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Wednesday, May 5, 2021

May 05, 2021

एकादशी व्रत कथा और महत्व(Ekadashi fasting story and importance)



एकादशी व्रत कथा और महत्व (Ekadashi fasting story and importance):-पूरे साल में चौबीस एकादशी आती हैं और मल या अधिक मास में दो एकादशी आती हैं, इस तरह छब्बीस एकादशी होती हैं, जो इस तरह है और उनके नाम महीने में आने के हिसाब से निम्नलिखित है-

बारह महीनों की चौबीस एकादशियों के नाम:-बारह महीने में चोबीस एकादशी आती हैं।इस तरह हर महीने में एक एकादशी कृष्णपक्ष की और दूसरी एकादशी शुक्ल पक्ष की आती हैं।इस तरह चोबीस एकादशी होती है,जिनके नाम निम्नांकित है-

1.चैत्र मास की एकादशियां:-

१.चैत्र शुक्लपक्ष पापमोचनी एकादशी।

२.चैत्र कृष्णपक्ष कामदा एकादशी।

2.वैशाख मास की एकादशियां:-

१.वैशाख कृष्णपक्ष वरूथिनी एकादशी।

२.वैशाख शुक्लपक्ष मोहिनी एकादशी।

3.ज्येष्ठ मास की एकादशियां:-

१.ज्येष्ठ कृष्णपक्षअपरा एकादशी।

२.ज्येष्ठ शुक्लपक्ष निर्जला एकादशी।

4.आषाढ़ मास की एकादशियां:-

१.आषाढ़ कृष्णपक्ष योगिनी एकादशी।

२.आषाढ़ शुक्लपक्ष देवशयनी एकादशी।

5.श्रावण मास की एकादशियां:-

१.श्रावण कृष्णपक्ष कामिका(पवित्र) एकादशी।

२.श्रावण शुक्लपक्ष पवित्रा एकादशी।

6.भाद्रपद मास की एकादशियां:-

१.भाद्रपद कृष्णपक्ष अजा एकादशी।

२.भाद्रपद शुक्लपक्ष जलझूलनी एकादशी।

7.आश्विन मास की एकादशियां:-

१.आश्विन कृष्णपक्ष इंदिरा एकादशी।

२.आश्विन शुक्लपक्ष पापांकुशा एकादशी।

8.कार्तिक मास की एकादशियां:-

१.कार्तिक कृष्णपक्ष रमा एकादशी।

२.कार्तिक शुक्लपक्ष देवप्रबोधिनी एकादशी।

9.मार्गशीर्ष मास की एकादशियां:-

१.मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष उत्त्पत्ति या उत्त्पन्ना एकादशी।

२.मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष मोक्षदा एकादशी।

10पौष मास की एकादशियां:-

१.पौष कृष्णपक्ष सफला एकादशी।

२.पौष शुक्लपक्ष पुत्रदा एकादशी।

11.माघ मास की एकादशियां:-

१.माघ कृष्णपक्ष षट्तिला एकादशी।

२.माघ शुक्लपक्ष जया एकादशी।

12.फाल्गुन मास की एकादशियां:-

१.फाल्गुन कृष्णपक्ष विजया एकादशी।

२.फाल्गुन शुक्लपक्ष आमलकी एकादशी।


पुरुषोत्तम मास:-पुरुषोत्तम मास में दो एकादशी होती हैं,एक कृष्णपक्ष पुरुषोत्तम मास की और दूसरी शुक्लपक्ष पुरुषोत्तम मास की होती है,उनको परमा एकादशी और पद्मिनी एकादशी के नाम से जाना जाता हैं, जो नाम के अनुसार फल देने वाली होती हैं।इस तरह बारह महीनों की चोबीस और पुरुषोत्तम मास की दो एकादशियों सहित पूरे साल में कुल छ्ब्बीस एकादशी आती हैं।


एकादशी व्रत की विधि:-एकादशी व्रत की विधि श्रीसूतजी ने ब्राह्मणों को बताई है जो इस तरह है-

श्री सूतजी महाराज ने ब्राह्मणों को कहा :हे ब्राह्मणों ! इस विधि युक्त उत्तम माहात्म्य को श्रीकेशवजी ने कहा था, विशेष कर जो इस व्रत की उत्त्पत्ति भक्ति से सुनते है, वह इस लोक में अनेक तरह के सुख भोगकर अन्त में दुष्प्राप्य विष्णुधाम को पाते है।

पूर्व काल में श्रीकेशवजी भगवान ने धनंजय कौंतेय के प्रति एकादशी व्रत की उत्पत्ति विधि इत्यादि कहि थी सो उन्हीं के कथोपकथन रूप से मैं कहता हूँ।

धनंजय कौंतेय ने पूछा : कि हे मुरलीधर जी! जो रात के समय में उपवास करते हैं तथा जो एक समय ही भोजन को ग्रहण करते है उन्हें किस तरह व कैसा पुण्य मिलता हैं और उस उपवास को करने की विधि-विधान क्या है ?आप से अरदास करता हूँ कि आप कृपया करके मुझे बताने की कृपा कीजिये।

◆इस तरह के धनंजय के वचन को सुनकर श्रीकेशवजी भगवान बोले कि सबसे पहले दशमी तिथि की रात्रि को दन्तधावन करना चाहिए अर्थात् दिन के आठवें प्रहर में जब सूरज भगवान की तेज किरणें कम हो जाती है तब दन्तधावन करना चाहिए।

◆रात के समय में भोजन को ग्रहण नहीं करना चाहिए।

◆उसके बाद फिर प्रातःकाल निश्चित मन को करके मन में व्रत करने का संकल्प करना चाहिए।

◆मध्यान्ह के समय में भी संकल्प करते हुए स्नान करना चाहिए।नदी, सरोवर और वापी कूप आदि में स्नान करना चाहिए।

◆स्नान करने से पूर्व मृत्तिका स्नान अर्थात् मिट्टी का स्नान करना चाहिए।

◆स्नान करने वाले व्रती मनुष्य पापी, चोर, पाखंडों, मिथ्या दूसरों का अपवाद करने वाला देवता, वेद और ब्राह्मणों को निन्दा करने वाला और जो अगम्या गमन करने वाला, दुराचारी दूसरों के धन को चुराने वाले इन समस्तों से बात नहीं करना चाहिए

◆यदि दैवत इनको देखले तो इस पाप को दूर करने के लिए सूर्य देव के दर्शन करना चाहिए।

◆स्नान करने के बाद सादर नैवेद्य आदि को अर्पण करना चाहिए।

◆उस दिन निद्रा और सहवास नहीं करना चाहिए।

◆दिन और रात के समय नाच-गायन आदि सदवार्ता से दिन और रात के समय को बिताना चाहिए।

◆भक्ति युक्त होकर अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा को देना चाहिए और ब्राह्मणों को प्रणाम करते हुए अपने द्वारा की गई त्रुटि या भूल के लिए क्षमा की अरदास करनी चाहिए।


अर्जुन ने पूछा : हे देव! आप इस तीर्थ को सब तीर्थों से श्रेष्ठ तथा पवित्र कहते है।इसमें क्या कारण है?

भगवान ने कहा कि :हे धनंजय सुुुुनो !मैं तुम्हें एकादशी की उत्पति के बारे में बताता हूँ तुम ध्यानपूर्वक मन को एक जगह पर स्थिर करके सुनना।

श्रीकृष्णजी के द्वारा मधुर वाणी से एकादशी उत्त्पति की पौराणिक कथा:-पहले सतयुग में मुर नामक एक भयंकर राक्षस था जिसके डर से सभी देवता भयभीत राक्षस थे। उसने इंद्र आदि सभी देवताओं को जीतकर उन्हें उनके स्थान से भ्रष्ट कर दिया था।

तब इंद्र ने महादेवजी से कहा: कि हम लोग इस समय मुर दैत्य के अत्याचार से पीड़ित होकर मृत्युलोक में अपना काल बिता रहे हैं और देवताओं की दशा तो कहीं नहीं जाती है सो कृपा करके इस दुःख से छूटने का उपाय बतलाइये।

श्रीमहादेवजी ने कहा :कि देवो के राजा इंद्र आप भगवान विष्णु के पास जाइये।महादेवजी के वचन सुनकर देवराज इंद्र देवताओं को साथ लेकर क्षीर सागर में जहां जगत्पति जनार्दनजी सोये थे,वहाँ गये।

भगवान को सोये देखकर इंद्र ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की-हे देवताओं के देव ! हे देवपुजित ! आपको नमस्कार है।दैत्यों के नाशक मधुसूदनजी ! हे पुण्डरीकाक्ष !दैत्यों से डरकर सब देवता मेरे साथ आपकी शरण में आए है।

आप हम लोगों की रक्षा करे। आप इस जगत् के स्थितिकर्ता, उत्पत्तिकर्ता और संहारकर्ता है।आप देवताओं के सहायक है तथा उन्हें सुखकर्ता, उत्पत्तिकर्ता औदेने वाले है। आप पृथिवी है, आकाश है और संसार के प्राणियों के उपकारक है। 

आप ही संसार है तथा सम्पूर्ण त्रैलोक्य की रक्षा करने वालेे है।आप देवताओं के सहायक है और सुख देने वाले है।आप ही सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, हव्य, मन्त्र, तन्त्र, यजमान,यज्ञ और समस्त कर्म फल भोक्ता ईश्वर भी है।इस सम्पूर्ण जगत् में इस कोई स्थान नहीं हैं जहाँ आप न होवे। 

हे शरणदः। आये हुओ के रक्षक है।हे देव-देव भगवान!आप हम लोगों की रक्षा करे।इस समय दानवों ने देवताओं को जीत लिया है और उन्हें स्वर्ग से निकल दिया हैं अब देवता लोग अपने स्थान को छोड़कर भूमिलोक में भटकते हुए मारे-मारे फिर रहे है।

आप ही हम सब देवताओं की रक्षा कर सकते है और हमें पुनः स्वर्गलोग दिलवा सकते है। हम सब आपकी शरण में आये है।

इस तरह की करुण स्वर देवराज इंद्र के सुनकर भगवान विष्णुजी ने कहा- हे देवराज इंद्र !वह कौन सा असुर है? जिसने स्वर्गलोग को जीतकर आपको स्वर्गलोक से बाहर निकाल दिया है।वह किस जगह पर रहता है,उस राक्षस का नाम क्या है और उस राक्षस में ताकत कितनी है? हे इंद्रराज !यह सब आप मुझे पुरा विवरण देवे और उस राक्षस के बारे में पूर्ण जानकारी करवाये और उस राक्षस का डर अपने मन से निकाल देवे।

इस तरह भगवान विष्णुजी के द्वारा सांत्वना देने के बाद इंद्रदेव बोले-हे देवों के देव विष्णुजी! पूर्व में एक विशाल भारी-भरकम नाड़ीजंघ नाम का राक्षस था।उसकी उत्पत्ति ब्रह्मकुल में हुई थी और वह नाड़ीजंघ को मिली ताकत से वह अपनी ताकत के घमंड से घमंडी होकर देवों को हमेशा अपनी ताकत से कष्ट पहुंचाने लगा।इस सब तरह वह देवों को कष्ट देता रहता था।

उसी नाड़ीजंघ के एक पुत्र हुआ उसका नाम मरु राक्षस रखा गया।उस मरु राक्षस ने अपना एक राज्य स्थापित किया उस राज्य की राजधानी चन्द्रावती थी।चन्द्रावती नगर बहुत सुंदर और मन को मोह लेना वाला था।

वह मरु राक्षस अपने तेज वीर्य से सभी संसार को जीत लिया और सभी संसार को जीत लेने के बाद उसने देवताओं को स्वर्गलोक से बाहर निकाल दिया,उस पर स्वर्गलोग पर अपना अधिकार कर लिया उसके बाद उसने इंद्र, अग्नि, यम, वरुण और चन्द्रमा आदि लोकपाल स्वयं को बना दिया और स्वयं सूर्य बनकर पुराए संसार को अपने ताप से तपा रहा है।

खुद पर्जन्य या बादल बन गया है।इस कारण से देवताओं को कष्ट पहुंचाने वाले और सब को हैरान करने वाले मरू राक्षस को आप वध करके देवताओं को उसके द्वारा जीता हुआ स्वर्गलोग को दिलवाये।

इस तरह देवराज इंद्र के स्वरों को सुनकर भगवान विष्णुजी बहुत ही क्रोधित हुए और इंद्रदेव से कहा कि-हे देवराज इंद्र! अब आप सभी देवताओं को उस राक्षस के डर से जल्दी ही मुक्ति मिलेगी।उस मरु राक्षस को हमेशा के लिए नष्ट करूँगा और हे बलशाली देवों। आप सभी लोग मिलकर चन्द्रावती नगरी को जाओ।

इस तरह भगवान विष्णुजी भी उन सभी देवों के पीछे-पीछे चलते हुए चन्द्रावती नगरी में पहुंचते हैं,जब उस नगर में भगवान पहुंकर वहां जाकर देखते है कि दैत्याधिप मुरू अपने बहुत से राक्षसों से युक्त होकर संग्राम भूमि में तेज आवाज के साथ चीला रहा था।युद्ध शुरू होने पर असंख्यात सहस्त्र राक्षस दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर लड़ने लगे।अंत में देवता लोग दानवों से लड़ नहीं सके,तब दैत्यों ने देखा कि चक्रपाणि भगवान विष्णुजी रणभूमि में उपस्थित है।

उन्हें देखकर बहुत दैत्य अस्त्र-शस्त्र से भगवान पर टूट पड़े।जब भगवान ने देखा कि देवता भाग गए है तब शंख, चक्र, गदाधारी भगवान अस्त्र-शस्त्रों से राक्षसों को मारने लगे।उन पर सर्प समान अस्त्रों से विद्ध अनेक दांव इस लोक से चिरदिन के लिए प्रस्थित हुए परन्तु दैत्याधिप निश्चलभाव से युद्ध करता रहा।

भगवान जिन-जिन अस्त्रों का प्रयोग उस पर करे वह सब उसके तेज से कुण्ठित होकर पुष्प के समान उसके अंगों में मालूम पड़ते थे।अनेक शस्त्रों के प्रयोग करने पर भी जब भगवान उसको जीत नहीं सके तो तब क्रोधित होकर परिघ तुल्य बाहुओं से मल्ल युद्ध करने लगे।देवताओं के हजार वर्ष भगवान ने उससे युद्ध किया लेकिन वह हारा नहीं।

तब भगवान शांत होकर विश्राम करने की इच्छा से बद्रिकाश्रम चले गए। वहां अवतालिस कोस की लम्बाई में विस्तृत और एक द्वार युक्त हेमवती नामक गुफा में शयन करने के अर्थ से भगवान ने प्रवेश किया।

हे सेव्यसाची ! मैं उस गुफा जब सोया हुआ था।वह मुरू दैत्य भी मेरे पीछे-पीछे उस गुफा में चला आया और मुझे सोता हुआ देखकर मुझे मारने के लिए तैयार हुआ।वह समझता था कि आज मैं दानवों के चिर शत्रु इनको मारकर उन्हें निष्कण्टक बनाऊँ।

उसी समय मेरे शरीर से बहुत ही सुंदर सुंदरी दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को लिए एक कन्या उत्पन्न होकर उस दानवराज के सम्मुख युद्ध के लिए उपस्थित हुई।उस सुंदर कन्या ने उस मुरू दानवेन्द्र को कहा मुझसे युद्ध कर और वह युद्ध करने लगी।उस युद्ध में उस कन्या की निपुणता देखकर मुरू दैत्य सोचने लगा कि इस रुद्रास्वरुओ स्त्री को किसने बनाया जिसके बाण बज्र के समान है।

पुनः उन दोनों में घमासान युद्ध शुरू हुआ।इस मुहूर्त में ही उस कन्या ने दानवराज के अस्त्र-शस्त्रों को काटकर उसे रथहीन कर दिया।वह दांव विरत और निःशस्त्र होकर आक्रमण करने के लिए दौड़ा परन्तु भगवती ने उसे आते हुए देखकर उसे मुष्टिक मारकर जमीन पर गिरा दिया।

पुनः उठकर कन्या को मारने की इच्छा से दौड़ा, उसे आते देखकर भगवती ने उसका सिर धड़ से अलग करके उसे यमलोक को भेज दिया और उसके साथी भयभीत होकर पाताललोक को चलेगये।तब भगवान उठे और सामने हाथ जोड़ खड़ी हुई उस कन्या को देखकर परम् खुश हुए और बोले कि सम्पूर्ण देव गन्धर्व नाग लोकेश सभी को जीतने वाले इस दुष्ट दांव को रण में किसने मारा है?जिसके डर से मैंने इस कन्दरा का आश्रय लिया था।सो किसने कृपाकर मेरी रक्षा की है।

कन्या ने उत्तर दिया कि-हे प्रभो!आपको सोया हुआ देखकर वह राक्षस आपको मारना चाहता था कि आपके अंश से उत्पन्न हुई मैनें ही इस दैत्य का संहार करके देवताओं को निर्भय किया है।मैं सर्व शुभ दमन्कारिणीअपकि ही महाशक्ति हूँ।हे प्रभु ! आप बतलाइये की इसके मारने से आपको क्यो आश्चर्य हो रहा है ?

भगवान बोले कि- हे निष्पाप! इस दानव को मारने से तुमसे मैं बहुत ही खुश हूँ इस समय समस्त देवता भी बहुत हर्षित हो गए है और तीनों लोकों में इस समय आनन्द छा रहा है।अतएव निस्संकोच होकर तुम्हारी जो इच्छा हो सो वर मांगो।याद रखों की देवताओं को दुर्लभ वर भी तुम मांगोगी तो तुम्हें मैं दूंगा।

कन्या बोली कि भगवान !यदि आप मुझ पर खुश है और यदि मुझे वर देना चाहते है तो मुझे वह वर  दीजिए कि यदि कोई उपवास करे तो मैं उसके सभी पापों से उसे तारने में समर्थ होउँ और उपवास से जो पुण्य होता है उससे आधा रात्रि भोजन में होने और उसका आधा पुण्य एक संध्या में भोजन करने वालो को हो।जो मेरे दिन को जितेन्द्रिय भक्ति युक्त होकर उपवास करे सो विष्णुलोक को प्राप्त होवे और अनेक कोटि वर्ष तक वह वहां अनन्त सुख भोग करे। भगवन् !यदि आप खुश है,तो यही वर दीजिए। 

यह सुनकर भगवान बोले कि: हे कल्याणी!जो तुम कहती हो वह सत्य होवे।जो हमारे और आपके भक्त है उनकी कीर्ति जगत् में प्रसिद्ध होगी तथा वे मेरे समीप वास करेंगे।हे मेरी उत्तम शक्ति तुम एकादशी तिथि को उत्पन्न हुई हो इस कारण तुम्हारा नाम भी एकादशी होगा।


एकादशी का महत्व:-शुक्ल पक्ष की और  कृष्णपक्ष की एकादशी दोनों धार्मिको के लिए समान होती हैं, इन दोनों पक्षों की एकादशी में भेद बुद्धि ठीक नहीं हैं।

◆इस तरह जो एकादशी का व्रत करते हैं, उन मनुष्यों को शंखों शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन से जो पुण्य होता हैं,वह एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवें हिस्से के भी बराबर नहीं है,व्यतिपात योग में संक्रांति समय में, चन्द्र-सूर्य ग्रहण में, कुरुक्षेत्र में स्नान से जो फल प्राप्त होता है, वह सब एकादशी के व्रत करने से मनुष्य को प्राप्त होता है।

◆अश्वमेघ यज्ञ करने से जो फल होता है उससे सौ गुना अधिक पुण्य एकादशी व्रत को करने से मिलता है जिस मनुष्य एक सहस्त्र तपस्वी साठ हजार साल भोजन करे,उसे जो पुण्य मिलता है सो एकादशी व्रत से भी होता है।

◆वेद में वेदांग पूर्ण ब्राह्मण को एक हजार गौदान करने से जो पुण्य होता हैं,उससे दस गुना अधिक पुण्य एकादशी व्रत से होता है।

◆दस उत्तम ब्राह्मणों मो भोजन करने से जो पुण्य होता है, उससे दस गुना अधिक पुण्य एकादशी व्रत से होता है।

◆दस उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य होता है उससे दस गुना अधिक ब्रहाचारियो के भोजन से होता है।

◆इससे हजार गुना अधिक कन्या और भूमिदान से पुण्य है इससे दस गुना अधिक विद्यादान से पुण्य है,विद्यादान से दस गुना अधिक पुण्य भूखे को अन्न देने से होता है।

◆अन्न दान के बराबर और दूसरा पुण्य नहीं है। 

◆इसके द्वारा स्वर्गीय पितर तृप्त होते है इसके पुण्य का प्रभाव देवताओं को भी जानना दुर्लभ है।

◆नत्तव्रत करने का आधा फल एक भुक्त व्रत से होता है।एकादशी को इनमे से कोई करना चाहिए।तीर्थ तभी तक गर्जना करते है,दान नियम यम अपने फल को तभी तक घोषणा करत है,यज्ञों का फल तभी तक है।

◆जब तक कि दस एकादशी प्राप्त नहीं हुई है।इस कारण अवश्य एकादशी व्रत करना चाहिए।

◆शंख से जल नहीं पीना चाहिए।

◆मछली और सुआ नहीं खाना चाहिए और अन्न नही खाना चाहिए, एक एकादशी के समान हजार यज्ञ भी नही है।

एकादशी तिथि के दिन उपवास करने वाले के सम्पूर्ण पापो को दूर कर मैं उन्हें उत्तम गति दूंगा।विशेष कर अष्टमी,चतुर्दशी एकादशी ये तिथियाँ मुझे बहुत ही प्यारी है।

हे पार्थ! सब तीर्थों से सब दानों से,सब व्रतों से अधिक पुण्य एकादशी तिथि में है।

◆विष्णु भगवान इतना वर देखे वही अंतर्ध्यान हो गए और एकादशी तिथि भी वर पाकर परम् सन्तुष्ट तथा हर्षित हुई। हे धनंजय!जो मनुष्य एकादशी का व्रत करते है,मैं उनके शत्रुओं को नाश करके अवश्य उत्तम फल देता हूँ।इस तरह एकादशी की उत्पत्ति हुई है।

◆यह नित्य एकादशी व्रत सब पापी को नाश करने वाला है। सब पापो को दूर करने वाला और सभी तरह के मन की इच्छाओं को सिद्ध करने के लिए यह एक तिथि प्रसिद्ध है।

◆शुक्ल पक्ष की एकादशी अथवा कृष्णपक्ष की एकादशी इन दोनों में भेद करना उचित नहीं है।दोनों समान है।

◆जो एकादशी का माहात्म्य जो हमेशा सुनता या पाठ करते है उन्हें अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।

◆जो विष्णुपरायण मनुष्य दिन-रात विष्णुजी के द्वारा विष्णुजी की कथा सुनते ही वह अनेक कोटि पुरुष के साथ विष्णुलोक में जाकर पूजित होते है।

◆जो एकादशी माहात्म्य का चतुर्थांश भी सुनते ही उसको ब्रह्म हत्यादिक पाप छूट जाते है। विष्णुधर्म नहीं है और एकादशी व्रत के समान दूसरा व्रत नहीं है।


  

Wednesday, April 7, 2021

April 07, 2021

पद्मिनी एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व(Padmini Ekadashi fasting method, story and importance)




पद्मिनी एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व(Padmini Ekadashi fasting method, story and importance):-

            (मल मास शुक्लपक्ष एकादशी)

धनंजय कौंतेय ने पूछा : -हे श्रीकेशवजी।आप से निवेदन करता हूँ कि आप अधिक(लौंद या मल या पुरुषोत्तम) महीने में आने वाली एकादशी के बारे में बताएं।मल महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी को क्या नाम से जाना जाता हैं, एकादशी की व्रत की विधि-विधान क्या हैं, इस एकादशी के व्रत में कौनसे देवता की पूजा-अर्चना की जाती हैं और इस एकादशी के व्रत को करने से क्या-क्या फल की प्राप्ति होती हैं?

श्रीमुरलीधरजी ने कहा : हे धनंजय।मल महीने में आने वाली एकादशी अनेक तरह के पुण्यों के फलों को प्रदान करने वाली होती हैं,उस एकादशी को 'पद्मिनी'के नाम से जाना जाता है।इस मल मास की पद्मिनी एकादशी के व्रत को करने व्रती को विष्णुधाम की प्राप्ति होती है।पद्मिनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से अनेक तरह के किये हुए पापों से मुक्ति मिलती है,जीवन की गति से मुक्ति मिलकर मोक्ष की प्राप्ति होती हैं और भगवान के प्रति भक्ति भाव को देने वाली होती हैं।

इसलिए धनंजय पद्मिनी एकादशी के फल और गुणों को ध्यानपूर्वक मन को एक जगह पर स्थिर करके सुनो:


पद्मिनी एकादशी व्रत करने की विधि-विधान के नियम:-     

पद्मिनी एकादशी के व्रत को करने वालों को एक दिन पूर्व अर्थात् दशमी तिथि के दिन से व्रत को शुरू करना चाहिए।

एकादशी तिथि के दिन सवेरे जल्दी उठकर अपनी दैनिकचर्या को पूरा करके स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र को पहनकर मन ही मन भगवान के गुणगान करना चाहिए।

उसके बाद पुण्य-पावन जगह पर जाना चाहिए।

उस समय गोबर,मृत्तिका,तिल, कुश और आमलकी चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।

स्नान करने से पूर्व देह पर मिट्टी लगाते समय उस मिट्टी से अरदास करनी चाहिए :हे मृत्तिके। मैं तुमको नमस्कार करता हूँ।तुम्हारे स्पर्श से मेरी देह पवित्र हो।समस्त औषधियों से पैदा हुई और पृथ्वी को पवित्र करने वाली,तुम मुझे शुद्ध करो।ब्रह्मा के थूक से पैदा होने वाली।तुम मेरे शरीर को छूकर मुझे पवित्र करो।हे शंख चक्र गदाधारी देवों के देव। चक्रपाणि जी।आप मुझे स्नान करने की आज्ञा दीजिये।'

इसके बाद वरुण मन्त्र ऊँ वरूणाय नमः मन्त्र का जाप करते हुए पवित्र तीर्थों के अभाव में उनका स्मरण करते हुए किसी भी तालाब में स्नान करना चाहिए।

स्नान के बाद स्वच्छ और सुंदर वस्त्र को पहनकर संध्या को तर्पण करके मन्दिर में जाकर भगवान की धूप,दीप, नैवेद्य,फूल,केसर आदि से पूजा-आराधना करनी चाहिए।

उसकेबाद में भगवान के सामने नाच-गायन आदि करना चाहिए। 

भक्तजनों के साथ भगवान के सम्मुख पुराण की कथा सुननी चाहिए।

अधिक महीने के शुक्लपक्ष की पद्मिनी एकादशी का व्रत बिना जल को पियें करना चाहिए।

यदि व्रत करने वाले व्रती को जल के बिना व्रत करने की शक्ति नहीं होने पर जल पी सकते है या ज्यादा भूख सहन नहीं होने पर थोड़ा आहार ग्रहण करते हुए व्रत करना चाहिए।

रात्रिकाल में जागते हुए भगवान का गुणगान करते हुए नाच-गायन करना चाहिए।

हर प्रहर में व्रत करने वाले व्रती को भगवान या महादेवजी की पूजा करनी चाहिए।

पहले प्रहर में भगवान को नारियल, दूसर प्रहर में बिल्वफल, तीसरे प्रहर में सीताफल और चौथे प्रहर में सुपारी, नारंगी आदि फल को अर्पित करना चाहिए।

इससे पूर्व पहले प्रहर में अग्नि होम,दूसरे प्रहर में वाजपेय यज्ञ, तीसरे प्रहर में अश्वमेघ यज्ञ का और चौथे प्रहर में राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं।

इस व्रत से बढ़कर जगत् में कोई भी यज्ञ, तप,दान या पुण्य नहीं होता हैं।

एकादशी के व्रत से एकादशी व्रत को करने वाले व्रती को सभी तीर्थों और यज्ञों का फल प्राप्त होता हैं।

इस प्रकार सूर्य के उदय होने तक जागते हुए जागरण करना चाहिए।

उसके बाद प्रातःकाल अपनी दैनिकचर्या स्नानादि से निवृत होकर ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए।

इस तरह जो कोई भी मनुष्य इस विधि-विधानपूर्वक भगवान की पूजा करते हुए व्रत को करता है,उस मनुष्य का जन्म सफल हो जाता है और वें इस लोक में अनेक तरह के सुखों को भोगकर अन्त में भगवान विष्णुजी के विष्णुधाम को प्राप्त करता हैं।हे धनंजय।मैंने तुम्हें एकादशी के व्रत का पूरा विधि-विधान बता दिया हैं।

अब जो 'पद्मिनी एकादशी' का भक्तिपूर्वक व्रत कर चुके है,उनकी कथा कहता हूँ, तुम मन को एक जगह केंद्रित करके ध्यानपूर्वक सुनो।यह सुन्दर कथा ऋषिवर पुलस्त्यजी ने नारदजी को सुनाई थी।

पद्मिनी एकादशी व्रत की पौराणिक पुलस्त्यजी के द्वारा सुनाई हुए कथा:-एक समय पूर्व में कार्तवीर्य ने रावण को अपने बन्दीगृह में कैद कर लिया।उसे मुनिवर पुलस्त्यजी ने कार्तवीर्य से विनय करके छुड़ाया।

इस घटना को सुनने के बाद नारदजी ने पुलस्त्यजी से पूछा: 'हे ऋषिवर। उस मायावी रावण को जिसने समस्त देवताओं सहित इंद्रदेव को भी जीत लिया था,कार्तवीर्य ने किस तरह जीत,सो आप से निवेदन करता हूँ कि आप मुझे विस्तारपूर्वक समझाइये।

इस पर ऋषिवर पुलस्त्यजी ने कहा : 'हे नारदजी। पहले कीर्तिवीर्य नाम का एक राजा राज्य करता था।उस राजा के सौ स्त्रीयाँ थीं।उन सभी पत्नियों से राजा कीर्त्तवीर्य को उसके राज्य को सँभालने के योग्य कोई पुत्र सन्तान नहीं हुआ।तब राजा किर्त्तवीर्य ने सम्मानपूर्वक ज्ञानी ब्राह्मण पण्डितों को बुलवाया और पुत्र प्राप्त करने के लिए उन ब्राह्मण पण्डितों से उपाय पूछा।

तब पण्डितों ने राजा को कहा : हे राजन्।आपको पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्र कामेष्ठी यज्ञ को करना चाहिए, जिससे आपको पुत्र की प्राप्ति अवश्य होगी।इस पर राजा ने अपने सेवकों को आदेश देककर पुत्र कामेष्ठी यज्ञ की तैयारी शुरू करवाई।नियत तिथि के दिन पुत्र कामेष्ठी यज्ञ को किया गया,जब यज्ञ पूरा हुआ तब भी राजा को इस यज्ञ से भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई और निराशा हाथ लगी।

राजा को सभी तरह से निराशा मिलने से राजा बहुत ही चिंतित हो गए।जिस तरह दुःखी मनुष्य को भोग नीरस मालूम पड़ते है,उसी तरह राजा किर्त्तवीर्य को अपना राज्य पुत्र के बिना दुःखमय प्रतीत होता था।अंत में राजा निराश होकर तप के द्वारा सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए वन को चले गए,जिससे तप के फल से उनको पुत्र की प्राप्ति हो जावे।

राजा हरिश्चंद्र की पुत्री जो कि राजा किर्त्तवीर्य की पत्नी थी,वह भी अपने सभी सोने व हीरे-जेवरातों के आभूषण और अच्छे-अच्छे वस्त्रों को त्यागकर अपने पति के साथ गन्धमादन पर्वत पर चली गयी।उस जगह पर इन दोनों ने दश हजार वर्ष तक तपस्या की परंतु सिद्धि प्राप्त न हो सकी।राजा के शरीर में केवल मात्र हड्डिया ही शेष रह गयी थी।

यह देखकर प्रमदा ने विनय सहित महासती अनसुइया से पूछा : मेरे पतिदेव को तपस्या करते हुए दस हजार वर्ष बीत गए,परन्तु अभी तक भगवान खुश नहीं हुए हैं,जिससे मुझे पुत्र की प्राप्ति हो सके।इसका क्या कारण हैं?

इस पर अनसुइया ने कहा :कि अधिक (लौंद या मल) मास में जो कि छत्तीस महीने के बाद आता हैं,उसमें दो एकादशी होती हैं।इसमें शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम 'पद्मिनी और कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम 'परमा' हैं।उसके व्रत और जागरण करने से भगवान तुम्हें अवश्य ही पुत्र की प्राप्ति होगी।इसके बाद अनसुइया ने व्रत की विधि को बतलायी।रानी प्रमदा ने अनसुइया के द्वारा बताई गई विधु के अनुसार के पद्मिनी एकादशी का व्रत किया और रात्रि में जागरण किया।इस व्रत के प्रभाव से भगवान उस पर बहुत ही खुश हुए और वरदान माँगने को कहा।

रानी प्रमदा ने भगवान से कहा :हे देव। आप यदि मेरे द्वारा किये गए व्रत से खुश है और मुझे वरदान देना चाहते होतो आप यह वरदान मेरे पति को दीजिये।

प्रमदा की बात को सुनकर भगवान विष्णुजी बोले : 'हे प्रमदे !मल मास (लौंद) मुझे बहुत ही प्रिय हैं।उसमें भी एकादशी तिथि मुझे सबसे अधिक प्रिय है। इस एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण तुमने विधिपूर्वक किया,इसलिए मैं तुम पर अत्यंत खुश हूँ।'इतना कहकर भगवान विष्णुजी राजा से बोले : 'हे राजेन्द्र !तुम अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगों।क्योंकि तुम्हारी पत्नी ने एकादशी के व्रत को करके मुझे खुश किया हैं।

भगवान विष्णुजी की मधुर वाणी को सुनकर राजा किर्त्तवीर्य बोला : 'हे भगवन् !आप मुझे सबसे श्रेष्ठ,सबके द्वारा पूजित तथा आपके अलावा देव,दांव,मनुष्य आदि से अजेय उत्तम पुत्र दीजिये।इसके बाद भगवान विष्णुजी ने तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गए।उसके बाद ये दोनों अपने राज्य को वापस आ गये।उन्हीं के यहाँ कार्तवीर्य उत्पन्न हुए थे।वे भगवान के अतिरिक्त सबसे अजेय थे।इन्होंने रावण को जीत लिया था।यह सब 'पद्मिनी एकादशी के व्रत के प्रभाव से हुआ था। इतना कहकर पुलस्त्यजी वहाँ से चले गये।

भगवान श्रीमाधव जी कहा ने:हे पाण्डुनन्दन अर्जुन ! यह मैनें अधिक (लौंद या मल या पुरुषोत्तम) मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत कहा हैं।जो मनुष्य इस एकादशी के व्रत को करता हैं,वह विष्णुधाम को जाता हैं।




Sunday, March 28, 2021

March 28, 2021

देवझूलनी एकादशी व्रत विधि,कथा और महत्व(Devjhulani Ekadashi fasting method, story and importance)



देवझूलनी एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व (Devjhulani Ekadashi fasting method, story and importance):-भाद्रपद शुक्लपक्ष की एकादशी को  देवउठनी एकादशी भी कहते है।भगवान की प्रतिमा या मूर्ति को नदी या तालाब में स्नान कराकर फिर से स्थापित किया जाता है, इसलिए इस एकादशी को देवझूलनी एकादशी कहते है।

देवझूलनी एकादशी व्रत विधि:-इस दिन सभी मंदिर के देवता को असवारी (पालकी) में बैठाकर तालाब में स्नान कराकर लाते हैं।इसे रेवाड़ी निकलना भी कहते है।

◆इस व्रत करने वालो को प्रातःकाल जल्दी उठकर अपनी दैनिकचर्या से निवृत होकर स्वच्छ कपड़े पहनना चाहिए।

◆देवझूलनी एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर व्रत को करने का मन ही मन में संकल्प करना चाहिए और पूजा भी करनी चाहिए।

◆रात के समय में भगवान विष्णुजी की प्रतिमा या मूर्ति के सामने गीत, नृत्य, कथा आदि का कीर्तन करते हुए रात्रि को बिताना चाहिए।

◆देवझूलनी एकादशी के दिन अनार, फूल, धूप आदि से भगवान श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

◆भगवान श्रीविष्णुजी को अर्ध्य अर्पण करना चाहिए।इसका फल तीर्थ और दान आदि से करोड़ गुना अधिक होता हैं।

◆जो गुलाब के फूल से बकुल और अशोक के फूलों से, सफेद और लाल कनेर के फूलों से, दूर्वादल से, शमीपत्र से, चम्पक पुष्प से भगवान श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना करते हैं,वे आवागमन के चक्र से छूट जाते है।इस तरह रात्रि में भगवान की पूजा करके प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए।

◆उसके बाद अपने गुरु देव की पूजा करनी चाहिए और सदाचारी और पवित्र ब्राह्मणों को अपने सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करके अपना व्रत को छोड़ना चाहिए।

◆इस दिन यशोदा माता को जलवा पूजाते हैं।

◆गौ त्रिरात के वास इस दिन से करते हैं।

◆एकादशी से वास शुरू करके पूनम को पारना करते है।


देवझूलनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-पुराने समय एक राजा एक राज्य पर शासन करता था।उस राजा के राज्य में सभी प्रजा सुखी थी।उसके राज्य में एकादशी को कोई भी अन्न नहीं बेचता था।सभी फलाहार करते थे।एक बार भगवान ने राजा की परीक्षा लेनी चाही।भगवान ने एक सुन्दरी का रूप धारण किया तथा सड़क पर बैठ गए।तभी राजा उधर से निकला और सुन्दरी को देखकर चकित रह गया।

उसने पूछा-हे सुन्दरी! तुम कौन हो और इस तरह यहां क्यों बैठी हो?तब सुंदर स्त्री बने भगवान बोले-मैं निराश्रिता हूँ।नगर में मेरा कोई जाना-पहचाना नहीं हैं।किससे सहायता मांगू?राजा उसके रूप पर मोहित हो गया था। वह बोला-तुम मेरे महल में चलकर मेरी रानी बनकर रहो।

सुन्दरी बोली-मैं तुम्हारी बात नहीं मानूंगी।लेकिन तुम्हें राज्य का अधिकार मुझे सौंपना होगा।राज्य पर पूर्ण अधिकार होगा।मैं जो भी बनाऊंगी, तुम्हें खाना होगा।राजा उसके रूप पर मोहित था। अतः उसने उसकी सभी शर्तें स्वीकार कर ली।अगले दिन एकादशी थी।रानी ने हुक्म दिया कि बाजारों में अन्य दिनों की तरह ही अन्न बेचा जाए।उसने घर में मांस-मछली आदि पकवाए तथा परोसकर राजा को खाने को कहा।यह सब देखकर राजा बोला-रानी! आज एकादशी हैं।मैं तो फलाहार ही करूँगा।तब रानी ने शर्त की याद दिलवाई और बोली या तो खाना खाओ,नहीं तो मैं बड़े राजकुमार का सिर काट लूंगी।

राजा ने अपनी स्थिति बड़ी रानी से कही तो वह बोली-महाराज! धर्म मत छोड़ो।बड़े राजकुमार का सिर दे दो।पुत्र तो फिर मिल जाएगा,लेकिन धर्म नहीं मिलेगा।इस दौरान बड़ा राजकुमार खेलकर आ गया।मां की आंखों में आंसु देखकर वह रोने का कारण पूछने लगा तो मां ने उसे सारी वस्तु स्थिति बता दी।

तब वह बोला- मैं सिर देने के लिये तैयार हूँ।पिताजी के धर्म की रक्षा जरूर होगी।राजा दुःखी मन से राजकुमार का सिर देने को तैयार हुआ तो रानी के रूप में भगवान श्रीविष्णुजी प्रकट होकर सच्ची बात बतायी-राजन्!तुम इस कठिन परीक्षा में पास हुए।

भगवान ने प्रसन्न मन से उससे वर मांगने को कहा तो राजा बोला-आपका दिया हुआ सब कुछ है।हमारा उद्धार करें। उसी समय वहां एक विमान उतरा।राजा अपना रानी पुत्र को सौंप दिया और विमान में बैठकर परमधाम को चले गये।


देवझूलनी एकादशी व्रत का महत्व:-जो मनुष्य 'देवझूलनी एकादशी के दिन विधिपूर्वक व्रत करते है, उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अंत में मृत्यु के बाद स्वर्गलोग की प्राप्ति होती है।

◆जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना संभव नहीं हैं, वही वस्तु एकादशी के व्रत से मिल जाती है।

◆इस एकादशी के व्रत को करने से व्रत के असरस्वरूप पहले जन्म में किये गये अनेक तरह के बुरे कर्म से मुक्ति मिल जाती है और बुरे कार्य खत्म हो जाते है। 

◆जो मनुष्य इस एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक थोड़ा भी पुण्य का कार्य करता है,उनका वह पुण्य पर्वत की तरह स्थिर हो जाता है।उस व्रत करने वाले के पितृ विष्णुधाम को प्राप्त हो जाते है।

◆ब्रह्महत्या आदि जघन्य महान पाप कर्म भी इस एकादशी के दिन रात के समय में जागरण करने से भी नष्ट हो जाते है।

◆मनुष्य को भगवान की खुशी के लिए इस एकादशी का व्रत को जरूर करना चाहिए।

◆जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत करता है उस मनुष्य को यह एकादशी अपने प्रभाव से धनवान,योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बना देती है,क्योंकि यह एकादशी भगवान श्रीविष्णुजी को बहुत प्यारी होती है।

◆इस एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ (भगवान्नामजप भी परम यज्ञ है। 'यज्ञानां जपयज्ञोअस्मि'। यज्ञों में जपयज्ञ मेरा ही स्वरूप हैं।'-श्रीमद्भगवद्गीता) आदि करते हैं,उन्हें अक्षय पुण्य मिलता हैं।


Saturday, March 27, 2021

March 27, 2021

देवप्रबोधिनी एकादशी व्रत विधि,कथा और महत्व(Devprabodhini Ekadashi fasting method, story and importance)

               


देवप्रबोधिनी एकादशी व्रत विधि,कथा और महत्व(Devprabodhini Ekadashi fasting method,story and importance):-(कार्तिक शुक्ल एकादशी):-कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवप्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।इस एकादशी को देवोत्थानी एकादशी भी कहते हैं।मारवाड़ी में इस एकादशी को देवउठनी एकादशी भी कहते हैं।ऐसा कहा जाता हैं कि इस दिन भगवान श्रीविष्णुजी क्षीर सागर में सोए हुए थे,चार माह के बाद जागते थे।श्रीविष्णुजी के शयनकाल के चार मासों में वैवाहिक मांगलिक कार्यों का आयोजन करना निषेध हैं।

देवप्रबोधिनी एकादशी व्रत की विधि:-हरि के जागने के बाद से ही सभी मांगलिक कार्य शुरू किए जाते है।

भगवान श्रीकेशवजी ने कहा : हे धनंजय कौंतेय । मैं तुनको जीवन के आने-जाने से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी व्रत के बारे में बताता हूँ तुम अपने मन को एक जगह पर स्थिर रखकर ध्यान पूर्वक सुनना।कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष में आने वाली एकादशी को 'प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।इस  'प्रबोधिनी एकादशी' के बारे में ब्रह्माजी को नारदजी ने पूछने पर बताया था। वहीं वार्तालाप को सुनता हूँ।

प्रबोधिनी एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर व्रत को करने का मन ही मन में संकल्प करना चाहिए और पूजा भी करनी चाहिए।

रात के समय में भगवान विष्णुजी की प्रतिमा या मूर्ति के सामने गीत, नृत्य, कथा आदि का कीर्तन करते हुए रात्रि को बिताना चाहिए।

प्रबोधिनी एकादशी के दिन अनार, फूल, धूप आदि से भगवान श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

भगवान श्रीविष्णुजी को अर्ध्य अर्पण करना चाहिए।इसका फल तीर्थ और दान आदि से करोड़ गुना अधिक होता हैं।

जो गुलाब के फूल से बकुल और अशोक के फूलों से, सफेद और लाल कनेर के फूलों से, दूर्वादल से, शमीपत्र से, चम्पक पुष्प से भगवान श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना करते हैं,वे आवागमन के चक्र से छूट जाते है।इस तरह रात्रि में भगवान की पूजा करके प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए।

उसके बाद अपने गुरु देव की पूजा करनी चाहिए और सदाचारी और पवित्र ब्राह्मणों को अपने सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करके अपना व्रत को छोड़ना चाहिए।

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में किसी वस्तु को त्याग देते हैं,उन्हें इस दिन से पुनः उस वस्तु को ग्रहण करनी चाहिए।जो मनुष्य 'प्रबोधिनी एकादशी के दिन विधिपूर्वक व्रत करते है,उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अंत में मृत्यु के बाद स्वर्गलोग की प्राप्ति होती है।

व्रती स्त्रियां इस दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत होकर आंगन में चौक पुरकर भगवान श्रीविष्णुजी के चरणों को कलात्मक रूप से अंकित करती हैं।

दिन की तेज धूप में विष्णुजी के चरणों को ढ़क दिया जाता हैं।

रात्रि को विधिवत पूजन के बाद प्रातःकाल भगवान को शंख, घण्टा, घड़ियाल आदि बजाकर जगाया जाता हैं।इसके बाद पूजा करके कथा सुनी जाती हैं।

इस व्रत से सम्बंधित कथाऐं इस प्रकार है-


देवप्रबोधिनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-पुराने समय में एक राज्य में राजा राज्य किया करते थे,उस राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे।प्रजा तथा नौकर-चाकर से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आकर बोला- महाराज! कृपा करके मुझे नौकरी पर रख लो।तब राजा ने उसके सामने एक शर्त रखी।ठीक हैं।रख लेते है किंतु रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा,लेकिन एकादशी के दिन फलाहार करना पड़ेगा।जब एकादशी के दिन जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के सामने गिड़गिड़ाने लगा।महाराज! इससे मेरा पेट नहीं भरेगा।मैं भूख से मर् जाऊंगा।मुझे अन्न दे दो।राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई,लेकिन वह अन्न छोड़ने को राजी नहीं हुआ।तब राजा ने उसे आटा, दाल, चावल आदि दिए।वह नित्य की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान करके भोजन बनाने लगा।जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा।आओ भगवान! भोजन तैयार है।बुलाने पर पीताम्बर धारण किए हुए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे।भोजनादि करके भगवान अंतर्ध्यान हो गए तथा वह अपने काम पर चला गया।पन्द्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज मुझे दुगुना समान दीजिए।उस दिन तो भूखा रह गया।राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं।इसलिये हम दोनों के लिये ये सामान पूरा नहीं होता हैं।यह सुनकर राजा को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। वह बोला-मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते है।मैं तो इतना व्रत रखता हूँ, पूजा करता हूँ,लेकिन भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए।राजा की बात सुनकर बोला-महाराज! यदि विश्वास नहीं हो तो साथ चलकर देख लें।राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गये।उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, लेकिन भगवान नहीं आए।अन्त में उसने कहा-हे भगवान!यदि तो नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगा।लेकिन भगवान नहीं आए।तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा।प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र भगवान प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे।खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बैठाकर अपने धाम में ले गए।यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता,जब तक मन शुद्ध न हो इससे राजा को ज्ञान मिला।वह भी शुद्ध मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग की प्राप्त हुए।


देवप्रबोधिनी एकादशी व्रत का महत्व:-

एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा :हे पिताश्री। कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की 'प्रबोधिनी एकादशी'के बारे मुझे बताये की इस एकादशी को किस विधि से करते है और इस एकादशी को करने से क्या-क्या फल की प्राप्ति होती है,आप से निवेदन करता हूँ कि आप कृपया करके मुझे इस प्रबोधिनी एकादशी के बारे में विस्तारपूर्वक बताये।'

ब्रह्माजी ने कहा :हे पुत्र नारद। जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना संभव नहीं हैं,वही वस्तु कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में आने वाली एकादशी के व्रत से मिल जाती है,उस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते है।इस एकादशी के व्रत को करने से व्रत के असरस्वरूप पहले  जन्म में किये गये अनेक तरह के बुरे कर्म से मुक्ति मिल जाती है और बुरे कार्य खत्म हो जाते है। हे पुत्र नारद।जो मनुष्य इस एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक थोड़ा भी पुण्य का कार्य करता है,उनका वह पुण्य पर्वत की तरह स्थिर हो जाता है।उस व्रत करने वाले के पितृ विष्णुधाम को प्राप्त हो जाते है।

ब्रह्महत्या आदि जघन्य महान पाप कर्म भी 'प्रबोधिनी एकादशी के दिन रात के समय में जागरण करने से भी नष्ट हो जाते है।मनुष्य को भगवान की खुशी के लिए कार्तिक महीने की प्रबोधिनी एकादशी का व्रत को जरूर करना चाहिए।जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करता है उस मनुष्य को यह प्रबोधिनी एकादशी अपने प्रभाव से धनवान,योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बना देती है,क्योंकि यह एकादशी भगवान श्रीविष्णुजी को बहुत प्यारी होती है।

प्रबोधिनी एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ (भगवान्नामजप भी परम यज्ञ है। 'यज्ञानां जपयज्ञोअस्मि'। यज्ञों में जपयज्ञ मेरा ही स्वरूप हैं।'-श्रीमद्भगवद्गीता) आदि करते हैं,उन्हें अक्षय पुण्य मिलता हैं।इसलिए हे नारद।तुमको भी विधिपूर्वक श्रीविष्णुजी भगवान की पूजा करनी चाहिए। 





Thursday, March 25, 2021

March 25, 2021

हरिवल्लभा परमा एकादशी व्रत विधि,कथा और माहात्म्य(Harivallabha Parma Ekadashi fasting method, story and significance)



हरिवल्लभा परमा एकादशी व्रत विधि,कथा और माहात्म्य(Harivallabha Parma Ekadashi fasting method, story and significance)(मल मास कृष्ण एकादशी):-पुरुषोत्तम मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को हरिवल्लभा परमा एकादशी कहते है।

हरिवल्लभा परमा एकादशी का भगवान मुरलीधर जी की मधुर वाणी से पूरा वृत्तांत:-

धनञ्जय कौंतेय ने कहा:हे मुरलीधर जी। आप से निवेदन करता हूँ कि आप अधिक(लौंद या मल या पुरुषोत्तम) महीने के कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताये।मल महीने कृष्णपक्ष की एकादशी का क्या नाम हैं ,इस एकादशी को किस तरह की विधि-विधान से किया जाता हैं और इसका माहात्म्य है?इस एकादशी में कौनसे देवता की पूजा की जाती है और इस एकादशी के व्रत को करने से क्या-क्या फल की प्राप्ति होती है, आप कृपया करके मुझे पूरा विवरण दीजिये ?

भगवान श्री मुरलीधरजी ने कहा: हे सव्यसाची!मल महीने के कृष्णपक्ष में आने वाले एकादशी को 'परमा' के नाम से जाना जाता हैं।इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से सभी तरह के किये हुए पापों से मुक्ति मिल जाती है और सभी तरह के पाप खत्म हो जाते है।मनुष्य को इस लोक में सभी तरह के सुखों की प्राप्ति होती है और जीवन के मरण-जीवन से मुक्ति मिलकर परलोक की प्राप्ति होती हैं।भगवान जनार्दन जी धूप,दीप,नैवेद्य और फूलों आदि के द्वारा पूजा-आराधना करनी चाहिए।महर्षियों के साथ इस एकादशी की जो मनोहर कथा बताई गई हैं वहीं मैं तुमको सुनाता हूँ तुम अपने मन को एक जगह पर केंद्रित करके ध्यानपूर्वक सुनो।

हरिवल्लभा परमा एकादशी की पौराणिक कथा:-पुराने समय एक काम्पिल्य नाम की नगरी हुआ करती थी।काम्पिल्य नगरी में एक अत्यंत धर्म को मानने वाला ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण का नाम सुमेधा था।उस सुमेधा ब्राह्मण के अत्यंत पवित्र और पतिव्रता पत्नी थी।पहले अपने किये हुए पाप के करण बहुत ही गरीब थे।सुमेधा ब्राह्मण की पत्नी सुमेधा की बहुत ही सेवा करती थी और अतिथि को अन्न देकर खुद भूखी रह जाती थी।

एक दिन सुमेधा ने कहा:'हे प्राणप्रिये!दाम्पत्य जीवन बिना धन के नहीं चल सकता है,इसलिए मैं प्रदेश जाकर कोई उद्योग करूँ।

सुमेधा की पत्नी ने कहा: 'हे प्राणनाथ !स्वामी जो भी अच्छा और बुरा कहे,पत्नी को वही करना चाहिए।मनुष्य को अपने पहले के जन्म के किये हुए कर्मों का फल भोगना पड़ता है।विधाता ने जो जिस मनुष्य के किस्मत में लिख दिया हैं उसको कोई भी नहीं बदल सकता है।हे प्राणनाथ आपको कहीं पर जानें कि कोई जरूरत नहीं है,जो किस्मत में लिखा होगा,वहीं यहीं पर भी मिल जाएगा।'

अपनी पत्नी की बात को सुनकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया।एक बार कौण्डिन्य ऋषिवर उस नगर में घूमते हुए आये और उस ब्राह्मण के घर की जगह पर आये।तब ब्राह्मण सुमेधा और उसकी पत्नी ने कौण्डिन्य ऋषिवर को देखकर उनको प्रणाम किया और कहा'आज हम तो धन्य हो गए। आपके दर्शन से हमारा जीवन सफल हुआ।'मुनिवर को उन्होंने आसन दिया उनकी आवभगत की उनको अपने सामर्थ्य के अनुसार भोजन करवाया। ।

भोजन के बाद पतिव्रता ने कहा: 'हे ऋषिवर !हमारी किस्मत से आप के दर्शन हो गए और आपका यहां आना हो गया मुझे पूरा भरोसा हैं कि अब मेरी गरीबी दूर जल्दी हो जाएगी।आपसे निवेदन करती हूं कि आप कृपया करके मुझे ऐसा कोई समाधान बताये जिसके करने से मेरे घर की मालिहालत ठीक हो जाये और मेरी गरीबी दूर हो जाये।

इस तरह पतिव्रता के कहने पर ऋषिवर कौण्डिन्य ने कहा: हे पतिव्रता ब्राह्मणी! 'अधिक मास'(मल मास) की कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी होती है उस एकादशी को 'परमा एकादशी' कहते है।इस परमा एकादशी के व्रत को जो कोई भी मनुष्य करता है उसके सभी तरह के पाओ,दुःख और गरीबी आदि खत्म हो जाते है।जो भी मनुष्य इस एकादशी के व्रत को करता है तो व्रत के प्रभाव से उसकी गरीबी दूर हो जाती है वह धनवान बन जाता हैं।इस एकादशी के व्रत में भगवान का गुणगान भजन आदि करने के साथ रात्रि जागरण करना चाहिए।

भगवान शिव शंकरजी ने कुबेर को इस एकादशी के व्रत को करने से कुबेर को धनाध्यक्ष बना दिया था।'फिर ऋषिवर कौण्डिन्य ने उस सुमेधा ब्राह्मण की पत्नी पतिव्रता को परमा एकादशी के व्रत को करने की विधि बताई।

ऋषिवर कौण्डिन्य ने कहा: 'हे ब्राह्मणी। इस एकादशी के व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठना।उसके बाद अपनी दैनिकचर्या को पूरा करने के बाद विधिपूर्वक पंचरात्रि व्रत को आरम्भ करना चाहिए।

जो मनुष्य पाँच दिन तक बिना जल के व्रत को करते है,वे अपने माता-पिता और स्ट्रिशित स्वर्गलोग को जाते है।

हे ब्राह्मणी।तुम अपने पति के साथ इस व्रत को करो।इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारी मन की कामनाओं की पूर्ति होगी।तुम्हें जरूर ही सिद्धि और आखिर में स्वर्गलोग की प्राप्ति होगी।'

कौण्डिन्य ऋषि के बताए अनुसार ब्राह्मण और ब्राह्मणी ने 'परमा एकादशी' का पाँच दिन तक बिना जल के उपवास किया।व्रत के पूरे होने पर ब्राह्मण की पत्नी को अपने घर की तरफ एक सुंदर राजकुमार को आते हुए देखा। राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्ररेणा से उन्हें आजीविका के लिए एक गाँव और एक अच्छा भवन दिया जो कि सभी तरह की सुख-सुविधाओं से युक्त था।इस तरह व्रत के प्रभाव से दोनों पति-पत्नी इस पृथ्वी लोक के सुखों को भोगने के बाद आखिर में स्वर्गलोग को प्राप्त हुए।

हरिवल्लभा परमा एकादशी व्रत की दूसरी पौराणिक कथा:-प्राचीनकाल में वभ्रु वाहन नामक एक दानी तथा प्रतापी राजा था। वह प्रतिदिन ब्राह्मणों को सौ गायें दान किया करता था।उसी के राज्यमें प्रभावती नाम की एक बाल-विधवा ब्राह्मणी भी रहती थी।जो भगवान विष्णुजी की परम उपासिका थी।पुरुषोत्तम मास में नित्य स्नान कर भगवान विष्णुजी और शंकरजी की पूजा किया करती थी।हरिवल्लभा परमा एकादशी का व्रत भी इसी बीच वह निरन्तर करती रही थी।एक दिन दैवयोग से राजा वभ्रु वाहन और बाल-विधवा प्रभावती ब्राह्मणी की मृत्यु हुई और दोनों साथ ही धर्मराज के दरबार में पहुँचे।धर्मराज ने उठकर जितना स्वागत ब्राह्मणी प्रभावती किया उतना ही राजा वभ्रु वाहन का नहीं किया।राजा को अपने द्वारा किये गए दान-पुण्य पर पूर्ण विश्वास था उसके प्रतिकूल अपना अपमान तथा ब्राह्मणी का सम्मान देखकर आश्चर्य चकित रह गये।इसी समय चित्रगुप्त ने आकर प्रभावती तथा राजा के कर्मानुसार विष्णुलोक तथा स्वर्गलोक की बात सुनाई।राजा को इस पर और भी आश्चर्य हुआ तब धर्मराज से इसका कारण पूछा।धर्मराज ने प्रभावती द्वारा हरिवल्लभा एकादशी के व्रत का पूर्ण करने का कारण बताया।उसके प्रभाव से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।


हरिवल्लभा परमा एकादशी व्रत का महत्व:-

हे सेव्यसाची।जो मनुष्य 'परमा एकादशी का व्रत करता है,उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिल जाता है।जिस तरह संसार में चार पैर वालों में गाय, देवताओं में इंद्रराज सबसे श्रेष्ठ है,उसी तरह मासों में अधिक मास उत्तम है।इस मास में पंचरात्रि अत्यंत पुण्य देने वाली है।इस महीने में'पद्मिनी एकादशी' भी श्रेष्ठ है।उसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते है और पुण्यमय लोकों की प्राप्ति होती हैं।


Monday, March 22, 2021

March 22, 2021

इन्दिरा एकादशी व्रत कथा,विधि और महत्व(Indira Ekadashi fast story, method and importance)

               



इन्दिरा एकादशी व्रत कथा,विधि और महत्व(Indira Ekadashi fast story, method and importance):-आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'इन्दिरा एकादशी' कहते है।

इन्दिरा एकादशी के व्रत के दिन सालीग्राम की पूजा करनी चाहिए।

इस एकादशी व्रत में सालीग्राम पर तुलसीदल जरूर अर्पण करना चाहिए।

धर्मराज ने कहा:हे श्रीकेशवजी!आप कृपया करके आश्विन महीने के कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे बताये,उस एकादशी को कैसे करे,क्या विधि-विधान हैं और कौनसे देव या देवी का पूजन होता है?आप से अरदास करता हूँ कि आप मुझे पूरी जानकारी देवे।

भगवान श्रीकेशवजी ने कहा:हे राजन्!तुम आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में जानने की चाह रखते हो,तुम अपने मन को एक जगह पर स्थिर करते हुए ध्यान से सुनना।मैं तुम्हें पूरी जानकारी देता हूँ।आश्विन मास के कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी को 'इन्दिरा' के नाम से जाना जाता हैं।इस एकादशी के व्रत के असर स्वरूप किये गये बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता हैं और जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति मिल जाती है।जो पितर नीच योनि को प्राप्त कर चुके है,उनको इस एकादशी से अच्छी गति मिल जाती है।

श्रीकेशवजी ने कहा कि:हे कुंती पुत्र धर्मराज इस विषय में मैं तुम्हें एक कथा सुनाते हूँ, तुम ध्यान पूर्वक सुनना।

इंदिरा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-पुराने समय की बात है।एक नगर था,उस नगर का नाम माहिष्मती था।उस माहिष्मती नगर पर बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध राजा राज्य करते थे,उस नगर के राजा का नाम इन्द्रसेन था।उस समय सतयुग चल रहा था।राजा इन्द्रसेन धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का ध्यानपूर्वक ख्याल रखते हुए उनका पालन-पोषण करते थे।इस तरह के द्वारा अपनी प्रजा को सन्तान के रूप में पालन करते रहने से उनका यश चारों फैल चुका था।प्रजा राजा की भूरी-भूरी प्रसंशा करती थी।राजा के माता-पिता का स्वर्गवास हो चुका था।राजा इन्द्रसेन भगवान श्रीमाधव जी के परम भक्त थे,भगवान की भक्ति में हमेशा तैयार रहते थे।भगवान वासुदेवजी की भक्ति में हमेशा डूबे रहते थे और भगवान की भक्ति में डूबे रहते हुए भगवान श्रीकेशवजी के मुक्तिदायक नामों का जाप करते हुए अपने जीवन का समय को बिताया करते थे और विधिपूर्वक आध्यात्मक तत्त्व के सोच में विचार करते रहते थे।एक दिन राजा इन्द्रसेन अपनी राजसभा में आराम पूर्वक बैठे हुए थे।

उस राजसभा में उसी समय देवर्षि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र नारदजी देवलोक से उतरकर उस राजसभा में आ गए।इस तरह नारदजी को अपनी राजसभा में आया हुआ देख कर राजा इन्द्रसेन ने नारद जी को हाथ जोड़कर खड़े हो गए और उनको नमस्कार किया।उसके बाद नारदजी का विधिपूर्वक पूजन करके उनको बैठने के लिए आसन पर बिठाया।इसके बाद राजा इन्द्रसेन ने कहा:'हे मुनिश्रेष्ठ।आपकी कृपा दृष्टि के प्रभाव से मेरा सभी तरह से कुशल है।आपके दर्शन हो जाने से मेरे सभी तरह के यज्ञ क्रियाएं सफल हो गयी।देवर्षे!आपके आने का क्या प्रयोजन है,कृपया करके मुझे बताएं?

नारदजी बोले:हे उत्तम राजन।मेरी बात को ध्यानपूर्वक सुनो।मेरे द्वारा बताई गई बात तुनको आश्चर्य में डाल देगी।मैं ब्रह्मलोक से भ्रमण करते-करते यमलोक में गया था।मुझे यमराज ने उत्तम आसन पर बैठकर यमराज ने भक्तिभाव पूर्वक मेरी पूजा की।उसी समय मैंने यमराज की सभा में तुम्हारे पिता को भी देखा था।तुम्हारे पिता ने तुमसे कहने के लिए मेरे द्वारा समाचार दिए कि,तुम उस सन्देश को ध्यानपूर्वक सुनो।उन्होंने कहा है कि पुत्र।मुझे इंदिरा एकादशी के व्रत का पुण्य देकर तुम मुझे स्वर्गलोक में भेजो।'उनका समाचार लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ।

राजन्।तुम अपने पिता श्री को यमलोक से मुक्त कराकर उनको स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने के लिए 'इंदिरा एकादशी का व्रत करो।

राजा इन्द्रसेन बोले:हे भगवन्।मुझे 'इंदिरा एकादशी के व्रत के बारे बताये।आपसे अनुरोध करता हूँ।कि आप कृपा करके इस व्रत की विधि-विधान के बारे में मुझे जानकारी प्रदान करें।इस व्रत को किस मास के किस पक्ष करना है,उसका पूर्ण विवरण देवे।

नारदजी बोले:राजेन्द्र। तुम अपने मन को एक जगह पर केंद्रित करके मेरी बात को ध्यानपूर्वक सुनये।मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि-विधान बतलाता हूँ।

इन्दिरा एकादशी व्रत की विधि-विधान:-

आश्विन मास के कृष्णपक्ष में दशमी तिथि के दिन श्रद्धापूर्वक अपने मन से सुबह जल्दी उठकर स्नान करना।

फिर मध्याह्नकाल में स्नान करके अपने मन को एक जगह पर स्थिर करके पूरे दिन-रात के समय में केवल एक बार भोजन को ग्रहण करना।

रात्रिकाल में ईश्वर का गुणगान करते हुए जमीन पर सो जाना।

रात्रि के अंतिम समय में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन दातुन करके मुहँ को धोवे।

इसके बाद में भक्तिभाव रखते हुए निम्नलिखित मंत्र को मन ही मन में दोहराते हुए उपवास व्रत के नियम को ग्रहण करे।

अघ स्थित्वा निराहारः सर्व भोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत।।

अर्थात्:-'कमलनयन भगवान नारायण!आज मैं सब तरह के भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूँगा।अच्युत।आप मुझे शरण देवे।

इस तरह नियम करके मध्याह्नकाल में पितरों की खुसी के लिए शालग्राम शिला के सामने विधिपूर्वक श्राद्ध करे।

ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उनको सन्तुष्ट करे।

अपने सत्कार पूर्वक ब्राह्मणों को भोजन करावे।

पितरों को दिए हुए अन्नमय पिण्ड को सूंघकर गाय को खिला देवे।

उसके बाद धूप और गन्ध आदि से भगवान हृषिकेश का पूजन-अर्चना कर।

उसके बाद रात्रि के समय भगवान हृषिकेश की मूर्ति के सामने उनका गुणगान करते हुए जागरण करे।

उसके बाद सुबह होने पर द्वादशी के दिन पुनः भक्तिपूर्वक श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए।

उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर भाई, बन्धु,नाती और पुत्र आदि स्वयं मौनव्रत रहते हुए स्वयं भोजन ग्रहण करे।

राजन्।इस विधि से आलस्यरहित होकर यह व्रत को करो।इससे तुम्हारे पीतर भगवान विष्णुजी के विष्णुधाम में चले जायेंगे।

भगवान श्रीकेशवजी बोले:राजन्!राजा इन्द्रसेन से ऐसा कहकर देवर्षि नारद जी अंतर्धान हो गए।राजा ने नारद जी के द्वारा बताई हुई विधि से अन्तःपुर की रानियों,पुत्रों और भृत्यों सहित उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया।

कुंती पुत्र धर्मराज।व्रत के पूर्ण होने पर आकाश लोक से पुष्पों की बारिश होने लगा।इन्द्रसेन के पिता गरुड़ पर आरूढ़ होकर श्रीविष्णुधाम को चले गए और राजर्षि इन्द्रसेन भी निष्कण्टक राज्य का उपभोग करके अपने पुत्र को राजसिंहासन पर बैठकर स्वयं स्वर्गलोग को चले गए।इस तरह मैंने तुम्हारे सामने'इन्दिरा एकादशी व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया।इसको पढ़ने और सुनने से मानव के सब पापों से मुक्त हो जाता है।इस तरह इस व्रत की इसी दिन से शुरुआत हुई और आज तक चल रही है।




 

Saturday, March 20, 2021

March 20, 2021

पधा एकादशी(भाद्रपद शुक्लपक्ष) व्रत विधि,कथा और महत्व(Padha Ekadashi (Bhadrapad Shukla Paksha Padha Ekadashi) fasting method, story and significance)


पधा एकादशी(भाद्रपद शुक्लपक्ष) व्रत विधि,कथा और महत्व(Padha Ekadashi (Bhadrapad Shukla) fasting method, story and significance):-

धर्मराज ने जब पूछा:श्री मुरारी जी!आप मैं निवेदन कर रहा हूँ कि आप कृपया करके भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष कौनसी एकादशी आती हैं और उस एकादशी को किस नाम से जाना जाता है, उस एकादशी को कौनसे देवता की पूजा-आराधना होती है और उस एकादशी को किस विधि-विधान किया जाता है?


भगवान केशवजी ने कहा:राजन्।इस विषय में मैं तुमको एक आश्चर्यजनक कथा को सुनाता हूँ,तुम राजन् ध्यानपूर्वक सुनना।इस कथा को ब्रह्माजी ने महात्मा नारद जी को बताया था।

नारदजी ने कहा:चतुरानन!आपको नमस्कार करता हूँ! मैं भगवान पिताम्बरजी की पूजा-अर्चना के लिए आपके मधुर वाणी से जानना चाहता हूं की भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष में कौनसी एकादशी आती हैं और उस एकादशी की विधि क्या है?

ब्रह्माजी बोले:ऋषिश्रेष्ठ। तुमने बहुत ही अच्छी बात को पूछा है।क्यों न हो वैष्णव जो ठहरे।भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी आती हैं,उस एकादशी को 'पधा'के नाम से जाना जाता है।इस एकादशी के दिन हृषीकेश की पूजा करनी चाहिए।यह अच्छा व्रत जरूर करने योग्य होता है।

पधा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-पुराने समय एक सूर्यवंशी राजा था,उस राजा का नाम मान्धाता था।मान्धाता राजा हमेशा सत्य को बोलने वाला,चक्रवर्ती और प्रतापी था।वह अपनी प्रजा को अपने पुत्रों के समान मानते हुए उनका धर्मपूर्वक पालन करते हुए ख्याल रखता था।राजा मान्धाता के राज्य में कभी भी अकाल की छाया नहीं पड़ती थी।

राजा मान्धाता को किसी तरह की कोई तरह की मानसिक चिंताएँ नहीं हुआ करती थी और राज्य में किसी तरह की कोई भी बीमारियों का प्रकोप भी नहीं हुआ करता था।राजा मान्धाता की प्रजा बिना किसी डर के और धन-धान्य से परिपूर्ण थी।राजा के कोषघर में अपने न्याय से कमाया हुआ धन ही संग्रह था।राजा के राज्य में सभी वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे।

मान्धाता राजा की राज्य की जमीन कामधेनु की तरह फल को देने वाली थी।उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत ही सुख प्राप्त होता था। 

एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई।इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित होकर खत्म होने लगी।तब सभी प्रजाजनों ने मिलकर राजा मान्धाता के पास जाकर बोले।

प्रजा ने राजा से कहा:नृपश्रेष्ठ।आपको प्रजा की बात को सुनना चाहिए।पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को 'नार' कहा है।वह 'नार'ही भगवान का 'अयन' (निवास स्थान) है, इसलिए वे 'नारायण' कहलाते हैं।नारायणस्वरूप भगवान विष्णुजी सर्वत्र व्यापकरूप में विराजमान हैं। 

वे ही मेघस्वरूप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है।नृपश्रेष्ठ।इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अतः ऐसा कोई उपाय कीजिये,जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो।

राजा बोले:आप लोगों का कहना एकदम ठीक हैं,क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है।अन्न से ही संसार जीवन धारण करता है।लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है,लेकिन जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता।

फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करूँगा ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले,विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये।

वहाँ जाकर मुख्य-मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे।एक दिन उन सबके फिरते हुए अंगिरा ऋषि को देखा।अंगिरा ऋषि को देखते ही राजा मान्धाता खुश होकर अपने रथ वाहन से नीचे उतरते है और ऋषिवर की तरफ चल पड़ते है और अपनी इन्द्रियों को नियंत्रण करते हुए ऋषिवर अंगिरा को अपने दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करते है और उनके चरणों को प्रणाम करते हुए छूते है।

तब ऋषिवर अंगिरा राजा मान्धाता को 'स्वस्ति'कहते हुए राजा का अभिवादन को स्वीकार करते है।राजा से अपने राज्य के सातों अंगों की कुशलक्षेम पूछते है।राजा ने अपनी कुशलक्षेम बताकर मुनि के शरीर की निरोगता के बारे में पूछते है।मुनिवर अंगिरा को बैठने के लिए आसन देते है और अर्ध्य को देते हैं।राजा आसन पर बैठकर और अर्ध्य को ग्रहण करने के बाद मुनिवर अंगिरा के पास बैठते है तब अंगिरा ऋषि राजा से पूछते है कि राजन् कैसे आना हुआ।

राजा मान्धाता बोलते:हे मुनिश्रेष्ठ अंगिरा जी।मैं धर्म के अनुसार अपनी राज्य की प्रजा का पालन कर रहा था।तो काफी समय तक तो मेरे राज्य में ठीक स्थिति रही थी लेकिन अचानक मेरे राज्य में बारिश नहीं हुई जिससे मेरी प्रजाजनों को बहुत ही तकलीफ हो रही है।इस स्थिति के होने का क्या कारण है जिससे मेरे राज्य में बारिश नहीं हो रही हैं।इस बात को मैं और मेरी प्रजाजन नहीं जानते है।इस विषय की जानकारी के लिए आपके पास आया हूँ।

ऋषिश्रेष्ठ अंगिरा जी ने कहा:हे राजन् मान्धाता।सब युगों में सबसे अच्छा युग जो चल रहा है वह सतयुग है।इस युग में समस्त मनुष्य ईश्वर के चिन्तन में लगे रहते है और इस युग के समय में धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता हैं।इस सतयुग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते है और दूसरे लोग नहीं होते है।

लेकिन राजन्।तुम्हारे राज्य में एक शुद्र जाति का शुद्र तपस्या कर रहा है,जिसके कारण तुम्हारे राज्य में बारिश नहीं हो रही हैं।तुम राज्य उस शुद्र की तपस्या को नष्ट करने का उपाय करो,जिससे तुम्हारे राज्य इंद्र देव बारिश करके तुम्हारे राज्य के अकाल को समाप्त कर देवें।

राजा मान्धाता बोले:हे मुनिश्रेष्ठ।जो शुद्र तपस्या कर रहा है उसने कोई अपराध तो नहीं किया है और वह तपस्या में लगा हुआ,इसलिए मैं उस शुद्र का बुरा कैसे कर सकता हूँ।आप कृपा करके मुझे कोई दूसरा धर्म और नीतिगत रास्ता बताये जिससे मेरे राज्य में बारिश हो सके।

ऋषिवर अंगीरा जी ने कहा:हे राजन् मांधाता।ऐसा तुम नहीं कर सकते हो तो तुमको एक उपाय बताता हूँ तुम एकादशी तिथि का व्रत करो।भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष तिथि में आने वाली एकादशी को तुम व्रत करो।इस एकादशी को सभी 'पधा'के नाम से जानते है।इस एकादशी के व्रत से अवश्य ही तुम्हारे राज्य बारिश होगी।राजन्।तुम अपने परिजनों और अपनी समस्त प्रजाजनों के साथ इस एकादशी का व्रत पूरी तरह विधिपूर्वक करो।

ऋषिश्रेष्ठ अंगिरा जी की बातें सुनकर राजा मान्धाता अपने राज्य वापस लौट कर आ जाते है।फिर अपनी राज सभा में बैठकर अपनी सभी मंत्रियों के साथ वार्तालाप करके अपने राज्य में सभी प्रजाजनों को सूचना दिलवाते है कि भाद्रपद शुक्लपक्ष की 'पधा एकादशी का व्रत करना है।

इस तरह राजा अपने परिजनों के साथ समस्त प्रजाजनों के साथ व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करते है तो एकादशी व्रत के प्रभाव के फलस्वरूप राजा के राज्य में भरपूर बारिश होती है।पूरी धरती माता वर्षा के जल से परिपूर्ण हो जाती हैं और खेतों में सूखी हुई वनस्पति फिर हरि-भरी हो जाती हैं।

इस तरह एकादशी व्रत से सभी प्रजा के जनों का कष्ट मिट जाता है और समस्त राज्य में फिर से खुशहाली हो जाती है।इस तरह हर एकादशी को अपने परिजनों और प्रजाजनों के साथ व्रत करते हुए सुख से अपने राज्य में शासन करते हुए अंतिम समय में एकादशी व्रत के फलस्वरूप उनको वैंकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।

भगवान श्री माधवजी कहते हैं:हे राजन धर्मराज!इस व्रत को करने वालों को सब तरह का सुख मिलता है,इसलिए इस सबसे अच्छे एकादशी व्रत का अनुष्ठान जरूर करना चाहिए।'पधा एकादशी व्रत के दिन एक घड़ा लेकर उसमें पानी भरकर उसको कपड़े से पूरी तरह ढकना चाहिए, उस ढ़के हुए कपड़े के साथ दही और चावल को किसी ब्राह्मण को दान देने से फायदा मिलता है,उस ब्राह्मण का आशीर्वाद मिलता है ,उस ब्राह्मण को छाता और पदत्राण भी देने से व्रत करने वाले के सभी कष्ट मिट जाते है।दान देते समय सभी वस्तुओं को देने के वक्त निम्नांकित मंत्र को मन ही मन दोहराते हुए दान की सभी वस्तुओं को देना फल ज्यादा मिलता है।

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक।

अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव।

भुक्ति मुक्तिप्रदश्चैव लोकानांं सुखदायकः।। 

प्रश्च'बुधवार और श्रवण नक्षत्र के संयोग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करने वाले भगवान केशवजी आपको प्रणाम है,प्रणाम है!मेरी पापराशि को समाप्त करके आप मुझे समस्त तरह के सुख देवे।आप पुण्यात्मा जनों को भोग और मोक्ष देने वाले और सुखदायक है।'

राजन्!इसके पढ़ने और सुनने से मानव के सभी तरह के किये गए बुरे पापों से मुक्ति मिल जाती हैं।




Friday, March 19, 2021

March 19, 2021

कामिका एकादशी(पवित्र एकादशी)व्रत विधि, कथा और महत्व(Kamika Ekadashi (Pavitra Ekadashi) fasting method, story and significance)




कामिका एकादशी(पवित्र एकादशी)व्रत विधि, कथा और महत्व(Kamika Ekadashi (Pavitra Ekadashi) fasting method, story and significance):-कामिका एकादशी श्रावण महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाती हैं।

प्रातः स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णुजी की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवा कर धूप-दीप करके भोग लगाना चाहिये।

धर्मराज ने पूछा:हे माधवजी।आपको मैं नम निवेदन से प्रणाम करता हूँ।श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की कौन सी एकादशी आती है?आप से अरदास करता हूँ कि इस माह की एकादशी के बारे में मुझे पूर्ण विवरण देवे।

भगवान श्रीकेशवजी ने कहा:राजन्। आप सुनिये।मैं आपको एक पाप को नाश करने वाले उपाख्यान को बताता हूँ और आप मन लगाकर ध्यान से सुनिये।उस उपाख्यान को पुराने समय में नारदजी के द्वारा ब्रह्माजी से पूछने पर ब्रह्माजी ने बताया था,वह उपाख्यान में आपको बताता हूँ।

ब्रह्माजी से नारदजी के द्वारा पूछने पर:हे विधाता!हे प्रजापति।मैं आपके मधुर वाणी से जानने का इच्छुक हूँ कि श्रावण महीने के कृष्ण पक्ष में कौंनसी एकादशी आती है,उस एकादशी का क्या नाम है?उस एकादशी में किस देव या देवी की पूजा-अर्चना होती है और इस एकादशी को करने से क्या पुण्य फल की प्राप्ति होती है?इस एकादशी के बारे में मुझे पूरा समझाए।

विधाता जी बोले:नारद।तुम ध्यान से सुनना मैं तुम्हें सम्पूर्ण लोकों की अच्छाई की चाह से तुम्हारे द्वारा पूछने पर तुम्हें बता रहा हूँ।श्रावण महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को जो एकादशी आती है,उस एकादशी का नाम 'कामिका' हैं।'कामिका' का नाम मन में दोहराने से भी वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता हैं, 

उस दिन केशवजी,चक्रपाणि जी,जनार्दनजी,दामोदरजी और गोविंदजी आदि नामों से भगवान का पूजन करना चाहिए और श्रीकेशवजी के पूजन से जो फल मिलता है।

वह ही सुरसरि,काशी,नेमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में स्थित ब्रह्माजी आदि में भी प्राप्त नहीं होता है।सिंह राशि के बृहस्पति होने पर व्यतिपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती है,वही फल भगवान श्रीमाधव जी के पूजन से भी मिलता है।

जो समुद्र और वन सहित सम्पूर्ण भूमि का दान  करने वाला को जो फल मिलता है, केवल 'कामिका एकादशी'के व्रत को करके भी मिल सकता है,इस तरह दोनों में समान फल ही मिलता है।जो गर्भवती गाय के गर्भ के जन्म देने पर उस गाय को दूसरी वस्तुओं के साथ दान करता है,उस मानव को जिस फल की प्राप्ति होती है,वही'कामिका एकादशी का व्रत करने वाले को मिलता है।

जो मनुष्य श्रीमाधवजी का श्रवण महीने में पूजा-अर्चना करता है,उस मनुष्य के द्वारा की गई श्रावण महीने की पूजा से गन्धर्वो और नागों सहित सभी देवताओं की पूजा हो जाती है।अतः बुरे पापों से डरे हुए मानवों को अपने सामर्थ्य से पूरी कोशिश करते हुए'कामिका एकादशी'के दिन श्रीविष्णुजी का पूजा-आराधना करनी चाहिए।

जो पापरूपी कीचड़ से भरे हुए जगत् रूपी सागर में डूब रहे है,उन किये गए पाप रूपी कीचड़ से जीवन को मुक्त कराकर मोक्ष की चाह रखने वालों को 'कामिका एकादशी का व्रत सबसे अच्छा रहता है।जो फल अध्यात्म विधापरायण आदमियों को मिलता है,उसकी तुलना में केवल मात्र 'कामिका एकादशी व्रत को करके प्राप्त किया जा सकता है।

जो कामिका एकादशी का व्रत करने वाले व्रती को रात के जागरण करके नहीं तो कभी डरावने यमदूत के दर्शन होते है और नहीं कभी बुरी गति में जाना पड़ता हैं।मोती,वैदूर्य,मूंगे और लालमणि आदि से पूजा अर्चना से भगवान चक्रपाणि जी खुश नहीं होते है,जिस तरह तूलसी दल की पूजा करने पर होते है।जिस किसी ने तुलसी की मंजरियों से श्रीमाधव जी का पूजन कर लिया है,उसके जन्मभर के बुरे किये गये पापों से पक्का ही खत्म हो जाते है।

या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी रोगाणाम भिवन्दिता

निरसनी सिकतान्तकत्रासिनी।

प्रत्यासतिविधायिनी भगवतः कृष्णस्य संरोपिता

न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नमः।। 

'जो देखने से ही सम्पूर्ण बुरे किये गए पापों के समूहों को समाप्त कर देती है,छूने पर ही पूरी देह को पावन कर देती है,नमस्कार करने से देह के सभी बीमारियों को खत्म कर देती है,पानी के द्वारा सींचन करने मात्र से ही यमराज जी को डर पहुँचाती है,आरोपित करने से ही भगवान श्रीमाधव जी के पास में ले जाती है और ईश्वर के चरणों में चढ़ने पर मोक्ष के रूप में फल देती हैं,उस तुलसीदेवी को प्रणाम हैं।

जो रात के समय में दीपदान कामिका एकादशी के व्रत को करते है,उसके द्वारा किये गए पुण्य के फलों को चित्रगुप्तजी भी नहीं बता सकते है।श्रीकेशवजी के सामने की तरफ दिया इस एकादशी व्रत में जलने क् विधान माना गया है, जो दीपक को श्रीकेशवजी के सामने की जलाते है,तो दीपक को जलाने वाले के पितर स्वर्गलोग में रहते हुए अमृत का पान करते हुए सन्तुष्ट हो जाते है।

जो मनुष्य घृत या तिल के तेल से भगवान के सम्मुख दीपक को जलाते है,तो दीपक को सम्मुख जलाने वालों को अपनी देह को जन्म-मरण के मोह-माया से छूटने पर करोड़ो दीपकों से पूजित होकर स्वर्गलोग की प्राप्ति होती हैं। 


कामिका एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-पुराने जमाने में एक गांव में एक ठाकुर रहता था,वह स्वभाव से बहुत ही क्रोधी था।उसके गुस्से से सब गांव के लोग डरते थे।एक दिन उस गुस्सेल ठाकुर की भिड़न्त एक ब्राह्मण से हो गयी।इस भिड़न्त में ब्राह्मण मारा गया।इस पर ठाकुर साहब ने ब्राह्मण की तेरहवीं करनी चाही।लेकिन सब ब्राह्मणों ने भोजन करने से मना कर दिया।तब उन्होनें सभी ब्राह्मणों से निवेदन किया कि हे महात्माओं!मेरा पाप कैसे दूर हो सकता हैं?तब महात्माओं ने उसे कामिका एकादशी के व्रत करने के बारे में कहा:तब ठाकुर ने पूरा विधि-विधान पूछा।तब महात्माओं ने उस ठाकुर को पूरा विधि-विधान कामिका एकादशी व्रत का बताया और आज्ञा दी कि तुम यह व्रत करो।

ठाकुर ने पूरे व्रत का विधि-विधान जान करके उस कामिका एकादशी के व्रत को वैसा ही किया जैसा उन महात्माओं ने बताया था।रात के समय भगवान की मूर्ति के सामने जाकर सो गया,जब वह सो रहा था,तब सपने में भगवान ने कहा कि ठाकुर तेरा सब पाप दूर हो गया है। अब तुम ब्राह्मण की तेरहवीं कर सकते हो।तेरे घर सूतक नष्ट हो गया है।ठाकुर ब्राह्मण की तेरहवीं करके ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो गया।

कामिका एकादशी व्रत का महत्व भगवान श्रीमाधव जी कहते है:हे धर्मराज कुंतीपुत्र!मैंने तुमको पूरा विवरण तुम्हारे सामने अपनी वाणी से बताया हूँ, जो कि 'कामिका एकादशी का गुणगान था।'कामिका एकादशी का व्रत सभी तरह के बुरे पापों को नष्ट करने वाली होती हैं,इसलिए मनुष्यों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए।

यह व्रत मनुष्य को स्वर्गलोक और बड़े-बड़े पुण्यफल के समान फल देने वाला है।जो अपने मन से पूरी समर्पण भाव से इस एकादशी के व्रत के गुणगान के महत्व को सुनता है,वह मनुष्य सभी तरह के पापों से मुक्ति पाकर जन्म-मरण के चक्कर से आजाद होकर श्रीविष्णुजी के धाम को प्राप्त कर लेता है।


Wednesday, March 17, 2021

March 17, 2021

देवशयनी एकादशी(आषाढ़ी एकादशी) व्रत विधि के नियम,कथा और महत्व (Devshayani Ekadashi (Ashadhi Ekadashi) fasting rules, story and importance)



देवशयनी एकादशी(आषाढ़ी एकादशी) व्रत विधि के नियम,कथा और महत्व (Devshayani Ekadashi (Ashadhi Ekadashi) fasting rules, story and importance):-हिन्दु पुराणों के मतानुसार ऐसा विवरण मिलता है,की देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णुजी चार महीने के समय तक बलिद्वार पाताल लोक में रहने के जाते है।राजा बलि के राज्य पाताललोक में चार महीने तक रहते है और चार मास तक रहने के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को वापस आना होता है।इसी कारण इसे हरिशयनी एकादशी तथा कार्तिक वाली एकादशी को "प्रबोधिनी एकादशी"के नाम से जाना जाता है।

आषाढ़ मास से कार्तिक मास के समय को "चातुर्मास"कहते है।इन चार महीनों में भगवान विष्णुजी क्षीर सागर की अनंत शैय्या पर शयन करते है।इसलिये खेती के काम के अलावा समस्त अच्छे काम बंद रहते हैं।धार्मिक दृष्टि से यह चार माह भगवान विष्णुजी का"निंद्राकाल" माना जाता हैं।इन दिनों में तपस्वी(साधु)एक स्थान पर रहकर तप कार्य करते है।गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश में देवशयनी एकादशी को आषाढ़ी एकादशी भी कहते है।इस दिन पुष्कर में जाकर ब्रह्माजी के दर्शन और उनकी पूजा-अर्चना करने का बहुत ही महत्व बताया गया है।

धर्मराज ने श्रीमध्वजी से पूछा:हे भगवान केशवजी।कौनसी एकादशी आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष में आती हैं?उस एकादशी को किस नाम से जाना जाता है और उस एकादशी की क्या विधि है?आप से निवेदन करता हूँ,की आप मुझे बताये।

भगवान श्रीमाधव जी ने कहा:हे राजन् धर्मराज।आषाढ़ महीने में आने वाली एकादशी को 'शयनी'नाम से जाना जाता है।मैं इस 'शयनी'के बारे में विस्तारपूर्वक बताता हूँ।'शयनी एकादशी'महान कल्याणकारी, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली,सब तरह के किये हुए बुरे पापों को नष्ट करने वाली और सबसे अच्छे व्रत वाली है।

आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की'शयनी एकादशी के दिन जिन मनुष्य ने कमल फूल से कमललोचन भगवान श्रीहरि का पूजन और इस एकादशी का व्रत सबसे अच्छा व्रत किया है,उस मनुष्य ने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया है।

देवशयनी एकादशी के दिन मेरा एक स्वरूप पाताललोक के राजा बलि के यहां पर निवास करता है और दूसरा स्वरूप क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर तब तक शयन करता है,जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती, इसलिए आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मानव को अच्छी तरह से धार्मिक आचरण करते रहना चाहिए।जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है,उसको उत्तम गति मिलती है और जीवन-मरण से मुक्ति मिल जाती है।

इस एकादशी के व्रत को पूरी श्रद्धा से अपनी पूरी कोशिश से करना चाहिए।भगवान श्रीविष्णुजी जो कि शंख,चक्र और गदा को धारण किये हुए होते है,उनकी पूजा पूरी विधि-विधान से करना चाहिए।इस तरह से इस एकादशी व्रत में भगवान विष्णुजी की पूजा करने से उस मनुष्य की पुण्य की गिनती स्वंय चार मुख वाले ब्रह्मदेव भी नहीं कर सकते है।


देवशयनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से एक एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की।तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया-सतयुग में एक राजा था,उस राजा का नाम मान्धाता था,वह बहुत ही पराक्रमी और चक्रवती सम्राट था।मान्धाता राजा के राज्य में सभी प्रजा बहुत ही सुखी थी।किन्तु भविष्य में क्या हो जाए यह कोई नहीं जानता।अतः वे इस बात से अनजान थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला हैं।उनके राज्य में पूरे तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई,जिसके कारण उस राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया।इस दुर्भिक्ष(अकाल) में चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई।धर्म पक्ष के यज्ञ,हवन,पिण्डदान कथा-व्रत आदि सब में कमी हो गई।

जब मुसीबत पड़ी हो तो धार्मिक कार्यों में प्राणी की रुचि खान रह जाती हैं?प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी वेदना की दुहाई दी।राजा तो इस स्थिति को लेकर पहले से दुःखी थे।वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौनसा पाप कर्म किया है,जिसका दंड मुझे और मेरी प्रजा को अकाल के रूप में मिल रहा है?फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना लेकर जंगल की ओर चल दिए।वहां विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।ऋषिवरने आशीर्वचन उपरान्त कुशल क्षेम पूछा।फिर जंगल में विचरने तक हाथ जोड़कर कहा-महात्मन सभी तरह से धर्म का पालन करता हुआ भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूँ।आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है।कृपया इसका समाधान करें।यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा-राजन!सब योगों से उत्तम यह सतयुग है।इसमें छोटे पाप का भी बड़ा दंड मिलता है।इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है।ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है।जबकि आपके राज्य में यह शुद्ध तपस्या कर रहा है।यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं ही रही हैं।जब तक वह काल को प्राप्त नहीं होगा।तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा।दुर्भिक्ष की शांति उसे मारने से संभव है।किन्तु राजा हृदय एक निरपराध शुद्ध तपस्वी का शमन करने नो तैयार नहीं हुआ।

उन्होनें कहा-हे देव!मैं उस निरपराध को मार दूं।यह बात मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है।कृपा करके आप कोई और उपाय बताए।

अंगिरा ने कहा-आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करें।इस व्रत के प्रभाव से अवश्य वर्षा होगी।राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पदमा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया।पदमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।


देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व एवं नियम:-राजन् धर्मराज। जो मनुष्य इस सभी तरह के पापों को हरने वाली,भोग और मोक्ष को देने वाली शयनी एकादशी का व्रत को पालन करता है,वह जाति में निम्न समझे जाने वाली चाण्डाल जाति का मनुष्य भी इस जगत् में सदा मेरा प्यारा होता है।

जो मनुष्य दीपदान,पलाश के पान पर खाना और व्रत को करते हुए चौमासा को बिताते है,वे सभी मेरे को प्यारे होते है।चौमासा में भगवान चक्रपाणि जी अपनी निंद्रा में रहते है,इसलिए मनुष्य को जमीन पर चौमासा में सोना चाहिए।

सावन में साग,भादों में दही,क्वार में दुग्ध और कार्तिक मास में दाल को छोड़ देने से फायदा होता है।

जो मनुष्य चौमासे के महीने में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करता है,तो उस मनुष्य को उत्तम गति मिलती है।

राजन्। 'शयनी एकादशी के दिन व्रत करने से ही मानव के सभी तरह के किये गए बुरे पापों से मुक्ति मिल जाती हैं,इसलिए हमेसा व्रत को करते रहना चाहिए।

शयनी और 'बोधिनी'के बीच में जो कृष्णपक्ष की एकादशियाँ आती है,वे एकादशियाँ गृहस्थ जीवन को जीने वाले के लिए बहुत  ही योग्य होती है-दूसरे मे सन की कर्षनपक्षीय एकादशी गृहस्थ जीवन को जीने वालों के लिए ठीक नहीं रहती है।शुक्लपक्ष की सब एकादशी करनी चाहिए।



Sunday, March 14, 2021

March 14, 2021

पापांकुशा एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व(Papankusha Ekadashi fasting method, story and importance)

              


पापांकुशा एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व(Papankusha Ekadashi fasting method, story and importance):-आश्विन महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को होने से इस एकादशी को 'पापांकुशा एकादशी'कहा जाता हैं।इस एकादशी को पाप रूपी हाथी को महावत रूपी अंकुश बनाकर बेधने के कारण से 'पापांकुशा एकादशी'कहलायी।इस दिन इमली का भी आहार करना चाहिए।


धर्मराज ने कहा:हे मुरलीधर जी।आप से निवेदन करता हूँ कि आप मुझे आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताये।इस माह में आने वाली एकादशी को कौनसे नाम से जाना जाता हैं,इस एकादशी को किस तरह की विधि से करे और इस एकादशी का क्या महत्व है?आप कृपया करके मुझे पूरा विवरण इस एकादशी के बारे में बताये।

भगवान श्रीकेशवजी ने कहा:हे राजन्।आश्विन महीने के शुक्लपक्ष में आने वाली एकादशी को 'पापांकुशा के नाम से जाना जाता हैं।यह 'पापांकुशा'नाम की एकादशी को करने से सभी तरह के बुरे किये गए पापों को नष्ट करने करने वाली,सर्वग और मोक्ष को देने वाली,देह को स्वस्थ रखने वाली,सुंदर-सुशील औरत-आदमी की चाहत को पूरी करने वाली,रुपये-पैसों एवं सुख-सम्पदा को देने वाली और दोस्तों की संख्या में बढ़ोतरी करने वाली होती हैं।

यदि दूसरे काम के प्रसंग से भी कोई भी मानव इस एकमात्र एकादशी का उपवास कर लेने पर उस मनुष्य को जीवन में कभी यमराज के यमलोक की यातनाओं को सहन करने की जरूरत नहीं पड़ती हैं।राजन्।इस एकादशी के दिन उपवास करना चाहिए।

रात्रि के समय में जागरण करने वाले मानव को अनायास ही दिव्यरूपधारी,चतुर्भुज, गरुड़ की ध्वजा से युक्त,हार से सुशोभित और पीताम्बरधारी होकर भगवान श्रीचक्रपाणी जी के विष्णुलोक की प्राप्ति हो जाती हैं।

राजेन्द्र। ऐसे पुरुष मातृपक्ष की दश, पितृपक्ष की दश और अपने जीवनसाथी के पक्ष की भी दश पीढ़ियों के उद्धार करने वाली होती है।

उस दिन सभी मन की इच्छाओं की पूर्ति के लिए मुझ चक्रपाणि का पूजन विधि-विधान से करना चाहिए।जितेन्द्रिय मुनि लम्बे समय तक कठोर तपस्या करके जिस फल को प्राप्त करते है,वह फल उस दिन भगवान जनार्दन को प्रणाम करने से ही मिल जाता हैं।जो पुरुष सुवर्ण,तिल, जमीन,गाय,अन्न,जल,जूते और छाते का दान करते है।

वह कभी यमराज को नहीं देखता।नृपश्रेष्ठ!गरीब मनुष्य को भी चाहिए कि वह स्नान,जप ध्यान आदि करने के बाद अपने सामर्थ्य के अनुसार होम,यज्ञ तथा दान आदि करके अपने प्रत्येक दिन को सफल बनाये।

जो होम,स्नान, जप,ध्यान और यज्ञ आदि पुण्यकर्म करने वाले है,उन्हें भयंकर यम यातना नहीं देखनी पड़ती।लोक में जो मानव दीर्घायु,रुपये-पैसों वाला धनवान,अच्छे स्वभाव के और शरीर से स्वस्थ देखे जाते है।

इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ,मनुष्य पाप से दुर्गति में पड़ते है और धर्म से स्वर्ग में जाते हैं।राजन्।तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था,उसके अनुसार'पापांकुशा एकादशी'का माहात्म्य मैनें वर्णन किया।

पापाकुंशा एकादशी की पौराणिक कथा:-विन्ध्य नामक पर्वत पर एक महाक्रूर नामक शिकारी रहता था।उसका जीवन हिंसा,लूटपाट, शराब पीना और वेश्यागमन में बीत गया।यमराज ने एक दिन पूर्व ही दूतों को उसे लाने के लिए भेज दिया।दूतों ने क्रोधन को कहा कि कल तुम्हारा अंतिम दिन है।हम तुम्हें ले जायेंगे।क्रोधन डर से अंगिरा ऋषि के आश्रम में चला गया।

ऋषि से रक्षा हेतु प्रार्थना की तो ऋषि को उस पर दया आ गयी।उन्होनें उसे पापांकुशा एकादशी करने को कहा।क्रोधन ने ऋषि के कहे अनुसार पापांकुशा एकादशी के व्रत को किया।इस व्रत को करने से व्रत के प्रभाव से भगवान खुश होकर उसको विष्णुधाम भेज दिया।एकादशी करने से भगवान के पार्षद आए और यमदूत उनको देखते ही भाग गए।

पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्व:-पापांकुशा एकादशी के व्रत को करने से मनुष्य के द्वारा किये गए पापों से मुक्ति मिल जाती है।

जो मनुष्य पापांकुशा एकादशी का व्रत करता है उस मनुष्य को इस एकादशी व्रत के प्रभाव से जन्म-मरण के बंधन से आजादी मिल जाती है,उस मनुष्य की मुक्ति हो जाती है और उस मनुष्य को भगवान विष्णुजी के चरणों में उनकी सेवा करने का मौका मिलता है।




Saturday, March 13, 2021

March 13, 2021

श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत विधि, कथा और महत्व (Putrada Ekadashi fasting method, story and importance of Shukla Paksha of Shravan month)



श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत विधि,  कथा और महत्व (Putrada Ekadashi fasting method, story and importance of Shukla Paksha of Shravan month):-श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती हैं उस एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते है। श्रावण के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी तिथि के दिन किया जाने वाला व्रत विशेष कर सन्तान को पाने के लिए किया जाता है। श्रावण के शुक्ल पक्ष पुत्रदा एकादशी के व्रत करने से सन्तान की प्राप्ति होती है और सन्तान की रक्षा भी होती है।इस व्रत को रखने वाली निःसन्तान व्यक्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती हैं।

धर्मराज ने कहा:हे श्रीकेशवजी!आप मुझे श्रावण मास के शुक्लपक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताये,उस एकादशी को किस नाम से जाना जाता है,उस एकादशी की क्या विधि और महात्म्य है?आप की मधुर वाणी से इस माह की एकादशी के बारे में पूर्ण जानकारी करावे।

भगवान श्रीमाधव जी ने कहा:राजन्।आपको एक कथा सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनये।

पुत्रदा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा:-पुराने समय की बात है।द्वापर युग के शुरुआत का समय था।एक राज्य था,उस राज्य का नाम महिष्मतीपुर था।उस महिष्मती पुर राज्य पर महीजित नाम राजा शासन करता था।महीजित राजा का राज्य में सुख-शांति थी,लेकिन राजा महीजित को कोई भी पुत्र सन्तान नहीं थी।राजा अपने राज्य के उत्तराधिकारी के विषय में सोचता रहता था,की उसका वंश कैसे आगे बढ़ेगा और महिष्मती राज्य का क्या होगा?

अपने पुत्र सन्तान की इच्छा के पूरा नहीं होने से राजा को राज्य में किसी भी तरह का सुखदायक नहीं प्रतीत होता था। राजा की उम्र अधिक होने से राजा अपनी बड़ी उम्र को देखकर बहुत ही चिंता करते थे।राजा ने अपने प्रजावर्ग में बैठकर इस तरह कहा:प्रजाजनों!इस जन्म में मुझसे कोई बड़ा पापकर्म तो नहीं हुआ है। 

मैनें अपने कोषघर के खजाने में किसी के साथ अन्याय करके धन को नहीं जमा किया है।ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है।प्रजा को अपने पुत्र की तरह मानते हुए मैंने पालन किया है।अपने धर्म से पृथ्वी लोक पर अधिकार जमाया हैं।दुष्टों को,चाहे वे मेरे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हो उनको सभी की तरह समान रूप से दण्डित किया है।

अच्छे और सभ्य पुरुषों का मैंने हमेशा सम्मान किया है और किसी के प्रति भी किसी तरह का कोई ईर्ष्या और द्वेष भाव नहीं रख है।फिर भी क्या कारण है,जो कि मेरे घर में आज तक पुत्र सन्तान की चाहत पूर्ण नहीं हुई है?आप सभी प्रजा जनों इस पर सोच-विचार करें।

राजा के इस तरह की बातें सुनकर सभी प्रजा के जनों ने और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने राजा की भलाई के बारे में गहराई से सोचते हुए वन की ओर प्रवेश किया।राजा की भलाई की चाहत रखने वाले सभी जनों  ने इधर-उधर फिरते हुए ऋषिसेवित आश्रमों की खोज करने लगे।इस तरह घूमते-फिरते हुए उन सभी को ऋषिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हो गए।

ऋषिश्रेष्ठ लोमशजी धर्म के तत्वज्ञ,सभी तरह के शास्त्रों के बहुत ही बड़े विद्वान, बड़ी उम्र वाले और महात्मा है।लोमशजी की देह लोभ से भरी हुई है।वे ब्रह्माजी के समान तेजवान है। एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक-एक लोभ विशीर्ण होता है,टूटकर गिरता है,इसलिए उनका नाम लोमश हुआ हैं।वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते है।उन्हें देखकर सब जनों को बहुत ही ज्यादा खुशी हुई।जब सभी जनों को अपने नजदीक आते देखते है।

लोमशजी ने कहा:'तुम सब जन किसलिए यहाँ पर आए हो?अपने आने का क्या प्रयोजन बताओ।तुम लोगों के लिए जो मेरे से भलाई होगी मैं उस को जरूर करूँगा।'

प्रजाजनों ने कहा:ब्रह्मन। महिष्मती नगर के राजा का महीजित नाम है,हम उनकी प्रजा है,राजा के अभी तक कोई पुत्र सन्तान नहीं हुई है।राजा महीजित हम सब प्रजा का ख्याल अपने पुत्र की तरह रखा और हमारा पालन कर रहे है।राजा महीजित को पुत्रहीन देख,उनके दुःख से दुःखित हो हम सबने तपस्या करने का पक्का निर्णय करके यहाँ पर आये है।

द्विजोत्तम।राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन हो गये है।महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के समस्त काम सिद्ध हो जाते है।मुनिवर।आप से हम सब निवेदन करते है कि आप हमें कोई रास्ता बताये जिससे राजा महीजित को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो जाये और उनका जो दुःख है,वह मिट जाये।उन सब प्रजाजनों की बाते सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए अपने ध्यान में मग्न हो गये।

उसके बाद राजा के पूर्व जन्म का वृतांत जानकर उन्होंने कहा: 'प्रजावृन्द!आप सभी को जो मैंने राजा महीजित के पूर्व जन्म के हाल को देखा हैं,उसको आप ध्यान से सुनिए।राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों का रक्त चूसने वाला धनहीन वैश्य था।वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार करता था।एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था,वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा।

पानी से भरी हुई बाबली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया।इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गाय भी आ पहुँची।वह प्यास से व्याकुल और सूर्य की गर्मी से गला सुख रहा था।अपनी प्यास बुजाने के लिए बिना पानी के तड़फ रहा था।

अतःबावली में जाकर पानी पीने लगा।वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हॉककर दूर हटा दिया और खुद पानी पीने लगा।उसी पाप काम के कारण राजा इस जन्म में पुत्रहीन हुए हैं।किसी जन्म के पुण्य से राजा को इस जन्म में निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई हैं।' 

प्रजाजनों ने कहा:मुनिवर!पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरूप  पुण्य से पाप से पाप से पाप नष्ट होते है,अतः ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये,जिससे उस पाप का नाश हो जाय।

लोमशजी ने कहा:प्रजाजनों।श्रावण महीने के शुक्लपक्ष में आने वाली एकादशी होती है,उस एकादशी को'पुत्रदा' को नाम से जाना जाता हैं।वह मन की इच्छा के अनुसार फल देने वाली होती है।तुम इसी एकादशी को व्रत करो। यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनिवर को नमस्कार किया और नगर में आकर पुत्रदा एकादशी'के व्रत का अनुष्ठान किया।

उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया।उसके बाद व्रत के पुण्य के फलस्वरूप राजा की रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव समय आने पर एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।इस पुत्रदा एकादशी के महात्म्य को सुनने मात्र से भी सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती हैं तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता हैं।


श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत का महत्व:- श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत करने से जिस मनुष्य दम्पति को सन्तान नहीं होती है उनको यह व्रत करने से सन्तान पुत्र की प्राप्ति होती है। मनुष्य दम्पति को पूरी श्रद्धा से श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत को करना चाहिए। 

भगवान श्रीपीताम्बरजी की पूजा करते है,उनको अपनी चाहत पूरी होती है।

श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत को करने वालों अवश्य पुत्र सन्तान देते है।