Breaking

Sunday, September 20, 2026

पूजा से पहले संकल्प क्यों किया जाता हैं? जानें अर्थ, विधि, मंत्र और पौराणिक महत्व (Why resolution is done before puja? Know Meaning, vidhi, Mantra and Puranic importance)

पूजा से पहले संकल्प क्यों किया जाता हैं? जानें अर्थ, विधि, मंत्र और पौराणिक महत्व (Why resolution is done before puja?  Know Meaning, vidhi, Mantra and Puranic importance):-हिन्दुधर्म शास्त्रों में धार्मिक कर्म को करते समय सबसे पहले मनुष्य को संकल्प को लेना चाहिए, जिससे जिस पूजा-कर्म का संकल्प मनुष्य लेता है, उस पूजा-कर्म के बंधन में बंध जाता हैं और अपने मन को पूर्ण रूप से सम्बंधित पूजा-कर्म को समर्पित कर सके। यदि मनुष्य पूजा-कर्म को करते समय संकल्प को ग्रहण नहीं करते हैं, तो उस समन्धित पूजा-कर्म का फल प्राप्त नहीं हो पाता हैं।





Why resolution is done before puja?  Know Meaning, vidhi, Mantra and Puranic importance






प्राचीन रूढ़ि परम्पराओं के अनुसार:-जब मनुष्य के द्वारा पूजनादि कर्म को करते समय संकल्प को नहीं लिया जाता हैं, तो उस पूजाकर्म का सम्पूर्ण फल इंद्रदेव को मिल जाता हैं। इसलिए मनुष्य को पूजा करते समय संकल्प लेना चाहिए, जिससे मनुष्य को सम्बन्धित पूजा का फल मिल सके।


संकल्प सम एवं कल्प दो शब्दों से मिलकर बना हैं।


सम का अर्थ:-पूर्णता, साथ अच्छा होता हैं।


कल्प का अर्थ:-वेद के छह अंगों में से एक जिसमें यज्ञ, बलि आदि संस्कारों की विधियाँ बताई गई है, उसे कल्प कहते हैं।



संकल्प का मतलब या अर्थ:-मांगलिक धार्मिक कृत्य एवं शुभ कर्मों को जो कि वेद के छह अंगों में से एक जिसमें यज्ञ, बलि आदि संस्कारों की विधियाँ बताई गई हैं, उनको वाणी से शब्दों को उच्चारित विधि-विधान से करने की दृढ़ इच्छा या प्रतिज्ञा को संकल्प कहते हैं।



संकल्प का अर्थ:-धर्म शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के द्वारा स्वयं को अपने इष्टदेव को साक्षी मानते हुए अपने धार्मिक पूजा कर्म को मन में आये किसी बुरे विचारों को त्याग कर अपने इष्टदेव की पूजा में समर्पित करने को संकल्प कहा जाता हैं, जिससे मनुष्य की समस्त मन की मुराद को पूर्ण करने के लिए कर रहे पूजा कर्म को पूर्ण श्रद्धाभाव रखते हुए अपने मन को सम्बन्धित पूजाकर्म में पूर्णरूपेण समर्पित करते हुए उस पूजाकर्म को पूर्ण करना होता हैं।



सामान्यतयः किसी कार्य या उद्देश्य की पूर्ति के लिए दृढ़ता के साथ संकल्प किया जाता है। संकल्प में जितनी दृढ़ता, आशा और विश्वास होगा, उस कार्य अथवा उद्देश्य के पूर्ण होने की संभावना उतनी ही प्रबल होगी। इसी प्रकार धार्मिक कार्यों को पूर्ण करने हेतु संकल्प का विधान है।



वास्तव में धार्मिक कार्यों (पूजा-पाठ और कर्मकांडों) को श्रद्धा-भक्ति, विश्वास और तन्मयता के साथ पूर्ण करने वाली धारणा शक्ति का नाम ही 'संकल्प' है। यह तथ्य विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि दान एवं यज्ञ आदि सद्कर्मों का पुण्य फल तभी प्राप्त होता है, जबकि उन्हें संकल्प के साथ पूरा किया गया हो।



संकल्प मन्त्र एवं संकल्प मन्त्र का विवेचन:-हिन्दुधर्म में धार्मिक पूजाकर्म को करते समय मनुष्य को अपने इष्टदेव को साक्षी मानते हुए उस कार्य को पूर्ण करने के लिए एक बंधन में बंधना पड़ता हैं, जिससे उस कार्य को पूर्णरूपेण मन को केंद्रित करते हुए पूर्ण कर सके। 



प्राचीन ऋषि-मुनियों के द्वारा समय का मापन आकाशीय चाल को मूल फलक मानते हुए किया हैं, वही समय की कोई अंत न होने का सफर और जो समय चल रहा हैं, उस समय के साथ सम्बन्ध को स्थापित करके समाज में सभी को समानता के साथ मनुष्य इस कालावधि के स्वरूप को अपने विचार में रखते हुए उसका अनुसरण कर सके। इस कालावधि का अनुसरण करने के लिए विलक्षण प्रबंध को बनाया।



हिन्दुधर्म में किसी भी तरह के मांगलिक या धार्मिक कर्म जैसे-इष्टदेव या इष्टदेवी की पूजा कर्म, हवन-यज्ञादि कर्म, भूमिपूजन, वास्तुनिर्माण का प्रारंभ हो, गृह प्रवेश हो, जन्म से सम्बंधित, विवाह से सम्बंधित आदि को करने से पहले धर्म से सम्बंधित आस्था रखने वाले को शास्त्र सम्मत व्यवस्था को अपनाते हैं। इन सब धार्मिक कर्मों को करते समय सबसे पहले दृढ़ इच्छा रखते हुए अपने कर्म को कराया जाता हैं। जो प्राचीन समय नष्ट नही हो उस समय से लेकर चल रहे समय तक कि अवस्था को बनाए रखने के लिए संकल्प मंत्र का विधान है, जिसका अनुसरण करते हुए प्राचीन समय को याद भी करते-रहे।




संकल्प मंत्र में क्या कहा जाता हैं?:-धर्म शास्त्रों ने संकल्प का मन्त्र बनाया हैं, जो इस तरह हैं-


हाथ में गन्ध, अक्षत, जल और दक्षिणा लेकर निम्नलिखित मन्त्र को बोलना चाहिए।


ऊँ विष्णुः, विष्णुः, विष्णुः, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वित्तीये परार्धे श्रीश्वेतवाराह कल्पे सप्तमे वैवस्वत मन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे तत्रापि परम् पुनीते भारतवर्षे आर्यवर्तान्तर्गते-ब्रह्मावर्तैकदेशे कुमारिका नाम क्षेत्रे पुष्करारण्ये (पुष्करारण्यसमीपे वा) गंगायमुनयोः पश्चिमे तटे नर्मदायाः उत्तरे तटे।


अमुकानाम्नि नगरे(ग्रामे वा) अमुकविक्रमसंवत्सरे अमुक शालिः वाहन शकाब्दे अमुकमासे........ शुक्ल या कृष्ण पक्षे.......


अमुकतिथौ.....अमुकवासरे....अमुकनक्षत्रे...अमुकयोगे.....अमुककरणे च (अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकराशिस्थिते चन्द्र शेषेषु सर्वेषु ग्रहेषु यथाराशिस्थान स्थितेषु सत्सु) एवं गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुकवासरे, अमुकगौत्रोप्तन्नोः Sमुकनामाहं (अमुकनाम्नो यजमानस्य प्रतिनिधित्वेन वा) ममात्मनो रोग-दोष-कष्ट पीड़ा निवारनार्थं अलक्ष्मी निवारणार्थ (जल त्याग करके पुनः जल लेकर बोले) श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फल-प्राप्त्यर्थं सपरिवारस्य मम (यजमानस्य वा) द्विपद चतुष्पद-सहितस्य क्षेमाभयायुरा- रोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं समस्त मंगलावाप्त्यर्थं तदंगत्वेन दिक्-रक्षणं कलशर्चनम् दीपार्चनम् गणपतिपूजनं षोडशमातृका-नवग्रह.... पूजनं च करिष्ये (यजमान के लिए करे तो 'करिष्यामि' बोलना चाहिए।)



                       ।।इति संकल्पः।।


 

संकल्प मंत्र को जानने के लिए:-संकल्प मंत्र को जानने के लिए इस मंत्र में वर्णित शब्दों के उच्चारण को उनके अर्थ के साथ जानना भी जरूरी हैं, इसलिए संकल्प मंत्र में वर्णित मंत्रों को अर्थ सहित विवेचन इस तरह हैं-


ऊँ विष्णुः, विष्णुः, विष्णुः, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणो द्वित्तीये परार्धे


अर्थात:-सृष्टि के पालनहार श्रीमहाविष्णुजी के द्वारा नष्ट नहीं होने वाला आरम्भ किया हुआ कालचक्र का द्वितीय परार्ध हैं, जो कि वर्तमान ब्रह्मा की आयु का समय हैं, जिनमें से पचास वर्ष ब्रह्मा के वर्तमान आयु के पूर्ण हो गए हैं।


श्रीश्वेतवाराह कल्पे कल्प


अर्थात:-इक्यावन वें वर्ष का पहला दिन ब्रह्मा का हैं। 


सप्तमे वैवस्वत मन्वंतरे 


अर्थात:-ब्रह्मा के दिन में चौदहा मन्वंतर होते हैं, जिनमें से वैवस्वत नाम का सातवां मन्वंतर चल रहा हैं।


अष्टाविंशतितमे कलियुगे


अर्थात:-एक मन्वंतर में एकहोतर चतुर्युगी होती हैं,जिनमे से कलयुग नाम का अठाईस वां चतुर्युगी चल रहा है।


कलियुगे कलि प्रथम चरणे 



अर्थात:-कलि कलयुग का शुरुआती चरण या समय हैं।

कलिसंवते या युगाब्दे-कलिसंवत या युगाब्द वर्तमान में 5104 चल रहा हैं।



जम्बूद्वीपे भरतखण्डे तत्रापि परम् पुनीते भारतवर्षे आर्यवर्तान्तर्गते-ब्रह्मावर्तैकदेशे कुमारिका नाम क्षेत्रे पुष्करारण्ये (पुष्करारण्यसमीपे वा) गंगायमुनयोः पश्चिमे तटे नर्मदायाः उत्तरे तटे


अर्थात:-देश-प्रदेश के नाम एवं नदियों के किनारों के नाम हैं।


अमुकानाम्नि नगरे(ग्रामे वा)-नगर या गांव का नाम


अमुकविक्रमसंवत्सरे-विक्रम संवत का नाम 


अमुक शालिः वाहन शकाब्दे 


अमुक स्थाने-कार्य का स्थान


अमुक आयने-उत्तरायणे या दक्षिणायणे


अमुक ऋतौ-शिशिर, बसंत, हेमंत आदि छह ऋतू हैं।


अमुकमासे-चैत्र, वैशाख आदि बारह महीने हैं। 


अमुक पक्षे-शुक्ल या कृष्ण पक्ष।


अमुक तिथौ-प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा या अमावस्या तिथि हैं।


अमुकवासरे-रविवार से लेकर शनिवार तक सात वार का नाम हैं।


अमुकनक्षत्रे-अश्विनी नक्षत्र से रेवती नक्षत्र तक सताईस नक्षत्र हैं।


अमुकयोगे-विष्कुम्भ योग से लेकर।


अमुककरणे-बव, बालव आदि ग्यारहा करणों के नाम।


अमुककाले-प्रातःकाल आदि समय का नाम।


अमुकराशिस्थिते सूर्ये-मेषादि बारह राशियों में से चन्द्रमा स्थित राशि का नाम।


अमुकराशिस्थिते चन्द्र-मेषादि बारह राशियों में से सूर्य स्थित राशि का नाम।


शेषेषु सर्वेषु ग्रहेषु यथाराशिस्थान स्थितेषु सत्सु-


गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ-


अमुकवासरे-सात वार में से उस दिन जो वार हो, उस वार का नाम बोलना चाहिए।


अमुकगौत्रोप्तन्नो-जाती में गोत्र का नाम


Sमुकनामाहं-मनुष्य का नाम, बाद में पिता के नाम, गोत्र एवं जाति का नाम और जिस कार्य को करने से सम्बंधित पूजा आदि कर्म के निमित बोलते हुए संकल्प करना पड़ता हैं।


      (अमुकनाम्नो यजमानस्य प्रतिनिधित्वेन वा)


उपरोक्त में जिस जगह पर अमुक शब्द आता हैं, वहां पर क्रमशः नाम बोलना चाहिए।


उदाहरण स्वरूप:-महाराष्ट्र में पूजा करनी हैं, तो उस मनुष्य को अमुक स्थाने-की जगह पर महाराष्ट्र राज्य का नाम बोलते हुए उस मनुष्य को अपना नाम बोलना पड़ता हैं, जो उस तिथि, वार आदि को बोलना पड़ता हैं।


जिस समय पर संकल्प मनुष्य के द्वारा पूजकर्म को करते हैं, तो उस मनुष्य को सृष्टि के उत्पत्ति के समय से लेकर वर्तमान समय को याद करना पड़ता हैं, जो स्वाभाविक रूप से लोक-रीति का पालन करते हुए भारतीय जीवन शैली में इस प्रबंध के द्वारा आकर आज के समय में भी चल रहा हैं।



प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सृष्टि के उत्पत्ति होने पर:-अपनी ज्ञान-साधना के द्वारा सृष्टि के उत्पत्ति के बाद गहन अध्ययन किया। उनके द्वारा गहन अध्ययन से उन्होंने सृष्टि को चन्द्रमंडल, पृथ्वीमंडल, सूर्यमंडल, परमेष्ठि मंडल और स्वायम्भू मंडल आदि पंचोमंडल से युक्त बताया था। उन्होंने बताया कि सृष्टि पांच मण्डल पर चलती हैं, जो कि अपने क्रम से सृष्टि को चलाते हैं। इस तरह सृष्टि को चन्द्रमंडल, पृथ्वीमंडल, सूर्यमंडल, परमेष्ठि मंडल और स्वायम्भू मंडल आदि पंच मंडल एक के बाद एक करके अपना चक्कर लगा रहे हैं।


उदाहरण स्वरूप:-चन्द्रमा पृथ्वी के चारों तरफ, पृथ्वी मंडल सूर्य के चारों तरफ, सूर्य मंडल परमेष्ठी मंडल के चारों तरफ एवं परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल के चारों तरफ अपनी गति के द्वारा चक्कर लगाते हुए घूमते हुए अपना परिभ्रमण पूर्ण करते-रहते हैं। जिससे सृष्टि निरन्तर गतिशील बनी रहती हैं।


चन्द्रमा के द्वारा परिक्रमा का समय:-चन्द्रमा के द्वारा एक महीने में अपना पूरा चक्कर पृथ्वी के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं।


पृथ्वी के द्वारा परिक्रमा का समय:-पृथ्वी के द्वारा एक वर्ष में अपना पूरा चक्कर सूर्य के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं।


सूर्य के द्वारा परिक्रमा का समय:-सूर्य के द्वारा एक मन्वंतर में अपना पूरा चक्कर परमेष्ठी या आकाशगंगा के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं।


परमेष्ठी या आकाशगंगा के द्वारा परिक्रमा का समय:-परमेष्ठी या आकाशगंगा के द्वारा एक कल्प में अपना पूरा चक्कर स्वायम्भू या ब्रह्मलोक के चारों तरफ अपनी गति से पूर्ण करता हैं। स्वायम्भू मंडल को ही ब्रह्मलोक कहा जाता हैं।


स्वायम्भू का अर्थ:-जिसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई हैं जो स्वयं अस्तित्व से प्रादुर्भाव हुए हो। इसको ही सम्पूर्ण विश्व का केंद्र बिंदु या उद्गम स्थल माना जाता है।


ऋषियों की विलक्षण शोध:-उपर्युक्त विवरण को जानने के बाद ऋषियों ने जो स्वरूप बताया हैं, वह स्वरूप ब्रह्मा के इक्यावन वें वर्ष के पहले दिन के सात वें मन्वंतर के अठाईस वें महायुग के कलियुग नाम के चौथे युग में हैं।



संकल्प की महत्ता:-पर प्रकाश डालते हुए मनु महाराज मनुस्मृति में इस प्रकार लिखते हैं-


संकल्पमूलः काम्यो वै यज्ञाः संकल्पसंभवाः।


व्रतानि यज्ञधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृतः।।



अर्थात्:-कामना या इच्छा की पूर्ति होने पर आंनद को देने का मूल फलक संकल्प ही हैं और यज्ञ या लोकहित के विचार से किए गए हवन-पूजन युक्त वैदिक कृत्य संकल्प से ही पूर्ण होते हैं। व्रत या दैहिक और आध्यात्मिक पवित्रता के लिए किया गया कार्य और यज्ञ या लोकहित के विचार से किए गए हवन-पूजन युक्त वैदिक कृत्य आदि सभी धार्मिक अभीष्ट प्राप्ति के लिए करने वाले कर्मों का मूल फलक संकल्प को ही महाराज मनुस्मृति में बताया गया है। 



प्रायः पुरोहित जन संकल्प के द्वारा ही यजमान को जल ग्रहण कराते हैं। अब क्योंकि अपने कर्म विशेष के प्रति संकल्पबद्ध हो गया है तो ईश्वर भी उनकी पूरी सहायता करते हैं। संकल्प के समय जल इसलिए ग्रहण कराया जाता हैं, क्योंकि जल में वरुण देव का निवास माना जाता है और जल लेकर संकल्प का पालन न करने वाले को वरुण देव कठोर दंड देते हैं।



जब पूजाकर्म में संकल्प को धारण करते समय सबसे पहले हाथ में जल को लिया जाता हैं, क्योंकि समस्त सृष्टि का निर्माण अग्नि, जल, वायु, आकाश एवं पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों से हुआ हैं, उन पंचमहाभूतों में जल तत्व को ग्रहण करते हुए भगवान श्रीगणपति जी का नाम लिया जाता हैं, क्योंकि जल तत्व के स्वामी श्रीगणपति जी को माना जाता है। इसलिए मनुष्य के द्वारा भगवान श्रीगणपतिजी को साक्षी मानते हुए उनके सम्मुख रखते हुए जल से संकल्प को लिया जाता हैं, जिससे पूजाकर्म को करते समय किसी भी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं हो पावें और पूजाकर्म सुख-शांतिपूर्वक सम्पन्न हो सके।




जब मनुष्य के द्वारा पूजाकर्म के निमित संकल्प का जल ग्रहण कर लिया जाता है, तब उस मनुष्य को उस सम्बन्धित पूजाकर्म को पूर्ण करना भी जरूरी होता हैं। इस तरह से मनुष्य की संकल्प शक्ति को बल मिलता हैं और मनुष्य बिना डर से अपने पूजाकर्म को उत्साह से पूर्ण करने की हिम्मत मिल जाती हैं।




दैनिक जीवन काल में हर कार्य को करते समय मनुष्य को अपने कार्य को शुरू करने से पूर्व उस कार्य को विधिवत योजना बनानी पड़ती हैं, यदि बिना योजना से कोई भी कार्य को करते हैं, तो उस कार्य में सफलता नहीं मिलती हैं। उसी तरह पूजा से सम्बंधित मांगलिक कार्य को शुरू करते समय मनुष्य को संकल्प लेना पड़ता हैं, यदि मनुष्य संकल्प को बिना धारण किए पूजादि कार्यों को करते हैं, तब उस मनुष्य के द्वारा पूजादि कर्म करना बेकार हो जाती हैं, क्योंकि उस पूजादि का मूल फलक नहीं प्राप्त हो सकेगा। 



शब्दों को मन में नहीं दोहराते हुए वाणी से उच्चारित करने पर वे वाणी के द्वारा उच्चारित शब्द सीधे रूप से संपूर्ण जगत में ध्वनि सुरक्षित विवरण में समा जाती हैं, जो कभी नहीं समाप्त होती हैं और मनुष्य के जीवन पर उस नष्ट नहीं होने वाली ध्वनि का असर भी होगा और उच्चारित ध्वनि की दृढ़ता से अंगीकार हो जाएगा अर्थात् मनुष्य के द्वारा पूजा के लिए मूल फलक मिल जाएगा।