घर की नकारात्मक ऊर्जा की पहचान करके दूर करने के उपाय (Remedies to identify and remove negative energy from your home):-प्राचीन काल से मनुष्य के लिए निवास स्थान जीवन का एक अहम हिस्सा माना गया है। प्रत्येक जीव-जंतु व मनुष्य अपने परिवार के सदस्यों को सुख व आराम प्रदान करने के लिए अपने-अपने निवास के लिए निवास स्थान को बनाते हैं और उस निवास स्थान को सभी तरह से शुद्ध व पवित्र बनाएं रखने के लिए उसकी नियमित साफ-सफाई किया करते हैं। जिस परिवार में सुबह-शाम साफ-सफाई होती है, वहां अच्छे विचार एवं सुबुद्धि होती है और अच्छे विचार एवं सुबुद्धि ही अनेक तरह के वैभव या धन-दौलत की कारक है। इसलिए मनुष्य को अपने घर में शुद्ध अवस्था में ही प्रवेश करना चाहिए। जिस घर में दूषित या मलिन होकर प्रवेश किया जाता है, वहां का सद् वातावरण प्रभावित होता है और तकरार तथा कलह के कारण उत्पन्न हो जाते हैं। जिस निवास स्थान में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती हैं, तब उस नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करके उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए ज्योतिष शास्त्र में बहुत सारी बातों के बारे में बताया गया हैं। उसी तरह वास्तु शास्त्र में भी नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए अन्तिम परिणाम हवा एवं पानी का सही तालमेल या मेलजोल के द्वारा संभव हैं।
कुछ वास्तुग्रंथों में तो कहा गया है कि:-मत्स्यपुराण और गरुड़पुराण सहित समरांगण सूत्रधार में निवास स्थान की स्वच्छता एवं रोजाना सफाई को जरूरी कहा गया है। बिना उपयोग किये हुए निवास स्थान यदि एक मास भी बेकार पड़ा रहा जाए तो पुनः वास्तु शांति कराई जाए। चीनी वास्तु के मत में यह नकारात्मक ऊर्जा के जमा होने का कारण है और इससे बचना चाहिए।
शास्त्रों में कहा गया है कि:-घर की समृद्धि और स्वच्छता बनाएं रखने के लिए स्पष्ट कहा गया हैं-
निवेशनद्वारे पिचुमन्दपत्राणि
विदृश्याचम्योकं अग्निं गोमयं गौर-
सर्षपांस्तैलमालभ्या श्मानमाक्रम्य प्रविष्यन्ति।।
अर्थात्:-शास्त्रों में नकारात्मक ऊर्जा को संतुलित करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए और उपायों करना चाहिए।
◆मनुष्य को कभी अपने निवास स्थान पर मृतक के अंतिम संस्कार करने के बाद दूषित या अशुद्ध होने पर नहीं प्रवेश करना चाहिए।
◆यदि मनुष्य को कभी मृतक के अंतिम संस्कार में जाना पड़ जाता हैं, तब दाहकर्म के बाद वापस आने पर नीम की पत्तियां चबानी चाहिए।
◆मनुष्य को पूजा, यज्ञ आदि आरम्भ करने से पहले अपने शरीर शुद्धि के लिए मंत्र को पढ़ते हुए जल को ग्रहण करना चाहिए।
◆मनुष्य को अग्नि से हाथ सेंककर जल पात्र को छूकर, गोबर, श्वेत सरसों या सर्षिप जैसी मंगलप्रद वस्तुओं को छूकर और सर्वप्रथम किसी पायदान या कालीन की बजाय शिला पर ही कदम रखकर निवास स्थान में प्रवेश करना चाहिए। ऐसी आज्ञा पारस्कर गृहसूत्र में सर्वप्रथम आई है।
आज्ञा प्रकारान्तर में कहा गया है कि:-घर की समृद्धि और स्वच्छता बनाएं रखने के लिए आज्ञा प्रकारान्तर से याज्ञवल्क्य स्मृति में स्पष्ट कहा गया हैं-
विदश्य निंबपत्राणि नियता द्वारि वेश्मनः।
आचम्यागन्यादि सलिलं गौमयं गौरसर्षपान्।।
अर्थात्:-मनुष्य को दाहकर्म से लौटकर आने पर नीम की पत्तियों को चबाकर, आचमन करके, अग्नि से हाथ को तपाकर, पानी के बर्तन को स्पर्श करके, गोबर, श्वेत सरसों या सर्षिप जैसी शुभकारी वस्तुओं को स्पर्श करके ही अपने आशियाने में जाना चाहिए।
विशेष रूप से:-ईशान कोण में पूजा स्थल और आग्नेय कोण में रसोई स्थल तथा आंगन में ब्रह्म स्थान पर दूषित या अशुद्ध होने पर कभी नहीं जाना चाहिए।
◆इसीलिए स्मृतियों में पवित्रता का पालन हमेशा करने के निर्देश दिए गए हैं।
◆हमेशा अपनी पवित्रता को बनाएं रखते हुए रोजाना पंचमहायज्ञ, ब्रह्मयज्ञ या देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव यज्ञ, पितृयज्ञ आदि करने चाहिए।
◆अपने निवास स्थान में नियमित रूप से शास्त्रों का पठन-पाठन करना चाहिए।
◆साथ ही मनुष्य को अपने निवास स्थान में आये हुए मेहमान का अतिथि सत्कार अनिवार्यतः करने का निर्देश मिलता है।
◆यह सद्गगृहस्थ का लक्षण और परिवार के फलने-फूलने के लिए आवश्यक नियम भी हैं।
