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Saturday, July 24, 2021

July 24, 2021

श्री शनिचालिसा(Shri Shanichalisa)



श्री शनिचालिसा(Shri Shanichalisa):-सूर्य पुत्र एवं छाया पुत्र श्री शनिदेवजी को प्रणाम करता हूँ।श्री शनिदेवजी आप की दृष्टि समस्त संसार के प्राणियों एवं समस्त लोकों के देवताओं पर हैं। आप की दृष्टि से कोई नहीं बच सका। भगवान शिवजी को भी आपने अपनी शनि की साढ़े-साती में जंगल में घोड़ा बनने पर विवश कर दिया था। राजा विक्रमादित्य को भी आपने तेली के घर पर बैल हांकने वाला बना दिया था। श्री शनिदेवजी न्याय के देवता होते है जो प्राणी अपने कर्मों के द्वारा न्याय पर चलता है सबके प्रति समान दृष्टि रखता है उस पर श्री शनिदेवजी अपना आशीर्वाद प्रदान कर देता है, जो मनुष्य गलत विचारधारा एवं दूसरों का अहित सोचता है उस पर श्री शनिदेवजी अपनी दशा-अन्तर्दशा में उसको कष्टों को भोगाते हैं। जब कभी श्री शनिदेवजी की दशा-अन्तर्दशा मनुष्य के जीवन पर आती है तो अच्छे कार्यों को करने वाले को राजा और बुरे कार्यों करने वालों को रंक बना देते हैं। श्री शनिदेवजी अपने पैरों से लँगड़े होने के कारण शनिदेवजी की गति बहुत ही धीमी होती हैं।

शनि ग्रह की गति एक राशि को पार करने में ढ़ाई साल का समय लगता हैं, समस्त बारह राशियों को पार करने में तीस वर्ष का समय लगता हैं।

जब कभी भी श्री शनिदेवजी की दशा-अन्तर्दशा चल रही होती है, जिस पर चल रही होती हैं उनको कोर्ट-कचहरी, बदनामी और दुर्घटना का योग बन जाता है।

इसके लिए मनुष्य को शनिदेवजी की आराधना करनी चाहिए।

मनुष्य को अपनी दृष्टि को गलत जगह पर नहीं रखना चाहिए।

स्त्रियों का सम्मान करना चाहिए।

माता-पिता, बहिन-भाई और वृद्ध जनों का ख्याल रखना चाहिए।

जिन मनुष्य पर शनिदेवजी की साढ़े-साती एवं ढैय्या चल रही होती हैं, उन मनुष्यों को श्री शनिदेवजी की चालीसा का पाठ करना चाहिए।

शनिवार को एवं मंगलवार को उपवास करना चाहिए।

भगवान श्री बजरंगीबली की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

शनिवार को पीपल के वृक्ष के नीचे सरसो का दिया शाम के समय में करने से फायदा मिलता है।

शनिवार के दिन सूखे नारियल की गिरी में छेद करके अपने हाथ से गेहूं के आटे को सेककर उसमें थोड़ी शक्कर व तेल मिलाकर उस सीके व मिश्रित आटे को उस सूखे नारियल की गिरी में डालकर किसी एकांत स्थान पर जहां पर किसी मनुष्य का आवागमन ज्यादा नहीं होता हैं उस स्थान पर पेड़ के नीचे जहां पर चींटिया ज्यादा होती है उस स्थान पर एक सामान्य गड्डा खोदकर उस नारियल को दबाना चाहिए। जैसे-जैसे उस नारियल को जीव खाएंगे उसी तरह ही मनुष्यों के कष्ट कम होंगे।

इन सभी के साथ-साथ श्री शनिदेवजी की चालीसा का पाठ भी हमेशा करते रहने पर मनुष्य को फायदा मिलता है।



            ।।अथ श्री शनिदेव चालीसा।।

।।दोहा।।

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

जयति जयति शनिदेव दयाला।

करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।

माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला।

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।

हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।

पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।

रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

पर्वतहू तृण होई निहारत।

तृणहू को पर्वत करि डारत॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।

कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।

मातु जानकी गई चुराई॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।

मचिगा दल में हाहाकारा॥

रावण की गति-मति बौराई।

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

दियो कीट करि कंचन लंका।

बजि बजरंग बीर की डंका॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।

चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी।

हाथ पैर डरवायो तोरी॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों।

तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।

आपहुं भरे डोम घर पानी॥

तैसे नल पर दशा सिरानी।

भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।

पारवती को सती कराई॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा।

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।

बची द्रौपदी होति उघारी॥

कौरव के भी गति मति मारयो।

युद्ध महाभारत करि डारयो॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।

लेकर कूदि परयो पाताला॥

शेष देव-लखि विनती लाई।

रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना।

जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।

हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा।

सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।

मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।

चोरी आदि होय डर भारी॥

तैसहि चारि चरण यह नामा।

स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

समता ताम्र रजत शुभकारी।

स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै।

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।

दीप दान दै बहु सुख पावत॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥


दोहा:-

पाठ शनिश्चर देव को, की हों 'भक्त' तैयार।

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

।।इति श्री शनिदेवजी की शनिचालीचा।।

।।जय बोलो श्री शनिदेवजी की जय।।

Friday, July 23, 2021

July 23, 2021

शीतला चालीसा(Sheetla chalisa)

                 


शीतला चालीसा(Sheetla chalisa):-माता शीतला के मंदिर में शीतला माता को गदर्भ की सवारी पर सवार होते हुए दिखाया जाता हैं, शीतला माता की पूजा करने का दायित्व कुम्हार जाति के लोग अपने ऊपर लेकर अपनी कुल की देवी मानते हैं, माता के मन्दिर को सुहाग मन्दिर के रूप में जाना जाता है। शीतला माता को महामाई या चेचक की देवी या बच्चों की संरक्षिका या सेढ़ल माता आदि दूसरे रूपों में भी लोग जानते हैं। माता शीतला का प्रमुख पर्व शीतला अष्टमी का होता हैं, जो की चैत्र मास के अंधेरे पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता हैं। जिसे बासोड़ा कहते हैं, जिसमें शीतला माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता हैं।

माता की सवारी का मेला भी भरा जाता हैं, जिसे गर्दभ का मेला कहते है।

माता शीतला जी अनुकृपा पाने के लिए उनकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जिससे माता की कृपा बनी रहे।

जिन औरतों को सन्तान की प्राप्ति नहीं हो रही हैं उनको माता शीतला की शीतला चालीसा का पाठ करना चाहिए।

माता की पूजा-चालीसा करने से शीतलता की प्राप्त होती है जिससे मनुष्य के शरीर में ठंडाई मिल जाती है तथा शरीर के सम्बन्धित बीमारियों से मुक्ति मिल जाती हैं।

माता शीतला की चालीसा को पढ़ने पर सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलकर सभी तरह मिल रही मुश्किलें खत्म हो जाती हैं, इसलिए मनुष्य को माता शीतला की चालीसा का पाठ करना चाहिए।

 

शीतला माता स्तुति मंत्र:-

शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत् पिता।

शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः।।


।।श्री शीतला चालीसा।।


        ।।चौपाई।।

जय जय श्री शीतला भवानी।

जय जग जननि सकल गुणधानी।।

गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती।

पूरन शरन चंद्रसा साजती।।


विस्फोटक सी जलत शरीरा।

शीतल करत हरत सब पीड़ा।।

मात शीतला तव शुभनामा।

सबके काहे आवही कामा।।


शोक हरी शंकरी भवानी।

बाल प्राण रक्षी सुखदानी।।

सूचि बार्जनी कलश कर राजै।

मस्तक तेज सूर्य सम साजै।।


चौसट योगिन संग दे दावै।

पीड़ा ताल मृदंग बजावै।।

नंदिनाथ भय रो चिकरावै।

सहस शेष शिर पार ना पावै।।


धन्य धन्य भात्री महारानी।

सुर नर मुनी सब सुयश बधानी।।

ज्वाला रूप महाबल कारी।

दैत्य एक विश्फोटक भारी।।


हर हर प्रविशत कोई दान क्षत।

रोग रूप धरी बालक भक्षक।।

हाहाकार मचो जग भारी।

सत्यो ना जब कोई संकट कारी।।


तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा।

कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा।।

विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो।

मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो।।


बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा।

मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा।।

अब नही मातु काहू गृह जै हो।

जह अपवित्र वही घर रहि हो।।


पूजन पाठ मातु जब करी है।

भय आनंद सकल दुःख हरी है।।

अब भगतन शीतल भय जै हे।

विस्फोटक भय घोर न सै हे।।


श्री शीतल ही बचे कल्याना।

बचन सत्य भाषे भगवाना।।

कलश शीतलाका करवावै।

वृजसे विधीवत पाठ करावै।।


विस्फोटक भय गृह गृह भाई।

भजे तेरी सह यही उपाई।।

तुमही शीतला जगकी माता।

तुमही पिता जग के सुखदाता।।


तुमही जगका अतिसुख सेवी।

नमो नमामी शीतले देवी।।

नमो सूर्य करवी दुख हरणी।

नमो नमो जग तारिणी धरणी।।


नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी।

दुख दारिद्रा निस निखंदिनी।।

श्री शीतला शेखला बहला।

गुणकी गुणकी मातृ मंगला।।


मात शीतला तुम धनुधारी।

शोभित पंचनाम असवारी।।

राघव खर बैसाख सुनंदन।

कर भग दुरवा कंत निकंदन।।


सुनी रत संग शीतला माई।

चाही सकल सुख दूर धुराई।।

कलका गन गंगा किछु होई।

जाकर मंत्र ना औषधी कोई।।


हेत मातजी का आराधन।

और नही है कोई साधन।।

निश्चय मातु शरण जो आवै।

निर्भय ईप्सित सो फल पावै।।


कोढी निर्मल काया धारे।

अंधा कृत नित दृष्टी विहारे।।

बंधा नारी पुत्रको पावे।

जन्म दरिद्र धनी हो जावे।।


सुंदरदास नाम गुण गावत।

लक्ष्य मूलको छंद बनावत।।

या दे कोई करे यदी शंका।

जग दे मैंय्या काही डंका।।


कहत राम सुंदर प्रभुदासा।

तट प्रयागसे पूरब पासा।।

ग्राम तिवारी पूर मम बासा।

प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा।।


अब विलंब भय मोही पुकारत।

मातृ कृपाकी बाट निहारत।।

बड़ा द्वार सब आस लगाई।

अब सुधि लेत शीतला माई।।


यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय।

सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय।।


बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू।

जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू।।


॥ इति श्री शीतला चालीसा॥ 

।।जय शीतला माता की जय।।

Friday, February 5, 2021

February 05, 2021

अथ श्री हनुमानजी की आरती(Aarti of Atha Shree Hanumanji)

            


अथ श्री हनुमानजी की आरती(Aarti of Atha Shree Hanumanji):-श्री हनुमानजी की आरती में हनुमानजी के द्वारा किये सभी कार्यो का विवरण मिलता है।श्री हनुमानजी की पूजा करने में रह गई भूल को ठीक करने के लिए श्री हनुमानजी को खुश करने के लिए आरती करते है।अपनी भूल के लिए आरती करते है।

आरती का अर्थ:- जब देवी-देवता की पूजा करते है,तब पूजा की समाप्ति पर आरती की जाती है।पूजा करते समय किसी तरह की भूल रह जाती हैं और आरती करने उस पूजा में रह गई भूल को सुधारा जा सकता है,इसलिए आरती की जाती है।आरती को पांच बत्तियों से करते है,लेकिन एक,सात या उससे ज्यादा बत्तियों से भी आरती की जाती है।आरती पूजा के अंत में अपने इष्टदेव को खुश करने के लिए करते है,इससे इष्टदेव को याद करते हुए अपनी भूल के लिए माफी मांगने के लिए आरती को करते है।सभी देवी-देवताओं के लिए अलग-अलग आरती होती है,लेकिन सभी देवी-देवताओं की आरती के तरीके समान होते है।आरती में पूरा विवरण मिलता है। 


।।अथ श्री हनुमानजी की आरती।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर काँपे।

रोग दोष जाके निकट न झाँके।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

अंजनि पुत्र महा बलदाई।

सन्तन के प्रभु सदा सहाई।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

दे बीरा रघुनाथ पठाये।

लंका जारि सीय सुधि लाये।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई।

जात पवनसुत बार न लाई।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

लंका जारि असुर संहारे।

सीयारामजी के काज सँवारे।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।

लाय सँजीवन प्राण उबारे।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

पैठी पाताल तोरि जम-कारे।

अहिरावन की भुजा उखारे।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

बायें भुजा असुरदल मारे।

दाहिने भुजा संतजन तारे।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

सुर नर मुनि आरती उतारें।

जय जय जय हनुमान उचारे।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

कंचन थार कपूर लौ छाई।

आरती करत अंजना माई।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

जो हनुमान जी की आरती गावै।

बसि बैकुण्ठ परम पद पावै।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

लंका बिध्वंश किन्ही रघुराई।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

तुलसी दास स्वामी आरती गाई।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।


।।इति श्री हनुमानजी की आरती।।


।।बोलो सियावर रामचन्द्रजी की जय हो।।