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Saturday, November 4, 2023

November 04, 2023

श्री सालासर बालाजी की आरती अर्थ सहित(Shri Salasar Balaji ki Aarti With Meaning)

श्री सालासर बालाजी की आरती अर्थ सहित(Shri Salasar Balaji ki Aarti With Meaning):-श्री सालासर बालाजी का मुख्य स्थान राजस्थान राज्य में स्थित चुरू जिले के सालासर गांव में है। श्री सालासर बालाजी की प्रतिमा दाढ़ी-मूँछो वाली है। जो कि अपनी शक्तियों के द्वारा अपने भक्तों की समस्त मन की कामनाओं को पूरा करते है। 



Shri Salasar Balaji ki Aarti With Meaning



श्री सालसर बालाजी की आरती अर्थ सहित:-श्री सालासर बालाजी को हनुमानजी के रूप में जाना जाता है, उनको अनेक रूपों का वर्णन मिलता है, इनके अनेक नाम भी हैं जिनमें एक नाम सालासर बालाजी है, तो इनको खुश करने के लिए इनकी आरती को करने से पूर्व आरती के भावों का ज्ञान होना चाहिए। उसके बाद ही आरती को करना चाहिए।



जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! जय-जयकार हो, बजरंगबली जी की, आप सब पर कृपा दृष्टी कर दीजिए। हे सालासर के श्री हनुमानजी आपकी अरदास करता हूँ।



चैत सुदी पूनम को जन्मे,


अंजनी पवन खुशी मन में।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! चैत्र मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को आपका जन्म हुआ था। तब अंजनी माता और पवन जी बहुत खुश होकर मन से खुशी मनाने लगे थे।



प्रकट भये सुर वानर तन में,


विदित यस विक्रम त्रिभुवन में।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! आपके शरीर में देव के रूप वानर रूप प्रकट हुआ था, चारों तरफ इस रूप की जानकारी तीनों लोकों में हो गई और आपकी शक्ति की जानकारी हो गई।



दूध पीवत स्तन मात के,


नजर गई नभ ओर।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! आप अपनी माता अंजनी की गोद में उनके स्तनों से दूध पी रहे थे, तब आपकी नजर आकाश की ओर गई।



तब जननी की गोद से पहुंचे,


उदयाचल पर भोर।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! तब आप अपनी माता अंजनी की गोद से उतर कर जहां से सूर्य उदय होता है उस पर्वत पर आप प्रातःकाल ही पहुंच गए।



अरुण फल लखि रवि,


मुख डाला कृपा कर।।1।।


तिमिर भूमण्डल में छाई,


चिबुक पर इन्द्र बज्र बाए।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! जब आप उदयाचल पर्वत पर पहुंचे तब आपने लाल रंग का सूर्य को फल समझकर अपने मुहं में ले लिया था। समस्त तीनों लोकों में अंधेरा छा गया तब इंद्रदेव ने आपसे कहा कि उस लाल रंग के फल के रूप में सूर्यदेव है उनको अपने मुख से आजाद करो तब आप नहीं माने तब इंद्रदेव ने अपने वज्र का प्रहार किया था तब आपकी ठोड़ी पर वज्र का प्रहार हो गया था।



तभी से हनुमत कहलाए,

द्वय हनुमान नाम पाये।।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! इस तरह व्रज के प्रहार से आपकी ठोड़ी खण्डित हो गई थी, तब से आपका नाम हनुमत पड़ा था। इस तरह से आपको हनुमान का नाम प्राप्त हुआ था।


जयति जय जय बजरंग बाला,

कृपा कर सालासर वाला।


अर्थात्:-हे बजरंगबली जी! जय-जयकार हो, बजरंगबली जी की, आप सब पर कृपा दृष्टी कर दीजिए। हे सालासर के श्री हनुमानजी आपकी अरदास करता हूँ।



।।इति श्री सालासर बालाजी की अर्थ सहित संपूर्ण।।


।।अथ श्री सालासर बालाजी की आरती।।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


चैत सुदी पूनम को जन्मे,


अंजनी पवन खुशी मन में।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


प्रकट भये सुर वानर तन में,


विदित यस विक्रम त्रिभुवन में।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


दूध पीवत स्तन मात के,


नजर गई नभ ओर।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


तब जननी की गोद से पहुंचे,


उदयाचल पर भोर।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


अरुण फल लखि रवि,


 मुख डाला कृपा कर।।1।।


तिमिर भूमण्डल में छाई,


चिबुक पर इन्द्र बज्र बाए।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


तभी से हनुमत कहलाए,


द्वय हनुमान नाम पाये।।


जयति जय जय बजरंग बाला,


कृपा कर सालासर वाला।


।।इति श्री सालासर बालाजी की आरती।।


।।जय बोलो श्री सालासर बालाजी की जय हो।।


।।जय बोलो पवनपुत्र श्री बजरंगबली की जय हो।









Tuesday, October 17, 2023

October 17, 2023

आरती गिरधारी जी की अर्थ सहित(aarti girdhari ji ki with meaning)

आरती गिरधारी जी की अर्थ सहित(aarti girdhari ji ki with meaning):-भगवान श्रीकृष्ण जी को अनेक तरह के नामों से जाना जाता है, उनके नाम जैसे वासुदेव, कृष्ण, गोपालक, गिरिधरी, कान्हा, मुरारी, केशव, माधव, यशोदापुत्र आदि हैं। उन नामों में से एक नाम गिरधारी भी है, जिसमें भगवान कृष्ण अपनी लीलाओं के द्वारा समस्त गोकुलधाम को आनन्दित किया था। श्रीकृष्णजी का नाम गिरिधर पड़ने का कारण था। भगवान श्रीकृष्णजी ने अपनी उंगलियों से गोवर्धन पर्वत को उठाया था, इसलिए उनको गिरिधर भी कहते है। जब इंद्रदेव को अपने ऊपर अभिमान हो गया। उनके बिना संसार नहीं चल सकता है, वे अपने-आपको ईश्वर तुल्य मानने लगे। समस्त जगत के निवासियों से अपनी पूजा करवाना चाहते थे। क्योंकि इंद्रदेव को वर्षा ऋतु एवं बारिश का स्वामी माना जाता है, वे अपनी पूजा मानव जाति को करवाने के लिए बाध्य करने लगे। जिससे उनके भय से मानव उनकी पूजा करते थे। 



Aarti with Girdhari ji's meaning



इस तरह उनकी इस जबर्दस्ती की पूजा का जब कृष्णजी को पता चलता है, तब कृष्णजी ने अपने समस्त गोकुलवासियों को कहा कि आप सब इंद्रदेव की पूजा की बजाएं गोवर्धन पर्वत को पूजन किया करे, क्योकि यह गोर्वधन पर्वत समस्त मानव जाति की रक्षा करते है। जो कि प्रकृति की विभिन्न तरह की मुशीबतों से बचाता है। इस तरह गोकुलवासियों ने श्रीकृष्णजी की बातें के अनुसार इंद्रदेव की पूजा करना छोड़ दिया और गोर्वधन पर्वत की पूजा करने लगे जब इंद्रदेव को पता चला तो उन्होंने इतनी तेज वर्षा की चारों तरफ सब कुछ पानी से लबालब हो गया, इस तरह की भारी वर्षा से बचने के लिए सब परेशान हो गए अपने जीवन को किस तरह बचाए। तब श्रीकृष्णजी ने अपनी उंगली पर गोर्वधन पर्वत को उठाई उनके नीचे समस्त गोकुलवासियों को आने के लिए कहा था। इस तरह इंद्रदेव को आखिर में अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी और इंद्रदेव का घमंड चूर-चूर हो गया। इस तरह श्रीकृष्णजी का नाम गिरिधर पड़ा था। तब से गोर्वधन पर्वत की पूजा विधान शुरू हुआ था। जो आज के युग तक चल रहा हैं।




इसलिए भगवान श्रीकृष्णजी की आरती को हमेशा करते रहने पर समस्त तरह के दुःखो का अन्त हो जाता हैं और अंत मोक्ष गति मिल जाती है। भगवान कृष्णजी को सच्चे मन से उनकी आराधना करनी चाहिए।



आरती श्री गिरधारी जी की अर्थ सहित:-भगवान गिरधारी की आरती करने से पूर्व आरती में लिखे गए शब्दों के अर्थ को समझकर आरती करने से आरती के बारे में जानकारी मिल जाती हैं। इसलिए आरती के अर्थ को समझकर करने से शुभ फल मिलता है, जो आरती का अर्थ इस तरह है:


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।


भावार्थ्:-हे श्रीकृष्णजी! आपको कृष्ण के नाम, हरि का नाम और गिरधारी के नाम से जाना जाता है। आपकी जय-जयकार हो। राक्षस की शक्ति को नष्ट करके उनको को मारने वाले एवं गायों एवं ब्राह्मणों का हित करने वाले हो।



जय गोविन्द दयानिधि, गोवर्धन धारी।


वंशीधर बनवारी, ब्रज जन प्रियकारी।।


भावार्थ्:- हे गोविन्द! आपकी जय-जयकार करें, आप तो दया के सागर हो, आपने तो उंगली पर गोर्वधन पर्वत को उठाने वाले, वंशी को अपने हाथ में धारण करने वाले बनवारी और ब्रज वासियों के दुलारे हो।



गणिका गोध अजामिल गणपति भयहारी।


आरत-आरति हारी, जय मंगल कारी।।


भावार्थ्:-हे गिरधारी! आपके नाम में भी इतना बल होता है, जिस तरह चमेली के फूल दूर होने पर भी अपनी सुंगध से महकाता है। आप तो मादा घड़ियाल, गिरगिट या छिपकली आदि के डर को हरने वाले एक पापी ब्राह्मण अजामिल था, जिसका उद्धार उसके पुत्र नारायण की मृत्यु होने पर उसकी याद में नारायण नाम का उच्चारण करते-करते मोक्ष को पाया, जो गणपति जी के डर को हरण करने वाले और शांति पूर्वक अपने विराग का हरण करने वाले और जो सभी तरह कल्याण करने वाले होते है, उनकी जय-जयकार हो।



गोपालक गोपेश्वर, द्रौपदी दुखहारी।


शबर-सुता सुखकारी, गौतम-तिय तारी।।


भावार्थ्:-हे माधवजी! आपका नाम गायों को पालने के कारण गोपालक पड़ा था, गोपियों के स्वामी हो, द्रौपदी के दुःखो को दूर करने वाले हो, शबरी का उद्धार करके उसको सुख देने वाले हो एवं गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के दुःख को दूर करके उसका उद्धार करने वाले होते हो।



जन प्रहलाद प्रमोडक, नरहरि तनु धारी।


जन मन रंजनकारी, दिति-सुत संहारी।।


भावार्थ्:-हे गिरिधारी! आप तो सभी मनुष्य को एवं प्रहलाद के दुःखो को दूर करने के लिए नृसिंह रूप को धारण करने वाले हो, समस्त मनुष्य को मनभावन सुख को देने वाले हो और दक्ष की सुंदर पुत्री एवं ऋषि कश्यप की पत्नी के द्वारा उत्पन्न पुत्र की आभा का संहार करने वाले होते हो।



टिट्टिभ-सुत संरक्षक, रक्षक मंझारी।


पाण्डु सुवन शुभकारी, कौरव मद हारी।।


भावार्थ्:-हे केशवजी! आप तो जमींनपर घोंसला बनाने वाले टिटिहरी पक्षी या टिड्डी को पुत्र के रूप में मानकर उनका पालन-पोषण करने वाले हो और उनकी रक्षा करने की स्वीकृति देने वाले होते हो। जिस तरह से पाण्डु जो की एक पीले रंग की मिट्टी होती है उसका उपयोग आभूषण आदि बनाने में किया जाता है, वह मिट्टी फायदेमंद होती है और कौरव वंश में जब घमंड में चूर हो जाते है तब उनके घमंड को तोड़ने वाले हो।




मन्मथ-मन्मथ मोहन, मुरली-रव कारी।


वृन्दाविपिन बिहारी, यमुना तट चारी।।


भावार्थ्:-हे श्रीकृष्णजी! आपके मुरली की ध्वनि इतनी मधुर होती है कि आप तो कामदेव के समान सभी को मोहित कर देते हो। वृन्दा जंगल में भृमण करने वाले आपको बिहारी भी कहते हैं और अपनी इच्छानुसार यमुना के किनारों पर घूमने वाले ही।



अघ-बक-बकी उधारक, तृणावर्त तारी।


बिधि-सुरपति मदहारी, कंस मुक्तिकारी।।


भावार्थ्:-हे केशव जी! आप तो पापिओं के द्वारा बिना मतलब के बोलने पर ध्यान नहीं देते हो, लेकिन पापियों के माफी मांगने पर उनके बचे हुए जीवन का उद्धार कर देते हो, बवंडर के समान विशाल दैत्य का भी आप तारण कर देते हो, जब इंद्रदेव जब मद में चूर हो जाते है तब उनकी मद के नशे को हरके उनको अनुकूलता प्रदान करते हो और कंस जैसे दैत्य से भी मुक्ति दिलवाने वाले हो।



शेष, महेश, सरस्वती, गुन गावत हारी।


कल कीरति विस्तारी, भक्त भीति हारी।।


भावार्थ्:-हे नारायण! आपके गुणों का बखान तो शिवजी, माता सरस्वती जी एवं शेषनाग करते रहते है, आपकी कीर्ति तो कल भी थी और आज भी है। आप तो अपने भक्तों के डर को हरने वाले हो।



'नारायण' शरणागत, अति अघ अघहारी।


पद-रज पावनकारी, चाहत चितहारी।।


भावार्थ्:-हे नारायण! आप तो आपके शरण में आये हुए शत्रु की भी रक्षा करने वाले होते है, आपके शरण में आये हुए बहुत ही पापी एवं दुष्कर्मी को भी माफ कर देते हो। आपके पैरों की धूल भी पावन करने वाली होती है और आप तो सभी का हित करना चाहते हो।



      ।।इति श्री गिरधारी जी की आरती।।


    ।।अथ आरती श्री गिरधारी जी की।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



जय गोविन्द दयानिधि, गोवर्धन धारी।


वंशीधर बनवारी, ब्रज जन प्रियकारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



गणिका गोध अजामिल गणपति भयहारी।


आरत-आरति हारी, जय मंगल कारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



गोपालक गोपेश्वर, द्रौपदी दुखहारी।


शबर-सुता सुखकारी, गौतम-तिय तारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



जन प्रहलाद प्रमोडक, नरहरि तनु धारी।


जन मन रंजनकारी, दिति-सुत संहारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



टिट्टिभ-सुत संरक्षक, रक्षक मंझारी।


पाण्डु सुवन शुभकारी, कौरव मद हारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



मन्मथ-मन्मथ मोहन, मुरली-रव कारी।


वृन्दाविपिन बिहारी, यमुना तट चारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



अघ-बक-बकी उधारक, तृणावर्त तारी।


बिधि-सुरपति मदहारी, कंस मुक्तिकारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



शेष, महेश, सरस्वती, गुन गावत हारी।


कल कीरति विस्तारी, भक्त भीति हारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



'नारायण' शरणागत, अति अघ अघहारी।


पद-रज पावनकारी, चाहत चितहारी।।


जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय जय गिरधारी।


दानव-दल बलिहारी, गो-द्विज हित कारी।।



      ।।इति आरती श्री गिरधारी जी की।।


।।जय बोलो गिरधारी बांके बिहारी जी की जय हो।।


        ।।जय बोलो केशवजी की जय हो।।



Monday, April 3, 2023

April 03, 2023

अम्बे माता की आरती अर्थ सहित(Ambe Mata Aarti with meaning)

अम्बे माता की आरती अर्थ सहित(Ambe Mata Aarti with meaning):-माता दुर्गाजी का नवदेवीयों के स्वरूप में पूजन किया जाता है, उन नवदेवीयों के स्वरूप में से ही एक स्वरूप को अम्बे माता के नाम से जाना जाता हैं। नवरात्रि में माता दुर्गाजी के नवस्वरूपों के रूप अलग-अलग स्वरूप की पूजा-आराधना की जाती हैं। हिन्दुधर्म में वर्ष में मुख्य दो नवरात्र आते है, उनमें से बसन्तीय नवरात्र एवं शारदीय नवरात्र होते है, तब माता अम्बे की आराधना के लिए उनकी आरती की जाती हैं, जिससे माता अम्बे की अनुकृपा मनुष्य के जीवन में प्राप्त हो सके। 





जिस तरह माता ने दैत्यों के संहार करके जगत सहित समस्त तीनों लोकों को दैत्यों के अत्याचार से मुक्त करवाया था, इसलिए माता खुश करने के लिए उनको अरदास स्वरूप उनकी आरती नियमित रूप से करते रहना चाहिए। जिससे मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं से मुक्ति मिल सके। 




Ambe Mata Aarti with meaning


अम्बे माता की आरती अर्थ सहित:-अम्बे माता की आरती को मनुष्य को अपने जीवनकाल में नियमित समय पर करने से माता की अनुकृपा की प्राप्ति हो सके। माता अम्बे समस्त जगत का पालन-पोषण करती है, जगत पर निवास करने वालो समस्त जीवों पर स्नेह से दुलार करती है। इसलिए माता अम्बे की आरती में शब्दों को जानकर उनका सही उच्चारण करते हुए आरती करनी चाहिए। 



अम्बे तू है जगदम्बे काली जय दुर्गे खप्पर वाली,


तेरे ही गुण गाएं भारती।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।



अर्थात्:-हे माता! आप ही अम्बे हो, आप ही जगदम्बे हो, आप ही काली हो, आप ही दुर्गा और आप को ही खप्पर वाली के नाम से यह पुकारता हैं। हे माता! आपका नाम भारती भी है। आपके गुणों का बखान चारों तरफ आपके भक्त करते-रहते है। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।



माता तेरे भक्त जनों पे भीड़ पड़ी है भारी।


दानव दल पर टूट पड़ो माँ करके सिंह सवारी।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।



अर्थात्:-हे माता! आपके दर्शन करने के लिए आपके भक्तों की संख्या असंख्य है, आपके दर्शन करने के लिए भक्त दूर-दूर से आते है। आप तो जिस तरह दैत्यों के संहार करने को तत्पर रहती हो और सिंह की सवारी करती हो। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।



सौ-सौ सिंहों से बलशाली अष्ट-दश भुजाओं वाली। 


दुष्टो को तू ही संहारती। दुखियों के दुःख को निवारती।


ओ मैया हम सब उतारेंते री आरती।


अर्थात्:-हे अम्बे माता! आपके बल का क्या कहना? आपमें तो सौ-सौ सिंहों से भी अधिक शक्ति होती है और आपके आठ भुजाएँ हैं। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।



मां बेटे का इस जग में है बड़ा ही निर्मल नाता।


पूत कपूत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।



अर्थात्:-हे माता! आपके भक्त को आप अपने सन्तान के रूप में स्नेह-दुलार करती है, इसलिए तो इस जगत में जिस तरह माता-पुत्र का स्नेह का निर्मल सम्बन्ध होता है। इस जगत में माता के पुत्र कपूत हो सकते है, लेकिन इस जगत में कभी भी माता कुमाता नहीं होती है। इस जगत में समस्त को पता हैं। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।




सब पे करुणा दरसाने वाली अमृत बरसाने वाली।


दुखियों के दुखड़े को निवारती।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।



अर्थात्:-हे भगवती! आप तो समस्त जीवों पर अपने दया भाव रखने वाली हो, समस्त पर अमृत की तरह अपना आशीर्वाद देने वाली हो और समस्त निर्बल-कमजोर एवं अपने कर्मो से दुःखी होते है, उनके दुःखों को दूर करने वाली हो। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।



नहीं मांगते धन और दौलत न चांदी न सोना।


हम तो मांगते तेरे मन का एक छोटा सा कोना 


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।


अर्थात्:-हे अम्बे माताजी! हम आपके समस्त भक्त गण आपसे हमें नहीं तो रुपये-पैसे, नहीं सोना-चांदी चाहिए। आपका आशीर्वाद हम समस्त मानव पर बना रहे इतना हम चाहते है। आपके मन की जगह पर थोड़ा सा स्थान हमें दे दीजिए। आपकी भक्ति को हम सच्चे मन से करने वाले है। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।



सबकी बिगड़ी बनाने वाली लाज बचाने वाली,


सतियों के सत को संवारती।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।



अर्थात्:-हे भगवती माताजी! आप तो सबकी बिगड़ी को बनाने वाली हो, सबके आन-मान की लाज रखने वाली हो। आप तो सतियों के सत को संवारने वाली हो। हे माता! आपकी आरती को समस्त जगत के प्राणी उतारते हैं।



।।इति आरती श्री अम्बे माता जी की अर्थ सहित।।



   ।।अथ श्री अम्बे माता की आरती।।



अम्बे तू है जगदम्बे काली जय दुर्गे खप्पर वाली,


तेरे ही गुण गाएं भारती।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।


माता तेरे भक्त जनों पे भीड़ पड़ी है भारी।


दानव दल पर टूट पड़ो माँ करके सिंह सवारी।


ओ मैया हम सब उतारेंते री आरती।



सौ-सौ सिंहों से बलशाली अष्ट-दश भुजाओं वाली। 


दुष्टो को तू ही संहारती। दुखियों के दुःख को निवारती।


ओ मैया हम सब उतारेंते री आरती।



मां बेटे का इस जग में है बड़ा ही निर्मल नाता।


पूत कपूत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता।


ओ मैया हम सब उतारेंते री आरती।



सब पे करुणा दरसाने वाली अमृत बरसाने वाली।


दुखियों के दुखड़े को निवारती।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।


नहीं मांगते धन और दौलत न चांदी न सोना।


हम तो मांगते तेरे मन का एक छोटा सा कोना।


ओ मैया हम सब उतारेंते री आरती।


सबकी बिगड़ी बनाने वाली लाज बचाने वाली,


सतियों के सत को संवारती।


ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।



  ।।इति आरती श्री अम्बे माता जी की।।


    ।।जय बोलो अम्बे माता की जय।।


।।जय बोलो दैत्यों के संहारिका की जय हो।।



Friday, December 2, 2022

December 02, 2022

कृष्ण भगवान जी की आरती अर्थ सहित(Aarti of Bhagavan Krishna ji with meaning)

कृष्ण भगवान जी की आरती अर्थ सहित(Aarti of Bhagavan Krishna ji with meaning):-भगवान कृष्णजी की आरती को नियमित रूप से करना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण जी की कृपा दृष्टि बनी रहे।



श्री कृष्ण भगवान की आरती का अर्थ सहित वर्णन:-भगवान श्री कृष्ण जी आरती को करने से पूर्व आरती के भावों को जानना भी जरूरी है, इसलिए आरती का अर्थ सहित वर्णन इस तरह है-



Aarti of Bhagavan Krishna ji with meaning



ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।। 


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आपकी जय जय हो, आप ही इस जगत के पालक हो, आपकी जय हो। आप ही अपने भक्तों के दुःखों को क्षण भर में ही हरण कर लेते हो। जय हो श्रीकृष्णजी आपकी जय हो।



परमानन्द मुरारी मोहन गिरधारी।


जय रस रास बिहारी जी जय गिरधारी।



अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आपको अनेक नामों से जाना जाता है, जिनमें कुछ आपको परमानन्द अर्थात् सभी तरह का आनन्द देने वाले के रूप में जानते हैं, कुछ आपको मुरारी अर्थात् मुर नामक दैत्य का संहार करने वाले के रूप में, कुछ आपको मोहन अर्थात् मन को हरने वाले के रूप में, कुछ आपको गिरधारी अर्थात् पर्वत को अपनी एक अंगुली पर उठाने के रूप में जानते है। जय-जय हो आपकी रस रास जी।



कर कंचन कटि सोहत कानन में बाला।


मोर मुकुट पीताम्बर सोहे बनमाला।


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आप हाथ इन स्वर्ण का कड़ा धारण किये हुए हो, कमर पर स्वर्ण की जंजीर को पहनने हुए और कानों में बाले को धारण किये हो, सिर पर आपने मोर के पंख को मुकुट के रूप में धारण किया है और पीले वस्त्र पहनने हुए हो। आपने गले में पुष्पों की और स्वर्ण आभूषण की माला बहुत सुंदर लगती हैं।



दीन सुदामा तारे दरिद्रों के दुख टारे।


गज के फन्द छुड़ाए भव सागर तारे।



अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आपने अपने सखा गरीब सुदामा के दुःख को हर कर उसको सभी तरह का ऐश्वर्य एवं सम्पत्ति को प्रदान किया था। आपने अपनी मित्रता को निभाया था। हाथ के फंदे में फंसने पर उसको बचाकर उसका उद्धार किया था। उसको जीवन-मरण के बंधन से मुक्त कराकर के आपने उसको भव सागर की नैया को पार लगाई थी।



हिरण्यकश्यप संहारे नरसिंह रूप धरे।


पाहन से प्रभु प्रंगटे जम के बीच परे।


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! जब पृथ्वी पर दैत्यराज हिरण्यकश्यप का अत्याचार बढ़ गया। तब अपने पत्थर से बने थम्बे को तोड़कर आपने श्रीनृसिंह के रूप में अपने प्रिय भक्त प्रहलाद की करुण पुकार पर अवतार लिया था। प्रहलाद कर प्राणों की रक्षा दैत्यराज हिरण्यकश्यप का वध करके की थी।



पापी कंस विदारे नल कूबेर तारे।


दामोदर छवि सुन्दर भक्तन के प्यारे।


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! जब दैत्यराज कंस का आतंक बहुत बढ़ गया तो आपने पापी व दुराचारी कंस का वध किया था। तब स्वर्ण नगरी के राजा कुबेर एवं नल राजा ने आपका गुणगान किया था। आपकी के उदर में समस्त जगत समाया हुआ है, इसलिए आपको दामोदर भी कहते है, यह दामोदर रूप की छवि आपके भक्तों को बहुत ही अच्छी लगती है।



काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे।


फन-फन नाचा करते नागन मन मोहे।


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आपने कालिया नाग को सरोवर से मुक्त कराया था। उस कालिया नाग के फन पर आप विराजित होकर नृत्य करते हुए बहुत ही शोभायमान लगते हो। आपके सिर पर कालिया नाग की छत्र होने से आपको नटवर अर्थात् आप सभी तरह से निपुण एवं चतुर होने से कहा जाता है, जब फनो से नागिन नाचती है, तब बहुत ही मन को लुभाती है, उस तरह की छवि आपकी हैं।



राज्य उग्रसेन पाये माता शोक हरे।


द्रुपद सुता पत राखी करुणा लाज भरे।


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आपने उग्रसेन जी को राज्य वापस दिलवाया था, आपकी जन्मदात्री माता के आपने शोक को हरण किया था। राजा द्रुपद की पुत्री ने जब राखी आपकी कलाई पर बांधी तो आपने उस राखी के निमित आपने लाज रखी थी।



ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


अर्थात्:-हे श्रीकृष्णजी! आपकी जय जय हो, आप ही इस जगत के पालक हो, आपकी जय हो। आप ही अपने भक्तों के दुःखों को क्षण भर में ही हरण कर लेते हो। जय हो श्रीकृष्णजी आपकी जय हो।




  ।।अथ श्री कृष्ण भगवान की आरती।।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


परमानन्द मुरारी मोहन गिरधारी।


जय रस रास बिहारी जी जय गिरधारी।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


कर कंचन कटि सोहत कानन में बाला।


मोर मुकुट पीताम्बर सोहे बनमाला।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


दीन सुदामा तारे दरिद्रों के दुख टारे।


गज के फन्द छुड़ाए भव सागर तारे।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


हिरण्यकश्यप संहारे नरसिंह रूप धरे।


पाहन से प्रभु प्रंगटे जम के बीच परे।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


पापी कंस विदारे नल कूबेर तारे।


दामोदर छवि सुन्दर भक्तन के प्यारे।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे।


फन-फन नाचा करते नागन मन मोहे।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।


राज्य उग्रसेन पाये माता शोक हरे।


द्रुपद सुता पत राखी करुणा लाज भरे।


ओउम जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे।


भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे।।



।।इति श्री कृष्ण भगवान की आरती।।


।।जय बोलो नन्दगोपाल की जय हो।


।।जय बोलो यशोदा सुत की जय हो।।


Saturday, September 18, 2021

September 18, 2021

श्री खाटू श्याम जी की आरती अर्थ सहित(Aarti of Shri khatu Shyam ji with meaning)


श्री खाटू श्याम जी की आरती अर्थ सहित(Aarti of Shri khatu Shyam ji with meaning):-श्री खाटू श्यामजी को श्रीकृष्ण जी के रूप में मानकर ही उनकी पूजा अर्चना की जाती है। श्री खाटू श्यामजी के नाम मात्र से सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। इसलिए जिस तरह अपने सिर का बलिदान करके अपना उद्धार हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण जी के नाम से सदा-सदा के लिए अमरत्व की प्राप्ति की थी। इसलिए उनकी आरती करके उनको गुणों का गुणगान करने से सभी तरह के संकटो से मुक्ति मिल जाती हैं।




Aarti of Shri khatu Shyam ji with meaning




महाभारत के प्रसंग के अनुसार श्री खाटू श्यामजी की उत्पत्ति की जानकारी:-श्री खाटूश्यामजी के बारे में महाभारत में जानकारी प्राप्त होती है, पांडवो में से मझले पांडव भीम और हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच हुए थे। इस तरह घटोत्कच के एक पुत्र हुआ था, उसका नाम बर्बरीक था। जो कि घटोत्कच से भी ज्यादा बलवान और अपने रूपो को बदल देने की शक्ति अपार थी। अपनी मायावी शक्तियों के बल पर सबको भर्मित कर देने वाले थे। देवी की अपार श्रद्धा से उसने देवी की उपासना की और बहुत अलौकिक विशिख को प्राप्त किया था। इस तरह महाभारत के युद्ध को देखने की इच्छा से जब जाने लगे तब श्रीकृष्ण उनसे ब्राह्मण भरकर दान मांगा, की तुम अपना सिर को अर्पण कर दो तब बर्बरीक ने अपना सिर को अर्पण कर दिया था। इस तरह श्रीकृष्णजी ने कटे हुए सिर को आशीर्वाद देकर कहा कि कलयुग में तुम्हारी पूजा होगी, वह भी मेरे स्वरूप के रूप में होगी। इस तरह श्री खाटू श्यामजी की पूजा श्रीकृष्णजी के नाम से की जाती है। 





श्री खाटू श्याम जी की आरती अर्थ सहित:-श्री खाटू श्यामजी को श्रीकृष्णजी के रूप में पूजन किया जाता है, इसलिए उनकी आरती को करने से पूर्व उनके आरती के शब्दों के अर्थ को जानकर आरती को सही रूप में करने पर फल प्राप्त होता है, आरती के भावों का फल इस तरह है:





ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।



अर्थात्:-श्रीश्यामजी आपकी जय-जयकार हो, हे ईश्वर आप ही इस जगत को चलाने वाले हो, श्रीश्यामजी की जय हो, आपने अपने भक्तों के सभी कार्यों को पूर्ण किया है। आपकी जय हो।




गल पुष्पों की माला, सिर पर मुकुट धरे।


पीत बसन पीताम्बर, कुण्डल कर्ण पड़े।



अर्थात्:-श्रीश्यामजी के गले फूलों की माला पहने हुए और सिर पर अनेक रत्नों से जड़ित मुकुट को धारण किये हुए हेब, पीले रंग के वस्त्रों को धारण किये हए हैं और कानों में कुण्डल की शोभा ओर भी होती हैं।




रत्नसिंहासन राजत, सेवक भक्त खड़े।


खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जरे।।



अर्थात्:-श्रीश्यामजी का अनेक तरह के रत्नों एव सोने से बना सिहांसन पर विराजित होते है, उनके भक्त उनके द्वार में खड़े होकर उनसे अरदास करते हैं और धूपबत्ती की अगरबती और दीपक की ज्योति से सारा द्वार प्रकाशमान होता हैं।



मोदक खीर चूरमा, सुवर्ण थाल भरे।


सेवक भोग लगावत, सिर पर चंवर ढुरे।।



अर्थात्:-श्रीश्यामजी को मोदक के लड्डू, दूध से बनी खीर को जब सोने के धातु के बने थाल में रखकर जब पूजा के दौरान उनको सेवक या पुजारी भोग को अर्पण करता है, तब सिर पर उनके कलँगी की तरह सुंदर आभायुक्त दिखाई पड़ते हैं।



झांझ, नगारा और घड़ियाल, शंक मृदंग घुरे।


भक्त आरती गावें, जय जयकार करे।।



अर्थात्:-श्रीश्यामजी की आरती करते समय भक्तों के द्वारा श्रीश्यामजी के मंदिर के स्थान पर झांझ, नगाड़ा और घड़ियाल, शंख और मृदंग को बजाते हुए उनकी ध्वनि को चारों तरफ फैलाते है और श्रीश्यामजी के नाम की जय-जयकार के शब्दों से चारों ओर श्रीश्यामजी-श्रीश्यामजी ही सुनाई पड़ता है।



जो ध्यावे फल पावे सब दुःख से उबरे।


सेवक जब निज मुख से, श्रीश्याम श्याम उचरे।।



अर्थात्:-जो मनुष्य श्रीश्याम जी का ध्यान धरता है, तो श्रीश्याम जी उसके सभी तरह के कष्टों को हरण कर लेते हैं और उसको सभी तरह के सुखों की प्राप्ति करवाते है। जब कोई भी भक्त अपने मुख से बार-बार श्रीश्यामजी का उच्चारण करता रहता है, तो श्रीश्यामजी उसको सभी तरह के सुख-समृद्धि को प्रदान कर देते हैं।




श्रीश्याम बिहारीजी की आरती, जो कोई नर गावे।


गावत दाससुनील, मन वान्छित फल पावे।।


अर्थात्:-श्रीश्याम बिहारीजी की आरती जो को मनुष्य अपने पूर्ण विश्वास और श्रद्धा भाव से गाता हैं, उसको सभी तरह की मन कामनाओ की पूर्ति होती है, इसी तरह सेवक सुनील जोशी भी श्रीश्याम बिहारीजी आरती को गाता है।





।।अथ आरती श्री खाटू श्याम जी की।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।


गल पुष्पों की माला, सिर पर मुकुट धरे।


पीत बसन पीताम्बर, कुण्डल कर्ण पड़े।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।


रत्नसिंहासन राजत, सेवक भक्त खड़े।


खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जरे।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।


मोदक खीर चूरमा, सुवर्ण थाल भरे।


सेवक भोग लगावत, सिर पर चंवर ढुरे।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।


झांझ, नगारा और घड़ियाल, शंक मृदंग घुरे।


भक्त आरती गावें, जय जयकार करे।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।


जो ध्यावे फल पावे सब दुःख से उबरे।


सेवक जब निज मुख से, श्रीश्याम श्याम उचरे।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।


श्रीश्याम बिहारीजी की आरती, जो कोई नर गावे।


गावत दाससुनील, मन वान्छित फल पावे।।


ऊँ जय श्रीश्याम हरे, प्रभु जय श्रीश्याम हरे।


निज भक्तन के तुमने पूरण काम करे।।



।।इति आरती श्री श्याम जी की।।


।।जय बोलो खाटू श्याम जी की जय हो।।


।।जय बोलो बंशीधर की जय हो।।


Friday, September 17, 2021

September 17, 2021

श्री बगलामुखी जी की आरती अर्थ सहित(Aarti of Shri Baglamukhi ji With meaning)

                  

श्री बगलामुखी जी की आरती अर्थ सहित(Aarti of Shri Baglamukhi ji With meaning):-श्री बगलामुखी माता को आद्यशक्ति के रूप में जाना जाता है, उनमें समस्त तीनों लोकों में तालमेल करना का सामर्थ्य हैं। इनकी आराधना समस्त देवी-देवता और त्रिदेव करते है। इसलिए श्री बगलामुखी माता को तंत्र-मंत्र करने वाले लोग स्तंभन देवी के रूप में आह्वान करते है। इनकी साधना रात्रिकाल में करने पर शीघ्र होती है। इस तरह माता की आराधना करके अपने जीवनकाल के समस्त शंकाओ का समाधान को प्राप्त कर सकते है। सभी तरह के तांत्रिक क्रियाओं की स्वामिनी है, जो षोड़श रूपों में पूजन किया जाता है। इसलिए देवी बगलामुखी की आरती करके अपने ऊपर किसी तरह के तांत्रिक प्रभाव का असर नहीं होवे। इसके लिए माता का गुणगान आरती के रूप में करना चाहिए।



Aarti of Shri Baglamukhi ji With meaning




दोहा:- बगलामुखी की आरती, पढ़ै सुनै जो कोय।


विनती कुलपति सुनिलजोशी की, सुख-सम्पति सब होय।।


अर्थात्:-जब कोई भी माता बगलामुखी की आरती का वांचन करता हैं, तो हे बगलामुखी माता! सुनिलजोशी आपसे अरदास करता है, की उस मनुष्य को सुख-सम्पत्ति आप प्रदान करके समस्त तरह के कष्टों का निवारण करें।



श्री बगलामुखी माता के प्रकट होने की कथा:-बहुत समय पहले जब चारों ओर सच्चाई का बोलबाला था, उस समय के योग को सतयुग कहते है। उस युग में सम्पूर्ण तीनों लोकों में चारों तरफ उथलपुथल हो रही थी। जिससे समस्त आकाशलोक तहस-नहस होने लगा तब समस्त संसार पर मुसीबत में देखकर श्रीचक्रपाणी जी बहुत ही व्याकुल होकर सोचने लगे कि इस बवंडर को कैसे शांत कर तब उन्होनें भोलेनाथ जी याद आयी उन्होंने भोलेनाथजी को सबकुछ बताया तब भोलेनाथ जी ने कहा कि इस सबको तो सिर्फ आद्य शक्ति ही रोक सकती है आप उनका आह्वान कीजिए। तब श्रीचक्रपाणी ने श्री आद्यशक्ति की बहुत कठिन से कठिन आराधना की थी। वह स्थान हरिद्रा कूल था। तब आद्यशक्ति ने उनको दर्शन दिया था। इस तरह उनकी कठिन आराधना से आद्यशक्ति खुश हुई थी। इस तरह हरिद्रा कूल में विचरण करते हुए उनके शरीर से एक आलोकित आभा स्वरूप एक तेज प्रकट हुआ था। इस आभा युक्त तेजपुंज से समस्त तीनों लोक में शांति हो गई थी। इस तरह से श्री बगलामुखी देवी रात्रिकाल में अपने स्वरूप का दर्शन दिया था और श्रीचक्रपाणी से वरदान मांगने को कहा तब समस्त तीनों लोकों में शांति थी।



जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! मैं आपकी जय-जयकार करता हुवा आपकी आरती करता हूँ। हे माता! आप मेरी अरदास को सुनिए। आप पर्वत पर निवास करने वाली हो। आपको जो अरदास करता है, उसको आप पार लगा देती हो।



पान सुपारी ध्वजा नारियल ले तेरी भेंट चढ़ाया।


पीत वसन तन पर तव सोहै, कुण्डल की छबि न्यारी।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! आपके दर्शन करने आने वाले आपके द्वार पर आपको पान, सुपारी, आपकी प्यारी पताका को लेकर आपको भेंट के रूप में अर्पण करते हैं। आप पीले वस्त्रों को धारण करने हो, देह पर आपके आभूषणों का भंडार और कानों में कुण्डल पहले आपकी छवि बहुत ही निराली एवं मन को मोहित करने वाली हैं।



कर-कमलों में मुद्गर धारै, अस्तुति करहिं सकल नर-नारी।


चम्पक माल गले लहरावे, सुर नर मुनि जय जयति उचारी।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! आपके हाथों में मुद्गर को धारण किये हुए हो, आपकी समस्त नर और नारी आपका गुणगान करते है। आपके गले में चंपा के फूल से बनी माला लहराती है, समस्त नर एवं नारी आपकी जयकार जयति के रूप में करते हैं।



त्रिविध ताप मिटि जात सकल सब, भक्ति सदा तव है सुखकारी।


पालत हरत सृजत तुम जग को, सब जीवन की हो रखवारी।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! तीनों तरह के ताप अर्थात् ज्वर आपके अरदास करने पर मिट जाते हैं, जो भी आपकी भक्ति हमेशा करता है उसको आप समस्त तरह से सुख-सम्पत्ति को देखकर सुखी कर देती हो। जब आप ही समस्त जगत का पालन करती हो और समस्त जगत की रक्षा भी आप ही करती हो।



मोह निशा में भ्रमत सकल जन, करहु हृदय महँ, तुम उजयारी।


तिमिर नशावहु ज्ञान बढ़ावहु, अम्बे तुम्ही हो असुरारी।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! जब मोह-माया में जब मनुष्य भर्मित हो जाता है, तब उनके हृदय में आप जागृति करती हो। उस मनुष्य के जीवन में छाये हुए अंधेरे को आप अपनी शक्ति के द्वारा नष्ट करके ज्ञान का संचार करने वाली हो। आप ही अम्बे माता हो और दैत्यों का संहार करने वाली हो।



सन्तनको सुख सदा देत सदा ही, सब जनकी तुम प्राण पियारी।


तव चरणन जो ध्यान लगावै, ताको हो सब भव-भयहारी।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! आप सज्जन मनुष्य एवं साधु-संतों को सदा ही सुख प्रदान करने वाली हो, आपको तीनों लोकों में निवास करने वालों की प्यारी हो। जो भी आपकी श्रद्धाभाव से ध्यान करता है, उसको आप इस भवसागर से पार करवा देती हो, उसका उद्धार कर देती हो।



प्रेम सहित जो करहिं आरती, ते नर मोक्षधाम अधिकारी।।


अर्थात्:-हे बगलामुखी माता! जो भी आपकी आराधना सच्चे मन से एवं विश्वास से करते है उनका आप उद्धार करके किसी भी योनि से मुक्ति दिलवा देती हो। जो भी मनुष्य आपकी आरती करता है, उसको मनुष्य योनि से मुक्ति दिलवाती हो।




।।अथ आरती श्री बगलामुखी जी की।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


पान सुपारी ध्वजा नारियल ले तेरी भेंट चढ़ाया।


पीत वसन तन पर तव सोहै, कुण्डल की छबि न्यारी।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


कर-कमलों में मुद्गर धारै, अस्तुति करहिं सकल नर-नारी।


चम्पक माल गले लहरावे, सुर नर मुनि जय जयति उचारी।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


त्रिविध ताप मिटि जात सकल सब, भक्ति सदा तव है सुखकारी।


पालत हरत सृजत तुम जग को, सब जीवन की हो रखवारी।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


मोह निशा में भ्रमत सकल जन, करहु हृदय महँ, तुम उजयारी।


तिमिर नशावहु ज्ञान बढ़ावहु, अम्बे तुम्ही हो असुरारी।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


सन्तनको सुख सदा देत सदा ही, सब जनकी तुम प्राण पियारी।


तव चरणन जो ध्यान लगावै, ताको हो सब भव-भयहारी।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।


प्रेम सहित जो करहिं आरती, ते नर मोक्षधाम अधिकारी।।


जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।


सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।।



।।इति श्री बगलामुखी माता की आरती।।



।।जय बोलो माता पर्वतवासिनी जी की जय हो।।