Breaking

Showing posts with label संपूर्ण भगवान व्रत कथा. Show all posts
Showing posts with label संपूर्ण भगवान व्रत कथा. Show all posts

Wednesday, October 22, 2025

October 22, 2025

अन्नकूट गोवर्धन पूजा कब हैं? जानें अन्नकूट पूजा विधि, कथा और महत्व (When is Annakut Govardhan Puja? Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance)

अन्नकूट गोवर्धन पूजा कब हैं? जानें अन्नकूट पूजा विधि, कथा और महत्व (When is Annakut Govardhan Puja?  Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance):-हिन्दू धर्म में कार्तिक मास में दिवाली पूजन के दूसरे दिन के पर्व को अन्नकूट पूजा या गोवर्धन पूजा और बाली प्रतिपदा का पर्व को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन मनाया जाता हैं। कार्तिक शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट का उत्सव भी मनाया जाता है।




अन्When is Annakoot Puja?  Know Annakoot Puja vidhi, katha and Importance



अन्नकूट का अर्थ:-जिनमें तरह-तरह के अन्न को इकट्ठा करके तरह-तरह की सब्जियों के साथ में मिलाकर एक किया जाता हैं, उसे अन्नकूट कहते हैं। इस तरह अन्नकूट के शब्दों को अलग करने पर दो शब्द प्राप्त होते है, जिनमें एक होता है अन्न एवं दूसरा शब्द कूट होता हैं।


अन्न का अर्थ समस्त तरह के धान्य पर्दाथ होता हैं।


कूट का अर्थ सभी को इक्कठा करके एक समूह बना होता हैं।


इस दिन खरीफ फसलों से प्राप्त अनाज एवं नई सब्जियों को बनाकर भगवान विष्णु का भोग लगाया जाता हैं। ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते है:



कार्तिकस्य सिते पक्षे अन्नकूटं समाचरेत्।


गोवर्धनोत्सवं चैव श्रीविष्णुः प्रिवनामिति।।



अन्नकूट पूजा विधि:-इस दिन की पूजा विधि इस तरह हैं।


◆प्रातःकाल घर के द्वार पर गौ के गोबर का गोवर्धन बनाये तथा उसे शिखर युक्त बनाकर वृक्ष शंखादि से संयुक्त और पुष्पों से सुशोभित करें। 



◆इस दिन यथा सामर्थ्य छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन रूप श्री भगवान को भोग लगाया जाता है। इसको प्रसाद रूप में भक्तों में वितरीत किया जाता हैं। 



◆रात में गौ से गोवर्धन का उपमर्दन करवाया जाता हैं। 



◆मन्दिरों में विविध प्रकार के पकवान, मिठाईयां, नमकीन और अनेक प्रकार की सब्जियां, मेवे, फल आदि भगवान के समक्ष भोग के लिए सजाये जाते हैं तथा सभी अन्नकूट का दर्शन कर भोग लगाकर आरती करते हैं। 



◆फिर भक्तों को प्रसाद रूप में अन्नकूट वितरण करते हैं। ब्रज में इसकी विशेष विशेषता हैं। 



◆काशी, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, बरसाना, नाथद्वारा आदि भारत के प्रमुख मन्दिरों में लड्डुओं तथा पकवानों के पहाड़ या कूट बनाये जाते हैं। जिनके दर्शन के लिए विभिन्न स्थानों से यात्री पधारते हैं। 



◆एक-एक करके सभी मन्दिरों में अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है और दीपावली से कार्तिक पूर्णिमा तक सभी मन्दिरों में ये महोत्त्सव चलता रहता हैं।





अन्नकूट पूजा की पौराणिक कथा:-द्वापर में ब्रज में अन्नकूट के दिन इन्द्र की पूजा होती थी। एक दिन श्रीकृष्ण ने गोप-ग्वालों को समझाया कि गायें व गोवर्धन प्रत्यक्ष देवता हैं। अतः तुन्हें इनकी पूजा करनी चाहिए। क्योंकी इन्द्र तो कभी यहां दिखाई भी नहीं देते। अब तक उन्होंने कभी आप लोगों के बनाये हुए पकवान ग्रहण भी नहीं किये। फलस्वरूप उनकी प्रेरणा से सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन की पूजा की। स्वयं भगवान श्री कृष्णजी ने गोवर्धन का रूप धारण करके सभी पकवानों या अन्नकूट को ग्रहण किया। जब इन्द्र को यह बात पता चली तो वे अत्यन्त क्रोधित होकर प्रलयकाल के सदृश मूसलाधार वर्षा करने लगे। यह देखकर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी चिटुडी अंगुली पर धारण किया। उसके नीचे सब ब्रजवासी ग्वाल-बाल, गायें-बछड़े आदि आ गये। लगातार सात दिन की वर्षा से जब ब्रजवासी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो इन्द्र को बड़ी ग्लानि हुई। ब्रह्माजी ने इन्द्र को श्री कृष्ण के परमब्रह्म परमात्मा होने की बात बतायी तो लज्जित होकर इन्द्र ने ब्रज में आकर श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। इस अवसर पर ऐरावत ने आकाश गंगा के जल से और कामधेनु ने अपने दुग्ध से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। जिससे वे गोविन्द कहे जाने लगे। इस प्रकार गोवर्धन पूजन स्वयं श्री भगवान का पूजन हैं। "गोविन्द मेरो हैं, गोपाल मेरो हैं, श्री बांके बिहारी नन्दलाल मेरो हैं।"





अन्नकूट पूजा की पौराणिक कथा:-भगवान की प्रेरणा से शाल्गलीद्वीप में द्रोणाचल की पत्नी से गोवर्धन का जन्म हुआ। भगवान के जाग रूप से वृन्दावन और उनके बावन स्कन्ध से यमुना प्रकट हुई। गोवर्धन को भगवद् रूप जानकर ही सुमेरु हिमालय आदि पर्वतों ने उसकी पूजा की और उसे गिरिराज बनाकर उसका स्तवन भी किया। एक समय तीर्थ यात्रा के प्रसंग में पुलस्त्यजी वहां आये। वे गिरिराज गोवर्धन को देख कर मुग्ध हो उठे और द्रोण के पास जाकर उन्होंने कहा कि मैं काशी निवासी हूँ। एक याचना लेकर आपके पास आया हूँ। आप अपने इस पुत्र को मुझे दे दो। मैं इसे काशी में स्थापित कर वहीं तप करूंगा। इस पर द्रोण पुत्र के स्नेह से कातर तो हो उठे, पर वे ऋषि मांग को ठुकरा न सके। तब गोवर्धन ने मुनि से कहा। "मैं दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा हूँ। आप मुझे कैसे ले चलेंगे।" मुनि ने कहा-मैं तुम्हें हाथ पर उठाये ले चलूंगा। गोवर्धन ने कहा-महाराज एक शर्त हैं। यदि आप मार्ग में मुझे कहीं रख देंगे तो मैं उठ नहीं सकूंगा। मुनि ने यह शर्त स्वीकार कर ली। ततपश्चात पुलस्त्यजी मुनि ने हाथ पर गोवर्धन उठा कर काशी के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में ब्रजभूमि मिली। जिस पर गोवर्धन की पूर्व स्मृतियां जाग उठी। वह सोचने लगा कि भगवान श्री कृष्ण राधा के साथ यही अवतीर्ण होकर बाल्य और किशोर आदि की बहुत सी मधुर लीलाऐं करेंगे। उस अनुपम रस के बिना मैं न रह सकूंगा। ऐसे विचार उत्पन्न होते ही वह भारी होने लगा। जिससे मुनि थक गये। इधर लघुशंका की भी प्रवृत्ति हुई। स्नान आदि से निवृत्त होकर जब वे गोवर्धन को पुनः उठाने लगे। तब वह न उठा। गोवर्धन ने मुनि को अपनी शर्त की याद दिलवाई और कहा-अब मैं यहां से नहीं हटूंगा। इस पर मुनि को क्रोध आया और वे शाप दे बैठे। तुमने मेरे मनोरथ पूर्ण नहीं किया। इसलिए तुम प्रतिदिन तिल-तिल घटते जाओगे। उसी शाप से गिरिराज गोवर्धन आज भी तिल-तिल घटता जा रहा हैं।




अन्नकूट पूजा का महत्त्व:-अन्नकूट पूजा करने से भगवान श्री कृष्णजी की अनुकृपा प्राप्त होती हैं।


1.अन्नकूट व्रत करने से मनुष्य के जीवनकाल के समस्त संकटों का निवारण हो जाता हैं।


2.मनुष्य के पारिवारिक जीवन में अन्न भण्डार भरा रहता हैं।


Sunday, January 1, 2023

January 01, 2023

भीष्म पंचक व्रत क्या होता हैं? जानें पूजन विधि, कथा और महत्व(What is Bhishma Panchak Vrat? Know the puja vidhi, katha and importance)

भीष्म पंचक व्रत क्या होता हैं? जानें पूजन विधि, कथा और महत्व(What is Bhishma Panchak Vrat? Know the puja vidhi, katha and importance):-कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तक किया जाता है, इसलिए भीष्म पंचक या महाभारत भीष्म पंचक या विष्णु पंचक या पंच भीखम कहते है। इस दिन स्नानादि से शुद्ध होकर पापों के नाश और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के लिए व्रत का संकल्प करें।



पंचक को ज्योतिष शास्त्र में अनिष्टकारी एवं नुकसान दायक होने से मांगलिक कर्म के कार्यों को करना वर्जित माना जाता है। लेकिन भीष्म पंचक में समस्त मांगलिक कार्य को किया जा सकता है। भीष्म पंचक को हिन्दुधर्म ग्रन्थों में बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। सबसे पहले भीष्मदेव ने भीष्म पंचक व्रत को करने से भीष्मदेव के नाम पर ही भीष्म पंचक पड़ा था। धर्म गर्न्थो में कार्तिक मास को एक बहुत ही पवित्र एवं पुण्य दायक माना जाता हैं, इस मास में स्नान को भी बहुत महत्व दिया हैं और इस मास में जो मनुष्य व्रत करते हुए पवित्र नदी में स्नान करते हैं, उनका जीवन मोक्ष गति को पा लेते हैं। सर्वप्रथम भीष्मदेव नें भीष्म पंचक व्रत को किया था। ऐसे तो कार्तिक मास पूर्ण रूप से पवित्र एवं पुण्यदायक होता हैं, लेकिन कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि से लेकर पूर्णिमा तिथि तक पांच दिवस बहुत ही पावनकारी माने गए हैं। जो मनुष्य पूरे कार्तिक मास में स्नान नहीं कर पाते हैं और वे मनुष्य केवल कार्तिक मास की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक पांच दिवस स्नान करने पर उस मनुष्य को पूरे कार्तिक मास में मिलने वाले पुण्य का फल केवल पांच दिवस स्नान से मिल जाता हैं। इसलिए मनुष्य को पांच दिवस में प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपनी दैनिकचर्या को पूर्ण करते स्नान करना चाहिए। 



What is Bhishma Panchak Vrat? Know the puja vidhi, katha and importance



भीष्म पंचक व्रत के पांच दिनों के रूप:-भीष्म पंचक व्रत में पांच दिनों को अलग-अलग रूप में मनाया जाता है, जो इस तरह हैं।



◆पहले दिन को हरि या देव प्रबोधिनी एकादशी व्रत के रूप में मनाया जाता है।



◆दूसरे दिन को तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।



◆तीसरे दिन विश्वेश्वर व्रत के रूप में मनाया जाता है।



◆चौथे दिन मणिकर्णिका स्नान के रूप में मनाया जाता है।



◆पांचवें दिन को कार्तिक पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता हैं।




धर्मग्रन्थों के अनुसार तर्पण एवं अर्घ्य के विषय के मन्त्र:-भीष्म पंचक या विष्णु पंचक के पांच दिन तक मनुष्य को पवित्र नदी जैसे-गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा या गोदावरी नदी में स्नान करना चाहिए, जिससे मनुष्य के द्वारा किये गए धर्म व नीति के विरुद्ध पतित कर्मो से मुक्ति मिल जावे और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो सके। इसलिए भीष्मदेव को तर्पण करते समय निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए तर्पण करना चाहिए। इस व्रत में गंगा पुत्र भीष्म की इच्छा पूरी होने से शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण का कायदा हैं।




भीष्म तर्पण के लिए मंत्र:-भीष्म को तृप्त करने के लिए अपने मन को पवित्र एवं एकाग्रचित्त करते हुए निम्नलिखित मन्त्र के द्वारा तर्पण करना चाहिए। यह तर्पण प्रतिवर्ष करना सभी वर्णों के लिए श्रेयस्कर हैं।



"ऊँ वैयाघरा पाद्य गोत्रया समकृति प्रवरया च


अपुत्रया ददमयेतत सलिलम भीष्मवर्मन।


सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने।


भीष्मायेतद् ददाम्यर्घ्यमाजन्म ब्रह्मचारिणे।।



अर्थात्:-जीवनभर सांसारिक बंधनो से दूर रहते हुए सात्विक जीवन को धारण करने वाले श्रेष्ठ पाप एवं दोष से रहित सत्य बोलने की प्रतिज्ञा के प्रति पूर्ण भक्ति भाव को रखने वाले गंगानन्दन महात्मा भीष्म को मैं अर्घ्यं देता हूँ।




भीष्म अर्घ्यंदान देने का मन्त्र:-जिन मनुष्य को सांसारिक जीवन के जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति पानी होती हैं और अपना उद्धार चाहते हैं, उनको निम्नलिखित मन्त्र के द्वारा अर्घ्य या जल, फल-फूल आदि सामग्री को पूजा में चढ़ाने के योग्य होती हैं।



वैयाघ्रद गोत्राय सांकृत्यप्रवराय च।


अपुत्राय ददाम्येतदुदकं भीष्मवर्मणे।


वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च।


अर्घ्यं ददानि भीष्माय आजन्म ब्रह्मचारिणे।।


अर्थात्:-जो व्याघ्रपद या बाघ के समान चिन्हों से गोत्र वाले और सांकृत वंश में जन्म लेने वाले और पुत्र सन्तान से रहित भीष्म को मैं जल रूपी अर्घ्यं अर्पण करता हूँ। जिन्होंने वसुओं के लिए अवतार लिया हैं, राजा शान्तनु के पुत्र में जन्म लिया हैं। जिन्होंने जीवनभर सांसारिक बंधनो से दूर रहते हुए सात्विक जीवन को धारण करने वाले भीष्म को मैं अर्घ्यं का जल अर्पण करता हूँ। जिन मनुष्य दम्पति को पुत्र सन्तान की अधूरी इच्छा को पूर्ण करना हैं, उनको अपनी भार्या सहित भीष्म पंचक व्रत को धारण करते हुए तर्पण एवं अर्घ्य देने पर एक साल के भीतर पुत्र सन्तान की प्राप्ति इस व्रत के असर से हो जाती है और धर्म एवं नीति के विरुद्ध किये गए पतित आचरणों का प्रभाव समूल नष्ट हो जाता हैं। इसलिए प्रत्येक भारतीय को प्रयत्नपूर्वक इसका अनुष्ठान करना चाहिए।




भीष्म पंचक व्रत की पूजा सामग्री के रूप में:-पंचगव्य (दूध, दही, घृत, गोबर, गोमूत्र), चन्दन आदि से निमित सुंगधित जल, इत्र आदि गन्ध से युक्त , कुंकुम, अबीर, गुलाल, केसर, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य आदि हैं।




भीष्म पंचक व्रत की पूजा विधि-विधान या भीष्म पंचक व्रत कैसे करे?:-मनुष्य को निम्नलिखित रूप से श्री भीष्म पंचक व्रत में श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जो इस तरह हैं- 



◆मनुष्य को घर के आंगन या नदी के तट पर चार दरवाजों वाला मंडप बनाकर गाय के गोबर से लीप देना चाहिए। 



◆बाद में सर्वतोभद्र की बेदी बनाकर उस पर तिल भरकर कलश स्थापित करें।



◆पांचों दिन काम, अर्थ, क्रोध आदि का त्याग करके ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया और उदारता धारण करनी चाहिए। 



◆पांच दिनों के इस व्रत को भीष्म ने भगवान वासुदेव से प्राप्त किया था।



◆प्रथम दिन पाँच दिन के व्रत का संकल्प लिया जाता हैं और देवताओं, ऋषियों और पितरों को श्रद्धा सहित याद किया जाता हैं।



◆इस व्रत में लक्ष्मीनारायणजी की मूर्ति बनाकर उनका पूजन किया जाता है। 



◆अर्घ्य के बाद श्री हरि विष्णुजी का वैसे तो पूजन षोडशोपचार कर्म से पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जिससे धर्म एवं नीति के विरुद्ध किये गए पतित आचरणों का नाश हो जावें।



◆पंचगव्य (दूध, दही, घृत, गोबर, गोमूत्र), चन्दन आदि से निमित सुंगधित जल, इत्र आदि गन्ध से युक्त , कुंकुम, अबीर, गुलाल, केसर, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य आदि से पूजन करना चाहिए।



पूजन में सामान्य पूजा के विशेष पूजा अतिरिक्त करने हेतु:-निम्नलिखित रूप से भी पूजा करनी चाहिए- 



◆पहले दिन देव उत्थान एकादशी में:-भगवान के ह्रदय का कमल के पुष्पों से पूजन किया जाता हैं



◆दूसरे दिन तुलसी विवाह में:-भगवान की जांघ या कटि प्रदेश का बिल्वपत्रों से पूजन किया जाता हैं।



◆तीसरे दिन विश्वेश्वर व्रत में:-भगवान की नाभि पर सुंगधित इत्र एवं घुटनों का केतकी के पुष्पों से पूजन किया जाता है।



◆चौथे दिन मणिकर्णिका स्नान:-भगवान के कन्धे पर जावा कस फूल एवं चरणों का चमेली के पुष्पों से पूजन किया जाता हैं।



◆पाँचवे दिन कार्तिक पूर्णिमा में:-भगवान के सिर पर मालती के फूल एवं सम्पूर्ण विग्रह या अंग का तुलसी की मंजरीयों से पूजन करना चाहिए।



◆ततपश्चात "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र से भगवान वासुदेव की पूजा करनी चाहिए।



◆श्रीविष्णुजी के नजदीक में भीष्म पंचक व्रत के पांच दिन कार्तिक माह के शुक्लपक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक लगातार घृत से परिपूर्ण दीपक की लौ बिना बुझे प्रज्वलित होनी चाहिए।



◆फिर भगवान श्रीविष्णुजी को फल एवं मिठाई का भोग के रूप में नैवेद्य को अर्पण करना चाहिए।



◆मौन होकर "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए।



◆फिर मनुष्य को पूजा करने के बाद अपने मन को स्थिर रखते हुए श्रीविष्णुजी को मन मन्दिर में स्थापित करके उनको याद करने के लिए उनका ध्यान करना चाहिए।




प्रणाम:-भगवान श्रीविष्णुजी को नतमस्तक होकर नमस्कार करना चाहिए।



"ओम् भीष्मः संतानव बिरह सत्यवादी जितेन्द्रियः


अभिर्दभिर्वपतन पुत्रपौत्रोचितम क्रियाम।"



अर्थात्:-हे श्रीविष्णुजी! मैं भीष्म सन्तान से रहित, अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहने वाला सत्यनिष्ठ, समस्त इन्द्रियों पर विजित और पुत्र-पौत्रों की चित की निर्मलता के लिए एवं जन्म-मारण के बंधन की मुक्ति हेतु आपको नतमस्तक होकर नमस्कार करता हूँ।



◆फिर ध्यान करने के बाद नतमस्तक होकर उनकी वंदना करनी चाहिए।



◆मनुष्य को प्रातःकाल एवं सायंकाल दोनों ही समय पर भगवान श्रीविष्णुजी का गुणगान पांच दिनों तक नियमित रूप से करना चाहिए।



◆मनुष्य को रात्रिकाल में पृथ्वी माता की गोद में बिस्तर करके सोना चाहिए।



◆मनुष्य को सांसारिक बंधनो से दूर रहते हुए सात्विक जीवन को धारण करने वाले श्रेष्ठ पाप एवं दोष से रहित सत्य बोलने की प्रतिज्ञा के प्रति पूर्ण भक्ति भाव को रखना चाहिए।



◆भीष्म पंचक में क्या खाना चाहिए?:-मनुष्य को शुद्ध सात्विक भोजन को आहार के रूप ग्रहण करना चाहिए। या कंदमूल, फल, दूध या हविष्य या विहित सात्विक आहार जो यज्ञ के दिनों में किया जाता हैं।



◆मनुष्य को भीष्म पंचक व्रत में भगवान श्रीविष्णुजी के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर उनका ही गुणगान समय को बिताना चाहिए।



◆जिन औरत के पति का स्वर्गवास हो गया हैं, उन औरतों को अपने जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति के लिए भीष्म पंचक का व्रत करना चाहिए।



◆मनुष्य को पूर्ण विधान पूर्वक भीष्म पंचक व्रत को करते हुए समापन करना चाहिए।



◆भीष्म पंचक व्रत एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक पांच दिन तक किया जाता हैं।



◆मनुष्य को भीष्म पंचक व्रत के पांच दिन तक अन्न को ग्रहण नहीं करना चाहिए।



◆इसके अलावा व्रत के आखिरी दिन में हवन करना चाहिए और "ऊँ विष्णुवे नमः स्वाहा" मंत्र से घी, तिल और जौ की 108 आहुतियां देकर हवन करना चाहिए।



◆व्रत करने वाले मनुष्यों व्रती को ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का अपनी इच्छानुसार मन ही मन में उच्चारण करना चाहिए।



◆यथाशक्ति के अनुसार ब्राह्मण को धेनु दान, वस्त्र दान और रुपयों-पैसों से युक्त दक्षिणा का दान देकर उनको सन्तुष्ट करते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।



◆फिर मनुष्य को स्वयं भोजन करना चाहिए।



◆मनुष्य को पानी में थोड़ा सा गोझरण डालकर पंचभीष्म स्नान करने से व्याधि एवं दोष नाशक और पाप नाशक हो जाते हैं  हैं।



◆भीष्म पंचक व्रत में पंचगव्य गाय का दूध, दही, घृत, गोबर रस एवं गोझरण का मिश्रण का सेवन करना चाहिए।  



◆इस व्रत में सामर्थ्यनुसार बिना भोजन के, फलाहार, एक समय भोजन करके, मिताहार या नक्तव्रत करना चाहिए।



◆इस तरह से पूर्ण विधि-विधान से भीष्म पंचक व्रत करने से श्रीविष्णुजी की अनुकृपा मनुष्य पर हो जाती है और मनुष्य के मन की मुराद को श्रीहरि पूर्ण कर देते हैं।





भीष्म पंचक व्रत विधान गरुड़ पुराण के अनुसार:-भीष्म पंचक व्रत में पांच दिनों तक भगवान श्रीविष्णुजी को पांच दिन तक विधान बताया है, जिसमें मनुष्य को अलग-अलग रूप में प्रसाद को ग्रहण करने के बारे में गरुड़ पुराण में बताया गया है, जो इस तरह हैं- 



◆श्रीविष्णुजी के नजदीक में भीष्म पंचक व्रत के पांच दिन कार्तिक माह के शुक्लपक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक लगातार घृत से परिपूर्ण दीपक की लौ बिना बुझे प्रज्वलित होनी चाहिए।



◆मौन होकर हमेशा "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए।



◆मनुष्य को प्रातःकाल एवं सायंकाल दोनों ही समय पर भगवान श्रीविष्णुजी का गुणगान पांच दिनों तक नियमित रूप से करना चाहिए।




◆मनुष्य को रात्रिकाल में पृथ्वी माता की गोद में बिस्तर करके सोना चाहिए।



◆हमारे देश में अधिकतर स्त्रियां एकादशी तिथि को व्रत रखते हुए श्रीविष्णुजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।



◆द्वादशी तिथि को निराहार रहते हुए मनुष्य को पृथ्वी माता की गोद में बैठकर गोमूत्र का सेवन मन्त्रों के उच्चारण से करना चाहिए।



◆त्रयोदशी तिथि को सगहार या दुग्ध का सेवन करना चाहिए।




◆चतुर्दशी को निराहार रहते हुए केवल दधि का सेवन करना चाहिए।



◆इस तरह लगातार चार दिनों तक व्रत करते हुए अपनी देह और आत्मा को पवित्र करना चाहिए।




◆पूर्णिमा तिथि के दिन मनुष्य को स्नान करके एवं निराहार रहकर भगवान चक्रपाणि जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।



◆मनुष्य को अपनी श्रद्धाभाव एवं सामर्थ्य के अनुसार प्रतिपदा को प्रातःकाल द्विज दम्पत्ति या ब्राह्मणदेव को भोजन करना चाहिए।  




◆मनुष्य के द्वारा सात्विक एवं शाकाहार से निर्वाह करते हुए श्रीकृष्णजी के पूजन में सलंग्न रहना चाहिए।



◆भीष्म पंचक व्रत में रात्रिकाल में पंचगव्य गाय का दूध, दही, घृत, गोबर रस एवं गोझरण का मिश्रण का सेवन करना चाहिए। 




◆फिर मनुष्य को अन्न को ग्रहण करना चाहिए।




◆मनुष्य के द्वारा विधिवत शास्त्रों में वर्णित पूजन करने पर उत्तम फल को भोगने वाला होता हैं।



◆मनुष्य भीष्म पंचक व्रत को नियमों के अनुसार संकल्प से युक्त करते हैं, उन मनुष्य को उत्तम पद मिलता हैं।



◆कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक समस्त तरह के धर्म व नीति के विरुद्ध पतित आचरणों से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को सुबह जल्दी उठकर स्नान करके, 'श्रीविष्णुसहस्त्रणाम' और 'भगवद्गीता' का वांचन करना एवं सुनने से जीवन में समस्त विकारों का शमन हो जाता हैं।





भीष्म पंचक व्रत की पौराणिक कथा:-महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में सिर शैय्या पर शयन कर रहे थे। तभी भगवान कृष्ण को साथ लेकर पांचों पांडव उनके पास आये। उपयुक्त अवसर समझकर धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से प्रार्थना की कि आप हम लोगों को कुछ उपदेश दें। तब युधिष्ठिर की इच्छानुसार भीष्म पितामह ने पांच दिनों तक राजधर्म, वर्णधर्म, मोक्षधर्म आदि पर महत्त्वपूर्ण उपदेश दिए। उनका उपदेश सुनकर श्रीकृष्ण बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने कहा कि "पितामह! "आपने कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिनों में जो धर्मजय उपदेश दिया हैं, उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इसकी स्मृति में आपके नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित करता हूँ। जो लोग इसे करेंगे, वे संसार में अनेक कष्टों से मुक्त हो जायेंगे। उन्हें पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहेगी। वे जीवन भर विविध सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त करेंगे। तब से आज तक श्रद्धालु इस व्रत को करके धर्म लाभ उठा रहे हैं।






भीष्म पंचक व्रत का महत्व पुराणों एवं धर्मग्रन्थों के अनुसार:-भीष्म पंचक व्रत आश्विन माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि या शरद पूर्णिमा से शुरुआत होकर कार्तिक माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को पूर्ण होता हैं। इस तरह भीष्म पंचक व्रत कार्तिक माह की एकादशी तिथि से लेकर पूर्णिमा तिथि तक पांच दिनों तक चलता हैं। भीष्म पंचक के पहले दिन में हरि प्रबोधिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है।




भगवान श्रीकृष्णजी के अनुसार भीष्म पंचक व्रत का महत्त्व:-भगवान श्रीकृष्णजी ने महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद अपनी देह के उद्धार के लिए पांच दिनों तक भीष्म पंचक व्रत को धारण किया था। जिससे उनकी देह को मोक्ष मिल जावें। मनुष्य अपने जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति एवं धर्म व नीति के विरुद्ध किये गए पतित आचरणों से मुक्ति के लिए भीष्म पंचक व्रत को पांच दिन तक धारण करके व्रत करते हैं, जिससे उनके परिवार के सदस्यों को किसी भी तरह की व्याधि का सामना नहीं करना पड़े और सन्तान की असमय मृत्यु से भी रक्षा हो सके।





पद्म पुराण के अनुसार महत्व:-पद्मपुराण के अनुसार भीष्म पंचक व्रत भगवान श्रीविष्णुजी को खुश करने का होता हैं, जो कि कार्तिक माह में आता हैं, कार्तिक माह भगवान श्रीविष्णुजी को बहुत ही प्यारा होता हैं, इस माह में जो मनुष्य प्रातःकाल जल्दी उठकर अपनी दैनिकचर्या को पूर्ण करते हुए स्नान करते हैं, उनको समस्त तीर्थ जगहों में स्नान का पुण्य फल मिल जाता हैं।



कृतिका वृत्तिं विप्रं यतोक्तं किं करम यम दुतह पलयन्ते सिम्हम


द्रष्ट्वा यथा गजः श्रीस्तम विष्णु विप्र तत् तूल्या न सत्यम् मखः


क्रत्वा फ्रतुम उरजे स्वार्ग्यम वैकुंठम कृतिका व्रती। (पद्मपुराण)



गरुड़ पुराण में भीष्म पंचक व्रत की प्रार्थनाओं एवं अनुष्ठान:-भीष्म पंचक कथा में अभीष्ट प्राप्ति के लिए संकल्पित मांगलिक कर्मकाण्ड या सुफल एवं सफलता के लिए देवी-देवता की आराधना एवं निवेदन गरुड़ पुराण में भीष्म पंचक कथा में वर्णित की गई हैं।



भीष्म पंचक व्रत के लाभ:-भीष्म पंचक व्रत को करने से मनुष्य को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं, जो इस तरह हैं-



1.महापातकों के अंत हेतु:-मनुष्य के द्वारा किये गए समस्त तरह के धर्म व नीति के विरुद्ध पतित आचरणों से मुक्ति पाने हेतु भीष्म पंचक व्रत को करना चाहिए, जिससे उन महापातकों से मुक्ति मिल सके।


2.जीवन में व्याप्त विकारों का अंत:-मनुष्य के द्वारा भीष्म पंचक व्रत की कथा को सुनने एवं दूसरों को सुनाने मात्र से भी समस्त विकारों का शमन हो जाता हैं।


3.दाम्पत्य जीवन में सन्तान सुख की चाहत हेतु:-रखने वाले दम्पत्ति को इस व्रत को करने पर पुत्र सन्तान की प्राप्ति होती हैं।


4.मोक्षगति पाने हेतु:-जो मनुष्य अपने जीवन में उद्धार चाहते हैं, उन मनुष्य को नियमित रूप से भीष्म पंचक व्रत करना चाहिए। जिससे मनुष्य का उद्धार हो जावें और मोक्षगति मिल जावें। 


5.उत्तम फल पाने हेतु:-मनुष्य के द्वारा भीष्म पंचक व्रत को धारण करके सही रीति से करने पर उत्तम फल की प्राप्ति हो जाती हैं। उत्तम पद पाने हेतु:-मनुष्य के द्वारा नियमित रूप से भीष्म पंचक व्रत को संकल्प को धारण करके करने से मनुष्य को उत्तम पद प्राप्त होता हैं।


6.व्याधियों से मुक्ति पाने हेतु:-व्याधियों से मुक्ति पाने का उत्तम उपाय हैं।

 



Friday, December 2, 2022

December 02, 2022

दत्तात्रेय जयंती कब हैं? जानें शुभ मुहूर्त एवं मन्त्र (When is Dattatreya Jayanti? Know shubh time and mantra)

दत्तात्रेय जयंती कब हैं? जानें शुभ मुहूर्त एवं मन्त्र (When is Dattatreya Jayanti? Know shubh time and mantra):-मार्गशीर्ष महीने की शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को दत्त पूर्णिमा या दत्तात्रेय जयन्ती कहा जाता है। ऋषिवर अत्रि एवं अनसूया के पुत्र के रूप में त्रिदेवों ने श्रीदत्तात्रेय जी के अवतार के रूप में पूर्णिमा तिथि के प्रदोषकाल में लिया था। उनके जन्मदिन के रूप में भारतवर्ष में पूर्ण रूप से खुशी एवं उत्साह से मनाया जाता हैं। त्रिदेवों के संयुक्त रूप में इस दिन भगवान दत्तात्रेय जी की पूजा-अर्चना की जाती है। जो मनुष्य इस दिन अपने मन में संकल्प लेते हुए श्रीदत्तात्रेय जी को मन में धारण करते हुए उनका उपवास करते हुए अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने पर बहुत ही पुण्य मिलता हैं। इस पूर्णिमा तिथि के दिन नदी-सरोवर आदि में स्नान आदि करने से भी मनुष्य के बुरे कर्मों के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिलती हैं। मार्गशीर्ष महीने का आखिरी दिन होता हैं।


When is Dattatreya Jayanti? Know shubh time and mantra




हिन्दुधर्म शास्त्रों के अनुसार किसी भी मांगलिक कार्यों को करते समय मुहूर्त के बारे जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। जिससे मनुष्य का मांगलिक कार्य को सही समय पर पूर्ण विधिपूर्वक कर सके। दिनांक 07 दिसम्बर 2022 में दत्तात्रेय जयंती का पर्व रहेगा।  इस दिन जो शुभ मुहूर्त रहेगा, उसका विवरण इस तरह रहेगा:



विशेष:-यह सभी तरह की पंचांग सूचना नई दिल्ली के अक्षांश 28.636 और देशांतर 77.224 और time zone 5.5 के अनुसार है।



श्रीदत्तात्रेय जयंती पूजन का शुभ मुहूर्त:-श्रीदत्तात्रेय जयंती के दिन पूजन का शुभ मुहूर्त इस तरह रहेगा-



तिथि के प्रारम्भ का दिन व समय:-07 दिसम्बर 2022 को मार्गशीर्ष महीने के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि बुधवार के दिन प्रातःकाल 08 बजकर 00 मिनिट 52 सेकण्ड पर शुरू होगी।


 

तिथि के समाप्ति का दिन व समय:-जो कि 08 दिसम्बर 2022 को गुरुवार के दिन प्रातःकाल 09 बजकर 37 मिनिट 07 सेकण्ड पर समाप्त होगी। दत्तात्रेय जी का पूजन कर सकते हैं।



विशेष:-आज के दिन सर्वाथ सिद्धि योग प्रातःकाल 07:24 से प्रातः(कल) 31:17 रहेगा।



सर्वाथ सिद्धि योग:-आज के दिन सर्वाथ सिद्धि योग होने से जिन मांगलिक कामों कोई मुहूर्त नहीं मिलने पर सर्वाथ सिद्धि मुहूर्त में मांगलिक और दूसरे सभी काम करने से काम में सफलता मिलती हैं। 



योग के प्रारम्भ का दिन व समय:-07 दिसम्बर 2022 को सिद्ध योग प्रातः 26 बजकर 52 मिनट 49 सेकंड तक रहेगा। 



उसके बाद साध्य योग शुरू होगा, जो कि 08 दिसम्बर 2021 को प्रातःकाल 27 बजकर 10 मिनट 19 सेकंड तक रहेगा।



इस तरह 07 दिसंबर 2021 को पूर्णिमा तिथि के दिन सिद्ध योग व 08 दिसंबर 2021 को साध्य योग रहेगा।




दिन के चौघड़िया के समय से जानें पूजन मुहूर्त को:- जो निम्नलिखित हैं-


लाभ का चौघड़िया:-प्रातःकाल 07:02 से 08:20 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



अमृत का चौघड़िया:-प्रातःकाल 08:20 से 09:37 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



शुभ का चौघड़िया:-प्रातःकाल 10:55 से 12:12 तक रहेगा, जो कि शुभ  कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



चर का चौघड़िया:-दोपहर 14:48 से 16:05 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



लाभ का चौघड़िया:-सायंकाल 16:05 से 17:23 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



रात के चौघड़िया के समय से जानें मुहूर्त को:-जो निम्नलिखित हैं-



शुभ का चौघड़िया:-रात्रिकाल 19:05 से 20:48 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के शुभ रहेगा।



अमृत का चौघड़िया:-रात्रिकाल 20:48 से 22:30 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



लाभ का चौघड़िया:-प्रातः(कल) 27:38 से 29:20 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।




08 दिसंबर 2021 में दिन के चौघड़िया के समय से जानें पूजन मुहूर्त को:-जो निम्नलिखित हैं-


शुभ का चौघड़िया:-प्रातःकाल 07:03 से 08:20 तक रहेगा जो कि शुभ कार्य को करने के लिए शुभ रहेगा।



दत्तात्रेय जयन्ती व्रत की पूजन विधि:-इस दिन त्रिदेवों का पूजन विधि-विधान जैसे-पीले रंग की वस्तुएं, हरिद्रा, सिंदूर, चन्दन, पीली मिठाई, अगरबत्ती, दीपक एवं धूपबत्ती आदि से षोडशोपचार कर्म से करना चाहिए, नदी या सरोवर जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। फिर आखिर में माफी मांगते हुए अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए।




श्रीदत्तात्रेयजी को खुश करने के मन्त्र:-मनुष्य को दत्तात्रेय जी को खुश करने के लिए निम्नलिखित मन्त्रों का वांचन करना चाहिए-




दत्तात्रेय बीज मंत्र:-दत्तात्रेयजी का बीज मंत्र का वांचन करने से त्रिदेवों की स्तुति हो जाती हैं और त्रिदेवियों की भी स्तुति हो जाती हैं, जिससे मनुष्य के जीवन का उद्धार हो जाता हैं और परम् धाम को पा लेता हैं।



दक्षिणामूर्ति बीजम च रामा बिकेन संयुक्तम्।


द्रम इत्यक्षक्षाराम गनम बिंदूनाथाकलातमकम


दत्तास्यादि मंत्रस्य दत्रेया स्यादिमाश्रवह


तत्रैस्तृप्य सम्यक्त्वं बिन्दुनाद कलात्मिका


येतत बीजम् मयापा रोक्तम् ब्रह्म-विष्णु-शिव नामकाम।



दत्तात्रेय जी के नाम का बीज मंत्र:- "ऊँ द्रां" बीज मंत्र के उच्चारण से मनुष्य को दत्तात्रेय जी का आशीर्वाद मिल जाता हैं।



दत्त गायत्री मंत्र:-"ऊँ दिगंबराय विद्मये योगीश्रारय् धीमही तन्नो दतः प्रचोदयात'' दत्त गायत्री मंत्र का वांचन करने से मनुष्य के मन में अच्छी सोच एवं जीवन में आध्यात्मिक भाव उत्पन्न होते हैं।



तंत्रोक्त गायत्री मंत्र:-"ऊँ द्रां दत्तात्रेयाय नमः" तंत्रोक्त गायत्री मंत्र के वांचन करना चाहिए।



दत्तात्रेय जी का महामंत्र:-"दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा" मन्त्र का वांचन करना चाहिए।



दत्तात्रेय जी का महामंत्र:-मन में बुरी भावनाओं पर विजय पाने हेतु मनुष्य को 'ऊँ श्री गुरुदेव दत्त' और 'श्री गुरु दत्तात्रेय नमः आदि मन्त्रों को मन में उच्चारित करना चाहिए।  



इसके अनुरूप एक भजन-


सबको नाच नचा गई रे सोने की चिड़ियां,


सबको नाच नचा गई रे सोने की चिड़ियां


उड़के चिड़ियां जब लंका पर बैठी,


उड़के चिड़ियां जब लंका पर बैठी


सोने की लंका जला गई रे सोने की चिड़ियां,


सोने की लंका जला गई रे सोने की चिड़ियां


उड़कर चिड़ियां जब नारद पर बैठी,


उड़कर चिड़ियां जब नारद पर बैठी


बन्दर का मुखड़ा बना गई रे सोने की चिड़ियां,


बन्दर का मुखड़ा बना गई रे सोने की चिड़ियां


उड़कर चिड़ियां ब्रह्मा, विष्णु, महेश पर बैठी,


उड़कर चिड़ियां ब्रह्मा, विष्णु, महेश पर बैठी


सबको झूला, झूला गई रे सोने की चिड़ियां,


सबको झूला, झूला गई रे सोने की चिड़ियां




श्रीदत्तात्रेय जी की जयन्ती के व्रत करने का महत्त्व:-दत्तात्रेय उपनिषद में कहा गया हैं, श्रीदत्तात्रेय जी की जयंती के दिन व्रत को रखकर दत्तात्रेय जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जिससे दत्तात्रेय जी मनुष्य की पूजा-अर्चना से खुश हो जावे और अपना आशीर्वाद दे देवे। इसलिए दत्तात्रेय जयंती का महत्त्व इस तरह हैं-


 

◆इस दिन व्रत करने से व्रती के समस्त तरह के किये हुए धर्म एवं नीति के विरुद्ध आचरणों से छुटकारा मिल जाता हैं। 



◆मनुष्य को जीवन में सभी तरह के आनन्द एवं वैभव मिल जाता हैं। 



◆मनुष्य को गृहस्थी सुख की प्राप्ति होती हैं और गृहस्थी जीवन में बिना किसी तरह के क्लेश से छुटकारा मिल जाता हैं। 


◆मनुष्य के जीवन में बनते हुए कार्यों में बाधा आने से छुटकारा मिल जाता हैं। 



◆मनुष्य का मन सही रूप से कार्य करता हैं और शरीर में किसी भी तरह के बुरे विकार नहीं आते हैं।


◆मनुष्य को अनावश्यक रूप डर से छुटकारा मिल जाता हैं। 


◆मनुष्य को जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती हैं और मनुष्य को मोक्ष मिल जाता हैं। 



Sunday, October 9, 2022

October 09, 2022

शरद पूर्णिमा क्यों मनाते हैं? जानें व्रत पूजा विधि, कथा और महत्व(Why celebrate Sharad Purnima? Know Vrat Puja vidhi, katha and Importance)

शरद पूर्णिमा क्यों मनाते हैं? जानें व्रत पूजा विधि, कथा और महत्व(Why celebrate Sharad Purnima? Know Vrat Puja vidhi, katha and Importance):-आश्विन मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा कहा जाता है हैं। इस व्रत में प्रदोष और निशीथ दोनों में होने वाली पूर्णिमा भी जाती हैं। यदि पहले दिन निशीथ-व्यापिनी और दूसरे दिन प्रदोष व्यापिनी न हो तो पहले दिन व्रत करना चाहिए। शरद पूर्णिमा की रात्रिकाल में चन्द्रमा सोलह कलाओं से युक्त होकर मन को हरणे वाली अपनी शीतल किरणों से जगत को रोशन करता हैं एवं शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा की चांदनी में अमृत निवास रहता हैं। उसकी किरणों से अमृतत्त्व व आरोग्य की प्राप्ति सुलभ होती हैं। 








 


शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?(Why Sharad Purnima is celebrated?):-इसका विवरण निम्नलिखित हैं।





धर्म शास्त्रों के अनुसार:-भगवान श्रीकृष्णजी ने शरद पूर्णिमा में गोपियों के साथ रासलीला की था, इसलिए बृज में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, इसे "कोजागरी पूर्णिमा" या "कोजागर व्रत" या "मोह रात्रि" या "रास पूर्णिमा" "रासोत्सव" या "कौमुदी व्रत महोत्सव" भी कहते हैं। माता महालक्ष्मीजी शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि काल में संसार में घूमने के लिए निकलती हैं, लक्ष्मीजी रात्रिकाल में कौन जाग रहा हैं व कौन नहीं जाग रहा हैं, उनका निरीक्षण करने के लिए निकलती हैं और जो मनुष्य रात्रिकाल में जागते हुए लक्ष्मीजी की पूजा करने वाले मनुष्य के निवास स्थान में स्थिर रूप से वास करते हुए एवं जागते रहने वाले मनुष्य पर अपनी अनुकृपा करके सुख-समृद्धि का आशिर्वाद प्रदान कर देती हैं। इसलिए मनुष्य शरद पूर्णिमा की रात्रिकाल में अधिकांश मनुष्य जागते रहते हैं और माता लक्ष्मीजी की अनुकृपा पाने हेतु इसलिए शरद पूर्णिमा में भगवान विष्णुजी, लक्ष्मीजी और तुलसी माता की पूजा-अर्चना की जाती हैं।






ज्योतिष शास्त्र के अनुसार:-शरद पूर्णिमा तिथि के दिन मंगलवार का संयोग अनेक वर्षों में होता हैं, जब यह संयोग होता हैं, तब उस रात्रिकाल में चन्द्रमा पूरे वर्ष में अपनी पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होता हैं और अपनी शीतल व मन को हरणे वाली किरणों से जगत में उजाला करते हैं, इसलिए इस तिथि को महापूर्णिमा कहा जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर रात भर चाँदनी किरणों में उत्तर भारत के मनुष्य के द्वारा रखने की परंपरा हैं, जिससे चन्द्रदेव के द्वारा अपनी अमृततुल्य किरणों से उस खीर में अमृत उत्पन्न हो सके।






शरद पूर्णिमा व्रत विधान:-शरद पूर्णिमा के व्रत को करते समय व्रत की विधि-विधान की जानकारी लेकर ही व्रत करने से उचित व्रत का फल मिलता हैं, शरद पूर्णिमा व्रत विधि-विधान निम्नलिखित हैं-



◆मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त के प्रातःकाल समय में जल्दी उठना चाहिए।


◆फिर अपनी रोजमर्रा की चर्या जैसे-शौच, दातुन, स्नानादि से निवृत होना चाहिए।


◆फिर स्वच्छ कपड़ों को पहनना चाहिए।


◆मनुष्य को सांसारिक बंधनों से दूर रहते हुए सात्विक जीवन को बिताने की सोच रखते हुए व्रत को पूर्ण रूप से करने का संकल्प मन में धारण करना चाहिए।


◆फिर मिट्टी से निमित कलश या ताम्र धातु के कलश को चावल आदि पर स्थापित करना चाहिए।



◆फिर ऐरावत पर आसठ इन्द्र और स्वर्णमयी महालक्ष्मी की मूर्ति या कोई चित्र वाली फोटू को उस कलश पर कपड़े से ढ़ककर स्थापित करना चाहिए।



◆इस दिन प्रातःकाल अपने आराध्य देव को सुंदर वस्त्राभूषण से सुशोभित करना चाहिए।



◆फिर उनका यथा विधि षोडशोपचार कर्म से लक्ष्मीजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। उपवास करना चाहिए।



इन्द्र देव का पूजन करना चाहिए


◆पूर्ण चन्द्रमा के मध्य आकाश में स्थित होने पर उनका पूजन कर अर्ध्य प्रदान करना चाहिए।


◆शाम को खीर बनाकर चन्द्रमाजी को भोग लगाना चाहिए।


 

◆जब सायंकाल के समय एवं रात्रि के समय चन्द्रदेवजी का उदय होने पर मिट्टी या स्वर्ण या रजत या ताम्र धातु से निमित घृतपूरित और गन्ध, पुष्पादि से पूजित एक सौ आठ या यथा शक्ति इससे भी अधिक दीप को प्रज्ज्वलित करके देव-मन्दिरों, बाग-बगीचों, तुलसी, अश्रत्थ वृक्षों के नीचे तथा भवनों में रखना चाहिए।



◆फिर घृत के मिश्रण में खीर को बनाकर, चपडों, शक्कर आदि को थाली में अलग-अलग पात्रों में डालकर रात्रिकाल में छंत पर खुली चन्द्रमा की चाँदनी में रखना चाहिए। जिससे रात्रि के समय चन्द्र की किरणों द्वारा अमृत गिरता हैं। 



◆तत्पश्चात जब तीन घण्टे का समय या एक प्रहर बीत जाने पर समस्त पात्रों में रखी हुई खीर या अर्धरात्रि के समय गौ दूध से बनी खीर का भगवान एवं माता लक्ष्मीजी को भोग लगाना चाहिए।



◆अपराह्न में हाथियों का नीराजन करने का भी विधान हैं।



उसके बाद में श्रद्धाभाव ब्राह्मणों को घी-शक्कर मिश्रित खीर रूपी प्रसाद को आहार के रूप में ग्रहण करना चाहिए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। 



◆फिर अपने श्रद्धाभाव के अनुसार मनुष्य को ब्राह्मणों को बढ़िया कपड़ो का दान देना चाहिए। 



◆सामर्थ्य के अनुरूप ही ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उनको सन्तुष्ट करके विदा करना चाहिए।



◆इसके साथ में स्वर्ण के दीपक देने से अनन्त फल की प्राप्ति होती हैं।


◆इस दिन श्रीसूक्त लक्ष्मी स्तोत्रं का पाठ ब्राह्मण द्वारा करवाना चाहिए।


◆ब्राह्मणों के द्वारा इस दिन कमल गट्टा, बेल, पंचमेवा अथवा खीर द्वारा दशांग हवन करवाना चाहिए।


◆इस दिन कांस्य पात्र में घी भरकर सुवर्ण सहित ब्राह्मण को दान देने से मनुष्य ओजस्वी होता हैं।


◆रात्रि जागरण करते हुए धार्मिक गीत को गाना चाहिए।


◆फिर प्रातःकाल में दैनिकचर्या स्नानादि से निवृत होकर लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी मूर्ति को ब्राह्मण को दे देना चाहिए।



शरद पूर्णिमा पर खीर खाने का महत्त्व:-आश्विन मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि की रात्रि से शरद ऋतु की शुरूआत होती हैं, जिससे शीत की ठंड से मनुष्य के शरीर में राहत पाने के हेतु गर्म प्रदार्थो को आहार के रूप में उपयोग लेने से शरीर को गर्मी पहुंच सके और ठंड से राहत मिल सके। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात में रखी हुई खीर में जो चन्द्रमा की सोलह कलाओं की युक्त अमृत तुल्य होती हैं। जिसको सेवन करने से जीवन को देने ऊर्जा मिल सके।



शरद पूर्णिमा व्रत की कथा:-एक साहूकार के दो बेटियां थी। दोनों कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करती थी। बड़ी बहिन तो व्रत पूरा करती थी और छोटी बहिन अधूरा व्रत करती थी। तब उन्हें बच्चा होते ही मर जाते, यानी बच्चा जीवित नहीं रहते। एक दिन छोटी बहिन ने पण्डितजी को बुलाकर पूछा कि मेरे बच्चे जीवित नहीं रहते हैं, उनका जन्म होते ही मर जाते हैं। जब पण्डितजी ने कहा-तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इस कारण तुम्हारे बच्चे जीवित नहीं रहते हैं।



आप व्रत पूरा करोगे तो आपके बच्चे जीवित रहेगें। छोटी बहिन ने अब पूरे विधि-विधान से व्रत पूरे किए, लेकिन फिर भी थोड़े दिन बाद लड़का होकर मर गया। उस मरे हुए बच्चे को उठाकर पलंग पर सुला दिया और चादर से ढ़क दिया। फिर बड़ी बहिन को बुलावा भेजा। बड़ी बहिन पलंग पर सोते हुए बच्चे को छूते ही लड़का रोने लगा।



जब छोटी बहिन ने कहा कि यह आपके पुण्य प्रताप से मेरा लड़का जीवित हुआ हैं। हम दोनों का पूर्णिमा का व्रत करती थी। आप तो पूरा व्रत करती थी, लेकिन मैं अधूरा व्रत करती थी। इडके दोष से मेरे बच्चे जीवित नहीं रहते हैं। आपके छूते ही बच्चा जैसे गहरी नींद से उठ गया और वैसे ही रोने लगा। हे पूर्णिमा माता! जैसे छोटी बहिन की गोद भर, वैसे ही सभी की गोद भरना और जो कोई भी पूर्णिमा का व्रत करे तो वह पूरा व्रत करें।




शरद पूर्णिमा की रात्रि को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?:-विजयदशमी से शरद पूर्णिमा तक चन्द्रमा अपनी शीतल व मन को हरणे वाली किरणों में अमृततुल्य रस एवं शरीर में शक्ति देने की शक्ति होती हैं। जिससे मनुष्य वर्ष भर जीवन को खुशी पूर्वक और बिना किसी तरह की व्याधि से रहित रह सके। मनुष्य को विजयदशमी से शरद पूर्णिमा तक हमेशा रात्रिकाल में पन्द्रहरा से बीस मिनिट तक चन्द्रमा की तरफ एक नजर दृष्टि से देखते रहने पर मनुष्य की चक्षु की ज्योति बढ़ने लगती हैं और चक्षु से सम्बंधित व्याधि से भी राहत मिलती हैं।




देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार होते हैं, इसलिए जब मनुष्य की इन्द्रियाँ में दुर्बलता होने पर उनको पूर्ण रूप से मजबूती पाने हेतु चन्द्रदेव की शीतल किरणों में खीर को रखना चाहिए और भगवान को खीर का भोग लगाते हुए अश्विनीकुमारों से अरदास करना चाहिए। हे अश्विनीकुमारों! आप इन्द्रियों को बल व ओज शक्ति को बढ़ावें। इस तरह से अरदास करने के बाद खीर को मनुष्य को ग्रहण करना चाहिए।




जब शुक्लपक्ष की पूर्णिमा और कृष्णपक्ष की अमावस्या तिथि के समय चन्द्रमा के असर के कारण समुद्र में उथल-पुथल होकर ज्वार भाटा को उत्पन्न करता हैं, तब चन्द्रमा के द्वारा उत्पन्न ज्वार भाटा से पृथ्वी पर बहुत ही कम्पन होती हैं, जिससे पृथ्वी पर निवास करने वाले जीव-जंतुओं सहित मानव के शरीर में विद्यमान जलीय तत्व, सात धातुएँ-रस, रक्त, माँस, मेद अस्थि, मज्जा, शुक्र व अण्ड, एवं सात रंग जैसे-लाल, पिला, सफेद, काला, पिला, भूरा, बैंगनी आदि पर असर चन्द्रमा की किरणों का पड़ता हैं, इस तरह इस समय में मनुष्य के द्वारा काम वासना का भोग करने पर अपंग सन्तान या असाध्य घातक व्याधि होने की प्रबल संभावना बनती हैं। जब मनुष्य इन समय में निराहार रहकर, दैहिक व आध्यात्मिक पवित्रता के लिए मन में संकल्प करते हुए साधु-संतों के साथ रहते हुए कर्म करने पर देह में मजबूती व ताजगी के साथ व्याधि से मुक्त हो जाते हैं, जिससे चित्त में पवित्रता उत्पन्न हो जाती हैं और ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं।




शरद पूर्णिमा उद्यापन विधि:-पूर्णिमा का उजमणा पूर्णिमा का व्रत झेलने के बाद ही करें। 



◆उजमणा में एक बड़े कटोरे में एक चूनड़ी, चूडों, शक्कर, मेवा, सुहाग का सामान भरकर सासुजी को पैर छूकर देवे। 


◆अगर श्रद्धा हो तो ब्राह्मणी को भी भोजन करावें।



◆सामग्री तीस आदमी एक जोड़ा-जोड़ी के कपड़े व सुहाग छाबड़ा, इकतीस लोटा, इकतीस सुपारी, इकतीस जनेऊ जोड़ा, इकतीस छोटे उपवस्त्र व इच्छानुसार दक्षिणा सहित भेंट देना चाहिए।



शरद पूर्णिमा तिथि के व्रत को करने का महत्व-शरद पूर्णिमा तिथि के व्रत को करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-



1.आंखों की दृष्टि बढ़ाने हेतु:-जो मनुष्य शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमाजी की रोशनी में सुई को धागे में पिरोने का बार-बार प्रयास करना चाहिए, जिससे मनुष्य की आंखों में रोशनी तेज होकर बढ़ जाती हैं।



2.श्वास से तकलीफ से मुक्ति पाने हेतु:-शरद पूर्णिमा की रात्रि श्वास रोग से ग्रसित मनुष्य के लिए जीवन दायक होती हैं।



3.गर्भवती औरत के गर्भ की रक्षा हेतु:-शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा की पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त किरणों का प्रभाव जब गर्भवती औरत की कुक्षि पर पड़ने से गर्भ में स्थित गर्भ का पूर्ण विकास होकर मजबूत अंग-प्रत्यंगों से युक्त हो जाता है। इस तरह से वर्ष भर में शरद पूर्णिमा की एक रात्रि के प्रभाव से गर्भ के लिए औषधियों की तरह किरणें असर करती हैं।



4.माता लक्ष्मीजी को खुश करके उनकी अनुकृपा पाने हेतु:-शरद पूर्णिमा तिथि के व्रत को करके माता लक्ष्मीजी को खुश किया जा सकता हैं और उनकी अनुकृपा प्राप्त की जा सकती हैं, जिससे मनुष्य को रुपयों-पैसों का सुख मिल जाता हैं और जीवन में खुशहाली भर जाती हैं।




5.मानसिक विकारों से राहत:-मनुष्य पर माता लक्ष्मीजी की अनुकृपा होने से मनुष्य को समस्त तरह से सुख-ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है और मन में उत्पन्न नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं।



6.दाम्पत्य जीवन में सुख-शांति:-मनुष्य को दाम्पत्य जीवन में उत्पन्न होने लड़ाई-झगड़े एवं आपसी मतभेद आदि से राहत मिल जाती हैं।



7.समस्त तरह की व्याधियों से राहत:-मनुष्य को शारिरिक व्याधियों से राहत मिलता  हैं।



शरद पूर्णिमा के दिन द्वादश राशियों के मनुष्य को सुख-समृद्धि को प्राप्त करने के लिए योग्य प्रयोग या उपाय:-शरद पूर्णिमा के दिन द्वादश राशियों के मनुष्य को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए।




1.मेष राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-मेष राशि वाले मनुष्य को शरद पूर्णिमा के दिन अविवाहित लड़की को अपने निवास स्थान में चावल व दूध से बनी हुई पायस को खिलाना चाहिए और दुग्ध में चावल को धोना चाहिए और उस धुले हुए दुग्ध मिश्रित तरल को नदी या तालाब या बहते हुए जल में प्रवाहित करने से मनुष्य की समस्त तरह की वेदनाओं का निवारण हो जाता हैं और जीवन में खुशहाली भर जाती हैं।



2.वृषभ राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-वृषभ राशि का स्वामी ग्रह भृगु देव होते हैं और वृषभ राशि में सोम ग्रह उच्च राशि के मालिक होते हैं। इसलिए वृषभ राशि वाले मनुष्य को शरद पूर्णिमा के दिन शुक्रदेव को खुश करना चाहिए, जिससे मनुष्य को लौकिक व सांसारिक जरूरतों की पूर्ति हो सके। मनुष्य को धेनु का घृत एवं दधि को मन्दिर में जाकर जरूरत मन्द को दान देना चाहिए।


  

3.मिथुन राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-मिथुन राशि का मालिक ग्रह बुध होता हैं, जब बुध ग्रह का मेल चन्द्र ग्रह के साथ होता हैं, तब मनुष्य अपने निर्णय लेने में स्थिर नहीं रह पाता हैं, जिससे उसको किसी भी कार्य में कामयाबी नहीं मिल पाती हैं, इसलिए मनुष्य को शरद पूर्णिमा के दिन दुग्ध एवं चावल को गरीब मनुष्य को दान के रूप में देना चाहिए, जिससे मन में स्थिरता रहते हुए मनुष्य अपना उचित निर्णय लेकर प्रगति की राह को पा सके।



4.कर्क राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-कर्क राशि का मालिक ग्रह चन्द्रमा होते हैं, स्वयं की राशि होने से मनुष्य को अपने मन में सकारात्मक भाव को उत्पन्न करने के लिए और बिना मतलब की मानसिक चिंता से मुक्त रहने हेतु मनुष्य को शरद पूर्णिमा के दिन दुग्ध को मिश्री में मिश्रित करके मंदिर में दान के रूप में देना चाहिए। 



5.सिंह राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-सिंह राशि का मालिक ग्रह सूर्यदेव होते हैं, इसलिए मनुष्य को अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए एवं रुपयों-पैसों की बढ़ोतरी हेतु, गुड़ का दान मन्दिर परिसर में करने से आत्मविश्वास एवं रुपयों-पैसों से सम्बंधित राहत मिलती हैं। 



6.कन्या राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-कन्या राशि वाले मनुष्य को तीन से दस वर्ष की उम्र वाली अविवाहित लड़कियों को अपने निवास स्थान पर आदरयुक्त पूजन करके खीर को खिलाना चाहिए, जिससे कार्य क्षेत्र में उन्नति मिल सके। 



7.तुला राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-तुला राशि के मनुष्य को अपनी राशि के मालिक शुक्र ग्रह को खुश करना चाहिए, जिससे मनुष्य को शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक सुख-ऐश्वर्य में बढ़ोतरी के लिए शरद पूर्णिमा के दिन मनुष्य को गाय से बना शुद्ध देसी घृत, दुग्ध और चावल को धार्मिक जगहों पर दान करने से सुख-समृद्धि में बढ़ोतरी होती हैं। 



8.वृश्चिक राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-वृश्चक राशि में जन्में मनुष्य की राशि का मालिक ग्रह मंगल होता हैं, जब चन्द्रमा से सयोंग होता हैं, तब लक्ष्मी योग का निर्माण होता हैं, इसलिए मनुष्य को शरद पूर्णिमा के दिन अपने जीवन में रुपयों-पैसों में बढ़ोतरी करने के लिए और निवास स्थान में सुख-शांति में बढ़ोतरी के लिए मनुष्य को मंगल ग्रह से सम्बंधित जैसे-गुड़, आदि वस्तुओं और अविवाहित लड़कियों को चांदी का व दुग्ध का दान करना चाहिए।



 

9.धनु राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-धनु राशि में जन्में मनुष्य की राशि का मालिक ग्रह गुरु होते हैं। जिससे मनुष्य के ज्ञान क्षेत्र में उन्नति मिल सके। इसलिए मनुष्य को शरद पूर्णिमा के दिन पीले कपड़ों, चने की दाल और पीले पुष्प को दान करना चाहिए।




10.मकर राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-मकर राशि में जन्में मनुष्य को अपनी राशि के मालिक ग्रह शनि ग्रह को बलवान करने के लिए शनि ग्रह से सम्बंधित दान एवं उपाय को करना चाहिए और मनुष्य को अपनी मन की मुराद को प्राप्त करने हेतु चावल को नदी या तालाब में प्रवाहित करना चाहिए।




11.कुम्भ राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-कुम्भ राशि में जन्में मनुष्य को अपनी राशि के मालिक शनि ग्रह को ज्यादा बलवान करने के लिए शनि ग्रह के उपाय एवं नेत्रहीनों को भोजन करवाने पर फायदा मिलता हैं। 




12.मीन राशि वाले मनुष्य के द्वारा करने योग्य उपाय:-मीन राशि में जन्में मनुष्य को सुख-समृद्धि को पाने हेतु ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।