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Saturday, January 16, 2021

ज्येष्ठ माह शुक्ल पक्ष की भीमसेनी या निर्जला एकादशी व्रत की विधि एवं कथा(The method and story of Bhimseni or Nirjala Ekadashi fast of Jyestha month Shukla Paksha)

             


ज्येष्ठ माह शुक्ल पक्ष की भीमसेनी या निर्जला एकादशी व्रत की विधि एवं कथा(The method and story of Bhimseni or Nirjala Ekadashi fast of Jyestha month Shukla Paksha):-

हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव शरीर को निरोग रखने के लिए बहुत सारे उपाय बनाये जिससे मनुष्य अपने शरीर को स्वस्थ रख सके इसके लिए उन्होंने धर्म के साथ व्रतों को जोड़ा जिसे वे करके अपने शरीर को स्वस्थ रखकर स्वास्थ्य को पा सके।

निर्जला एकादशी तिथि:- एकादशी तिथि के सूर्य के उगने से द्वादशी तिथि के सूर्य के उदय तक बिना पानी को पिये जो विधान किया जाता है उसे निर्जला एकादशी कहते है। साल भर की चौबीस एकादशियों में से ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को सबसे अच्छा माना गया है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का व्रत रखने से सभी एकादशियों के व्रतों के फल को पाने में सहज ही मिल जाते है। 

निर्जला एकादशी व्रत विधान:- एक तो ज्येष्ठ महीने के दिन बड़े होने से और गर्मी के ज्यादा होने के कारण ज्यादा बार-बार प्यास लगती है। इस एकादशी तिथि के दिन में पानी  नहीं पिया जाता है इसलिए यह व्रत अत्यधिक मेहनत-साध्य होने के साथ-साथ कष्ट एवं रोक पाने के साधन के योग्य भी है। जल पीने की मना होने से फलों को आहार के रूप में लेने के बाद दूध का पीने का विधान भी है।

निर्जला एकादशी व्रत को करने वाले को जल से कलश को भरके उस कलश पर सफेद कपड़े को ढक्कन के रूप में रखकर उस ढक्कन पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मणों को दान देवें।

औरतें नथ पहनकर,ओढ़नी ओढ़कर,मेहंदी लगाकर शीतल जल से भरे मिट्टी के घड़े या कलश पर सफेद कपड़े से ढक्कन से ढके कलश पर रखी चीनी और दक्षिणा को दान में देकर अपनी सास अथवा अपने से बड़ो का चरण स्पर्श करने चाहिए।

एकादशी व्रत के दान:-औरतें निर्जला एकादशी व्रत को अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्न,कपड़े,छतरी,जूता, पंखी तथा फलादि का दान देना चाहिए।

इस दिन बिना पानी पीयें हुए व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु जी आराधना करने का बहुत ही ज्यादा महत्व माना गया है।

एकादशी तिथि के व्रत के दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को सालभर की एकादशियों का फल-लाभ मिलता है। इस तरह के दान-भावना में सर्वभूत हिते रताः की भावना चरितार्थ होती है।

निर्जला एकादशी व्रत की कथा:- एक दिन महर्षि व्यास जी ने पांडवों को एकादशी व्रत करने का विधान तथा फल के बारे में बताया। इस दिन जब वे भोजन करने के दोषों के बारे में बातचीत करने लगे तो भीमसेन ने कष्ट प्रकट करते हुए कहा पितमहा! एकादशी का व्रत करते हुए सभी पांडव परिवार इस दिन अन्न-जल को नहीं लेवे,आपके आदेश का पालन मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं तो खाये-पिये नहीं रह सकता हूं। इसलिए चौबीस एकादशियों पर बिना आहार रहने के कष्ट-साधना से बचने के लिए मुझे ऐसा एक व्रत बताइए जिसे करने से मुझे विशेष असुविधा नहीं होवे और वह फल भी मिल जाए जो अन्य लोगों को चौबीस एकादशियो व्रत करने पर मिलता है।

महर्षि व्यास जी जानते कि भीमसेन के पेट में भेड़िया  नामक अग्नि है। इसलिए ज्यादा खाने पर पर भी उसकी भूख शांत नहीं होती है।इस तरह भीमसेन की मन की भावना को समझकर महर्षि व्यास जी ने आदेश दिया,"प्रिय भीम! तुम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को ही एकमात्र व्रत किया करो। इस व्रत में स्नान-आचमन के समय पानी पीने का दोष नहीं लगता है।इस दिन अन्न खाकर,जितने पानी में एक माशा वजन की स्वर्ण मुद्रा डूब जाए,ग्रहण करो।इस प्रकार यह व्रत करने से अन्य तेरह एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जायेगा तथा पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा।

क्योंकि भीम मात्र एक एकादशी का व्रत करने के लिए महर्षि व्यास जी के सामने प्रतिज्ञा कर चुका था, इसलिए इस व्रत को करने लगा। इसी कारण इसे 'भीमसेनी एकादशी' भी कहा जाता है।

'भीमसेनी एकादशी' या निर्जला एकादशी व्रत का महत्व:-साल भर की चौबीस एकादशियों में से ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को मानव करके अपने सभी शुभ फल को पा सकते है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का व्रत रखने से सभी एकादशियों के व्रतों के फल को पाने में सहज ही मिल जाते है