श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् अर्थ सहित और लाभ (Sri Durgashottottanam Stotram with meaning and benefits):-माता दुर्गा के दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करके मनुष्य अपने जीवन को खुशियों से भर सकता है, क्योंकि माता दुर्गा ही समस्त तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली होती है और दुष्टों का संहार करने वाली होती हैं। दुर्गा माता की पूजा-अर्चना एवं साधना करके जो सिद्धि को पाते है, उनकी तरह जो भी मनुष्य दुर्गा माता की आराधना के रूप में अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का उच्चारण करते है, उनको भी उसी तरह ही सिद्धि मिलती है, जो मनुष्य कठोर तपस्या करते है। इसलिए माता दुर्गा की अनुकृपा पाने का सर्वोत्तम उपाय एक ही दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करना होता हैं। मनुष्य को अपने जीवननकाल में समस्त तरह के सुख-सम्पत्ति एवं समृद्धि को पाने के लिए माता इस स्तोत्र का वांचन करना चाहिए, जिससे मनुष्य को अपने किए गए बुरे कर्मों से मुक्ति मिल जाये। दुर्गा माता के नवरुपों के रूप में नवरात्रि को मनाया जाता है।
अथ श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन:-दुर्गा माता के श्री दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का वांचन करने से पूर्व उनके जो मन्त्रों का वर्णन किया गया है, उन मन्त्रों के भावों को समझते हुए उच्चारण करना चाहिए, जिससे अर्थों को समझकर सही उच्चारण करने से मनुष्य को उचित फल की प्राप्ति हो सके, इसलिए श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन इस तरह हैं: दुर्गा माता की अरदास "ॐ श्री दुर्गायै नमः" के द्वारा करते हुए, श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं का अर्थ सहित विवेचन कर रहा हूँ:।
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती।।१।।
अर्थात्:-भगवान श्रीशिवशंकरजी से जब पार्वतीजी पूछती है, तब शिवजी बोलते है-हे देवी भगवती! आप ध्यानपूर्वक सुनिए। मैं आपको अष्टोत्तर शतनामों अर्थात् एक सौ आठ दुर्गाजी के नामों के बारे में बताता हूँ, इन एक सौ आठ नामों के वांचन या सुनने से ही उत्तम विनम्र, पवित्र एवं सदाचार से युक्त भगवती दुर्गा खुश हो जाती हैं।
ऊँ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी।।२।।
अर्थात्:-अष्टोत्तर शतनामों में सबसे पहले प्रजापति दक्ष की तनुजा सती, आशावादी के रूप में साध्वी, भगवान शिवजी पर प्रेम रखने वलु भवप्रीता, ब्रह्माण्ड में रहने वाली भवानी, जगत में जीवन-मरण के बंधनों से आजादी दिलाने वाली भवमोचनी, परोपकारी एवं विनम्र के रूप में आर्या, आदि शक्ति के रूप में दुर्गा, सब पर विजय पाने वाली के रूप में जया, प्रारम्भ के वास्तविक होने के भाव के रूप में आद्य, तीन चक्षुओं के रुप में त्रिनेत्रा एवं विकट पीड़ा को धारण करने की शक्ति वाली शूलधारिणी के रूप में नामों का उच्चारण करें।
पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः।।३।।
अर्थात्:-जो भोलेनाथजी के पिनाक को अपने हाथों में संभालने वाले होती हैं, अत्यंत मनोरम एवं रमणीय के समान, जो बहुत ही तेज आवाज से घण्टानाद करने वाली, कठिन अभीष्ट की सिद्धि के लिए किया जानेवाले कठोर एवं कष्टदायक आचरण करने वाली, चिंतन शक्ति और अंतः कर्ण की निश्चयात्मक वृत्ति वाली वाले होते हैं।
सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्द स्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः।।४।।
अर्थात्:-समस्त तरह के मन्त्रों से युक्त, जिनका स्थान समस्त देवी-देवताओं में उच्च हैं, जिनके स्वरूप के दर्शन से समस्त तरह की वास्तविक खुशी प्रदान करने वाली, जिनके स्वरूप का कभी अंत नहीं होता है, समस्त की पैदायश करनी वाली सबको अपनी तरफ खींचने के भाव वाली सौन्दर्य से युक्त स्त्री स्वरूप वाली हैं, जिनका रूप शानदार हैं, चित्त की एकाग्रता से गुणगान करने वाली हैं, जिनमें बहुत सारे गुणों का भंडार भरा हुआ हैं, जिनके अलावा कुछ सुंदर स्वरूप नहीं हैं और जीवन-मरण के मार्ग से मुक्ति देने वाली हैं।
शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी।।५।।
अर्थात्:-जो भगवान शिवजी को बहुत ही प्यारी हैं और उनकी अर्धागिनी भी हैं, देवताओं की माता हैं, चिंतन करने का कार्य करने वाली, बहुमूल्य और चिकने पदार्थ से लगाव रखने वाली, प्रजापति की तनुजा हैं, प्रजापति के कारण हवन पूजन युक्त वैदिक कृत्य को नष्ट करने वाली हैं।
अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरिधाना कमलञ्जरीरञ्जिनी।।६।।
अर्थात्:-जो अभीष्ट सिद्धि के लिए किए जाने वाले कठोर एवं दुःखदायक आचरण को करते हुए पल्लवों को भी ग्रहण नहीं करती हैं, जो तरह-तरह के वर्ण से युक्त हैं, रक्त वर्ण से युक्त, जो वृत्तपुष्प को हाथों में सम्भालने वाली, कौशा से बने कपड़े को वर्ण या रक्तवर्ण से युक्त पट को पहनने धारण करने वाली हैं, जो पैरों में घुँघरुदर नूपुर को पहनकर आकर्षक ताल को करते हुए खुश रहने वाली है।
अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता।।७।।
अर्थात्:-जिसकी सीमा न हो उस शौर्य से युक्त हो, जो असरों के अनुकृति के लिए बहुत निष्ठुर हैं, जो बहुत ही रूपवती हैं, बहुत ही सुंदर हैं, जिनका नाम वनदुर्गा हैं, जिनका एक रूप मातङ्गी देवी का भी हैं, जिनको मतङ्ग मुनि पूजन करते हैं।
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः।।८।।
अर्थात्:-जिनको ब्रह्मा की शक्ति या ब्राह्म विधि से विवाहित स्त्री का रूप वाली ब्राह्मी हैं। जो कि शिवजी की अर्धांगिनी के रूप में माहेश्वरी के रूप में जानी जाती है। जिनका एक नाम चैन्द्री भी हैं, जो कि पांच वर्ष की उम्र से युक्त सुंदर किशोरी हैं, इसलिए कौमारी कहते हैं। जो कि विष्णुजी के शक्ति के रूप में वैष्णवी भी होती हैं, जो कि चण्ड एवं मुण्ड का वध करके चामुंडा के नाम से जानी जाती है, जो कि वराह की सवारी करने से वाराही कहलाती हैं। जो कि लक्ष्मीजी के रूप में भी जानी जाती है। पुरुष के रुप को भी ग्रहण करने वाली पुरुषाकृति हैं।
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहन वाहना।।९।।
अर्थात्:-जो समस्त तरह से खुशी देने वाली हैं, जो ऊपर की तरफ खींचने वाली हैं अर्थात् मोक्ष देने वाली हैं, जिनमें बहुत ही ज्ञान का भंडार भरा हुआ हैं। जो धार्मिक कर्म को करने वाली हैं, जो कि लगातार होने वाली हैं, जो अंतःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति से युक्त हैं। जो बहुला के नाम वाली गौ की तरह सत्यनिष्ठ हैं, जो बहुत ही स्नेह रखने वाली हैं, जो समस्त तरह के वाहन की सवारी करने वाली हैं।
निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी।।१०।।
अर्थात्:-जो निशुम्भ एवं शुम्भ नामक दैत्यों का संहार करने वाली हैं, जो महिषासुर नाम के दैत्य का वध करने वाली हैं, मधु एवं कैटभ नाम के दो दैत्य भाइयों का वध करने वाली हैं। जो चण्ड एवं मुण्ड नामक दो दैत्य भाइयों का संहार करने वाली हैं।
सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा।।११।।
अर्थात्:-जो समस्त दैत्यों का संहार करने वाली हैं, जो हमेशा दुराचारों एवं अत्याचारों से परेशान करने वालों का विनाश करने के लिए तत्पर रहने वाली हैं, जो समस्त तरह के शास्त्रों की जानकर हैं, जो सत्यनिष्ठ पर कायम रहने वाली हैं। जो समस्त तरह अस्त्र-शस्त्र को हाथों में धारण करने वाली हैं।
अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः।।१२।।
अर्थात्:-जो तरह-तरह के शस्त्रों को अपने हाथ में पकड़ने रखने वाली हैं, जो तरह-तरह के अस्त्रों को अपने हाथ में पकड़ने रखने वाली हैं, जो कि बारह वर्ष तक कि कन्या रूप में हैं, जो एक अविवाहित बालिका भी हैं, जो दस से पंद्रह वर्ष के मध्य की उम्र वाली बालिका भी हैं, जो जवानी से भरी हुई एक स्त्री के रूप में भी हैं। जो समस्त तरह के मनोविकारों से रहित हैं।
अप्रौढ़ा चैव प्रौढ़ा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला।।१३।।
अर्थात्:-जो दीर्घकाल तक रहने वाली स्त्री भी हैं, जो बहुत ही समय पहले की स्त्री भी हैं, जो एक बूढ़ी माता के रूप में भी हैं, जो ताकत या शक्ति से युक्त भी हैं, जो कि बहुत बड़े पेट से युक्त हैं, जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड संग्रहीत रखने वाली हैं, जो खुले बालो के रूप वाली भी हैं, जो डरावने रूप को धारण करने वाली भी हैं, जो भूत-प्रेत बाधा को दूर करने वाली हैं।
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी।।१४।।
अर्थात्:-जो अपने क्रोध की आग की ज्वाला से युक्त होकर तेज ज्वाला आसमान को भी नष्ट करने का सामर्थ्य रखने वाली हो, जो विध्वंसक रुद्र की तरह एक भयंकर चेहरे वाली हो, जो प्रलय की तरह अंधेरी एवं भयानक रात की तरह के स्वरूप वाली हैं, जो बहुत ही कठिन तपस्या करने वाली हैं, जिनमें विष्णुजी की पत्नी के रूप लक्ष्मीजी का रूप भी समाहित होता हैं, जो कि दुर्गा माता एक कात्यायनी रूप वाली हो, जो कि शिवजी की पत्नी पार्वतीजी का रुप भी समाहित रखने वाली हैं, जो वायव्य ब्रह्माण्ड के लोक वाली है।
शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी।।१५।।
अर्थात्:-जो भगवान शिवजी के राजदूत के रूप में हैं, जो मुक्त रूप वाली स्त्री हैं, जो शाश्वत विनाश से रहित हो, जो सर्वोच्च देवी के रूप वाली हैं, जो माता पार्वती का एक रूप रखने वाली हैं, मत्स्य देश के राजा अश्वपति की तनुजा के समान पतिव्रता रूप में होती हैं, जो स्पष्ट दिखाई देने वाली या इंद्रिय के द्वारा ज्ञान को स्पष्ट रूप में रखने वाली हैं, जो ब्रह्माजी की भार्या गायत्रीजी के रूप में भी समाहित रहने वाली होती हैं।
य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति।।१६।।
भावार्थ्:-देवी पार्वती! माता देवी के श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं के मन्त्रों को जो कोई भी नियमित रूप से वांचन करते हैं, उनके लिए पृथ्वी लोक, आकाश लोक और पाताललोक में कुछ भी साधने योग्य नहीं हैं।
धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्।।१७।।
भावार्थ्:-जो भी इसके मन्त्रों का वांचन करते हैं, वे धन, धान्य, पुत्र, औरत, अश्व, हस्ती, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चार पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेते हैं। आखिर में जिसका आदि है न अन्त अर्थात् जो हमेशा बना रहने वाले होता हैं। जो परम्परानिष्ठ शाश्वत जीवन-मरण के चक्कर से मुक्त होकर मोक्ष गति को प्राप्त कर लेता हैं।
कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत् पराया भक्त्या पठेन्नामशताष्टाकम्।।१८।।
भावार्थ्:-जो मनुष्य बारह वर्ष की उम्र की कन्या का विधि-विधान से पूजा करता हैं, उसके बाद में देवताओं की देवी दुर्गा जी की छवि को मन में बनाकर मन ही मन में उनको याद करते हुए उनका ध्यान करना चाहिए, फिर अपने विश्वास एवं श्रद्धाभाव से मन में किसी भी तरह के बुरे विकारों के बिना अपने स्वार्थ या हित की कुछ भी कामना नहीं रखते हुए देवी दुर्गाजी का पूजन करना चाहिए, उसके बाद में अष्टोत्तरशत नाम के स्तोत्रं के मन्त्रों का वांचन करना चाहिए।
तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैं सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्।।१९।।
भावार्थ्:-जो भी इस तरह वांचन करते हैं, उसको समस्त अति उत्तम देवताओं से भी सफलता मिलती है, महीपति भी उसके भृत्य बनकर उसकी सेवा करते हैं, और वह समस्त धन को प्राप्त करके उस धन का स्वामी बन जाता हैं, जिस तरह राज्यलक्ष्मी जी को धन की देवी कहा जाता हैं।
गोरोचनालक्तककुङ्कुमेव सिन्धूकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।२०।।
भावार्थ्:-जो मनुष्य गोरोचन, लाक्षा लाह, कुङ्कुम, सिन्दूर, कपूर या घनसार घृत या दुग्ध, शक्कर या शर्करा और मधु या कुसुमासव आदि चीजों को जब एक पात्र में इकट्ठा करके उनको मिश्रित करने से जो मिश्रित लेप बनता हैं, उस लेप को स्याही के रूप में उपयोग करते हुए मन्त्रों के पाठ के द्वारा जब किसी यन्त्र को पूजा-अर्चना एवं विधि-विधान से पूर्वक लिखा जाता हैं, उस लिखे गए यन्त्र को जब कोई विधि-विधान आदि को अच्छा जानकर मनुष्य उस यन्त्र को हमेशा अपने पास रखते हैं और पहनता हैं, तब वह मनुष्य भगवान शिवजी की तरह ही बन जाता हैं या उस मनुष्य को जीवन के जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिलकर मोक्ष रूप को प्राप्त कर लेता हैं।
भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम्।।२१।।
भावार्थ्:-जब भौमवती अमावस्या तिथि की अर्धरात्रि के समय में जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र में परिभ्रमण करता है, तब उस समय जो भी मनुष्य श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् को अपने हाथ के द्वारा लिखकर उस लिखे गए स्तोत्रं के मन्त्रों का उच्चारण उचित तरह से वांचन करते है, तब वे मनुष्य अपने जीवनकाल में बहुत ही सुख-समृद्धि एवं अनेक तरह की सम्पदा को प्राप्त करता हैं।
।।इति श्री विश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं संपूर्णम्।।
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