यादा में रहते हुए कठिन से कठिन समस्या को धैर्यपूर्वक सुलझाने में कुशल होते है। अपनी दोस्तों को पूर्ण जिम्मेदारी से निभाने वाले होते है। रहन-सहन बड़े लोगों जैसा होता है। इन्हें भार्या अच्छी, स्थिर स्वभाव की और आज्ञापालक मिलती है। ये संतान पक्ष से सूखी नहीं होते है। विवाह में स्त्री पक्ष से धन लाभ होता है। सिंह लग्न वालों के लिए मगंल ग्रह उत्तम फलकारक है। यदि गुरु का मगंल से योग हो, तो राजयोग कारक हो जाता है।




कन्या राशिगत लग्न:-कन्या लग्न का स्वामी बुध ग्रह होता है। यह राशि भूमि तत्त्व की होती है। इस लग्न वाले व्यक्ति के कंधे व बाजू हष्ट-पुष्ट होते हैं। व्यक्ति अपने दिए हुए वचन पर दृढ़ रहने वाला तथा जो सबके प्रति एक नजर से इंसाफ करने वाला और दया करने वाले होते है। गलत कार्यों को करने से मना करने वाले होते हैं। प्रत्येक कार्य को बड़ी सावधानी व चौकसी से करते है। यानी बिना सोचे-समझे किसी कार्य को नहीं करते हैं। व्यापार में निपुण होते हैं। इनकी भार्या मध्यम स्वभाव व कम बोलने और हँसी-मजाक से दूर रहने की प्रकृत्ति वाली होती हैं। संतानें पितृ-मातृ भक्त व अच्छे चाल-चलन वाली होती हैं। कन्या लग्न वाले को बुध व शुक्र शुभदायी ग्रह होते हैं।




तुला राशिगत लग्न:-तुला लग्न का स्वामी ग्रह शुक्र होता है। राशि वायु तत्त्व होती हैं। इस लग्न के व्यक्ति प्रायः कमजोर शरीर से यक्त और लम्बे होते हैं। अगर लग्न का स्वामी लग्न में हो तो शरीर मांसल मोटे होता है। इन व्यक्तियों को अपने दोस्तों के द्वारा मदद मिलती है। इन लग्न के व्यक्ति अनिश्चित विचार, उदार प्रकृति और खर्चीला स्वभाव के होते हैं। सबसे मेलजोल रखने वाले होते हुए दूसरों की मदद करने में इन व्यक्तियों को प्रसन्नता मिलती है। स्वयं को व घर को हमेशा साफ-सुथरा रखने में तत्पर रहते है। इस लग्न वाले को जल्दी गुस्सा आता है और जल्दी ही शांत हो जाता है। अपने से उच्च श्रेणी के व्यक्तियों से मित्रता होती है। इन लोगों को स्त्री दूसरों को कष्ट पहुँचाकर सुखी रहने वाले और नटखट मिजाज की मिलती है। इनकी संतानें गुणी और अच्छी होती है। शनि व बुध उत्तम फल प्रदान करते हैं।



वृश्चिक राशिगत लग्न:-लग्न का स्वामी मगंल ग्रह होता है। यह राशि जल तत्त्व है। इस लग्न के व्यक्ति दिखने में सबको अपनी तरफ खींचने वाले खूबसूरत होते है, लेकिन स्वभाव से बहुत ही गुस्सा करने वाले होते हैं। सच्ची बात को स्पष्ट कहने और झूठ बोलने की प्रवृत्ति होती है। अपने विरुद्ध बोलने वाले के शत्रु बन जाते है। इन लोगों को खूबसूरत भार्या और अच्छे संस्कारों की मिलती है। संतान पक्ष अच्छा होता है और विद्वान और श्रेष्ठ होती है। धार्मिक कार्यों में धन खर्च करने वाले होते है। इस लग्न वालों को सूर्य और चन्द्रमा अच्छा फल प्रदान करते हैं।




धनु राशिगत लग्न:-इस लग्न वाले व्यक्ति के कान बड़े-बड़े होते हैं। राशि तत्त्व अग्नि है। इस लग्न के व्यक्ति अक्लमंद और कई भाषाओं के जानकार होते है। यदा-कदा दूसरों के प्रति व्यंग्य के शब्दों की वर्षा करने वाले शब्दों का उपयोग भी करते हैं। ऐसे लग्न के व्यक्तियों को प्रायः खूबसरत मन को भाने वाली, रुपयों-पैसों से सम्पन्न और विनयी सुशील भार्या की प्राप्ति होती हैं। संतानें साधारण एवं पैतृक संपत्ति का उपयोग करने वाली होती है। इस लग्न वालों को सूर्य औ मगंल ग्रह का शुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं।




मकर राशिगत लग्न:-इस लग्न के व्यक्ति लम्बे व पतले होते है। राशि तत्त्व भूमि हाति है। इस लग्न के व्यक्ति आनंद तथा तत्परता के साथ काम में लगने वाले और बहुत मेहनती होते है। अपने विचारों को बिना छुपाये खुले रूप से प्रकट करने वाले होते है। मिजाज से किसी पर भी शक करने वाले होते हैं। प्रत्येक कार्य को विचार कर के चौकसी से करने वाले होते हैं। अपने अधीनस्थ व्यक्तियों से काम लेने में सोच-समझकर एवं सलीके से काम को करवाने वाले होते है। अपने दोस्तों के समूह में सबसे बढ़कर होते हैं। स्त्री पक्ष से बहुत दुःखी रहते हैं। अनेक व्यवसाय करते है। इस लग्न वालों को बुध व शुक्र ग्रह शुभ फल प्रदान करने वाले होते है।




कुंभ राशिगत लग्न:-इस लग्न के व्यक्ति के शरीर की बनावट मन को भाने वाली होती है। कुंभ राशि वायु तत्त्व की है। दूसरों की भलाई करने वाला और दया करने की प्रकृति होते है। अपने पुरुषार्थ से धन कमाते है और आनन्दमय जीवन व्यतीत करते है। इन लोगों को प्रायः राजपक्ष से लाभ प्राप्त होता है। भार्या का मिजाज ठीक नहीं होता हैं। संतान पक्ष भी अच्छा नहीं होता है। इस लग्न वालों को शुक्र उत्तम प्रदान करता हैं।




मीन राशिगत लग्न:-इस लग्न वालों का शरीर देखने में खूबसूरत और डील-डाल वाला होता है। मीन राशि तत्त्व जल होता है। इस लग्न के व्यक्ति सुख-भोग विलासी जीवन व्यतीत करने वाले होते है। रुपयों-पैसों को खर्च करने में दिलेर होते है। समय का सोच-समझकर एवं सलीके से ठीक-ठाक उपयोग करते हुए काम करने वाले होते है। इन लोगों को प्रायः भार्या खूबसूरत सरल स्वभाव की लेकिन कूटनीतिक स्वभाव वाली मिलती हैं। मगंल ग्रह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। बृहस्पति-मगंल योग से राजपक्ष से लाभ प्राप्त होता है। उपरोक्त व्याख्या साधारण और संक्षिप्त है।







Tuesday, April 21, 2026

April 21, 2026

घर की नकारात्मक ऊर्जा की पहचान करके दूर करने के उपाय (Remedies to identify and remove negative energy from your home)

 

घर की नकारात्मक ऊर्जा की पहचान करके दूर करने के उपाय (Remedies to identify and remove negative energy from your home):-प्राचीन काल से मनुष्य के लिए निवास स्थान जीवन का एक अहम हिस्सा माना गया है। प्रत्येक जीव-जंतु व मनुष्य अपने परिवार के सदस्यों को सुख व आराम प्रदान करने के लिए अपने-अपने निवास के लिए निवास स्थान को बनाते हैं और उस निवास स्थान को सभी तरह से शुद्ध व पवित्र बनाएं रखने के लिए उसकी नियमित साफ-सफाई किया करते हैं। जिस परिवार में सुबह-शाम साफ-सफाई होती है, वहां अच्छे विचार एवं सुबुद्धि होती है और अच्छे विचार एवं सुबुद्धि ही अनेक तरह के वैभव या धन-दौलत की कारक है। इसलिए मनुष्य को अपने घर में शुद्ध अवस्था में ही प्रवेश करना चाहिए। जिस घर में दूषित या मलिन होकर प्रवेश किया जाता है, वहां का सद् वातावरण प्रभावित होता है और तकरार तथा कलह के कारण उत्पन्न हो जाते हैं। जिस निवास स्थान में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती हैं, तब उस नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करके उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए ज्योतिष शास्त्र में बहुत सारी बातों के बारे में बताया गया हैं। उसी तरह वास्तु शास्त्र में भी नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए अन्तिम परिणाम हवा एवं पानी का सही तालमेल या मेलजोल के द्वारा संभव हैं।





घर की नकारात्मक ऊर्जा की पहचान करके दूर करने के उपाय








कुछ वास्तुग्रंथों में तो कहा गया है कि:-मत्स्यपुराण और गरुड़पुराण सहित समरांगण सूत्रधार में निवास स्थान की स्वच्छता एवं रोजाना सफाई को जरूरी कहा गया है। बिना उपयोग किये हुए निवास स्थान यदि एक मास भी बेकार पड़ा रहा जाए तो पुनः वास्तु शांति कराई जाए। चीनी वास्तु के मत में यह नकारात्मक ऊर्जा के जमा होने का कारण है और इससे बचना चाहिए।




शास्त्रों में कहा गया है कि:-घर की समृद्धि और स्वच्छता बनाएं रखने के लिए स्पष्ट कहा गया हैं-



निवेशनद्वारे पिचुमन्दपत्राणि 

विदृश्याचम्योकं अग्निं गोमयं गौर-

सर्षपांस्तैलमालभ्या श्मानमाक्रम्य प्रविष्यन्ति।।



अर्थात्:-शास्त्रों में नकारात्मक ऊर्जा को संतुलित करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए और उपायों करना चाहिए।




◆मनुष्य को कभी अपने निवास स्थान पर मृतक के अंतिम संस्कार करने के बाद दूषित या अशुद्ध होने पर नहीं प्रवेश करना चाहिए।



 

◆यदि मनुष्य को कभी मृतक के अंतिम संस्कार में जाना पड़ जाता हैं, तब दाहकर्म के बाद वापस आने पर नीम की पत्तियां चबानी चाहिए।




◆मनुष्य को पूजा, यज्ञ आदि आरम्भ करने से पहले अपने शरीर शुद्धि के लिए मंत्र को पढ़ते हुए जल को ग्रहण करना चाहिए।



◆मनुष्य को अग्नि से हाथ सेंककर जल पात्र को छूकर, गोबर, श्वेत सरसों या सर्षिप जैसी मंगलप्रद वस्तुओं को छूकर और सर्वप्रथम किसी पायदान या कालीन की बजाय शिला पर ही कदम रखकर निवास स्थान में प्रवेश करना चाहिए। ऐसी आज्ञा पारस्कर गृहसूत्र में सर्वप्रथम आई है।




आज्ञा प्रकारान्तर में कहा गया है कि:-घर की समृद्धि और स्वच्छता बनाएं रखने के लिए आज्ञा प्रकारान्तर से याज्ञवल्क्य स्मृति में स्पष्ट कहा गया हैं-



विदश्य निंबपत्राणि नियता द्वारि वेश्मनः।

आचम्यागन्यादि सलिलं गौमयं गौरसर्षपान्।।



अर्थात्:-मनुष्य को दाहकर्म से लौटकर आने पर नीम की पत्तियों को चबाकर, आचमन करके, अग्नि से हाथ को तपाकर, पानी के बर्तन को स्पर्श करके, गोबर, श्वेत सरसों या सर्षिप जैसी शुभकारी वस्तुओं को स्पर्श करके ही अपने आशियाने में जाना चाहिए।




विशेष रूप से:-ईशान कोण में पूजा स्थल और आग्नेय कोण में रसोई स्थल तथा आंगन में ब्रह्म स्थान पर दूषित या अशुद्ध होने पर कभी नहीं जाना चाहिए।




◆इसीलिए स्मृतियों में पवित्रता का पालन हमेशा करने के निर्देश दिए गए हैं।



◆हमेशा अपनी पवित्रता को बनाएं रखते हुए रोजाना पंचमहायज्ञ, ब्रह्मयज्ञ या देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ, पितृयज्ञ आदि करने चाहिए।




◆अपने निवास स्थान में नियमित रूप से शास्त्रों का पठन-पाठन करना चाहिए।



◆साथ ही मनुष्य को अपने निवास स्थान में आये हुए मेहमान का अतिथि सत्कार अनिवार्यतः करने का निर्देश मिलता है।



◆यह सद्गगृहस्थ का लक्षण और परिवार के फलने-फूलने के लिए आवश्यक नियम भी हैं।






Monday, February 23, 2026

February 23, 2026

कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का नक्षत्रों के आधार पर फलादेश सिद्धांत( The Krishnamurti system of astrology based on the constellations

 

कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का नक्षत्रों के आधार पर फलादेश सिद्धांत( The Krishnamurti system of astrology based on the constellations):-कृष्णमूर्ति पद्धति में ग्रहों के फल देने का आधार नक्षत्र एवं उप नक्षत्र का स्वामी माना गया है। इस पद्धति से फलादेश करने का सिद्धान्त सर्वप्रथम 'मीना' नामक लेखक ने प्रतिपादित किया। इसके बाद कृष्णामूर्ति जैसे विद्वान ने इस पर और अधिक खोज की। कृष्णामूर्ति ने खोज करते हुए पाया कि दो या तीन ग्रह जब एक ही राशि में एक ही नक्षत्र में स्थित होने के बावजूद भी अलग-अलग फल दे रहे हैं, तो उन्होंने इस पर और खोज की। उन्होंने खोज करते हुए नक्षत्र जो कि 13 डिग्री 20 अंश का होता है। उसे विशोंत्तरी दशा के कुल 120 वर्षों का आधार बनाकर प्रत्येक ग्रह में कुल वर्षों से भाग देकर नक्षत्र को नौ भागों में बांटा। इसे उन्होंने उप नक्षत्र या सब लॉड की संज्ञा दी। इसके आधार पर उन्होंने पाया कि दो या तीन ग्रह एक ही नक्षत्र में स्थित होते हुए भी उप नक्षत्र भिन्न-भिन्न होने के कारण अनुकूल-प्रतिकूल फल देते हैं।




The Krishnamurti system of astrology based on the constellations





कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति में फलादेश के सिद्धांत:-इस पद्धति में ग्रहों के फल देने के सिद्धांत में पांच बातें निम्न प्रकार है-




पहला सिद्धांत फलादेश:-ग्रह जिस भाव में बैठा है, उस भाव का फल वह ग्रह देगा जो कि उस भाव स्थित ग्रह के नक्षत्र में स्थित हैं।




उदाहरणार्थ:-मेष लग्न में सूर्य स्थित हैं, तो जो ग्रह सूर्य के तीन नक्षत्रों कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी एवं उत्तराषाढ़ा में क्रमशः मेष, सिंह अथवा धनु राशि में 26 डिग्री 40 कला से लेकर 30 डिग्री तक, इसी तरह वृषभ, कन्या व मकर राशि के 0 डिग्री से 10 डिग्री तक स्थित होगा, वह ग्रह सूर्य का फल देगा।




दूसरा सिद्धांत फलादेश:-यदि कोई अन्य ग्रह इन नक्षत्रों में स्थित नहीं होगा तो फिर सूर्य उस भाव का फल देगा।





तीसरा सिद्धांत फलादेश:-यदि मेष राशि में कोई ग्रह स्थित नहीं हो तो मेष राशि का स्वामी मंगल के तीनों नक्षत्रों क्रमशः मृगशिरा, चित्रा एवं धनिष्ठा में जो ग्रह स्थित है, वे ग्रह मेष राशि का फल देंगे।




चौथा सिद्धांत फलादेश:-यदि कोई अन्य ग्रह मंगल के मृगशिरा, चित्रा एवं धनिष्ठा नक्षत्रों में स्थित नहीं हैं, तो फिर मंगल स्वयं उस राशि का फल देगा।




पांचवां सिद्धांत फलादेश:-उपरोक्त चार प्रकार से फल निर्धारण के अलावा ऐसे ग्रह जो उस भाव एवं भाव में स्थित ग्रह से किसी प्रकार से संबंध स्थापित करते हों तो वे ग्रह भी उस भाव का फल देने में सहायक होंगे।




ग्रहों के फल देने के इन पांच सिद्धांतो के अलावा एक मुख्य बात:- यह है कि यदि राहु एवं केतु इन भावों से संबंध रखते हों अथवा उन राशियों में बैठे हैं तो वे उस ग्रह का फल लूट लेते हैं। उस ग्रह के स्थान पर स्वयं मुख्य रूप से फल देते हैं। उस ग्रह को फल नहीं देने देते।



उदाहरणार्थ:-मेष राशि में सूर्य, बुध एवं शुक्र स्थित है। यदि राहु एवं केतु इन ग्रहों के नक्षत्रों में स्थित हो अथवा सूर्य की राशि सिंह में स्थित हो तो सूर्य के स्थान पर राहु-सूर्य का फल देगा। 



◆इसी प्रकार राहु या केतु बुध की राशि मिथुन अथवा कन्या में स्थित होगा तो बुध के स्थान पर राहु या केतु देंगे।



◆इसी प्रकार शुक्र की राशि वृषभ या तुला में राहु या केतु स्थित होने पर शुक्र के स्थान पर राहु या केतु फल देंगे। शुक्र फल नहीं देगा।



कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का महत्त्व:-ग्रहों के फल देने की कृष्णमूर्ति की यह नवीन पद्धति है। फल अनुकूल होगा या प्रतिकूल यह उप नक्षत्र अथवा उप-नक्षत्र के स्वामी जिसके नक्षत्र में जो ग्रह स्थित होगा। उसके राशि स्वामी व राशि के आधार पर मूल्यांकन होगा। इस तरह नहीं कोई ग्रह खराब है व नहीं कोई ग्रह अच्छा हैं।

Saturday, December 27, 2025

December 27, 2025

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् अर्थ सहित और लाभ(Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits)

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् अर्थ सहित और लाभ (Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits):-माता दुर्गा के दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करके मनुष्य अपने जीवन को खुशियों से भर सकता है, क्योंकि माता दुर्गा ही समस्त तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली होती है और दुष्टों का संहार करने वाली होती हैं। दुर्गा माता की पूजा-अर्चना एवं साधना करके जो सिद्धि को पाते है, उनकी तरह जो भी मनुष्य दुर्गा माता की आराधना के रूप में अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का उच्चारण करते है, उनको भी उसी तरह ही सिद्धि मिलती है, जो मनुष्य कठोर तपस्या करते है। इसलिए माता दुर्गा की अनुकृपा पाने का सर्वोत्तम उपाय एक ही दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करना होता हैं। मनुष्य को अपने जीवननकाल में समस्त तरह के सुख-सम्पत्ति एवं समृद्धि को पाने के लिए माता इस स्तोत्र का वांचन करना चाहिए, जिससे मनुष्य को अपने किए गए बुरे कर्मों से मुक्ति मिल जाये। दुर्गा माता के नवरुपों के रूप में नवरात्रि को मनाया जाता है।


Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits





अथ श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन:-दुर्गा माता के श्री दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करने से पूर्व उनके जो मन्त्रों का वर्णन किया गया है, उन मन्त्रों के भावों को समझते हुए उच्चारण करना चाहिए, जिससे अर्थों को समझकर सही उच्चारण करने से मनुष्य को उचित फल की प्राप्ति हो सके, इसलिए श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन इस तरह हैं: दुर्गा माता की अरदास "ॐ श्री दुर्गायै नमः" के द्वारा करते हुए, श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन कर रहा हूँ:।




शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।


यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती।।१।।


अर्थात्:-भगवान श्रीशिवशंकरजी से जब पार्वतीजी पूछती है, तब शिवजी बोलते है-हे देवी भगवती! आप ध्यानपूर्वक सुनिए। मैं आपको अष्टोत्तर शतनामों अर्थात् एक सौ आठ दुर्गाजी के नामों के बारे में बताता हूँ, इन एक सौ आठ नामों के वांचन या सुनने से ही उत्तम विनम्र, पवित्र एवं सदाचार से युक्त भगवती दुर्गा खुश हो जाती हैं।



ऊँ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।


आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी।।२।।


अर्थात्:-अष्टोत्तर शतनामों में सबसे पहले प्रजापति दक्ष की तनुजा सती, आशावादी के रूप में साध्वी, भगवान शिवजी पर प्रेम रखने वलु भवप्रीता, ब्रह्माण्ड में रहने वाली भवानी, जगत में जीवन-मरण के बंधनों से आजादी दिलाने वाली भवमोचनी, परोपकारी एवं विनम्र के रूप में आर्या, आदि शक्ति के रूप में दुर्गा, सब पर विजय पाने वाली के रूप में जया, प्रारम्भ के वास्तविक होने के भाव के रूप में आद्य, तीन चक्षुओं के रुप में त्रिनेत्रा एवं विकट पीड़ा को धारण करने की शक्ति वाली शूलधारिणी के रूप में नामों का उच्चारण करें।



पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।


मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः।।३।।


अर्थात्:-जो भोलेनाथजी के पिनाक को अपने हाथों में संभालने वाले होती हैं, अत्यंत मनोरम एवं रमणीय के समान, जो बहुत ही तेज आवाज से घण्टानाद करने वाली, कठिन अभीष्ट की सिद्धि के लिए किया जानेवाले कठोर एवं कष्टदायक आचरण करने वाली, चिंतन शक्ति और अंतः कर्ण की निश्चयात्मक वृत्ति वाली वाले होते हैं।



सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी।


अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः।।४।।


अर्थात्:-समस्त तरह के मन्त्रों से युक्त, जिनका स्थान समस्त देवी-देवताओं में उच्च हैं, जिनके स्वरूप के दर्शन से समस्त तरह की वास्तविक खुशी प्रदान करने वाली, जिनके स्वरूप का कभी अंत नहीं होता है, समस्त की पैदायश करनी वाली सबको अपनी तरफ खींचने के भाव वाली सौन्दर्य से युक्त स्त्री स्वरूप वाली हैं, जिनका रूप शानदार हैं, चित्त की एकाग्रता से गुणगान करने वाली हैं, जिनमें बहुत सारे गुणों का भंडार भरा हुआ हैं, जिनके अलावा कुछ सुंदर स्वरूप नहीं हैं और जीवन-मरण के मार्ग से मुक्ति देने वाली हैं।



शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।


सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी।।५।।


अर्थात्:-जो भगवान शिवजी को बहुत ही प्यारी हैं और उनकी अर्धागिनी भी हैं, देवताओं की माता हैं, चिंतन करने का कार्य करने वाली, बहुमूल्य और चिकने पदार्थ से लगाव रखने वाली, प्रजापति की तनुजा हैं, प्रजापति के कारण हवन पूजन युक्त वैदिक कृत्य को नष्ट करने वाली हैं।



अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।


पट्टाम्बरपरिधाना कमलञ्जरीरञ्जिनी।।६।।


अर्थात्:-जो अभीष्ट सिद्धि के लिए किए जाने वाले कठोर एवं दुःखदायक आचरण को करते हुए पल्लवों को भी ग्रहण नहीं करती हैं, जो तरह-तरह के वर्ण से युक्त हैं, रक्त वर्ण से युक्त, जो वृत्तपुष्प को हाथों में सम्भालने वाली, कौशा से बने कपड़े को  वर्ण या रक्तवर्ण से युक्त पट को पहनने धारण करने वाली हैं, जो पैरों में घुँघरुदर नूपुर को पहनकर आकर्षक ताल को करते हुए खुश रहने वाली है।



अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।


वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता।।७।। 


अर्थात्:-जिसकी सीमा न हो उस शौर्य से युक्त हो, जो असरों के अनुकृति के लिए बहुत निष्ठुर हैं, जो बहुत ही रूपवती हैं, बहुत ही सुंदर हैं, जिनका नाम वनदुर्गा हैं, जिनका एक रूप मातङ्गी देवी का भी हैं, जिनको मतङ्ग मुनि पूजन करते हैं।



ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।


चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः।।८।।


अर्थात्:-जिनको ब्रह्मा की शक्ति या ब्राह्म विधि से विवाहित स्त्री का रूप वाली ब्राह्मी हैं। जो कि शिवजी की अर्धांगिनी के रूप में माहेश्वरी के रूप में जानी जाती है। जिनका एक नाम चैन्द्री भी हैं, जो कि पांच वर्ष की उम्र से युक्त सुंदर किशोरी हैं, इसलिए कौमारी कहते हैं। जो कि विष्णुजी के शक्ति के रूप में वैष्णवी भी होती हैं, जो कि चण्ड एवं मुण्ड का वध करके चामुंडा के नाम से जानी जाती है, जो कि वराह की सवारी करने से वाराही कहलाती हैं। जो कि लक्ष्मीजी के रूप में भी जानी जाती है। पुरुष के रुप को भी ग्रहण करने वाली पुरुषाकृति हैं।



विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।


बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना।।९।।


अर्थात्:-जो समस्त तरह से खुशी देने वाली हैं, जो ऊपर की तरफ खींचने वाली हैं अर्थात् मोक्ष देने वाली हैं, जिनमें बहुत ही ज्ञान का भंडार भरा हुआ हैं। जो धार्मिक कर्म को करने वाली हैं, जो कि लगातार होने वाली हैं, जो अंतःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति से युक्त हैं। जो बहुला के नाम वाली गौ की तरह सत्यनिष्ठ हैं, जो बहुत ही स्नेह रखने वाली हैं, जो समस्त तरह के वाहन की सवारी करने वाली हैं।



निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।


मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी।।१०।।


अर्थात्:-जो निशुम्भ एवं शुम्भ नामक दैत्यों का संहार करने वाली हैं, जो महिषासुर नाम के दैत्य का वध करने वाली हैं, मधु एवं कैटभ नाम के दो दैत्य भाइयों का वध करने वाली हैं। जो चण्ड एवं मुण्ड नामक दो दैत्य भाइयों का संहार करने वाली हैं।



सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।


सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा।।११।।


अर्थात्:-जो समस्त दैत्यों का संहार करने वाली हैं, जो हमेशा दुराचारों एवं अत्याचारों से परेशान करने वालों का विनाश करने के लिए तत्पर रहने वाली हैं, जो समस्त तरह के शास्त्रों की जानकर हैं, जो सत्यनिष्ठ पर कायम रहने वाली हैं। जो समस्त तरह अस्त्र-शस्त्र को हाथों में धारण करने वाली हैं।



अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।


कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः।।१२।।


अर्थात्:-जो तरह-तरह के शस्त्रों को अपने हाथ में पकड़ने रखने वाली हैं, जो तरह-तरह के अस्त्रों को अपने हाथ में पकड़ने रखने वाली हैं, जो कि बारह वर्ष तक कि कन्या रूप में हैं, जो एक अविवाहित बालिका भी हैं, जो दस से पंद्रह वर्ष के मध्य की उम्र वाली बालिका भी हैं, जो जवानी से भरी हुई एक स्त्री के रूप में भी हैं। जो समस्त तरह के मनोविकारों से रहित हैं।



अप्रौढ़ा चैव प्रौढ़ा च वृद्धमाता बलप्रदा।


महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला।।१३।।


अर्थात्:-जो दीर्घकाल तक रहने वाली स्त्री भी हैं, जो बहुत ही समय पहले की  स्त्री भी हैं, जो एक बूढ़ी माता के रूप में भी हैं, जो ताकत या शक्ति से युक्त भी हैं, जो कि बहुत बड़े पेट से युक्त हैं, जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड संग्रहीत रखने वाली हैं, जो खुले बालो के रूप वाली भी हैं, जो डरावने रूप को धारण करने वाली भी हैं, जो भूत-प्रेत बाधा को दूर करने वाली हैं।



अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।


नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी।।१४।।


अर्थात्:-जो अपने क्रोध की आग की ज्वाला से युक्त होकर तेज ज्वाला आसमान को भी नष्ट करने का सामर्थ्य रखने वाली हो, जो विध्वंसक रुद्र की तरह एक भयंकर चेहरे वाली हो, जो प्रलय की तरह अंधेरी एवं भयानक रात की तरह के स्वरूप वाली हैं, जो बहुत ही कठिन तपस्या करने वाली हैं, जिनमें विष्णुजी की पत्नी के रूप लक्ष्मीजी का रूप भी समाहित होता हैं, जो कि दुर्गा माता एक कात्यायनी रूप वाली हो, जो कि शिवजी की पत्नी पार्वतीजी का रुप भी समाहित रखने वाली हैं, जो वायव्य ब्रह्माण्ड के लोक वाली है।



शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।


कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी।।१५।।


अर्थात्:-जो भगवान शिवजी के राजदूत के रूप में हैं, जो मुक्त रूप वाली स्त्री हैं, जो शाश्वत विनाश से रहित हो, जो सर्वोच्च देवी के रूप वाली हैं, जो माता पार्वती का एक रूप रखने वाली हैं, मत्स्य देश के राजा अश्वपति की तनुजा के समान पतिव्रता रूप में होती हैं, जो स्पष्ट दिखाई देने वाली या इंद्रिय के द्वारा ज्ञान को स्पष्ट रूप में रखने वाली हैं, जो ब्रह्माजी की भार्या गायत्रीजी के रूप में भी समाहित रहने वाली होती हैं।




य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।


नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति।।१६।।


भावार्थ्:-देवी पार्वती! माता देवी के श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं के मन्त्रों को जो कोई भी नियमित रूप से वांचन करते हैं, उनके लिए पृथ्वी लोक, आकाश लोक और पाताललोक में कुछ भी साधने योग्य नहीं हैं।



धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।


चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्।।१७।।


भावार्थ्:-जो भी इसके मन्त्रों का वांचन करते हैं, वे धन, धान्य, पुत्र, औरत, अश्व, हस्ती, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चार पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेते हैं। आखिर में जिसका आदि है न अन्त अर्थात् जो हमेशा बना रहने वाले होता हैं। जो परम्परानिष्ठ शाश्वत जीवन-मरण के चक्कर से मुक्त होकर मोक्ष गति को प्राप्त कर लेता हैं।



कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।


पूजयेत् पराया भक्त्या पठेन्नामशताष्टाकम्।।१८।।


भावार्थ्:-जो मनुष्य बारह वर्ष की उम्र की कन्या का विधि-विधान से पूजा करता हैं, उसके बाद में देवताओं की देवी दुर्गा जी की छवि को मन में बनाकर मन ही मन में उनको याद करते हुए उनका ध्यान करना चाहिए, फिर अपने विश्वास एवं श्रद्धाभाव से मन में किसी भी तरह के बुरे विकारों के बिना अपने स्वार्थ या हित की कुछ भी कामना नहीं रखते हुए देवी दुर्गाजी का पूजन करना चाहिए, उसके बाद में अष्टोत्तरशत नाम के स्तोत्रं के मन्त्रों का वांचन करना चाहिए।



तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैं सुरवरैरपि।


राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्।।१९।।


भावार्थ्:-जो भी इस तरह वांचन करते हैं, उसको समस्त अति उत्तम देवताओं से भी सफलता मिलती है, महीपति भी उसके  भृत्य बनकर उसकी सेवा करते हैं, और वह समस्त धन को प्राप्त करके उस धन का स्वामी बन जाता हैं, जिस तरह राज्यलक्ष्मी जी को धन की देवी कहा जाता हैं।



गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूकर्पूरमधुत्रयेण।


विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।२०।।


भावार्थ्:-जो मनुष्य गोरोचन, लाक्षा लाह, कुङ्कुम, सिन्दूर, कपूर या घनसार घृत या दुग्ध, शक्कर या शर्करा और मधु या कुसुमासव आदि चीजों को जब एक पात्र में इकट्ठा करके उनको मिश्रित करने से जो मिश्रित लेप बनता हैं, उस लेप को स्याही के रूप में उपयोग करते हुए मन्त्रों के पाठ के द्वारा जब किसी यन्त्र को पूजा-अर्चना एवं विधि-विधान से पूर्वक लिखा जाता हैं, उस लिखे गए यन्त्र को जब कोई विधि-विधान आदि को अच्छा जानकर मनुष्य उस यन्त्र को हमेशा अपने पास रखते हैं और पहनता हैं, तब वह मनुष्य भगवान शिवजी की तरह ही बन जाता हैं या उस मनुष्य को जीवन के जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिलकर मोक्ष रूप को प्राप्त कर लेता हैं।



भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।


विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम्।।२१।।


भावार्थ्:-जब भौमवती अमावस्या तिथि की अर्धरात्रि के समय में जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र में परिभ्रमण करता है, तब उस समय जो भी मनुष्य श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् को अपने हाथ के द्वारा लिखकर उस लिखे गए स्तोत्रं के मन्त्रों का उच्चारण उचित तरह से वांचन करते है, तब वे मनुष्य अपने जीवनकाल में बहुत ही सुख-समृद्धि एवं अनेक तरह की सम्पदा को प्राप्त करता हैं।



।।इति श्री विश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं संपूर्णम्।।

















Wednesday, October 22, 2025

October 22, 2025

अन्नकूट गोवर्धन पूजा कब हैं? जानें अन्नकूट पूजा विधि, कथा और महत्व (When is Annakut Govardhan Puja? Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance)

अन्नकूट गोवर्धन पूजा कब हैं? जानें अन्नकूट पूजा विधि, कथा और महत्व (When is Annakut Govardhan Puja?  Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance):-हिन्दू धर्म में कार्तिक मास में दिवाली पूजन के दूसरे दिन के पर्व को अन्नकूट पूजा या गोवर्धन पूजा और बाली प्रतिपदा का पर्व को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन मनाया जाता हैं। कार्तिक शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट का उत्सव भी मनाया जाता है।




अन्When is Annakoot Puja?  Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance



अन्नकूट का अर्थ:-जिनमें तरह-तरह के अन्न को इकट्ठा करके तरह-तरह की सब्जियों के साथ में मिलाकर एक किया जाता हैं, उसे अन्नकूट कहते हैं। इस तरह अन्नकूट के शब्दों को अलग करने पर दो शब्द प्राप्त होते है, जिनमें एक होता है अन्न एवं दूसरा शब्द कूट होता हैं।


अन्न का अर्थ समस्त तरह के धान्य पर्दाथ होता हैं।


कूट का अर्थ सभी को इक्कठा करके एक समूह बना होता हैं।


इस दिन खरीफ फसलों से प्राप्त अनाज एवं नई सब्जियों को बनाकर भगवान विष्णु का भोग लगाया जाता हैं। ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते है:



कार्तिकस्य सिते पक्षे अन्नकूटं समाचरेत्।


गोवर्धनोत्सवं चैव श्रीविष्णुः प्रिवनामिति।।



अन्नकूट पूजा विधि:-इस दिन की पूजा विधि इस तरह हैं।


◆प्रातःकाल घर के द्वार पर गौ के गोबर का गोवर्धन बनाये तथा उसे शिखर युक्त बनाकर वृक्ष शंखादि से संयुक्त और पुष्पों से सुशोभित करें। 



◆इस दिन यथा सामर्थ्य छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन रूप श्री भगवान को भोग लगाया जाता है। इसको प्रसाद रूप में भक्तों में वितरीत किया जाता हैं। 



◆रात में गौ से गोवर्धन का उपमर्दन करवाया जाता हैं। 



◆मन्दिरों में विविध प्रकार के पकवान, मिठाईयां, नमकीन और अनेक प्रकार की सब्जियां, मेवे, फल आदि भगवान के समक्ष भोग के लिए सजाये जाते हैं तथा सभी अन्नकूट का दर्शन कर भोग लगाकर आरती करते हैं। 



◆फिर भक्तों को प्रसाद रूप में अन्नकूट वितरण करते हैं। ब्रज में इसकी विशेष विशेषता हैं। 



◆काशी, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, बरसाना, नाथद्वारा आदि भारत के प्रमुख मन्दिरों में लड्डुओं तथा पकवानों के पहाड़ या कूट बनाये जाते हैं। जिनके दर्शन के लिए विभिन्न स्थानों से यात्री पधारते हैं। 



◆एक-एक करके सभी मन्दिरों में अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है और दीपावली से कार्तिक पूर्णिमा तक सभी मन्दिरों में ये महोत्त्सव चलता रहता हैं।





अन्नकूट पूजा की पौराणिक कथा:-द्वापर में ब्रज में अन्नकूट के दिन इन्द्र की पूजा होती थी। एक दिन श्रीकृष्ण ने गोप-ग्वालों को समझाया कि गायें व गोवर्धन प्रत्यक्ष देवता हैं। अतः तुन्हें इनकी पूजा करनी चाहिए। क्योंकी इन्द्र तो कभी यहां दिखाई भी नहीं देते। अब तक उन्होंने कभी आप लोगों के बनाये हुए पकवान ग्रहण भी नहीं किये। फलस्वरूप उनकी प्रेरणा से सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन की पूजा की। स्वयं भगवान श्री कृष्णजी ने गोवर्धन का रूप धारण करके सभी पकवानों या अन्नकूट को ग्रहण किया। जब इन्द्र को यह बात पता चली तो वे अत्यन्त क्रोधित होकर प्रलयकाल के सदृश मूसलाधार वर्षा करने लगे। यह देखकर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी चिटुडी अंगुली पर धारण किया। उसके नीचे सब ब्रजवासी ग्वाल-बाल, गायें-बछड़े आदि आ गये। लगातार सात दिन की वर्षा से जब ब्रजवासी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो इन्द्र को बड़ी ग्लानि हुई। ब्रह्माजी ने इन्द्र को श्री कृष्ण के परमब्रह्म परमात्मा होने की बात बतायी तो लज्जित होकर इन्द्र ने ब्रज में आकर श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। इस अवसर पर ऐरावत ने आकाश गंगा के जल से और कामधेनु ने अपने दुग्ध से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। जिससे वे गोविन्द कहे जाने लगे। इस प्रकार गोवर्धन पूजन स्वयं श्री भगवान का पूजन हैं। "गोविन्द मेरो हैं, गोपाल मेरो हैं, श्री बांके बिहारी नन्दलाल मेरो हैं।"





अन्नकूट पूजा की पौराणिक कथा:-भगवान की प्रेरणा से शाल्गलीद्वीप में द्रोणाचल की पत्नी से गोवर्धन का जन्म हुआ। भगवान के जाग रूप से वृन्दावन और उनके बावन स्कन्ध से यमुना प्रकट हुई। गोवर्धन को भगवद् रूप जानकर ही सुमेरु हिमालय आदि पर्वतों ने उसकी पूजा की और उसे गिरिराज बनाकर उसका स्तवन भी किया। एक समय तीर्थ यात्रा के प्रसंग में पुलस्त्यजी वहां आये। वे गिरिराज गोवर्धन को देख कर मुग्ध हो उठे और द्रोण के पास जाकर उन्होंने कहा कि मैं काशी निवासी हूँ। एक याचना लेकर आपके पास आया हूँ। आप अपने इस पुत्र को मुझे दे दो। मैं इसे काशी में स्थापित कर वहीं तप करूंगा। इस पर द्रोण पुत्र के स्नेह से कातर तो हो उठे, पर वे ऋषि मांग को ठुकरा न सके। तब गोवर्धन ने मुनि से कहा। "मैं दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा हूँ। आप मुझे कैसे ले चलेंगे।" मुनि ने कहा-मैं तुम्हें हाथ पर उठाये ले चलूंगा। गोवर्धन ने कहा-महाराज एक शर्त हैं। यदि आप मार्ग में मुझे कहीं रख देंगे तो मैं उठ नहीं सकूंगा। मुनि ने यह शर्त स्वीकार कर ली। ततपश्चात पुलस्त्यजी मुनि ने हाथ पर गोवर्धन उठा कर काशी के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में ब्रजभूमि मिली। जिस पर गोवर्धन की पूर्व स्मृतियां जाग उठी। वह सोचने लगा कि भगवान श्री कृष्ण राधा के साथ यही अवतीर्ण होकर बाल्य और किशोर आदि की बहुत सी मधुर लीलाऐं करेंगे। उस अनुपम रस के बिना मैं न रह सकूंगा। ऐसे विचार उत्पन्न होते ही वह भारी होने लगा। जिससे मुनि थक गये। इधर लघुशंका की भी प्रवृत्ति हुई। स्नान आदि से निवृत्त होकर जब वे गोवर्धन को पुनः उठाने लगे। तब वह न उठा। गोवर्धन ने मुनि को अपनी शर्त की याद दिलवाई और कहा-अब मैं यहां से नहीं हटूंगा। इस पर मुनि को क्रोध आया और वे शाप दे बैठे। तुमने मेरे मनोरथ पूर्ण नहीं किया। इसलिए तुम प्रतिदिन तिल-तिल घटते जाओगे। उसी शाप से गिरिराज गोवर्धन आज भी तिल-तिल घटता जा रहा हैं।




अन्नकूट पूजा का महत्त्व:-अन्नकूट पूजा करने से भगवान श्री कृष्णजी की अनुकृपा प्राप्त होती हैं।


1.अन्नकूट व्रत करने से मनुष्य के जीवनकाल के समस्त संकटों का निवारण हो जाता हैं।


2.मनुष्य के पारिवारिक जीवन में अन्न भण्डार भरा रहता हैं।