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Friday, October 22, 2021

ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं अर्थ सहित(Rina Mochaka mangal stotra with meaning)

                     

ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं अर्थ सहित(Rina Mochaka mangal stotra with meaning):-ऋण मोचक मङ्गल स्तोत्रं मंगलदेव को खुश करने का स्तोत्रं होता हैं, इस स्तोत्रं में मंगलदेव जी के समस्त इक्कीस नामों का वर्णन मिलता है, जिनका उच्चारण करने से किसी भी तरह के कर्ज से मुक्ति मिल जाती हैं। जिन मनुष्य ने अपने जीवनकाल में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए दूसरों मनुष्य से कर्ज लिया होता है, आवक की कमी होने पर समय पर नहीं चुका पाते हैं, जिससे कर्ज के भार से मनुष्य का जीवन नरकमयी बनता चला जाता हैं। मनुष्य बहुत मेहनत करता है, लेकिन कर्ज उतरने की बजाय बढ़ता चला जाता है, जिससे मनुष्य निराश हो जाता है और कुछ मनुष्य तो गलत कदम उठाकर अपनी जीवनलीला को समाप्त कर देते है। इन सभी तरह की परेशानियों का अंत ऋण मोचक मंगल स्तोत्रं एकमात्र उपाय होता हैं।





इस ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं का जो मनुष्य कर्ज में डूबे हुए वे अपनी श्रद्धा एवं विश्वास से नियमित रूप से वांचन करते है तो उनका कर्ज एकदम तो खत्म नहीं होता है लेकिन निश्चित रूप से उनकी आवक में बढ़ोतरी होकर धीरे-धीरे समाप्त होने लगता हैं। समस्त मनुष्य जानते है कि मंगल का सम्बंध हनुमानजी से माना जाता है और हनुमानजी को सभी तरह की परेशानियों से छुटकारा दिलाने वाले माने गए हैं। इस ऋण मोचक मंगल स्तोत्रं में हनुमानजी के प्रतीक मंगल की आराधना के रूप बताया गया हैं।




Rina Mochaka mangal stotra with meaning




ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं के पाठ की विधि:-ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं के पाठ को पूर्णरूप से विधि से करने पर फल की प्राप्ति होती है, इसकी विधि इस तरह हैं:



◆सबसे पहले किसी भी माह के शुक्लपक्ष की कोई शुभ तिथि का चयन करना चाहिए, जिसमें यह ध्यान रखना होता हैं, की वह शुभ तिथि के दिन मंगलवार होवे। 



◆मंगलवार को हनुमानजी का दिन माना जाता हैं और मंगल का भी दिन होता है, जो कि कर्ज से मुक्ति दिलाने में अहम रोल अदा करता हैं।



◆सबसे पहले अपने मन में प्रबल इच्छा शक्ति से ऋण मोचक मंगल स्तोत्रं कस पाठ के वांचन का संकल्प अपने इष्टदेव को साक्षी मानकर करना चाहिए।



◆उसके बाद जिस मंगलवार को मंगल स्तोत्रं का पाठ करने के दिन में प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र को धारण करना चाहिए।



◆उसके बाद में अपने घर के पूजा घर के स्थान की जगह को साफ करना चाहिए।



◆उसके बाद में बाजोठ पर लाल कपड़ा बिछाकर उस बाजोठ पर मंगल यंत्र एवं भगवान पवनपुत्र हनुमानजी की प्रतिमा को स्थापित करना चाहिए।



◆फिर हनुमानजी को चमेली के तेल में सिंदूर को मिलाकर मालिपन्ना पर लगाकर चोला पहनना चाहिए।



◆फिर प्रतिमा के दायीं तरफ तो सरसो या तिल या चमेली के तेल से भीगी हुई बत्ती का दीपक एवं प्रतिमा के बायें तरफ शुद्ध गाय के घृत को रुई या नाड़ाछड़ी की बनी हुई बत्ती को दीपक में रखकर घृत से भरकर स्थापित करना चाहिए।



◆भगवान पवनपुत्र जी को चने व गुड़ का एवं बेसन की बनी हुई किसी भी मिठाई का भोग के रूप में अर्पण करना चाहिए।



◆मंगलदेवजी या मंगल यंत्र को प्राण प्रतिष्ठित कर एवं पवनपुत्र हनुमानजी के सम्मुख ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं का पाठ करने से पूर्व मनुष्य को लाल रंग या केसरिया रंग के कपड़ों को पहन कर करना चाहिए।



◆ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं के पाठ का वांचन अपने सामर्थ्य के अनुसार अपनी इच्छा के अनुसार जैसे एक, तीन, पांच, सात, नौ या ग्यारहा की संख्या में वांचन करना चाहिए।



◆ऋणमोचक मंगल स्तोत्रं के पाठ को नियमित रूप से तैयालिस दिन तक अपनी मन की इच्छा की पूर्ति तक करते रहना चाहिए।



◆इस तरह नियमित रूप से वांचन करने से अवश्य ही मंगल देव एवं हनुमानजी की कृपा दृष्टि प्राप्त हो जाती है, जिससे मनुष्य के लिए कर्ज के भार से मुक्ति मिलकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती हैं।




अथ श्रीऋण मोचक मंगल स्तोत्रं का अर्थ सहित वर्णन:-श्री ऋण मोचन मंगल स्तोत्रं के मन्त्रों भावों के अर्थ सहित विवरण से मनुष्य को इस स्तोत्रं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है, की इस स्तोत्रं में क्या-क्या बताया गया है। इसलिए किसी भी स्तोत्रं के पाठ को करने से पूर्व उसके अर्थ को जानना भी जरूरी होता है, जिससे मनुष्य को उस स्तोत्रं के महत्त्व की जानकारी प्राप्त हो जाती है और उस स्तोत्रं के शब्दों को अच्छी तरह से सच्चे मन से श्रद्धाभाव से उच्चारित करता है।



मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।


स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मावरोधकः।।1।।


भावार्थ्:- हे मंगलदेव जी! आपके जो नाम शास्त्रों में बताये गए हैं, उनमें से पहला नाम मंगल, दूसरा नाम भूमिपुत्र जिनका जन्म पृथ्वी से उत्पन्न हुआ हो, तीसरा नाम ऋण हर्ता या कर्ज को हरण करने वाले, चौथा नाम धनप्रद या धन को देने वाले, पांचवा नाम स्थिरासन या जो अपने आसन के स्थान पर अड़िग रहने वाले,छठा नाम महाकाय या बहुत बड़े देह वाला, सातवां नाम सर्वकमावरोधक समस्त तरह के कार्य की बाधा को हटनाने वाले होते हैं।



लोहितो लोहिताङ्गश्च सामगानां कृपाकरः।


धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः।।2।।


भावार्थ्:-हे मंगलदेव जी! आपके नामों में आठवाँ नाम लोहित, नवा नाम लोहितांग, दशवा नाम सामगानां, कृपाकर अर्थात् सामग ब्राह्मणों के ऊपर अपनी कृपा दृष्टि को रखने वाले, ग्यारहवा नाम धरात्मज या पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बारहवां नाम कुज, तेहरवा नाम भौम, चौदहवाँ नाम भूतिद अर्थात् ऐश्वर्य को देने वाले, पन्द्रहवां नाम भूमिनन्दन अर्थात् पृथ्वी को आनन्द देने वाले।



अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।


वृष्टे कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः।।3।।


भावार्थ्:-हे मंगलदेव जी! आपके नामों में सोलहवाँ नाम अंगारक, सत्रहवाँ नाम यम, अठहरवा नाम सर्व रोगापहारक अर्थात् समस्त तरह की व्याधियों को दूर करने वाले, उन्नीसवाँ नाम वृष्टिकर्ता अर्थात् वृष्टि करने वाले या वर्षा के जल को कराने वाले, बीसवाँ नाम वृष्टिहर्ता अर्थात् वृष्टि को न कर अकाल डालने वाले और इक्कीसवाँ नाम सर्वकाम फलप्रद अर्थात् सम्पूर्ण कामनाओं के फल को देने वाले होते हैं।



एतानि कुजनामानि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।


ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्।।4।।


भावार्थ्:-जो मनुष्य मंगलदेव के उपर्युक्त बताए गए इक्कीस नाम का वांचन सच्चे मन से एवं विश्वास से करते है, उन मनुष्य को ऋण-कर्ज नहीं होता हैं और उन मनुष्य को धन की प्राप्ति जल्दी हो जाती हैं।



धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्ति-समप्रभम्।


कुमारं शक्तिहरतं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।।5।।


भावार्थ्:-हे अंगारक!आप की उत्पत्ती पृथ्वी के गर्भ से हुई हैं, आपकी आभा तो आकाश में कड़कने वाली दामिनी के समान होती हैं, समस्त तरह की शक्ति को धारण करने वाले कुमार मंगलदेव को नतमस्तक होकर अभिवादन करता हूँ।



स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत् पठनीयं सदा नृभिः।


न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।।6।।


भावार्थ्:-हे मंगलदेवजी! आपके मंगल स्तोत्रं का पाठ मनुष्यों को हमेशा अपने मन में किसी भी तरह के विकार से एवं अपनी पूर्ण श्रद्धा एवं आस्था से नियमित रूप करना चाहिए। जो भी मनुष्य इस मंगल स्तोत्रं का पाठ करते हैं और दूसरों को सुनाते हैं, उनको मंगल से प्राप्त विपत्ति की थोड़ी सी पीड़ा नहीं होती हैं।



अङ्गारक! महाभान! भगवन्! भक्तवत्सल!


त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय।।7।।


भावार्थ्:-हे अंगारक अर्थात् अग्नि की ज्वाला से जलने वाले ! महाभाग अर्थात् पूजनीय हो, भगवान या ऐश्वर्यशाली, भक्तों के प्रति वात्सल्य या प्रेम रखने वाले भौम आपको हम नतमस्तक होकर अभिवादन करते हैं। आप हमारे ऊपर किसी दूसरे से लिया हुआ उधार को पूर्ण करवा कर उस कर्ज को सदैव के लिए दूर कीजिए।



ऋणरोगादि-दारिद्रयं ये चाऽन्ये ह्यपमृत्यवः।


भय-क्लेश-मनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।।8।।


भावार्थ्:-हे मंगलदेव! मेरे ऊपर किसी दूसरे का कोई बकाया को समाप्त कीजिए, किसी भी तरह की व्याधि हो तो उसको भी दूर कीजिए। मेरी गरीबी को दूर कीजिए एवं अकाल मृत्यु को दूर कीजिए। मुझे किसी भी तरह का डर, क्लेश तथा मन में दुःख हो तो उसे भी हमेशा के लिए दूर कीजिए।



अतिवक्र! दुराराध्य! भोगमुक्तजितात्मनः।


तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।9।।


भावार्थ्:-हे मंगलदेव! आप बहुत ही टेढ़ी प्रकृति को, आपको सन्तुष्ट करना बहुत ही कठिन होता है, आप तो मुश्किल से प्रसन्न होने वाले भगवान मंगल देव, आप जब किसी पर अपनी कृपा की बारिश करते हो तो उसको समस्त तरह के सुखों-समृद्धियों से युक्त सार्वभौम सत्ता दे सकते हो, जब आप किसी पर नाराज होते हो तब उसकी सार्वभौम सत्ता को तहस-नहस करके समाप्त कर देते हो।



विरिञ्च-श्क्र-विष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।


तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः।।10।।


भावार्थ्:-हे महाराज!आप जब भी किसी से अप्रसन्न होते है, तब किसी पर भी अपनी अनुकृपा दृष्टि से हीन कर देते हो। आप नाखुश होने पर ब्रह्माजी, इन्द्र देव एवं विष्णुजी के भी साम्राज्य-सम्पत्ति को नष्ट कर सकते हो फिर मेरे जैसे मनुष्य की तो बात ही क्या है। इस तरह के शौर्य से सम्मिलित होने के कारण आप सबसे शक्तिशाली तथा सबसे बड़े राजा हो।



पुत्रान् देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गताः।


ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः।।11।।


भावार्थ्:- हे भगवन! आप से अरदास करता हूँ कि आप मुझे सन्तान के रूप में पुत्र प्रदान करे, मैं आपके द्वार पर आया हूँ आप मेरी मनोकामना को पूर्ण करे। मेरे ऊपर किसी तरह से भी किसी दूसरे से उधार लिया हुआ धन नहीं रहे, मेरे को दूसरों के आगे हाथ फैलाना नहीं पड़े, मेरी गरीबी को दूर कीजिए, मेरे सभी तरह के कष्ट या क्लेश को दूर कीजिए और जो मेरे दुश्मन बन चुके हैं उनके डर से मुझे आप मुक्त कराएं।



एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।


महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा।।12।।


भावार्थ्:-जो भी मनुष्य इन बारह श्लोकों वाले ऋण मोचन मंगल स्तोत्रं से भौम ग्रह की वंदना करते है, उन मनुष्य पर मंगल भगवान खुश होकर उस मनुष्य को बहुत ही अधिक मात्रा में रुपये-पैसों को प्रदान कराते हैं, जिससे वह मनुष्य इस पृथ्वी लोक में सबसे अधिक रुपये-पैसों से युक्त होकर समस्त तरह के सुख-सम्पत्ति को प्राप्त करके दूसरे कुबेर भगवान की तरह धन-संपत्ति का स्वामी बन जाता है और वह मनुष्य उम्र में अधिक होने पर भी हमेशा युवा बना रहता है उस पर आयु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता हैं।



   ।।इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।



।।अथ ऋण मोचक मंगल स्तोत्रं।।


मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।


स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मावरोधकः।।1।।


लोहितो लोहिताङ्गश्च सामगानां कृपाकरः।


धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः।।2।।


अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।


वृष्टे कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः।।3।।


एतानि कुजनामानि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।


ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्।।4।।


धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्ति-समप्रभम्।


कुमारं शक्तिहरतं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्।।5।।


स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत् पठनीयं सदा नृभिः।


न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्।।6।।


अङ्गारक! महाभान! भगवन्! भक्तवत्सल!


त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय।।7।।


ऋणरोगादि-दारिद्रयं ये चाऽन्ये ह्यपमृत्यवः।


भय-क्लेश-मनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।।8।।


अतिवक्र! दुराराध्य! भोगमुक्तजितात्मनः।


तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।9।।


विरिञ्च-श्क्र-विष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।


तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः।।10।।


पुत्रान् देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गताः।


ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः।।11।।


एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।


महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा।।12।।


।।इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।