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Thursday, January 21, 2021

इतवार (रविवार) के व्रत की विधि-विधान,कथा और आरती(Law, legislation and aarti for the fast of Sunday)

                    


इतवार (रविवार) व्रत के विधि-विधान, कथा और आरती (Law, legislation and story of Sunday (Sunday) fast): -मनुष्य के द्वारा शरीर को निरोग रखने के लिए उपवास करना चाहिए।जिससे मनुष्य को पेट से सम्बंधित बीमारियों से मुक्ति मिले। रवि ग्रह के कमजोर हालात को उनका व्रत करके रवि ग्रह को अपनी जन्मकुंडली में मजबूत कर सकते है।


रविवार (इतवार) के व्रत करने के फायदे:-सभी तरह की मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए व्रत है, जो कि रविवार का व्रत उत्तम रहता है।

इतवार व्रत की विधि-विधान:-जो कोई भी इतवार व्रत करने का इच्छुक मनुष्य होता है,उसे सबसे पहले  प्रातःकाल के समय अपनी दैनिक दिनचर्या को पूरा करनी चाहिए। उसके बाद स्नानादि करके साफ-सुधरे कपड़ो को पहनना चाहिए।

◆मन को एकाग्रचित्त करके मनुष्य को शांत मन से अपने इष्ट का ध्यान करके उनको याद करना चाहिए। 

◆मनुष्य को खाना दिन में एक बार ही करना चाहिए। खाना और फलों को आहार के रूप में भास्कर देव के उजाला रहते हुए ही करना उत्तम रहता है। 

◆मनुष्य को बिना खाये भास्कर देव यदि अस्त हो जावें तो अगले दिन भास्कर देव के प्रकट होने पर भास्कर देव को अर्ध्य देकर ही भोजन करना चाहिए।

◆मनुष्य को व्रत के अंत में भास्कर देव की कथा को सुनना चाहिए।

◆मनुष्य को खाने के रूप तेल से बनी नमकीन का भोजन के रूप में कभी भी उपयोग में नहीं करना चाहिए।

◆मनुष्य के द्वारा इतवार का व्रत करने से मनुष्य को इज्जत मिलती है और सामाजिक जीवन में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है तथा दुश्मनों का अंत होता है।

◆मनुष्य को नेत्रों के कष्ट से मुक्ति मिलती है और दूसरे सभी तरह के कष्टों से आजादी मिलती है।

इतवार या रविवार की पौराणिक कथा:-पुराने जमाने में एक बूढ़ी औरत एक गांव में रहती थी,वह रोजाना सवेरे भास्कर देव के उगने से पूर्व उठती थी और हर एक रविवार को सुबह उठ कर स्नानादि करके कच्चे बने अपने भवन को गाय के गोबर से लीपकर,खाना बनाकर भगवान भास्कर देव को भोग लगाकर ही खुद खाना खाती थी। इस तरह हर एक रविवार को व्रत करने से उसके घर में धन-धान्य का भंडार भरा रहता था। श्रीहरि के आशीर्वाद से उसको किसी भी तरह से कोई भी दुःख और गरीबी नहीं थी। सभी प्रकार से उसके घर में चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली थी।लेकिन समय के चलते हुए कुछ दिनों के बीत जाने पर एक दिन बूढ़ी औरत की पड़ोसन जिसके यहां से वह गाय का गोबर  लाया करती थी। पड़ोसन के मन में विचार शुरू हो गया कि यह बूढ़ी औरत हमेशा मेरी गाय का गोबर ले जाया करती है। इसलिए उस पड़ोसन ने अपनी गाय को कहि पर भीतरी जगह पर बांधना शुरू कर दिया। जिससे उस बूढ़ी औरत को गाय का गोबर नहीं मिलने से रविवार व्रत कथा में मुश्किल होने लगी और जिससे वह अपने घर को गाय के गोबर से नहीं लीप सकी। इसलिए उसने खाना नहीं खाया और पूरे दिन बिना खाने के ही उसने व्रत को किया। रात्रि बीतने पर भी उसने खाना नहीं खाया। जब वह रात के समय में सोई हुई थी तो उसके सपने में भस्कर देव आये और उससे पूछा कि आज तुमने नहीं खाना बनाया और नहीं मेरे को भोग लगाया। उस बूढ़ी औरत ने भास्कर देव को गाय का गोबर नहीं मिलने का कारण बताया। तब भास्कर देव ने कहा कि हे माता मै तुम्हें एक ऐसी गाय देता हूं कि वह गाय तुम्हारी सभी तरह की मन की इच्छाओं की पूर्ति होगी। क्योंकि तुम नित्य इतवार को गाय के गोबर से घर को लीपकर ही भोजन बनाकर मेरा भोग लगाने के बाद ही स्वयं खाना खाती हो,इससे मैं खुश होकर तुम्हें आशीर्वाद के साथ वरदान देता हूं कि तुम्हारी सभी मन की कामनाएं पूरी होगी। मैं उन सबको वरदान देता हूं जो कि मेरी पूजा आराधना करते है उनको मैं उनकी गरीबी से मुक्त करके गरीब को धन देता हूं और जिस औरत के सन्तान नहीं होती है उनको सन्तान देता हूँ और उनको अपने अंत समय में उनकी मुक्ति भी देता हूँ। सपने में इस तरह के प्रवचन देकर भगवान भेदकर देव गायब हो गये। जब बूढ़ी औरत सुबह उठी तो उसने अपने घर के आँगन में एक सुंदर गाय और बछड़ा को बंधा देखा। जिससे वह बूढ़ी औरत खुश होकर उस सुंदर गाय को बछड़ा सहित घर के बाहर बांध दिया और खाने के लिए चारा भी डाल दिया। जब पड़ोसन ने बूढ़ी औरत के घर के बाहर एक सुंदर गाय और बछड़ा को बंधे देखा तो उसको जलन से उसके ह्रदय में कष्ट हुवा तथा उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है तो उस गाय के सोने के गोबर को अपने घर ले गयी और उस बूढ़ी औरत की गाय के गोबर की जगह पर अपनी गाय का गोबर को रख दिया। वह पड़ोसन हमेशा ऐसा ही करती रही लेकिन बूढ़ी औरत को मालूम ही नहीं पड़ने दिया। तब सर्वव्यापी भगवान भास्कर ने विचार किया कि चतुर पड़ोसन के काम से बूढ़ी औरत ठगी जा रही है। भगवान ने शामक समय अपनी माया से बड़े जोर की आँधी चला दी। डर के मारे उस बूढ़ी औरत ने अपनी गाय को घर के आँगन में बांध दिया। सुबह जब बूढ़ी औरत उठी तो उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है,तो उस बूढ़ी औरत को बहुत ही ज्यादा आश्चर्य हुवा और वह हमेशा अपनी गाय को घर के भीतर बांधना शुरू कर दिया। इससे उसकी पड़ौसन को सोने का गोबर उठाने का मौका नहीं मिल पा रहा था,जिससे उसकी जलन ओर तेज हो गयी और कुछ भी उपाय नहीं सूझने पर उसने अपने राज्य के राजा के पास में जाकर कहा कि महाराज मेरे घर के पड़ोस में एक बुढ़िया रहती है, उसकी गाय सोने का गोबर देती है। यह गाय तो आप जैसे महाराज के राज्य में महाराज के पास होनी चाहिए जिससे उस सोने रूपी गोबर का उपयोग आप प्रजा की भलाई के रूप कर सके। उस बुढ़िया को इतने सोने की क्या जरूरत है। इस तरह की वार्ता को सुनकर राजा ने अपने सैनिक को आदेश दिया कि उस बुढ़िया से वह गाय लेकर आवे। जब बुढ़िया सुबह अपनी दैनिकचर्या स्नानादि करके भास्कर देव को भोग लगाने के बाद जब खुद खाना खाने लगी तो उसके घर राजा के सिपाई आकर उसकी बंधी हुई गाय को खोलकर अपने साथ ले गये। सेनिको के सामने बुढ़िया बहुत ही रोई-बिलकी लेकिन उन पर कोई तरह से असर नहीं हुवा। इस तरह वह बुढ़िया बिना खाये-पिये रात को रोती हुई भास्कर देव से अरदास करती रही कि वह गाय को वापस उसे दिलवा दे। उस तरफ राजा उस सोने के गोबर की गाय को पाकर बहुत ही ज्यादा खुश हो गया। लेकिन जब राजा सवेरे उठा तो देखा कि पूरा महल गाय के गोबर से भरा पड़ा है और वहां पर सोने के गोबर का नामों-निशान भी नहीं है। राजा इस तरह गोबर से भरा महल देखकर घबरा गया। भगवान भास्कर देव ने राजा के सपने में कहा कि हे राजन उस बूढ़ी औरत की गाय को तुम लौटा दो जिससे तुम्हारा भला होगा यदि तुम उस गाय को नहीं लोटावोगे तो मैं तेरा राज्य सहित तुम्हारा नाश कर दूंगा। मेने उस बूढ़ी औरत को उसके इतवार के व्रत से खुश होकर उसको दी थी। सुबह होते ही राजा ने उस बुढ़िया को राजमहल में बुलाकर उसे बहुत सा धन देकर सम्मान के साथ गाय और बछड़ा को दे दिया। उस बुरी पड़ोसन बुढ़िया को बुलाकर उसे दण्ड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से सब गोबर गायब गो गया। राजा ने अपनी राज सभा को इकट्ठा करके सभी प्रजा में घोषणा करवा दी कि हर कोई मनुष्य इतवार का व्रत करें।जिससे सभी की मन की इच्छाओं की पूर्ति होगी  और व्रत करने से सभी लोग सुखी जीवन को व्यतीत करने लगे। किसी भी तरह की बीमारी तथा प्रकृति का प्रकोप उस नगर  पर नहीं होता था। सारी प्रजा सुख एवं खुशी से रहने लगी। 

             ।।इति रविवार व्रत कथा समाप्त।।





               ।।अथ रविवार की आरती।।

कहुँ लगि आरती दास करेंगे,सकल जगत् जाकी जोट विराजे।।टेक।।

सात समुद्र जाके चरणानि बसे,कहा भये जल कुम्भ भरे हो राम।।टेक।।

कोटि भानु जाके नख की शोभा,कहा भयो मन्दिर दिप धरे हो राम।।टेक।।

भार अठारह रामा बलि जाके, कहा भयो शिर पुष्पधरे हो राम।।टेक।।

छप्पन भोग जाके नितप्रति लागे, कहा भयो नैवेद्य धरे हो राम।।टेक।।

अमित कोटि जाके बाजा बाजे,कहा भयो झनकार करे हो राम।।टेक।।

चार वेद जाके मुख की शोभा,कहा भयो ब्रह्म वेद पढ़े हो राम।।टेक।।

शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक,नारद मुनि जाको ध्यान धरें हो राम।टेक।।

हिम मंदार जाको पवन झकोरें, कहा भयो शिर चँवर ढुरे हो राम।।टेक।।

लख चौरासी वन्धे छुड़ाये, केवल हरियश नामदेव गाये।।हो रामा।।