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Tuesday, January 26, 2021

January 26, 2021

अथ शुक्रवार व्रत की विधि के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(The rules of the Law of Friday fast, the benefits of Katha, Aarti and fasting)

                   The rules of the Law of Friday fast, the benefits of Katha, Aarti and fasting



अथ शुक्रवार व्रत की विधि के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(The rules of the Law of Friday fast, the benefits of Katha, Aarti and fasting):- शुक्रवार व्रत को उन ओरतों को करना चाहिए जिनको दाम्पत्य जीवन का सुख नहीं मिलता है,माता वैभव लक्ष्मी जी और सन्तोषी माता को खुश करके उनकी कृपा दृष्टि को अपने ऊपर करवाना चाहिए। यह व्रत सभी लड़कियों-ओरतों और लड़कों-आदमियों के लिए है।शुक्रवार के व्रत को करने से कुंवारी लड़की या लड़कों का विवाह अपनी चाह के अनुसार होता है।



शुक्रवार व्रत की विधि के नियम:-शुक्रवार के व्रत को करने वालों को अपने मन से नियमों का पालन करते हुए व्रत को करने से फायदा होता है।

◆मनुष्य को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले पहले शुक्रवार से व्रत को आरम्भ करना चाहिए।

◆मनुष्य को अपनी मन की कामनाओं की पूर्ति के लिए इक्कीस या इकतीस व्रत को करना चाहिए।

◆शुक्रवार व्रत के दिन स्नानादि करने के बाद में सफेद कपड़े को पहनना चाहिए।

◆मनुष्य को रंग में सफेद गाय को देखना चाहिए और पानी वाला नारियल एक या दो लड़कियों को उनको देखकर देना चाहिए।

◆मनुष्य को ऊँ द्रां द्रीं द्रौं सः शुकाय नमः  मंत्र को व्रत के  पूरे दिन जपते रहना चाहिए।

◆मनुष्य को सफेद रंग की चादर को बिछाकर रात के समय सोना और सोने से पहले धार्मिक संगीत को सुनना और धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने के बाद ही सोना चाहिए।



शुक्रवार व्रत के लिए भोजन करना:- मनुष्य को अपने खाने  में दूध,दही,चाँवल, खीर,घी,साबूदाना,सफेद मावा,मिष्ठान,केला,जुवार,गेँहू की रोटी आदि सफेद चीजो को ही केवल खाना चाहिए और दूसरी चीजों को खाना अच्छा नहीं होता है।



अथ शुक्रवार व्रत की कथा आरम्भ:-एक जमाने में तीन दोस्त थे,उनमें से एक कायस्थ,ब्राह्मण और वैश्य इन तीनों दोस्तों में बहुत ही ज्यादा दोस्ती थी। उन तीनों दोस्तों की शादी हो गयी थी। लेकिन ब्राह्मण और कायस्थ के लड़कों का गौना भी हो गया था,परन्तु सेठ के बेटे का गौना नहीं हुआ था। एक दिन कायस्थ के लड़के ने कहा- ''है दोस्त! तुम मुकलावा करके अपनी पत्नी को घर क्यों नहीं लाते? पत्नी के बिना घर कैसा लगता है। यह बात सेठ के लड़के को जंच गई,कहने लगा कि मैं अभी जाकर मुकलावा लेकर आता हूँ। ब्राह्मण के लड़के ने कहा अभी मत जाओ क्योंकि शुक्र अस्त हो रहा है, जब शुक्र उदय हो जाये तब  जाकर ले आना। परन्तु सेठ के लड़के को ऐसी जिद हो गई कि किसी तरह से नहीं माना और अपने ससुराल को चला गया। उसको आया हुआ देखकर ससुराल वाले भी आश्चर्य चकित रह गये और पूछा कि कैसे आना हुआ? तब वह कहने लगा कि मैं अपनी पत्नी को विदा कराने के लिए आया हूँ। ससुराल वालों ने भी बहुत समझाया कि इन दिनों शुक्र अस्त है जब शुक्र उदय हो जाएगा तब आप विदा कराके ले जाना,लेकिन वह सेठ का लड़का नहीं किसी की बात को सुनी और अपनी औरत को अपने साथ विदा कर ले जाने का बार-बार आग्रह करता रहा, तो उसके ससुराल वालों ने लाचार होकर अपनी पुत्री को अपने जमाई के साथ विदा कर दिया। थोड़ी दूरी पर जाने के बाद रास्ते में उसके रथ का पहिया टूट कर गिर पड़ा।रथ के बैल का पग टूट गया। उसकी पत्नी घायल हो गई। जब आगे चले तो रास्ते में डाकू मिले, उसके पास जो धन,कपड़े और जेवरात थे वह सब उससे छीन लिये। इस तरह उसे बहुत से मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस तरह जैसे-तैसे अपने नगर में पहुँचा और अपने घर गया। जैसे ही अपने घर पर पहुँचा तो सेठ के लड़के को सांप ने काट दिया, वह बेहोश होकर गिर पड़ा। तब उसकी पत्नी अधिक विलाप कर रोने लगी। उसे वैद्यों को दिखलाया तो वैद्य कहने लगे-यह तीन दिन में मर जायेगा। जब उसके दोस्त ब्राह्मण के लड़के को जानकारी हुई तो उसने कहा-"सनातन धर्म की प्रथा है कि जिस समय शुक्र का अस्त हो कोई अपनी पत्नी को नहीं लाता। परन्तु यह शुक्र के अस्त में अपनी पत्नी को विदा कराके ले आया है, इस कारण से इसको मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

 यदि दोनों पति-पत्नी वापस अपने ससुराल चले जायें और शुक्र के उदय होने पर वापिस आवें तो निश्चय ही मुश्किलें दूर हो जायेगी। इतना सुनते ही सेठ और उसकी पत्नी ने अपने बेटे और बहु को वापिस उसके ससुराल के लिए रवाना किया। जब दोनों पति-पत्नी जैसे ही ससुराल पहुँचे तब जाकर सेठ के लड़के की बेहोशी दूर हो गई और फिर सामान्य ईलाज से सांप के डसे विष से उस सेठ के लड़के को मुक्ति मिली। अपने दामाद को ठीक हुआ देखकर ससुराल वालों को अत्यंत ही खुशी हुई और जब शुक्र का उदय हुआ तब बड़ी खुशीपूर्वक अपनी बेटी को अपने दामाद के साथ विदा किया। इसके बाद दोनों घर पर पहुँचे और अपना जीवन खुशी से बिताया। हर शुक्रवार का व्रत विधि-विधान से करने लगे और कथा को सुनते एवं दूसरों को भी शुक्रवार के व्रत की महिमा के बारे में बताते। इस तरह शुक्रवार के दिन का व्रत करने से सभी तरह की बाधाए दूर हो जाती है।


      ।।अथ शुक्रवार व्रत कथा समाप्त।।



शुक्रवार व्रत के लिए हवन-यज्ञ करना:-मनुष्य को अपनी इच्छा के पूरे के बाद अंतिम शुक्रवार के दिन हवन-यज्ञ करना चाहिए।

◆हवन-यज्ञ के लिए समिधा के रूप में उडम्बर-गूलर की लकड़ीयों का प्रयोग करते हुए हवन करना चाहिए।



शुक्रवार व्रत के दिन दान करना:-मनुष्य को अंतिम व्रत के दिन पर हवन करके छह कन्याओं को दूध,दही,चाँवल, खीर,घी,साबूदाना,सफेद मावा,मिष्ठान,केला,जुवार,गेँहू की रोटी आदि चीजों का  खाना खिलाना या दान करना चाहिए।

◆मनुष्य को दक्षिणा के रूप में सफेद कपड़े,सफेद रुमाल,श्रृंगारिक वस्तु,चाँदी आदि का दान अपनी शक्ति के अनुसार किसी एक आंख से काने व्यक्ति को करना चाहिए।



शुक्रवार के दिन का व्रत करने के फायदे:-शुक्रवार का व्रत कुंवारे लड़के-लड़की के मन की इच्छा के अनुसार जीवनसाथी को पाने में मदद करता है।

◆मनुष्य को अपने जीवनसाथी से प्यार और मधुरता से गृहस्थी जीवन बिताने में सहायता करता है।

◆मनुष्य के लिए मांगलिक काम को ठीक तरह से होने में मदद करता है।

◆शुक्रवार का व्रत आदमी-औरत और लड़के-लड़की सभी के लिए अच्छा नतीजा देने वाला है।


  

        ।।अथ शुक्रवार की आरती।।


आरती लक्ष्मण बाल जती की।

असुर संहारन प्रजापति की।।आरती लक्ष्मण बाल....।।

जगमग ज्योति अवधपुरी राजे।

शेषाचल पर आप विराजे।।आरती लक्ष्मण बाल........।।

घण्टाताल पखावाज बाजै।

कोटि देव आरती साजै।।आरती लक्ष्मण बाल............।।

क्रिटमुकुट कर धनुष विराजै।

 तीन लोक जाकि शोभा राजै।।आरती लक्ष्मण बाल....।।

कंचन थार कपूर सुहाई।

 आरती करत सुमित्रा माई।।आरती लक्ष्मण बाल........।।

प्रेम मगन होय आरती गावैं।

बसि बैकुण्ठ बहुरि नहीं आवैं।।आरती लक्ष्मण बाल....।।

भक्ति हेतु हरि लाड़ लड़ावैं।

जब घनश्याम परम् पद पावैं।।आरती लक्ष्मण बाल.....।।


       ।।अथ शुक्रवार की आरती समाप्त।।

Monday, January 25, 2021

January 25, 2021

अथ बृहस्पतिवार व्रत की विधि के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(The rules of the Law of Thursday Thursday fast, the benefits of Katha, Aarti and fasting)

                     The rules of the Law of Thursday Thursday fast, the benefits of Katha, Aarti and fasting



अथ बृहस्पतिवार व्रत की विधि के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(The rules of the Law of Thursday Thursday fast, the benefits of Katha, Aarti and fasting):-बृहस्पतिवार के दिन व्रत बृहस्पति देवजी को खुश करने के लिए होता है जिससे सन्तान की प्राप्ति और मन की समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है।

◆बृहस्पति देवजी बृहस्पतिवार के दिन का व्रत करने वालों से जल्दी खुश होते है और मनुष्य को रुपयों-पैसों और पढ़ाई का फायदा करते है।

◆बृहस्पतिवार के दिन का व्रत ओरतों के लिए बहुत जरूरी होता है।



बृहस्पतिवार के दिन का व्रत करने की विधि के नियम:-बृहस्पतिवार के दिन बृहस्पतेश्वर शिवजी जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

◆बृहस्पतिवार के व्रत को किसी भी माह में पड़ने वाले चादने पक्ष बृहस्पतिवार के दिन से शुरू करना चाहिए।◆बृहस्पतिवार के दिन व्रत शुरू करने से पहले अपने मन में व्रत को एक वर्ष या तीन वर्ष या सोलह व्रत की संख्या में से अपनी इच्छा के अनुसार धारण करना चाहिए।

◆व्रत को करने वाले को बृहस्पतिवार व्रत के दिन हल्दी से मिक्स किये हुए पानी से स्नान करना चाहिए।

◆व्रत करने वालों को स्नान के बाद पीले रंग के अंगवस्त्र और पीले कपड़ो को पहनना चाहिए।

◆बृहस्पतिवार व्रत के दिन का व्रत करने वाले को पीले फूलों को धारण करना चाहिए।

◆बृहस्पतिवार व्रत के दिन का व्रत करने वाले को केसर या हल्दी का तिलक लगाना चाहिए।

◆बृहस्पतिवार व्रत के दिन का व्रत करने वालों को केले के वृक्ष का पुजन करके दर्शन करना चाहिए।

◆केले के वृक्ष को पानी में कुछ पीली सरसों व हल्दी मिलाकर पानी को अर्पण करना चाहिए।

◆बृहस्पतिवार के दिन बृहस्पतेश्वर महादेव जी की पूजा-आराधना होती है।

◆मनुष्य को ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरूवे नमः मन्त्र को अपनी श्रद्धा के अनुसार जपते हुए दिन को बिताना चाहि

◆पूजन करने के बाद में कथा को पूरी श्रद्धा पूर्वक पूरी सुनना चाहिए।



भोजन के रूप में:- मनुष्य को भोजन के रूप में चने की दाल से बने प्रदार्थ हलवा,मोदक,भूजिये,केशरिया चांवल आदि प्रदार्थ के पहले पांच से सात ग्रास को लेना चाहिए और उसके बाद में दूसरी वस्तुओं को खाना चाहिए।

◆व्रत करने वालों को पूरे दिन में एक बार ही खाना खाना चाहिए



अथ बृहस्पतिवार के दिन के व्रत की पहली कथा की शुरुआत:- एक गांव में एक साहूकार रहता था,साहूकार के घर में अन्न,कपड़े और रुपये-पैसों आदि की किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थी,लेकिन उसकी औरत बहुत ही कंजूस थी। किसी भी भीख मांगने वाले भिक्षार्थी को कुछ भी नहीं देती थी,पूरा दिन अपने घर के काम-काज को करते हुए बिताती थी। एक दिन एक साधु-महात्मा बृहस्पतिवार के दिन उसके दरवाजे पर आये और भीख मांगी। औरत उस समय अपने घर के आंगन लीप रही थी,इस कारण साधु महाराज को कहने लगी किसी अवकाश के दिन आप आवे। इस तरह साधु-महात्मा उस दिन खाली बिना भिक्षा के ही चले गये। थोड़े दिनों के बाद फिर साधु-महात्मा फिर उस साहूकार के घर के दरवाजे पर आकर भिक्षा की याचना की,उस समय साहूकार की औरत अपने बेटे को खाना खिला रही थी और कहने लगी साधु-महात्मा मैं क्या करूँ अवकाश नहीं है,इसलिए आज मैं आपको आज भिक्षा नहीं दे सकती हूं। इस तरह ही तीसरी बार महात्मा फिर उसके दरवाजे पर आये, तो साहूकार की औरत उनको फिर टालना चाहा तो साधु-महात्मा ने कहा कि जब आपको अवकाश होगा तो आप मुझे भिक्षा दोगी,तब साहूकार की औरत बोली ऐसा हो जाये तो आपका उपकार रहेगा।

साधु-महात्मा कहने लगें की अच्छा तो मैं तुम्हे एक उपाय बताता हूं।तुम बृहस्पतिवार के दिन चढ़ने पर उठो और सारे घर में झाड़ू लगाकर सारा कचरा-कूड़ा एक जगह पर इकट्ठा करके  रख दो। घर में चौका इत्यादि आदि मत लगाओ।फिर स्नान आदि करके घरवालों को कह दो,उस दिन सब हजामत अवश्य बनवायें। रसोई बनाकर चूल्हें के पीछे रक्खा करो,सामने कभी नहीं रक्खो। शाम के समय जब अंधेरा होने के बाद में दिया को जलाया करो तथा बृहस्पतिवार के दिन को पीले कपड़े मत पहनना करो नहीं पीले रंग की वस्तुओं का भोजन करो। यदि ऐसा करोगे तो तुमको घर का कोई भी कम नहीं करना पड़ेगा। सहुकारनी ने इस ही किया। बृहस्पतिवार के दिन को दिन चढ़े उठी, झाड़ू लगाकर करके घर की एक जगह पर इकट्ठा कर दिया और आदमियों ने हजामत बनवाई। भोजन बनाकर चूल्हे के पीछे रखा। इस तरह सब बृहस्पतिवार के दिन वह इस ही करती रही। अब कुछ समय के बाद उसके घर में खाने को दाना न रहा। थोड़े दिनों में वही महात्मा फिर उसके घर के दरवाजे पर आकर भीख मांगी,तब सहुकारनी ने कहा महात्मा जी मेरे घर में खाने के लिए कुछ भी अन्न नहीं है,इसलिए आपको मैं क्या देवू? साधु-महात्मा ने कहा कि जब तुम्हारे घर में जब सब कुछ था तो भी तुम कुछ नहीं देती थी। अब तो तुम्हारे पास में अवकाश ही अवकाश है तब भी  तुम कुछ नहीं दे रही हो,तुम क्या चाहती हो वह कहो? तब सेठानी ने हाथ जोड़कर अरदास की महाराज अब कोई ऐसा उपाय बताओ कि मेरा घर पहले की तरह ही सुखी-सम्पन्न हो जाय। अब मै प्रतिज्ञा करती हूँ कि अवश्यमेव जैसा आप कहेंगे वैसा ही करूँगी।

तब साधु-महात्मा जी ने कहा-"बृहस्पतिवार के दिन को प्रातःकाल उठकर स्नानादि से करके घर को गाय के गोबर से लिपो तथा घर के आदमियों को कहो कि हजामत नहीं बनावें। भूखों को अन्न,जल देती रहा करो। ठीक शाम के समय में दिया को जलाओ। इस तरह तुम करोगी तो तुम्हारे ऊपर बृहस्पतिजी कृपा जरूर होगी। सेठानी ने ऐसा ही किया और उसके घर में पहले की तरह ही धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। इस तरह भगवान बृहस्पतिजी की कृपा से अनेक तरह के सुख भोगकर लम्बे समय तक जीवित रही।


अथ बृहस्पतिवार की व्रत की पहली कथा समाप्त।



अथ बृहस्पतिवार के दिन के व्रत की दूसरी कथा:-एक दिन स्वर्ग के राजा इंद्र बड़े घमंड से अपने सिंहासन पर राज सभा में आकर बैठे थे और बहुत ही देवता,ऋषि,गन्धर्व,किन्नर आदि सभा में उपस्थित थे। उस समय जब देवता के गुरु बृहस्पतिजी उस सभा मे आये तो सभी के सभी उनके सम्मान में खड़े हो गये, लेकिन इंद्र देव अपने गर्व के मारे खड़ा नहीं हुये,यद्यपि हमेशा उनका सम्मान करते थे। बृहस्पतिदेवजी अपना अनादर समझते हुए वहां से उठकर के गये। तब इंद्र को बड़ा दुःख हुवा की देखो मैंने गुरुजी का अनादर कर दिया,मुझसे बड़ी भूल हो गयी। गुरुजी के आशीर्वाद से ही मुझको यह सब तरह का ऐश्वर्य मिला है और उनके गुस्से से सबकुछ समाप्त हो जायेगा। इसके लिए मुझे उनके पास में जाकर माफी मांगनी होगी जिससे उनका गुस्सा शांत हो जाये और मेरा कल्याण होवे। इस तरह इंद्र देव गुरु बृहस्पति जी के पास जाते है। जब बृहस्पतिजी ने अपने योगबल से देखा कि इंद्र उनसे माफी मांगने के लिए आ रहे है तो बृहस्पतिजी अपने गुस्से के कारण इंद्र से नहीं मिलने के लिए गायब हो गये।जब इंद्र ने देखा कि बृहस्पति जी कहि पर भी नहीं दिखाई दे रहे है तो वे निराश होकर वापस इंद्रलोक को आ गये।

जब दैत्यों के राजा वृषवर्मा को जब सूचना मिली तो अपने गुरु शुक्राचार्य जी से आदेश लेकर इंद्रपुरी को चारों तरफ से घेर लिया। गुरु की कृपा नहीं होने से देवता हारिणे लगे। तब इंद्र देव ने ब्रह्माजी से विनयपूर्वक सब हाल को बताया और कहा महाराज दैत्यों हमारी रक्षा करें और बचावें। ब्रह्माजी ने कहा कि तुमने बड़ा गुनाह कर दिया जो कि देव गुरु को नाराज करके किया है। अब तुम्हरी भलाई इसी में है कि तुम त्वष्टा ब्राह्मण के पुत्र विश्वरूपा के पास जावो, वे बहुत ही बड़े तपस्वी और ज्ञानी है। उनको अपना पुरोहित बनावो तो तुम्हारा कल्याण होगा। इस तरह की बात सुनते ही देव इंद्र त्वष्टा के पास गये और विनम्र भावना से नमस्कार करके उनको निवेदन किया की आप हमारे पुरोहित बनिये,जिससे हमारा कल्याण होवे। तब त्वष्टा जी उत्तर दिया की पुरोहित बनने से तपोबल कम हो जाता है,परन्तु तुम विनती कर रहे हो इसलिए मेरा बेटा विश्वरूपा पुरोहित बनकर तुम्हारी रक्षा करेगा।विश्वरूपा ने पिता के आदेश से पुरोहित बनकर ऐसा यत्न किया कि हरि की इच्छा से इंद्र वृषवर्मा को युद्ध में जीतकर अपने इन्द्रासन पर स्थित हुआ। विश्वरूपा के तीन मुख थे।

एक मुख से वह सोमपल्ली का रस निकाल कर पीते थे। दूसरे मुख से वह मदिरा का पान करते थे और तीसरे मुख से अन्नादि भोजन करते थे। इंद्र ने कुछ दिनों के बाद कहा कि मैं आपकी कृपा से यज्ञ करना चाहता हूँ जब विश्वरूपा की आज्ञानुसार यज्ञ आरम्भ हुआ तब एक दैत्य ने विश्वरूपा से कहा कि तुम्हारी माता दैत्य की लड़की है। इसलिए हमारे कल्याण के लिए एक आहुति दैत्यों के नाम पर भी दे दिया करो तो अति उत्तम बात है। विश्वरूपा उस दैत्य का कहना मानकर आहुति देते समय दैत्य नाम भी धीरे से लेने लगे। इस कारण से यज्ञ करने से देवताओं का तेज बल नहीं बढ़ा। इंद्र देव यह सब सुना तो गुस्सा होकर विश्वरूपा के तीनों सिरों को काट दिया जिससे मद्यपान करने वाले मुख से भंवरा,सोमपल्ली पाइन वाले मुख से कबूतर और अन्न खाने वाले मुख से तीतर बन गये। विश्वरूपा के मरते ही इंद्र का स्वरूप ब्रह्महत्या के असर बदल गया। देवताओं के एक वर्ष तक पश्चाताप करने पर भी ब्रह्महत्या का वह पाप से मुक्त नहीं हुए तो सब देवताओं के अरदास करने पर ब्रह्माजी  बृहस्पतिजी के सहित वहां आए। उस ब्रह्महत्या के चार भाग किये। उनमें से एक भाग पृथ्वी को दिया इसी कारण कहीं-कहीं धरती ऊँची-नीची और बीज बोने के लायक भी नहीं होती। साथ ही ब्रह्माजी ने यह वरदान दिया जहाँ पृथ्वी में गढ्ढा होगा,कुछ समय पाकर स्वयं भर जाएगा।

दूसरा वृक्षों को दिया जिसे उनमें से गोंद बनकर बहता है। इस कारण गूगल के अतिरिक्त सब गोंद अशुद्ध समझे जाते हैं। वृक्षों को यह वरदान दिया कि ऊपर से सूख जाने पर जड़ फिर से फूट जाती है। तीसरा भाफ औरतों को दिया,इसी कारण औरतें हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चांडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनि,तीसरे दिन धोबिन के रूप में रहकर और चौथे दिन होती हैं और सन्तान प्राप्ति का उनको वरदान दिया। चौथा भाग जल को दिया जिससे फेन और सिवाल आदि जल के ऊपर आ जाते है। जल को वरदान मिला कि जिस चीज में डाला जायेगा, वह बोझ में बढ़ जायेगी। इस तरह इंद्र को ब्रह्महत्यस के पाप से मुक्त किया। जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसके सभी तरह के पाप बृहस्पतिजी महाराज की कृपा से समाप्त हो जाते है।



अथ बृहस्पतिवार के व्रत की दूसरी कथा समाप्त।।



बृहस्पति वार के दिन के अंतिम व्रत के लिए हवन-यज्ञ:-व्रत करने वालों को अपनी इच्छा की पूर्ति होने के बाद अंतिम व्रत के दिन हवन-यज्ञ करना चाहिए।

◆हवन करने के लिए समिधा के रूप में अश्वत्थ,पीपल की लकड़ी का उपयोग करना चाहिए।



बृहस्पति वार के व्रत का दान करना:-मनुष्य को चने की दाल से बने प्रदार्थ हलवा,मोदक,भूजिये,केशरिया चांवल आदि प्रदार्थ को किसी पीली गाय को अथवा पढ़ने वाले लड़के या लड़की एवं अध्यापक को दान के रूप में देना चाहिए।

◆मनुष्य को दक्षिणा के रूप में सोने का,पीतल के बर्तन,पीले कपड़े,पीला रुमाल,पीला चन्दन गट्टा,चने की दाल और हल्दी को अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए।



बृहस्पतिवार के व्रत को करने के फायदे:-

◆बृहस्पतिवार के दिन का व्रत करने वाले को विद्या और बुद्धि प्राप्त होती है।

◆मनुष्य को उच्च पद अपने काम करने की जगह पर मिलता है।

◆मनुष्य के परिवार में रुपयों-पैसों की कोई तरह कमी नहीं रहती है।

◆मनुष्य को गृहस्थी जीवन के सुख मिलता है।

◆मनुष्य को अच्छी सन्तान मिलती है।

◆मनुष्य को अपने काम करने की जगह पर और अपने सामाजिक जीवन में इज्जत मिलती है।


    ।।अथ बृहस्पति वार व्रत कथा समाप्त।।



        ।।अथ बृहस्पतिवार की आरती।।


जय जय आरती राम तुम्हारी। 

राम दयालु भक्तिहितकारी।।जय जय आरती राम.....।।

जनहित प्रगटे हरिव्रतधारी।

जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पारी।।जय जय आरती राम.....।।

द्रुपदसुता को चीर बढ़ायो।

गज के काज पयादे धायो।।जय जय आरती राम.....।।

दस सिर छेदि बीस भुज तोरे।

तैंतीस कोटि देव बंदि छोर।।जय जय आरती राम.....।।

छत्र लिए सर लक्ष्मण भ्राता ।

आरती करत कौशल्या माता।।जय जय आरती राम....।।

शुक शारद नारदमुनि ध्यावैं। 

भरत शत्रुघन चंवर डुरावैं।।जय जय आरती राम....।।

राम के चरण गहे महावीरा।

ध्रुव प्रहलाद बालिसुर वीरा।।जय जय आरती राम....।।

लंका जीति अवध हरि आए।

सब सन्तन मिलि मंगल गाए।।जय जय आरती राम....।।

सीय सहित सिंहासन बैठे रामा।

सभी भक्तजन करें प्रणामा।।जय जय आरती राम.......।।

 

    ।।अथ बृहस्पतिवार की आरती समाप्त।।

Sunday, January 24, 2021

January 24, 2021

अथ बुधवार के व्रत करने के विधि-विधान के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(Fasting rules of Atha Wednesday, rules, story, Aarti and benefits of fasting)

             



अथ बुधवार के व्रत करने के विधि-विधान के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(Fasting rules of Atha Wednesday, rules, story, Aarti and benefits of fasting):-जिन मनुष्य की जन्मकुंडली पर बुध ग्रह के बुरे असर होते है और जो मनुष्य सभी तरह के सुख की चाह रखने वाले होते है,उनको बुधवार का व्रत करना चाहिए।



बुधवार व्रत करने की रीति:-शुक्ल पक्ष के पहले बुधवार को  बुधवार के व्रत को शुरुआत करना चाहिए।

◆मनुष्य को इक्कीस या पैंतालीस व्रत करने की चाह से संकल्प से ही व्रत को करना चाहिए। 

◆रात और दिन में एक टाईम ही खाना खाना चाहिए।

◆मनुष्य को हरे रंग की चीजों को ज्यादा इस व्रत में प्रयोग में लेना चाहिए।

◆हरे रंग के अंगवस्त्र या हरे रंग के कपड़े को मनुष्य को बुधवार के दिन पहनना चाहिए।

◆मनुष्य को अपने मन में "ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः"  बीज मन्त्र को मन में जपते हुए दिन को बिताना चाहिए। 

◆मनुष्य को बुधवार के दिन भगवान गणपति जी के दर्शन करना चाहिए।

◆मनुष्य को एक पाव मोदक के लड्डू का प्रसाद के रूप में भगवान गणपति जी को भोग लगाना चाहिए।

◆मनुष्य को बुधवार के दिन गाय को हरी रंग की घास का दान करना चाहिए।



बुधवार व्रत करने की पूजा-आराधना विधि:-बुधवार व्रत के अंत में भगवान शिव शंकर जी की पूजा- आराधना धूप,बेल-पत्र आदि से करना चाहिए।

◆मनुष्य को पूरी कथा को सुनना चाहिए और आरती लेना चाहिए उसके बाद भगवान को लगाए हुए भोग को प्रसाद के रूप में सभी को बांटने के बाद खुद को ग्रहण करना चाहिए।

◆कथा के समय उठ-खेश नहीं करनी चाहिए।

भोजन के रूप उपयोग में लेना:-मनुष्य को हरे मूंग की दाल चावल की खिचड़ी,मूँग का हलवा,हरे मूँग की पकौड़ी आदि वस्तुओं को किसी विकलांग मनुष्य को इन वस्तुओं से बनाये गये भोजन को करवा कर खुद भोजन  के चार से पांच ग्रास को ग्रहण करना चाहिए उसके बाद दूसरी वस्तुओं को खाने में उपयोग में लेना चाहिए। मनुष्य को भोजन के करने से पूर्व पांच से सात तुलसी के पान को गंगा के पानी या साफ पानी के साथ मिक्स करके पीना चाहिए।



बुधवार के दिन हवन- यज्ञ करना:-मनुष्य को अपनी मन की मुराद के पूरा होने पर अंतिम व्रत के दिन में मनुष्य को हवन-यज्ञ करने के लिए हवन समिधा के रूप में अपामार्ग,आंधीझाड़ा की लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए।



बुधवार के दिन दान करना:- मनुष्य को अंतिम व्रत के दिन में हवन करने के बाद किसी विकलांग मनुष्य को या भिक्षुक को हरे मूंग की दाल, चावल की खिचड़ी,मूँग का हलवा,हरे मूँग की पकौड़ी आदि वस्तुओं का दान करना और इन वस्तुओं को भोजन के रूप में खिलाना चाहिए।

◆मनुष्य को बुधवार के व्रत के अंतिम व्रत के दिन कांसी के बर्तन,दो फल,हरे रंग का रुमाल,हरे रंग के कपड़े और मूंग आदि वस्तुओं का दान करना चाहिए।



अथ बुधवार व्रत की कथा:-पुराने समय में एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विदा करवाने के लिए अपने ससुराल को गया।अपने ससुराल में कुछ दिनों तक रुकने के बाद अपने सास-ससुर से अपनी पत्नी को उसके साथ भेजने का कहा।लेकिन उसके सास-ससुर ने कहा कि आज तो बुधवार का दिन है और आज के दिन बेटी को विदा नहीं करते है। वह व्यक्ति अपने सास-ससुर की बात को नहीं माना बहुत समझाने पर भी अपने जिद पर अड़ा रहा और अपनी जिद से अपनी पत्नी को बुधवार के दिन अपने ससुराल से लेकर अपने नगर की तरफ रवाना हो गया। रास्ते में उसकी पत्नी को प्यास लगी तो उसनेअपनी पति से कहा कि मुझे बहुत जोर की प्यास लगी है। तब वह व्यक्ति लोटा लेकर अपने रथ से उतरकर जल लेने के लिए निकल पड़ा और जब वह व्यक्ति पानी लेकर अपनी पत्नी के पास आया तो वह देखकर आश्चर्य से चकित रह गया कि ठीक अपनी ही जैसी शक्ल तथा वैसी ही वेशभूषा में एक व्यक्ति उसकी पत्नी के पास में रथ पर बैठा हुआ था। दूसरा व्यक्ति बोला कि यह मेरी पत्नी है। मैं तो अभी-अभी अपने ससुराल से विदा कराकर ला रहा हूँ। इस तरह दोनों व्यक्ति आपस मे लड़ाई-झगड़े करने लगे। तभी राज्य के सिपाही आकर लोटे वाले व्यक्ति को पकड़ने लगे। औरत से पूछा,की इन दोनों में से तुम्हारा असली पति कौनसा है? तब वह पत्नी शांत रही क्योंकि दोनों ही एक जैसे रूप और कपड़े पहने हुए थे वह किसे अपना पति कहे। वह व्यक्ति ईश्वर से प्रार्थना करता हुआ बोला- ''है परमेश्वर!यह आपकी क्या लीला है कि सच्चा झूठ बन रहा हूँ।" तभी आकाशवाणी हुई कि मूर्ख व्यक्ति आज बुधवार के दिन तुझे गमन नहीं करना था। तूने किसी की भी बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपने हठ से अपनी पत्नी को विदा कराकर ले आया। यह सब लीला बुधदेव भगवान की है। उस लोटे वाले व्यक्ति ने बुधदेव भगवान से प्रार्थना की और अपनी गलती के लिए माफी मांगी। तब जाकर बुधदेवजी गायब हो गए। वह अपनी औरत को लेकर अपने नगर को आया तथा बुधवार का व्रत उन दोनों पति-पत्नी ने पूरे विधि-विधान से करने लगे।

जो व्यक्ति बुधवार की कथा को सुनता है और दूसरों को सुनाता है उसको बुधवार के दिन यात्रा का कोई भी तरह का दोष नहीं लगता है और उसको सब तरह के सुख मिलते है।


            ।।अथ बुधवार व्रत कथा समाप्त।।



बुधवार के दिन व्रत को करने के फायदे:-बुधवार का व्रत करने वाले मनुष्य को ज्ञान और बुद्धि में बढ़ोतरी होती है।

◆मनुष्य के व्यापार में अच्छे रुपयों-पैसों की प्राप्ति होती है।

◆मनुष्य को उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती हैं।



           ।।अथ बुधवार की आरती।।


आरती युगलकिशोर की कीजै।

तन मन न्यौछावर कीजै।।आरती युगल.........।। 

गौर श्याम मुख निरखन लीजै।

हरि का स्वरूप नयन भरि लीजै।।आरती युगल....।। रवि शशि कोटि बदन की शोभा 

ताहि निरखि मेरो मन लोभा।।आरती युगल.........।। ओढ़े नील पीत पट सारी।

कुंजविहारी गिरिवरधारी।।आरती युगल.........।। 

फूलन की सेज फूलन की माला।

रत्न सिंहासन बैठे नन्दलाला।।आरती युगल........।।कंचनथार कपूर की बाती। 

हरि आए निर्मल भई छाती।।आरती युगल.........।। 

श्रीपुरुषोत्तम गिरिवरधारी।

आरती करें सकल बज्र नारी।।आरती युगल......।। 

नन्दनन्दन बृजभान किशोरी।

परमानन्द स्वामी अविचल जोड़ी।।आरती युगल...।।


      ।।अथ बुधवार की आरती समाप्त।। 


Saturday, January 23, 2021

January 23, 2021

अथ मंगलवार के व्रत करने के विधि-विधान के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(Fasting rules of Atha Tuesday, rules of law, story, Aarti and benefits of fasting)

              



अथ मंगलवार के व्रत करने के विधि-विधान के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(Fasting rules of Atha Tuesday, rules of law, story, Aarti and benefits of fasting):-मंगलवार के दिन भगवान राम जी के भक्त हनुमानजी की आराधना और पूजा-पाठ करने चाहिए। हनुमानजी को खुश करने से सभी तरह के संकटो से मुक्ति मिटती है और मनुष्य को सब तरह के सुख मिलते है।मंगल ग्रह से सम्बंधित कमजोर असर से छुटकारा मिलता है।सभी तरह के सुख को पाने के लिए, खून के दोषों को दूर करने के लिए, राजकीय सम्मान पाने तथा सन्तान के रूप में बेटे को पाने के लिए मंगलवार का व्रत को करना सबसे अच्छा रहता है। 


मंगलवार व्रत की रीति के नियम:-मंगलवार का व्रत किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार से आरम्भ करना चाहिए।मनुष्य को अपने मन मे इक्कीस या पैंतालीस व्रत को करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए।

भोजन के रूप में:- मनुष्य को खाने में गेँहू के आटे में गुड़ और गाय के शुद्ध घी से बना हुवा हलवा और मोदक लड्डुओं का पांच से सात ग्रास लेना चाहिए और फिर मनुष्य को खाने के रूप में दूसरी चीजों को खाना चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार के व्रत में नमक का उपयोग नहीं करना चाहिए।

◆मनुष्य को गेँहू के आटे में गुड़ और गाय के शुद्ध घी से बना हुवा हलवा और मोदक लड्डुओं को किसी भी बेल-पशु को खिलाकर ही भोजन को करना चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार व्रत के दिन हनुमानजी के मंदिर में जाकर दीपक को जलाना चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार व्रत के दिन हनुमानजी के मंदिर में जाकर लाल फूलों की माला अर्पण करनी चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार व्रत के दिन हनुमानजी के मंदिर में पानी वाला श्रीफल को अर्पण करना चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार व्रत के दिन हनुमानजी के मंदिर में मनुष्य को श्रीहनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए

◆मनुष्य को मंगलवार व्रत के दिन हनुमानजी के मंदिर में  या अपने घर पर हनुमानाष्टक-बजरंग बाण का पाठ पूरी श्रद्धा से करना चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार व्रत के दिन हनुमानजी के मंदिर में या घर पर पूरे दिन में समय के अनुसार ऊँ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः बीज मंत्र का उच्चारण अपने मन के अंदर जाप करना चाहिए। 

◆मंगलवार के व्रत में गेहूँ और गुड़ का ही भोजन करना चाहिए।

◆दिन रात में मनुष्य को मंगलवार के व्रत में केवल एक बार ही करना चाहिए।

◆मनुष्य को इक्कीस सप्ताह तक व्रत को करना चाहिए। मनुष्य के सभी तरह के दोष मंगलवार का व्रत करने से मिट जाते है।

◆मनुष्य को मंगलवार के व्रत में पूजन के लिए लाल फुलों को चढ़ाना चाहिए।

◆मनुष्य को मंगलवार के व्रत के दिन लाल कपड़ों को पहनना चाहिए।

◆अंत में हनुमानजी की पूजा करनी चाहिए।

◆मंगलवार के व्रत की कथा का सुनना चाहिए।



अथ मंगलवार व्रत की पौराणिक कथा:- एक जमाने मे एक ब्राह्मण पति-पत्नी रहते थे,उनको कोई भी सन्तान नहीं थी,जिसके कारण वे दोनों ही हमेशा दुःखी रहते थे। इस तरह सन्तान नहीं होने से ब्राह्मण दुःखी होकर एक दिन हनुमानजी की पूजा करने के लिए जंगल में चला गया। वह पूजा के साथ महावीर जी से एक बेटे की इच्छा किया करता था। बेटे को पाने के लिए ब्राह्मणी नित्य मंगलवार का व्रत को किया करती थी। ब्राह्मणी मंगलवार के दिन व्रत के अंत भोजन बनाकर हनुमानजी को भोग लगाकर अंत मे खुद भोजन को करती थी। इस तरह एक दिन कोई व्रत आ गया जिसके कारण ब्राह्मणी भोजन नहीं बना सकी और हनुमानजी को भोग नहीं लगा सकी। जिससे वह अपने मन में ऐसी प्रतिज्ञा करके सो गयी कि अब वह अगले मंगलवार को हनुमानजी को भोग लगाने के बाद ही भोजन करेगी। इस तरह छः दिन तक वह भूखी प्यासी पड़ी रही। मंगलवार के दिन ब्राह्मणी को बेहोशी आ गयी तब हनुमानजी उसकी निष्ठा और लगन को देखकर खुश हो गये। हनुमानजी ने ब्राह्मणी को दर्शन दिए और कहा-"मैं तुमसे बहुत ही खुश हूँ। मैं तुझको एक सुंदर पुत्र देता हूँ। जो तुम्हारी बहुत ही सेवा करेगा।"हनुमानजी मंगल को बाल रूप में उसको दर्शन देकर अंतर्ध्यान हो गये। सुंदर बालक को पाकर ब्राह्मणी बहुत ही खुश हुई। ब्राह्मणी उस बालक का नाम मंगल रखा। थोड़े समय के बाद ब्राह्मण जंगल से लौटकर आया। खुश मुद्रा में सुंदर बालक को घर में खेलते हुए देखकर वह ब्राह्मण पत्नी से बोला कि-"यह बोला-"यह बालक कौन है?"पत्नी ने कहा-"मंगलवार के व्रत से खुश होकर हनुमानजी ने दर्शन देकर मुझे बालक दिया है। पत्नी की बात छल से भरी जान उसने सोचा यह कुल्टा व्यभिचारिणी अपनी कलुषता छुपाने  के लिए बात बन रही है। एक दिन उसका पति कुंए पर पानी भरने चला तो उसकी पत्नी ने कहा कि मंगल को भी अपने साथ ले जाओ। वह मंगल को भी साथ ले गया और उसको कुएँ में डालकर वापिस पानी भरकर घर आया तो पत्नी ने पूछा कि मंगल कहाँ है? तभी मंगल हँसते हुए घर आ गया। उसको देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित हुआ। रात के समय उसके पति को हनुमानजी ने सपने में कहा-"यह बालक मैंने दिया है तुम पत्नी को कुल्टा क्यों कहते हो? पति यह जानकर हर्षित हुआ। फिर पति-पत्नी मंगलवार का व्रत रख अपना जीवन आनन्दपूर्वक बिताने लगे।जो कोई मनुष्य मंगलवार व्रत कथा को पढ़ता है या सुनता है और नियम से व्रत रखता है। उसे हनुमानजी की कृपा से सब कष्ट दूर होकर सभी तरह के सुख प्राप्त होते है।



मंगलवार तथा मंगलिया की कथा:- पुराने जमाने में एक बूढ़ी औरत थी। वह मंगल देवता को अपना इष्ट देव मानकर हमेशा मंगलवार का व्रत रखती और मंगलदेव का पूजन भी किया करती थी।मंगलवार के दिन उत्पन्न हुआ एक बेटा था इस कारण उस बूढ़ी औरत के बेटे को मंगलिया के नाम से पुकारा करती थी।मंगलदेव के दिन बुढ़िया न तो घर को लीपती और न ही पृथ्वी खोदा करती थी। एक दिन मंगल देवता उस बूढ़ी औरत की श्रद्धा की परीक्षा लेने के लिये उसके घर में साधु का रूप धरके आये और दरवाजे पर आवाज लगाई। बुढ़िया ने कहा महाराज क्या आदेश है ? साधु कहने लगा किबहुत ही जोरों की भूख लगी है,भोजन बनाना है। इसके लिए तू थोड़ी सी पृथ्वी लीप दे तो तेरा पूण्य होगा। यह सुन बुढ़िया ने कहा महाराज आज मंगलवार की व्रती हूँ इसलिये मैं चौका नहीं लगा सकती हूँ आप कहो तो जल का छिड़काव कर दूँ। उस पर भोजन बना लें। साधु कहने लगा कि मैं गोबर से लीपे चौके पर खाना बनाता हूँ। बुढ़िया ने कहा पृथ्वी लीपने के सिवाय और कोई सेवा हो तो मैं सबकुछ करने के लिए तैयार हूँ तब साधु ने कहा कि सोच समझकर उत्तर दो जो कुछ भी मैं कहूँ सब तुमको करना होगा। बुढ़िया कहने लगी कि महाराज पृथ्वी लीपने के अलावा जो भी आदेश दोगे। उसका पालन जरूर करूंगी। बुढ़िया ने इसे तीन बार वचन दे दिया। तब साधु कहने लगा कि तू अपने लड़के को बुलाकर औंधा लिटा दे,मैं उसकी पीठ पर भोजन बनाऊंगा। साधु की बात सुनकर बुढ़िया चुप हो गई। तब साधु ने कहा-"बुला ले लड़के को,अब सोच-विचार क्या करती है? बुढ़िया मंगलिया,मंगलिया कहकर पुकारने लगी।थोड़ी देर बाद लड़का आ गया। बुढ़िया ने कहा-"जा बेटे तुझको बाबाजी बुलाते हैं।" लड़के ने बाबाजी से जाकर पूछा-"क्या आदेश है महाराज?" बाबाजी ने कहा कि जाओ अपनी माताजी को बुला लाओ। तब माता आ गई तो साधु ने कहा कि तू ही इसको लिटा दे। बुढ़िया ने मंगल देवता को याद करते हुए लड़के को औंधा लिटा दिया और उसकी पीठ लगी कि महाराज अब जो कुुुछ आपको करना है कीजिए,मैं जाकर अपना काम करती हूँ। साधु ने लड़के की पीठ पर रखी हुई अंगीठी में आग जलाई  और उस पर भोजन बनाया। जब भोजन बन चुका तो साधु ने बुढ़िया से कहा कि अब अपने लड़के को बुलाओ वह भी आकर भोग ले जाये। बुढ़िया कहने लगी कि यह कैसे आश्चर्य की बात है कि उसकी पीठ पर अपने आग जलाई और उसी को प्रसाद के लिये बुलाते है। क्या यह सम्भव है कि अब भी आप उसको जीवट समझते हैं। आप कृपा करके उसका स्मरण भी मुझको न कराइए और भोग लगाकर जहां जाना हो जाइये। साधु के अत्यंत आग्रह करने पर बुढ़िया ने ज्यों ही मंगलिया कह कर आवाज लगाई त्यों ही एक ओर से दौड़ता हुआ आ गया। साधु ने लड़के को प्रसाद दिया और कहा कि माई तेरा व्रत सफल हो गया। तेरे ह्रदय में दया है और अपने इष्ट देव में अटल श्रद्धा है। इसके कारण तुमको कभी कोई कष्ट नहीं पहुंचेगा।

        

    ।।अथ मंगलवार व्रत कथा समाप्त।।



मनुष्य के द्वारा दान करना:-मनुष्य को सब तरह के काम करने के बाद में दक्षिणा के रूप में लाल कपड़े,ताम्र के बर्तन,गुड़ और नारियल आदि वस्तुओं का श्रद्धा पूर्वक दान किसी गरीब मनुष्य को या ब्राह्मण को करना चाहिए।


मंगलवार के व्रत में हवन-यज्ञ करना:-मनुष्य को  हनुमानजी के नाम से और मंगल ग्रह के अशुभ असर के लिए और अपनी मन की इच्छा के पूरा होने पर हवन-यज्ञ करना चाहिए।

◆मंगलवार के अंतिम व्रत के दिन पर हवन करना चाहिए।

◆मनुष्य को हवन करने के बाद बालक विद्यार्थी को लड्डुओं से भोजन करना चाहिए।

◆मनुष्य को हवन की समिधा के रूप में खदिर-खैर की लकड़ी का उपयोग करना चाहिए।


मंगलवार के व्रत को करने के फायदे:-मंगलवार के व्रत को मनुष्य के द्वारा करने से उसको ऋण लेने से मुक्ति मिलती है।

◆मनुष्य की धन सम्बन्धी परेशानी से आजादी मिलती है।

◆मनुष्य को सन्तान की प्राप्ति होती है।

◆मनुष्य को सुख मिलता है और मनुष्य के मन में अपने ऊपर विश्वास बढ़ता है

      


    

        ।।अथ मंगलवार के व्रत की आरती।।


आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।आरती कीजै हनुमान....।। 

जाके बल से गिरिवर कांपे।

रोग दोष निकट न झांके।।आरती कीजै हनुमान....।। 

अंजनी पुत्र महा बलदाई।

सन्तन के प्रभु सदा सहाई।।आरती कीजै हनुमान....।। 

दे बीड़ा रघुनाथ पठाये।

लंका जारि सिया सुधि लाये।।आरती कीजै हनुमान....।। 

लंका सो कोट समुद्र सी खाईं।

जात पवनसुत बार न लाई।।आरती कीजै हनुमान....।। 

लंका जारि असुर संहारे।

सियारामजी के काज संवारे।।आरती कीजै हनुमान....।। 

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।

लाय संजीवन प्राण उबारे।।आरती कीजै हनुमान....।। 

पैठी पाताल तोरि जम कारे।

अहिरावण की भुजा उखारे।।आरती कीजै हनुमान....।। 

बाएं भुजा असुर संहारे। 

दाहिने भुजा संत जन तारे।।आरती कीजै हनुमान....।। 

सुर नर मुनि आरती उतारें। 

जै जै जै हनुमान उचारें।।आरती कीजै हनुमान....।। 

कंचन थार कपूर लौ छाई। 

आरति करत अंजना माई।।आरती कीजै हनुमान....।। 

जो हनुमान जी की आरती गावै।

बसि बैकुंठ परमपद पावै।।आरती कीजै हनुमान....।। 

लंका विध्वंस किये रघुराई।

तुलसीदास कीर्ति गाई।।आरती कीजै हनुमान....।। 


  ।।अथ मंगलवार के व्रत की आरती समाप्त।।

Friday, January 22, 2021

January 22, 2021

अथ सोमवार के व्रत करने के विधि-विधान के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(Fasting rules of Atha Monday, rules, story, aarti and benefits of fasting)




अथ सोमवार के व्रत करने के विधि-विधान के नियम,कथा,आरती और व्रत के फायदे(Fasting rules of Atha Monday, rules, story, aarti and benefits of fasting):-सोमवार का व्रत भगवान शिव-शंकरजी को खुश करने के लिए किया जाता है,शिवजी सबकी इच्छाओं को जल्दी पूरा करते है और उनका नाम भोलेनाथ है। मनुष्य के द्वारा किये हुए व्रत के करने से जीवन में आ रही बाधाएं और कष्टों से मुक्ति मिलती है और मनुष्य इस भवसागर से तर जाता है। सोम ग्रह के बुरे असर को कम करने के लिए भी सोमवार का व्रत करना चाहिए।

सोमवार व्रत की रीति के नियम्:-सोमवार का व्रत चैत्र, वैशाख,श्रावण या कार्तिक मार्गशीर्ष के मास से धारण करना योग्य होता है।

◆मनुष्य को किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम पहले सोमवार से शुरुआत करना चाहिए। 

◆सोमवार के व्रत की संख्या अपने मन में दश या चौपन व्रत करने की इच्छा से करना चाहिए।

भोजन के रूप में:-मनुष्य को भोजन में दही,दूध-चावल अथवा खीर के पहले साथ ग्रास को खाना चाहिए फिर दूसरे प्रदार्थ को खाना चाहिए।

दान करना:-मनुष्य को व्रत के दिन खाने से पहले किसी भी विद्यार्थी को दही,दूध-चावल अथवा खीर वस्तु प्रदार्थ आदि में से अपनी इच्छा के अनुसार अनुदान करना चाहिए।

◆मनुष्य को खाना सूर्यास्त के बाद ही करना चाहिए।

◆मनुष्य को सोमवार के दिन में सफेद रंग के कपड़े आदि को पहनना ठीक रहता है।

◆प्रातःकाल के समय स्नान करने के बाद चन्दन का तिलक लगाना चाहिए।

◆मनुष्य को शिवालय के दर्शन दिप-ज्योति सुगंध अर्पण करना चाहिए।

◆मनुष्य को "ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः" इ बीज मंत्र का अपनी मन श्रद्धा शक्ति के अनुसार जाप करना चाहिए।

◆मनुष्य को जब भी व्रत शुरू करें तो दिन के तीसरे पहर को ध्यान रखना चाहिए।

◆सोमवार के व्रत में फल को आहार का कोई भी विशेष नियम नहीं होता है।

◆मनुष्य को दिन और रात में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए।

◆मनुष्य को भगवान शंकरजी और माता गौरी का पूजन सोमवार के दिन में करना चाहिए।

सोमवार व्रत के भाग:-सोमवार व्रत को तीन भागों में मनुष्य कर सकता है,जो इस तरह है-

1.सामान्य हर सोमवार व्रत।

2.सौम्य सोमवार का व्रत।

3.सोलहा सोमवार का व्रत।

सामान्य हर,सौम्य एवं सोलहा सोमवार का व्रत तीनों व्रत करने की विधि:- सामान्य हर सोमवार,सौम्य सोमवार का व्रत और सोलहा सोमवार के व्रत में विधि समान है। सोमवार के दिन के तीसरे पहर में एक समय ही भोजन करना चाहिए और शंकर जी और गौरी माता की पूजा करनी चाहिए।लेकिन तीनों व्रतों की कथा अलग-अलग है।

1.अथ हर सोमवार व्रत की कथा आरम्भ:-एक जमाने में एक बहुत ही धनवान साहूकार रहता था,जिसके पास में कोई तरह के धन की कमी नहीं थी।लेकिन उसको बहुत ही दुःख था कि उसके कोई पुत्र सन्तान नहीं थी इसी सोच-विचार में रात-दिन पुत्र सन्तान इच्छा के लिए हर सोमवार को शंकरजी का व्रत और पूजन करता और शाम के समय में शंकरजी के मंदिर में जाकर शंकरजी के विग्रह के सामने दिया को जलाया करता था। उस साहूकार के भक्तिभाव को देखकर माता गौरी ने शंकर जी से कहा कि-"महाराज! यह साहूकार आपका बहुत बड़ा भक्त है और आपका व्रत व पूजन पूरी श्रद्धा और विश्वास से करता है,इसलिए इसकी मन की इच्छा को पूरा करना चाहिए।

शंकरजी ने कहा-"हे गौरी! यह जगत् कर्म की जगह है,जो मनुष्य जैसे कर्म करता है,उसे वैसा ही फल मिलता है"माता गौरी ने ज्यादा आग्रह करते हुए कहा-"महाराज! जब यह आपका बहुत ही ज्यादा भक्त है और इसको जो भी दुःख है उसे आप दूर कर देना चाहिए, क्योंकि आप सब भक्तों पर सदैव अपनी कृपा दृष्टि करते है और दुखों को दूर करते है।यदि आप ऐसा नहीं करोगें तो कोई भी मनुष्य आपकी सेवा,व्रत और पूजन क्यों करेंगे?

गौरी माता के अधिक आग्रह करते देख शंकरजी महाराज कहने लगे-"हे गौरी! इस साहूकार के कोई भी पुत्र सन्तान नहीं होने से दुःखी रहता है। लेकिन इसके भाग्य में पुत्र सन्तान नहीं होते हुए भी मैं इसे पुत्र सन्तान का वरदान देता हूँ, लेकिन इसका पुत्र बारह साल तक ही जीवित रहेगा उसके बाद उसकी मृत्यु हो जायेगी। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।" यह सब बातें साहूकार सुन रहा था। इन बातों से नहीं उसे खुशी हुई और नहि उसे दुःख हुआ। वह पहले की तरह नियमित शंकरजी का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ सनी बीतने पर साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और दशवें महीने में उसके गर्भ से एक अति सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। साहूकार घर में खुशिया मनाई गई लेकिन साहूकार मालूम था कि यह पुत्र बारह साल के बाद मर जायेगा जिसके कारण उसको कोई खुशी नहीं थी इस बात को किसी को भी नहीं बताई। जब बालक ग्यारह साल का होने पर उसकी पत्नी ने साहूकार से कहा कि इस पुत्र का विवाह करना चाहिए तो साहूकार ने कहा अभी इसका विवाह का समय नहीं है और पुत्र को काशी पढ़ने के लिए भेजूंगा।फिर साहूकार ने अपने साले को बुलाकर,उसको बहुत ही ज्यादा धन देकर कहा-" तुम इस बालक को काशी जी पढ़ने के लिये ले जाओ और रास्ते में जिस जगह पर भी जाओ यज्ञ और ब्राह्मणों को भोजन कराते जाओ।

दोनों मामा और भानजे यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए जा रहे थे।मार्ग में एक शहर से गुजरे रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक राजा की लड़की का विवाह था और दूसरे राजा का जो लड़का विवाह करने के लिए आया था वह एक आंख से काना था। लड़की वाले पिता राजा को चिंता थी कि कहि लड़की उस राजा के लड़के को काना जानकर शादी के लिए मना नहीं कर देवे। जब उस राजा ने सेठ के पुत्र को देखा की इस सुंदर लड़के से अपनी लड़की विवाह कर देता हूँ। जब राजा ने लड़के और उसके मामा से बात करके उनको मना लिया। उस लड़के को बिंद के कपड़े पहनाकर घोड़ी पर बैठाकर अपने राजमहल के दरवाजे पर ले गये और सब काम खुशी से पूरा हो गया। फिर लड़की के पिता ने विचार किया कि शादी की रस्में भी इस लड़के से कराने में क्या बुराई है? इस तरह का विचार करके लड़के और उसके मामा से कहा-",यदि फेरों का और कन्यादान के काम को भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी और मैं इसके बदले में बहुत धन दूंगा।"तो उन्होंने बात मान ली और शादी काम पूरी तरह से पूरा हो गया, परन्तु लड़के जब जाने लगा टी उसने राजकुमारी की चुंदड़ी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है,परन्तु जिस राजकुमार के साथ तुमको भेजेंगे वह एक आंख से काना है और मैं पढ़ने काशी जा रहा हूँ। जब राजकुमारी ने चुंदड़ी के पल्ले पर गांठ देखी और खोला तो उसमें लिखा देखकर पढा और जब उस राजकुमार के साथ भेजने पर उसने मना कर दिया और बोली कि मेरा पति नहीं है।मेरी शादी इस राजकुमार के साथ नहीं हुई है। मेरी शादी जिसके साथ हुई है वह तो पढ़ने काशी गया है। राजकुमारी को उसके माता-पिता ने विदा नहीं किया और बारात वापस भेज दी।

सेठ का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचकर वहां उन्होंने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू कर दिया।जब लड़का बारह साल का हुआ और उस दिन यज्ञ किया गया था लड़के ने अपने मामाजी से कहा मेरी तबियत ठीक नहीं है तो मामा ने कहा अंदर जाकर सो जाओ। जब लड़का अंदर जाकर सो गया और उसके प्राण निकल गए। जब मामा ने देखा कि लड़का मर चुका है तो उसको दुःख हुवा और उसने विचार किया कि अभी रोने-पीटने से यज्ञ का काम अधूरा रह जाएगा, इसलिए उस मामा ने यज्ञ को जल्दी से पूरा कराके ब्राह्मणों को दान देकर विदा करने के बाद रोना-पीटना शुरू किया। तब उसी समय शंकरजी और माता गौरी वहां से जा रहे थे उन्होंने रोने की आवाज सुनी तब गौरी माता ने शंकरजी को कहा कि-"महाराज! कोई दुखियारा रो रहा है उसके दुःख व कष्ट को मिटावे। जब शंकरजी-माता गौरी नजदीक से देखा तो वहां एक लड़का मरा पड़ा था। माता गौरी कहने लगी-महाराज यह तो उस सेठ का लड़का है जिसको आपने वरदान देने से हुआ था। शंकरजी कहने लगे-"हे गौरी इसकी उम्र इतनी ही थी यह भोग चुका है।" तब माता गौरी ने कहा-"हे महाराज!  इस लड़के को उम्र दो नहीं तो इसके माता-पिता तड़प-तड़पकर मर जायेंगे।"माता गौरी के बहुत कहने पर शंकरजी के द्वारा उस लड़के को जीवन दान देने पर लड़का जीवित हो गया। शंकरजी और माता गौरी कैलाश पर्वत को चले गये।

तब वह लड़का और मामा उसी तरह यज्ञ करते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते अपने घर की ओर निकले तो मार्ग में वही नगर आया,जहां पर उस लड़के मि शादी हुई थी। वहां पर आकर दोनों हवन शुरू किया तो राजा ने देखा और पहचान लिया। पहचाने पर अपने राजमहल ले गये और उन दोनों की बहुत ही सेवा की साथ ही बहुत से दास-दासियों सहित सम्मान के साथ अपनी लड़की और जमाई को विदा किया। जब वह अपने नगर के नजदीक आने पर मामा ने कहा कि मैं पहले घर पर जाकर सूचना देता हूँ, जब लड़के के मामा घर पर पहुंचा तो देखा कि लड़के के माता-पिता छत पर बैठे है और उन्होंने ने प्रतिज्ञा कर रखी है कि जब तक हमारा पुत्र सकुशल लौट आएगा तो ही हम राजी-खुशी से नीचे आ जायेंगे। इतने में उस लड़के के मामा ने आकर यह सूचना दी कि आपका पुत्र आ गया है तो उनको विश्वास नहीं हुआ तब उसके मामा ने सौगन्ध खाकर कहा कु आपका पुत्र अपनी पत्नी  और बहुत ज्यादा धन साथ लेकर आया है। तो सेठ ने खुशी के साथ उसका स्वागत किया और बड़ी खुशी के साथ रहने लगे। 

सोमवार व्रत करने के फायदे:-जो अपनी श्रद्धा से सोमवार का व्रत करता है और कथा को पढ़ता है और कथा को सुनता है उसकी सभी मन की कामनाए पूरी होती है।


2.सोलह सोमवार व्रत कथा:-एक बार शंकरजी और माता गौरी की इच्छा मृत्यु लोक में घूमने की हुई तो वे दोनों मृत्यु लोक में पधारे,वहां पर घूमते हुए विदर्भ देश के अंतर्गत अमरावती सुंदर नगरी में पहुंचे। अमरापुरी की तरह अमरावती नगर में सब तरह के सुखों से पूर्ण थी। उस अमरावती नगरी के राजा के द्वारा उस नगरी में अधिक सुंदर शिवजी का मंदिर बनाया हुआ था। उसमें भगवान शंकरजी भगवती गौरी माता के साथ निवास करने लगे।

एक समय माता गौरी ने प्राणपति को खुश देख के हंसी मजाक करने की इच्छा से बोली-"हे महाराज! आज तो हम दोनों चौसर खेलेंगे। शिवजी ने अपनी प्राणप्रिया की बात को मानकर चौसर खेलने लगे। उसी समय उस मंदिर का पुजारी ब्राह्मण मन्दिर में पूजा करने को आया। माता गौरी ने पुजारी ब्राह्मण से पूछा कि इस चौसर के खेल में किसकी जीत होगी। ब्राह्मण बिना सोचे ही बोला कि शिवजी की जीत होगी,लेकिन जब बाजी खत्म हुई तो माता गौरी की जीत हो गयी। माता गौरी ने जीतते ही ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध में श्राप देने को तैयार हो गयी। तब शिवजी ने उनको समझाया परन्तु माता गौरी ने शिवजी की बात को नहीं मानते हुए उस पुजारी ब्राह्मण को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया।

1.ब्राह्मण के शाप से मुक्ति का उपाय अप्ससराओं के द्वारा बताना:-श्राप की वजह से पुजारी ब्राह्मण अनेक तरह से दुःखी रहने लगा। इस तरह के कष्ट को भोगते हुए बहुत दिन हो गये तो देवलोक की अप्ससरायें शिवजी की पूजा करने के लिए उस मंदिर में आयी और पुजारी के कोढ़ के कष्ट को देखकर बड़े दयाभाव से उससे रोगी होने का कारण पूछा-"पुजारी ने बिना संकोच के सब बातें उनको बताई।"वे अप्ससरायें बोली-" पुजारी!भगवान शिवजी तुम्हारे कष्ट को जल्दी दूर कर देंगे तुम्हे चिंता करने की जरूरत नहीं है। तुम सब बातों में सबसे अच्छा षोडश सोमवार का व्रत भक्ति भाव से किया करो।पुजारी ने अप्ससराओं से हाथ जोड़कर षोडश सोमवार करने की विधि पूछने लगा।

सोलह सोमवार व्रत के लिए सामग्री और विधि अप्ससराओं के द्वारा बताई गई:-अप्ससराओं बोलीं की जिस दिन सोमवार हो उस दिन भक्तिभाव के साथ व्रत करे। साफ कपड़े पहनकर आधा सेर गेहूँ का आटा ले उसके तीन अंगा बनावे और घी,गुड़,दिप,नैवेद्य,पुंगीफल,बेलपत्र,जनेऊ जोड़ी में,चन्दन,अक्षत,फलादि के द्वारा प्रदोष समय में भगवान शिव जी का विधि से पूजन करके उसके बाद में अंगों में से एक शिवजी को अर्पण कर दे बाकी दो को शिवजी का प्रसाद समझकर हाजिर लोगों में बांट दें और खुद प्रसाद लेवे। 

इस विधि से सोलह सोमवार व्रत को करे।उसके बाद सत्रहवें सोमवार के दिन पाव सेर पवित्र गेहूँ के आटे की बाटी बनावे उसके बाद घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनावें और शिवजी को भोग लगाकर हाजिर भक्तों को बांटे और पीछे खुद सकुटुम्ब प्रसाद को लेवें। इस तरह पुजारी नियमित सोमवार को व्रत करता रहा और वह ठीक हो गया। जब शिवजी और माता गौरी वापस उस मंदिर में आये तो देखा कि पुजारी कोढ़ से ठीक होकर स्वस्थ हो गया है तो माता गौरी ने पुजारी ब्राह्मण के ठीक होने का कारण पूछा तो ब्राह्मण पुजारी ने सोलह सोमवार व्रत की कथा कह सुनाई।


2.माता गौरी द्वारा अपने नाराज पुत्र को मनाने के लिए व्रत करना:- गौरी माताजी बहुत खुश होकर ब्राह्मण से व्रत की विधि के बारे में जानकर व्रत करने को तैयार हुई। इस व्रत के बाद उनकी मन की कामना पूरी हुई तथा अपने आज्ञाकारी नाराज पुत्र स्वामी कार्तिकेय को मनाया।जब कार्तिकेय अपनी नाराजगी खत्म हो गयी तो अपनी माता गौरी से पूछा कि मेरे विचार में बदलाव किसके कारण हुआ तब माता गौरी ने बताया कि षोडश सोमवार के व्रत करने से तुम्हारा मन बदल गया और तुम मेरे पास आ गए।


3.भगवान कार्तिकेय के द्वारा अपने प्यारे मित्र से मिलने की इच्छा के लिए व्रत करना:- तब कार्तिकेय ने कहा कि हे माताजी मैं यह सोलह सोमवार का व्रत करूँगा क्योंकि प्रियमित्र ब्राह्मण बहुत दुःखी दिल से परदेश गया है और मुझे उससे मिलने की इच्छा है। जब कार्तिकेय जी ने यह व्रत करने से अपने प्रिमित्र ब्राह्मण से मिले। जब कार्तिकेयजी से उनके मित्र ने पूछा कि हम अचानक कैसे मिले तो कार्तिकेय जी सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया कि यह व्रत करने से मेरी तुम्हारे से मुलाकात हुई है।


4.ब्राह्मण के द्वारा अपनी शादी के लिए व्रत करना:- ब्राह्मण मित्र को अपने विवाह की बहुत इच्छा हुई। कार्तिकेय जी से व्रत की विधि पूछकर स्वयं विधिपूर्वक व्रत को किया। व्रत के असर से जब ब्राह्मण किसी काम के लिए विदेश गया तो वहां राजा की लड़की का स्वयंवर था। राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले मे सब तरह श्रृंगारित हथिनी माला डालेगी मैं उसी के साथ अपनी प्यारी पुत्री का विवाह कर दूंगा। शिवजी की कृपा से ब्राह्मण भी स्वयंवर को देखने की इच्छा से राजसभा में गया और सभा में एक ओर बैठ गया। नियत समय पर हथिनी आई और जयमाला उस ब्राह्मण के गले में दाल दी। राजा अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से कन्या का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया। राजा ने बहुत से धन और सम्मान देकर सन्तुष्ट किया। ब्राह्मण सुंदर राजकन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा।


5.ब्राह्मणी के द्वारा पुत्र सन्तान की कामना के लिए व्रत करना:-एक दिन राजकन्या ने अपने पति से प्रश्न किया-"हे प्राणनाथ! आपने कौनसा ऐसा पूण्य का काम किया जिसके असर से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपके गले में माला डाली?"ब्राह्मण बोला-"हे प्राणप्रिय!मैने अपने मित्र कार्तिकेय जी के कहे अनुसार सोलह सोमवार का व्रत पूर्ण विधि-विधान से किया जिसके असर से मुझे तुम जैसी सुंदर रूप वाली पत्नी मिली है।व्रत की महिमा को सुनकर वह आश्चर्य हुआ और वह भी अपने मन में पुत्र Tसन्तान को पाने के लिए व्रत करने लगी। शिवजी की कृपा से उसके गर्भ में एक बहुत सुंदर अच्छा धर्मात्मा और पंडित पुत्र सन्तान की प्रप्ति हुई। माता-पिता दोनों उस देव पुत्र को पाकर बहुत ही खुश हुए और उसका पालन-पोषण अच्छी तरह से करने लगे।


6.ब्राह्मणी के पुत्र द्वारा राज्याधिकार पाने के लिए व्रत करना:-जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन अपने माता से पूछा कि"मां तुमने कौन सा ऐसा व्रत किया जिसके असर से मेरे जैसा पुत्र तुम्हारे गर्भ से पैदा हुआ।"माता ने पुत्र की तीव्र इच्छा को जानकर सोलह सोमवार के व्रत को विधि सहित अपने पुत्र को बताया।पुत्र ने ऐसे सरल व्रत और सब इच्छा के पूर्ण करने वाला सुना तो वह भी इस व्रत को राज्याधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को व्रत को विधि-विधान से करने लगा तो एक दिन एक देश के वृद्ध राजा के दूतों ने आकर उसकी राजकन्या के लिए चुना। राजा ने अपनी राजकन्या का विवाह सब गुणों से युक्त ब्राह्मण युवक से करवा दिया और जब वृद्ध राजा देवलोक हो गये तब यही ब्राह्मण बालक राजगद्दी पर बिठाया गया,क्योंकि दिवंगत राजा के कोई पुत्र सन्तान नहीं था। राज्य का उत्तराधिकारी होकर भी वह ब्राह्मण पुत्र अपने सोलह सोमवार के व्रत को करता रहा।जब सत्रहवां सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी प्रियतमा से सब पूजन सामग्री लेकर शिवपूजा के लिये शिवालय में चलने को कहा,परन्तु प्रियतमा ने उसकी आज्ञा की परवाह न कि। दास-दासियों के द्वारा सब सामग्री शिवालय में भिजवा दी और खुद नहीं गई।जब राजा ने शिवजी की पूजा को समाप्त किया,तब आकाशवाणी राजा के प्रति हुई-" हे राजा! अपनी इस रानी को अपने राजमहल से निकल दे नहीं तो तेरा सर्वनाश कर देगी।"आकाशवाणी को सुन राजा को आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और तुरंत ही मंत्रणा गृह में आकर अपने सभासदों को बुलाकर पूछने लगा कि हे मंत्रियों!मुझे आज शिवजी की वाणी हुई है कि राजा तू अपनी इस रानी को अपने महल से निकाल दें नहीं तो ये तेरा सर्वनाश कर देगी। राज्यसभाये,मंत्री आदि सब बड़े विस्मय और दुःख में डूब गये क्योंकि जिस कन्या के कारण राजा को राज्य मिला है उसी को निकालने का यह जल रच रहा है,यह कैसे हो सकेगा?अंत में राजा ने अपने यहां से निकल दिया। रानी दुःखी ह्रदय में को कोसती हुई नगर  के बाहर चली गई। बिना पदत्राण, फ़टे कपड़े पहने भूख से दुखी धीरे-धीरे चलकर एक नगर में पहुंची। वहाँ एक बुढ़िया सूट कात कर बेचने को जाती थी। रानी की करूँ हालत को देख बोली-"चल तू मेरा सूत बिकवा दे,मैं वृद्ध हूँ, भाव नहीं जानती हूँ।" ऐसी बात बुढ़िया की सुन रानी ने बुढ़िया के सिर से सूट गठरी उतार कर अपने सर पर रख ली, थोड़ी देर बाद आंधी आई और बुढ़िया का सूत पोटली के सहित उड़ गया। बेचारी बुढ़िया पछताती रह गई और रानी को अपने साथ से दूर रहने को कह दिया। अब रानी तेली के घर गई,तो तेली के सब मटके शिवजी के प्रकोप से उसी समय चटक गये। ऐसी हालत देख तेली ने रानी को अपने घर से निकल दिया।इस तरह रानी अत्यंत दुःख पाती हुई एक नदी के तट पर गई तो नदी का सारा जल सुख गया। उसके बाद रानी एक वन में गई,वहां जाकर सरोवर में सीढ़ी से उतरकर पानी पीने को गई उसके हाथ का जल में स्पर्श होते ही सरोवर का नीलकमल के समान जल असंख्य कीड़ामय गन्दा हो गया। रानी ने भाग्य पर दोषारोपण करते हुए उस जल को पी करके पेड़ की पत्ते उसी समय गिर जाते। वन,सरोवर तथा जल की ऐसी दशा देखकर गऊ चराते ग्वालों ने अपनी गुसाईं जी से जो उस जंगल में स्थित मंदिर में पुजारी थे कहि। गुसाईं जी के आदेशानुसार ग्वाले रानी को पकड़कर गुसाईं के पास ले गये। रानी की मुख कांति और शरीर की शोभा देख गुसाईं जान गए कि यह अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कुलीन स्त्री है। ऐसा सोचकर पुजारीजी ने कहा कि मैं तुमको किसी तरह का कष्ट नहीं दूंगा। गुसाईं के ऐसे वचन सुनकर रानी को धीरज हुआ और आश्रम में रहने लगी। परन्तु आश्रम में रानी जो भोजन बनाती उसमें कीड़े पड़ जाते,जल भर के लाती तो उसमें कीड़े पड़ जाते। अब तो गुसाईं जी भी दुःखी हुए और रानी से बोले कि हे बेटी! तुम्हारे ऊपर कौनसे देवता का कोप है जिससे तुम्हारी ऐसी दशा हुई?पुजारी की बात सुन रानी ने शिवजी महाराज के पूजन का बहिष्कार करने की कथा सुनाई तो पुजारी शिवजी महाराज की अनेक तरह से स्तुति करते हुए रानी से बोले कि देवी तुम सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले सोलह सोमवार व्रत को करो। उसके असर से अपने कष्ट से मुक्त हो सकोगी। गुसाईं की बात सुनकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत को विधिवत सम्पन्न किया और सत्रहवें सोमवार को पूजन के प्रभाव से राजा के ह्रदय में विचार आया कि रानी को गए बहुत समय बीत गया न जाने कहां- कहां भटकती होगी? ढूढ़ना चाहिए। यह सोच रानी को तलाश करने के लिए चारों दिशाओं में दूत भेजे। वे दूत रानी को खोजते हुए पुजारी के आश्रम में पहुँचे वहाँ रानी को पाकर पुजारी से रानी का मांगने लगे,परन्तु पुजारी ने उन दूतों को मना कर दिया। तो दूत चुपचाप लौट आए और आकर महाराज के सन्मुख रानी का पता बतलाया।रानी का पता पाकर राजा स्वयं पुजारी के आश्रम में गये और पुजारी से अरदास करने लगे कि"महाराज!जो देवी आपके आश्रम में रहती है वह मेरी पत्नी है। शिवजी के कोप से मैंने इसको त्याग दिया था अब इस पर से शिवजी का प्रकोप शांत हो गया है। इसलिए मैं इन्हें लेने आया हूँ। आप इनको मेरे साथ जाने की आज्ञा दीजिए।"


गुसाईं आज्ञा पाकर रानी खुश होकर राजा के साथ महल में आई,नगर में अनेक तरह के बधावे बजने लगे। नगर निवासियों ने नगर के दरवाजे तथा नगर को तोरण बन्दनवारों से विविध प्रकार से सजाया। घर-घर में मंगल गान होने लगे,पंडितो ने विविध वेद मंत्रों का उच्चारण करके अपनी राज रानी का स्वागत किया। ऐसी अवस्था मे रानी पुनः अपनी राजधानी में प्रवेश किया, महाराज ने अनेक तरह से ब्राह्मणों को दानादि देकर सन्तुष्ट किया,याचकों को धन-धान्य दिया,नगरी में स्थान-स्थान पर सदाव्रत खुलवाये, जहाँ भूखे लोगों को भोजन मिलता था। इस प्रकार से राजा शिवजी की कृपा का पात्र हो राजधानी के साथ अनेक तरह के सुखों का भोग करते हुए सोमवार व्रत करने लगा। विधिवत शिवाजी का पूजन करते हुए, इस लोक में अनेकानेक सुखों को भोगने के बाद शिवपुरी को पधारे। ऐसे ही जो मनुष्य मन,वचन और कर्ण द्वारा भक्ति सहित सोलह सोमवार का व्रत पूजन इत्यादि विधिवत करता है वह इस लोक में समस्त सुखों को भोगकर अंत मे शिवपुरी को प्राप्त विधिवत करता है। यह व्रत सब मनोरथों को पूर्ण करने वाला हैं। 


             ।।इति सोलह सोमवार व्रत कथा।।



3.सौम्य प्रदोष व्रत कथा:-पुराने जमाने में एक ब्राह्मणी अपने पति की मृत्यु होने के बाद बिना आधार के भीख मांगने लग गई। वह सुबह होते ही अपने बेटे को अपने साथ लेकर भीख मांगने के लिए अपने घर से बाहर निकल जाती थी और शाम होने पर घर आती थी। एक समय में उसको विदर्भ राज्य के राजा का पुत्र मिला। जिसके पिता को दुश्मनों ने धोखे से मार दिया और उससे उसके पिता का राज्य छीनकर उसे उसके राज्य से बाहर निकाल दिया। इस कारण से वह बहुत दु:खी होकर इधर-उधर मारा-मारा फिर रहा था। ब्राह्मणी जब उसे इस तरह देखा तो उसको अपने साथ अपने घर ले गई और उसका लालन-पालन करने लगी। एक दिन दोनों बालक वन में खेल खेलते हुए वन में गन्धर्व कन्याओं को देखा। राजा का पुत्र वन में रुककर उस अंशुमती नाम की गन्धर्व कन्या से बातचीत करने लगा। एक दिन वह अपने घर से निकल उस जगह पर पहुंचा जहां पर गन्धर्व लड़की से मिला था,तो उसने देखा कि अंशुमती अपने माता-पिता के साथ बैठी बातें कर रही थी।उस तरफ ब्राह्मणी ऋषियों के द्वारा बताये हुए सोमवार के प्रदोष व्रत को कर रही थी। थोड़े समय के बाद में उस राजकुमार को अंशुमती के माता-पिता ने बताया कि तुम विदर्भ राज्य के राजकुमार धर्मगुप्त हो,हम आपके साथ भगवान शिवजी के आशीर्वाद से आपका लग्न अपनी राजकुमारी अंशुमती से करवा देते है। इस तरह अंशुमती का लग्न राजकुमार धर्मगुप्त के साथ हो जाता था। फिर राजकुमार ने अपने ससुराल गन्धर्व राज की सेना की मदद से विदर्भ राज्य को जीत लिया और ब्राह्मण के पुत्र को अपना मंत्री बनाया था। इस तरह उस ब्राह्मणी के द्वारा सोमवार के प्रदोष व्रत के प्रभाव से सबकुछ हुआ। यही से सोमवार के प्रदोष व्रत की शुरुआत हुई थी।



            ।।इति सौम्य प्रदोष व्रत कथा।।




                   सोमवार की आरती


आरती करत जनक कर जोरे। बड़े भाग्य रामजी घर आए मोरे।।टेक।।

जीत स्वयंवर धनुष चढ़ाये। सब भूपन के गर्व मिटाए।।

तोरि पिनाक किए दुई खण्डा।रघुकुल हर्ष रावण मन शंका।।

आई है लिए संग सहेली। हरिष निरख वरमाला मिली।।

गज मोतियन के चौक पुराए। कनक कलश भरि मंगल गाए।।

कंचन थार कपूर की बाती। सुर नर मुनि जन आये बराती।।

फिरत भांवरी बाजा बाजे। सिया सहित रघुवीर विराजे।।

धनि-धनि राम लखन दोऊ भाई। धनि-धनि दशरथ कौशल्या माई।।

राजा दशरथ जनक विदेही। भरत शत्रुधन परम् सनेही।।

मिथिलापुर में बजत बधाई। दास मुरारी स्वामी आरती गाई।।


हवन यज्ञ करना:-मनुष्य को मन की इच्छा के अनुसार सोमवार व्रत के करने के बाद में अंतिम सोमवार के दिन हवन करना चाहिए। 

◆मनुष्य को हवन की क्रिया को करने के बाद बालक-विद्यार्थी को खीर सहित खाना खिलाना चाहिए।।

◆हवन की समिधा के रूप में पलाश की छाल या लकड़ीयों का उपयोग करना चाहिए।

दान देना:-मनुष्य को दक्षिणा के रूप में चाँदी अथवा सफेद कपड़ो को दान के रूप में किसी गरीब या ब्राह्मण को देना चाहिए।

सोमवार के दिन का व्रत करने के फायदे:-मनुष्य को सोमवार का व्रत करने से मनुष्य को अपने व्यापार में फायदा होता है।

◆मनुष्य के मानसिक कष्ट विकारों का नाश होकर मुक्ति मिलती है।


Thursday, January 21, 2021

January 21, 2021

इतवार (रविवार) के व्रत की विधि-विधान,कथा और आरती(Law, legislation and aarti for the fast of Sunday)

                    


इतवार (रविवार) व्रत के विधि-विधान, कथा और आरती (Law, legislation and story of Sunday (Sunday) fast): -मनुष्य के द्वारा शरीर को निरोग रखने के लिए उपवास करना चाहिए।जिससे मनुष्य को पेट से सम्बंधित बीमारियों से मुक्ति मिले। रवि ग्रह के कमजोर हालात को उनका व्रत करके रवि ग्रह को अपनी जन्मकुंडली में मजबूत कर सकते है।


रविवार (इतवार) के व्रत करने के फायदे:-सभी तरह की मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए व्रत है, जो कि रविवार का व्रत उत्तम रहता है।

इतवार व्रत की विधि-विधान:-जो कोई भी इतवार व्रत करने का इच्छुक मनुष्य होता है,उसे सबसे पहले  प्रातःकाल के समय अपनी दैनिक दिनचर्या को पूरा करनी चाहिए। उसके बाद स्नानादि करके साफ-सुधरे कपड़ो को पहनना चाहिए।

◆मन को एकाग्रचित्त करके मनुष्य को शांत मन से अपने इष्ट का ध्यान करके उनको याद करना चाहिए। 

◆मनुष्य को खाना दिन में एक बार ही करना चाहिए। खाना और फलों को आहार के रूप में भास्कर देव के उजाला रहते हुए ही करना उत्तम रहता है। 

◆मनुष्य को बिना खाये भास्कर देव यदि अस्त हो जावें तो अगले दिन भास्कर देव के प्रकट होने पर भास्कर देव को अर्ध्य देकर ही भोजन करना चाहिए।

◆मनुष्य को व्रत के अंत में भास्कर देव की कथा को सुनना चाहिए।

◆मनुष्य को खाने के रूप तेल से बनी नमकीन का भोजन के रूप में कभी भी उपयोग में नहीं करना चाहिए।

◆मनुष्य के द्वारा इतवार का व्रत करने से मनुष्य को इज्जत मिलती है और सामाजिक जीवन में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है तथा दुश्मनों का अंत होता है।

◆मनुष्य को नेत्रों के कष्ट से मुक्ति मिलती है और दूसरे सभी तरह के कष्टों से आजादी मिलती है।

इतवार या रविवार की पौराणिक कथा:-पुराने जमाने में एक बूढ़ी औरत एक गांव में रहती थी,वह रोजाना सवेरे भास्कर देव के उगने से पूर्व उठती थी और हर एक रविवार को सुबह उठ कर स्नानादि करके कच्चे बने अपने भवन को गाय के गोबर से लीपकर,खाना बनाकर भगवान भास्कर देव को भोग लगाकर ही खुद खाना खाती थी। इस तरह हर एक रविवार को व्रत करने से उसके घर में धन-धान्य का भंडार भरा रहता था। श्रीहरि के आशीर्वाद से उसको किसी भी तरह से कोई भी दुःख और गरीबी नहीं थी। सभी प्रकार से उसके घर में चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली थी।लेकिन समय के चलते हुए कुछ दिनों के बीत जाने पर एक दिन बूढ़ी औरत की पड़ोसन जिसके यहां से वह गाय का गोबर  लाया करती थी। पड़ोसन के मन में विचार शुरू हो गया कि यह बूढ़ी औरत हमेशा मेरी गाय का गोबर ले जाया करती है। इसलिए उस पड़ोसन ने अपनी गाय को कहि पर भीतरी जगह पर बांधना शुरू कर दिया। जिससे उस बूढ़ी औरत को गाय का गोबर नहीं मिलने से रविवार व्रत कथा में मुश्किल होने लगी और जिससे वह अपने घर को गाय के गोबर से नहीं लीप सकी। इसलिए उसने खाना नहीं खाया और पूरे दिन बिना खाने के ही उसने व्रत को किया। रात्रि बीतने पर भी उसने खाना नहीं खाया। जब वह रात के समय में सोई हुई थी तो उसके सपने में भस्कर देव आये और उससे पूछा कि आज तुमने नहीं खाना बनाया और नहीं मेरे को भोग लगाया। उस बूढ़ी औरत ने भास्कर देव को गाय का गोबर नहीं मिलने का कारण बताया। तब भास्कर देव ने कहा कि हे माता मै तुम्हें एक ऐसी गाय देता हूं कि वह गाय तुम्हारी सभी तरह की मन की इच्छाओं की पूर्ति होगी। क्योंकि तुम नित्य इतवार को गाय के गोबर से घर को लीपकर ही भोजन बनाकर मेरा भोग लगाने के बाद ही स्वयं खाना खाती हो,इससे मैं खुश होकर तुम्हें आशीर्वाद के साथ वरदान देता हूं कि तुम्हारी सभी मन की कामनाएं पूरी होगी। मैं उन सबको वरदान देता हूं जो कि मेरी पूजा आराधना करते है उनको मैं उनकी गरीबी से मुक्त करके गरीब को धन देता हूं और जिस औरत के सन्तान नहीं होती है उनको सन्तान देता हूँ और उनको अपने अंत समय में उनकी मुक्ति भी देता हूँ। सपने में इस तरह के प्रवचन देकर भगवान भेदकर देव गायब हो गये। जब बूढ़ी औरत सुबह उठी तो उसने अपने घर के आँगन में एक सुंदर गाय और बछड़ा को बंधा देखा। जिससे वह बूढ़ी औरत खुश होकर उस सुंदर गाय को बछड़ा सहित घर के बाहर बांध दिया और खाने के लिए चारा भी डाल दिया। जब पड़ोसन ने बूढ़ी औरत के घर के बाहर एक सुंदर गाय और बछड़ा को बंधे देखा तो उसको जलन से उसके ह्रदय में कष्ट हुवा तथा उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है तो उस गाय के सोने के गोबर को अपने घर ले गयी और उस बूढ़ी औरत की गाय के गोबर की जगह पर अपनी गाय का गोबर को रख दिया। वह पड़ोसन हमेशा ऐसा ही करती रही लेकिन बूढ़ी औरत को मालूम ही नहीं पड़ने दिया। तब सर्वव्यापी भगवान भास्कर ने विचार किया कि चतुर पड़ोसन के काम से बूढ़ी औरत ठगी जा रही है। भगवान ने शामक समय अपनी माया से बड़े जोर की आँधी चला दी। डर के मारे उस बूढ़ी औरत ने अपनी गाय को घर के आँगन में बांध दिया। सुबह जब बूढ़ी औरत उठी तो उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है,तो उस बूढ़ी औरत को बहुत ही ज्यादा आश्चर्य हुवा और वह हमेशा अपनी गाय को घर के भीतर बांधना शुरू कर दिया। इससे उसकी पड़ौसन को सोने का गोबर उठाने का मौका नहीं मिल पा रहा था,जिससे उसकी जलन ओर तेज हो गयी और कुछ भी उपाय नहीं सूझने पर उसने अपने राज्य के राजा के पास में जाकर कहा कि महाराज मेरे घर के पड़ोस में एक बुढ़िया रहती है, उसकी गाय सोने का गोबर देती है। यह गाय तो आप जैसे महाराज के राज्य में महाराज के पास होनी चाहिए जिससे उस सोने रूपी गोबर का उपयोग आप प्रजा की भलाई के रूप कर सके। उस बुढ़िया को इतने सोने की क्या जरूरत है। इस तरह की वार्ता को सुनकर राजा ने अपने सैनिक को आदेश दिया कि उस बुढ़िया से वह गाय लेकर आवे। जब बुढ़िया सुबह अपनी दैनिकचर्या स्नानादि करके भास्कर देव को भोग लगाने के बाद जब खुद खाना खाने लगी तो उसके घर राजा के सिपाई आकर उसकी बंधी हुई गाय को खोलकर अपने साथ ले गये। सेनिको के सामने बुढ़िया बहुत ही रोई-बिलकी लेकिन उन पर कोई तरह से असर नहीं हुवा। इस तरह वह बुढ़िया बिना खाये-पिये रात को रोती हुई भास्कर देव से अरदास करती रही कि वह गाय को वापस उसे दिलवा दे। उस तरफ राजा उस सोने के गोबर की गाय को पाकर बहुत ही ज्यादा खुश हो गया। लेकिन जब राजा सवेरे उठा तो देखा कि पूरा महल गाय के गोबर से भरा पड़ा है और वहां पर सोने के गोबर का नामों-निशान भी नहीं है। राजा इस तरह गोबर से भरा महल देखकर घबरा गया। भगवान भास्कर देव ने राजा के सपने में कहा कि हे राजन उस बूढ़ी औरत की गाय को तुम लौटा दो जिससे तुम्हारा भला होगा यदि तुम उस गाय को नहीं लोटावोगे तो मैं तेरा राज्य सहित तुम्हारा नाश कर दूंगा। मेने उस बूढ़ी औरत को उसके इतवार के व्रत से खुश होकर उसको दी थी। सुबह होते ही राजा ने उस बुढ़िया को राजमहल में बुलाकर उसे बहुत सा धन देकर सम्मान के साथ गाय और बछड़ा को दे दिया। उस बुरी पड़ोसन बुढ़िया को बुलाकर उसे दण्ड दिया। इतना करने के बाद राजा के महल से सब गोबर गायब गो गया। राजा ने अपनी राज सभा को इकट्ठा करके सभी प्रजा में घोषणा करवा दी कि हर कोई मनुष्य इतवार का व्रत करें।जिससे सभी की मन की इच्छाओं की पूर्ति होगी  और व्रत करने से सभी लोग सुखी जीवन को व्यतीत करने लगे। किसी भी तरह की बीमारी तथा प्रकृति का प्रकोप उस नगर  पर नहीं होता था। सारी प्रजा सुख एवं खुशी से रहने लगी। 

             ।।इति रविवार व्रत कथा समाप्त।।





               ।।अथ रविवार की आरती।।

कहुँ लगि आरती दास करेंगे,सकल जगत् जाकी जोट विराजे।।टेक।।

सात समुद्र जाके चरणानि बसे,कहा भये जल कुम्भ भरे हो राम।।टेक।।

कोटि भानु जाके नख की शोभा,कहा भयो मन्दिर दिप धरे हो राम।।टेक।।

भार अठारह रामा बलि जाके, कहा भयो शिर पुष्पधरे हो राम।।टेक।।

छप्पन भोग जाके नितप्रति लागे, कहा भयो नैवेद्य धरे हो राम।।टेक।।

अमित कोटि जाके बाजा बाजे,कहा भयो झनकार करे हो राम।।टेक।।

चार वेद जाके मुख की शोभा,कहा भयो ब्रह्म वेद पढ़े हो राम।।टेक।।

शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक,नारद मुनि जाको ध्यान धरें हो राम।टेक।।

हिम मंदार जाको पवन झकोरें, कहा भयो शिर चँवर ढुरे हो राम।।टेक।।

लख चौरासी वन्धे छुड़ाये, केवल हरियश नामदेव गाये।।हो रामा।।