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Thursday, February 4, 2021

February 04, 2021

श्री हनुमानजी का 'संकटमोचन हनुमानाष्टक काव्य रचना(ShreeHanumanji's 'Sankatmochan Hanumanashtak Poetry'):

श्री हनुमानजी का 'संकटमोचन हनुमानाष्टक  काव्य रचना(ShreeHanumanji's Hanumanashtak Poetry'):-हनुमान जयंती की तिथि में बहुत मत चलन में बताए गए। उन मतों में से चैत्र शुक्ल पूर्णिमा और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का मत विशेष कर चलन में है। श्री हनुमान जी के जन्म दिन के रूप में हनुमान जयंती पुरे भारतवर्ष में मनाई जाती है। हनुमान जयंती के दिन श्री हनुमानजी की भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिए। श्री हनुमानजी को श्री रामजी के अनन्य भक्त के रूप में जाना जाता है। हनुमानजी को मारुतीनन्दन के रूप और अंजनी पुत्र के रूप में भी जाना जाता है।




भारतीय वैदिक धर्म गर्न्थो के अनुसार जो को मनुष्य श्री हनुमानजी की पूजा-अर्चना करता है, उसके सभी पापों और कष्टों को श्री हनुमानजी हर लेते है। संकटमोचन हनुमानाष्टक के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी थे। भारतीय वैदिक धर्म गर्न्थो के अनुसार हनुमान जयंती पर 'संकट मोचन हनुमानाष्टक का पाठ' करने से मनुष्य के सभी तरह के पापों और कष्टों को श्री हनुमानजी हर लेते है और मनुष्य के जीवन मे खुशहाली भर देते है। 




ShreeHanumanji's Hanumanashtak Poetry'






गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन परिचय:-गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'रामचरितमानस काव्य' को बनाया था।गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म 1554 ईसवी में श्रावण शुक्ल सप्तमी तिथि के दिन बांदा में हुआ था। तुलसीदास के माता का नाम हुलसी देवी और पिता का नाम आत्माराम दुबे था। माता-पिता ने उनको अशुभ जानकर छोड़ दिया था। फिर उनको एक दासी ने पालन-पोषण किया था। थोडे समय के बाद उस दासी की मृत्यु हो गई। इस तरह उनको अशुभ समझकर कोई उनको अपने पास में रखने को तैयार नहीं था। इस तरह अनाथ होकर दर-दर की ठोकर खाते हुए भटकने लगे तब उनकी मुलाकात एक सन्त बाबा नरहरिदास जी हुई और उनके द्वारा शिक्षा प्राप्त की थी। उनका विवाह युवावस्था में रत्नावली नाम की एक रूपसी से हुआ था। तुलसीदास जी उससे बहुत ही प्यार करते और उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे। इस तरह समय बीतने पर उनकी पत्नी रत्नावली एक दिन बिना बताएं अपने मायके चली गई और बहुत समय बीतने पर नहीं आने पर तुलसीदास जी ने भारी बारिश के मौसम में भीगते हुए नदी को पार करके अपने ससुराल रात के समय पहुंचे। तब रत्नावली ने अपने पति के इस तरह की अधीरता से बड़ा दुःख हुआ और वह बोली-



हाड़चाम की देह मम, तापर ऐसी प्रीति।


तसु आधी जो होत राम पर, मिट जाती भवभीति।।



इस तरह के वचनों को सुनकर तुलसीदास जी को तीर की भांति चुभे। उन्होंने उसी समय घर को छोड़कर काशी व चित्रकूट के सन्तों का सत्संग करने लगे।




'रामचरित मानस'  की रचना:-जब एक दिन पूजा का चन्दन घिसते समय उनके पास में राजकुंवर आकर कहने लगा कि मेरे चन्दन लगावो तब तुलसीदास जी उस राजकुंवर के चन्दन लगाया।



तभी कहीं से किसी ने कहा-


चित्रकूट के घाट पर,भई सन्तन की भीर।


तुलसीदास चन्दन घिंसे,तिलक देत रघुवीर।।



यह सुनकर तुलसीदास ने भगवान के चरण पकड़ने चाहे पर वें उन्हें नहीं दिखे। अब राम के सेवक के रूप में उन्होंने अपने इष्टदेव का जीवनचरित्र लिखना आरम्भ किया।



दो वर्ष, सात माह व छब्बीस दिन के अथक मेहनत से उन्होंने ग्रन्थ को लिखकर पूरा किया। इस ग्रन्थ का नाम 'रामचरित मानस' रखा।



इस तरह भगवान राम को अपना इष्टदेव के रूप में जगह-जगह पर उनके गुणों के बखान करते रहे थे।



श्री हनुमानजी के द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जी को दर्शन देना:-भगवान रामजी के गुणों के आख्यान करते हुए, उनके गुणों के बखान करने का मुख्य क्षेत्र उन्होंने अवधपुरी, वाराणसी नगर के क्षेत्र पवित्र धाम काशी और चित्रकूट को बनाया था। वे हमेशा प्रभु श्री रामजी के गुणों का बखान अपने कीर्तन के रूप में करते थे। तुलसीदास जी के नियमित श्री रामजी के गुणों के बखान के कीर्तन में बहुत ही सारे भक्त आते थे और उस कीर्तन को सुनते थे। इस तरह काफी समय तक रामजी के गुणों के कीर्तन को सुनने के लिए एक रामरसिक नाम का कोढ़ की बीमारी से ग्रसित मनुष्य भी आता था और भगवान श्री रामजी के गुणों के आख्यान को ध्यानपूर्वक सुनता था। जब श्री रामजी का आख्यान पूरा होता तो वह रामरसिक वहां से चला जाता था। इस तरह तुलसीदास जी उसको नियमित रूप उसको देखते थे। इस तरह काफी समय हो गया। वह रामरसिक आता और प्रभु कीर्तन को सुनकर चला जाता था। एक दिन तुलसीदास ने विचार किया कि यह कौन है, जो नियमित रूप से प्रभु श्री रामजी के कीर्तन को सुनता और चला जाता है। तो तुलसीदास जी ने एक दिन विचार किया की मैं इसका पीछा करता हूं। तो जब रामजी का कीर्तन पूरा हुआ तब सब कीर्तन सुनने वाले चले गए। रामरसिक जाने लगा तो तुलसीदास जी उसके पास जाकर उसके चरणों को पकड़ कर कहा की आप कौन है और अपना परिचय बताए।




तब रामरसिक ने तुलसीदास जी के आदर भाव को देखकर उन्होंने अपना असली रूप बताया तब तुलसीदास जी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। रामरसिक कि रूप में पवनपुत्र हनुमान जी थे जो कि तुलसीदास जी की भक्ति भाव को परखने के लिए आते थे। इस तरह अपने देव हनुमानजी को अपने सामने देखकर आनन्दित हो गये और उन्होंने बजरंगबली जी के प्रोत्साहन से तुलसीदास जी अनेक काव्य रचनाओं को बनाया था। इस तरह से उन रचनाओं में से एक रचना 'संकट मोचन हनुमानाष्टक' को रचित किया था। इस तरह जिस जगह पर तुलसीदास जी और कोढ़ी के रूप में हनुमानजी के साथ मुलाकात और उनके दर्शन की जगह पर हनुमानजी का मंदिर बना हुआ है। इस तरह हनुमानजी के द्वारा अपने भक्तों का कष्टों को हरण करने वाले होते है और अपने भक्तों को सब तरह की मुशीबतों से मुक्त कराने वाले होते है।





बाल्य काल में हनुमानजी अपने मित्रों के साथ अपने बल और क्षमता का उपयोग खेल-खेलते समय करते थे। इस तरह की शैतानीपन से सभी परेशान थे। कभी ऋषियों-मुनियों को भी परेशान करते थे। इस तरह भृगुवंश के ऋषियों को परेशान करने से भृगुवंश के ऋषियों ने हनुमानजी को श्राप दिया कि तुम इन क्षमताओं और अपने बल का खेल की तरह उपयोग करते हो तो तुम सब यह क्षमताएं भूल जायोगे। इस तरह श्राप मिलने पर माता अंजनी और महाराज केसरी जी के अरदास पर भृगुवंश के ऋषियों ने कहा कि श्राप तो रहेगा, लेकिन जब उनको किसी के द्वारा याद दिलाने पर यह अपनी क्षमता और बल का उपयोग कर पाएंगे। इस तरह जब सीता माता की खोज-खबर के समय हनुमानजी को जामन्वत जी के द्वारा याद कराने पर उनमें पहले की तरह बल और क्षमताएं की प्राप्ति हुई थी। उन क्षमताओं और अपने बल का उपयोग इन आठ काव्य रचना के पद में बताया गया है।




।।अथ श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक।।



बाल समय रवि भक्षि लियो तब,


तिनहुँ लोक भयो अँधियारो।


ताहि सों त्रास भयो जग को,


यह संकट काहु सों जात न टारो।


देवन आनि करी बिनती तब,


छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।


को नहिं जानत है जग में कपि,


संकटमोचन नाम तिहारो। को-१


बालि की त्रास कपीस बसै गिरि,


जात महाप्रभु पंथ निहारो।


चौंकि महा मुनि साप दियो तब


चाहिये कौन बिचार बिचारो।


कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु,


सो तुम दास के सोक निवारो। को-२


अंगद के संग लेन गए सिय,


खोज कपीस यह बैन उचारो।


जीवत ना बचिहौ हम सों जु,


बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।


हेरि थके तट सिंधु सबै तब,


लाय सिया-सुधि प्रान उबारो। को-३


रावण त्रास दई सिय को सब,


राक्षसि सों कहि सोक निवारो।


ताहि समय हनुमान महाप्रभु,


जाय महा रजनीचर मारो।


चाहत सीय असोक सों आगिसु,


दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को-४


बान लग्यो उर लछिमन के तब


प्रान तजे सुत रावण मारो।


लै गृह बैद्य सुषेन समेत,


तबै गिरि द्रोन सुबीर उपारो।


आनि सजीवन हाथ दई तब,


लछिमन के तुम प्रान उबारो। को-५


रावण युद्ध अजान कियो तब,


नाग कि फाँस सबे सिर डारो।


श्री रघुनाथ समेत सबै दल,


मोह भयो यह संकट भारो।


आनि खगेश तबै हनुमान जु,


बन्धन काटी सुत्रास निवारो। को-६


बंधु समेत जबै अहिरावन,


लै रघुनाथ पाताल सिधारो।


देविहिं पूजि भली विधि सों बलि,


देउ सबै मिलि मन्त्र बिचारो।


जाय सहाय भयो तब ही,


अहिरावन सैन्य समेत संहारो। को-७


काज किए बड़ देवन के तुम,


बीर महाप्रभु देखि बिचारो।


कौन सा संकट मोर गरीब को,


जो तुमसों नहिं जात है टारो।


बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,


जो कछु संकट होय हमारो। को-८


                  

                   ।।दोहा।।


लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर,


बज्र देह दानवदलन, जय जय जय कपि सुर।


।।इति श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक।।


।।बोलो सियावर रामचन्द्रजी की जय।।




संकटमोचन हनुमानाष्टक काव्य रचना का विश्लेषण:-हनुमानाष्टक में आठ पद की काव्य रचना है, जिसमे हनुमानजी के द्वारा किये सभी कार्यों के बारे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने उनके कार्यों के बारे में जानकारी दी है। हनुमानजी के दिव्य रूप के द्वारा किये सब तरह के कामों को बताया है। हनुमानजी के क्षमता या बल के बारे में विवरण मिलता है कि किस तरह कैसे भी बाधाओ को उन्होंने कैसे अपनी बुद्धि और बल से हल किया है। इस तरह हनुमानजी के संकट मोचन हनुमानाष्टक पाठ को श्रद्धा से पाठन करने से वें अपने भक्तों की सभी तरह की बाधाओं और कष्टों को हर लेते है।




1.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की पहली काव्य रचना में:-श्री हनुमानजी के बाल्य काल के समय में भूख लगने पर सूरज भगवान को अपने भोजन के रूप में अपने मुहं में ले लिया था जिससे तीनों लोक देवलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक में अंधेरा हो गया था। सब जगह पर त्राहि-त्राहि होने लगी। तब सभी देवताओं ने मिलकर हनुमानजी से अरदास की तब जाकर सूरज देव को हनुमानजी ने अपने मुहं से छोड़ा।




2.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की दूसरी काव्य रचना में:-जब बाली के द्वारा अपने भाई सुग्रीव को मारने के लिए दौड़ते है,तब हनुमानजी के द्वारा सुग्रीव जी को बचाने का उपाय बताते है कि आप पर्वत ऋष्यमूक पर चले जाएं जहां पर ऋषि मातंग जी के आश्रम के पास में है, क्योंकि बाली को ऋषि मातंग जी ने श्राप दिया था कि वह ऋषि मातंग जी के आश्रम से एक योजन की दूरी में आया तो उसकी मौत हो जाएगी। इसलिए आप ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करें। इस तरह दुजी काव्य रचना में सुग्रीव की रक्षा का उपाय बताकर उनकी रक्षा की थी।




3.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की तीजी काव्य रचना में:-जब माता सीताजी की कोई खबर नहीं मिलती है तो तब सब वानर सेना को ढूंढने के लिए भगवान रामजी के द्वारा कहा जाता है,तब हनुमानजी अंगद को साथ लेकर माता सीताजी को ढूंढने का प्रण करते है और कहते है कि जब तक मैं माता सीताजी को खोज-खबर नहीं लाता हूँ, तब तक मुझे चैन से नहीं बैठूंगा और मेरे जीवत रहना कोई मतलब नहीं रहेगा। मैं तब तक अपना मुहं श्रीरामजी को नहीं दिखाऊंगा। आखिर में माता सीताजी की खोज-खबर के लिए सिंधु समुद्र को पार करके खबर लाकर ही प्रभु श्रीरामजी को अपना मुहं दिखाते है। यह इस तीसरे काव्य रचना में गोस्वामी तुलसीदास जी ने वृन्तान बताया है।




4.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की चौथी काव्य रचना में:-जब हनुमानजी के द्वारा सिंधु सागर को पार करके रावण की लंका में प्रवेश करते है तो वे देखते है कि सीता माता को दुःख और कष्ट रावण के द्वारा दिया जाता है। तब हनुमानजी के द्वारा राक्षसों को मारकर लंका में त्राहि-त्राहि करके अशोकवाटिका में आम के पेड़ पर जाकर बैठ जाते है और भगवान रामजी की निशानी के रूप में अंगूठी माता सीता जी को देखकर उनके दुःख और कष्ट को कम करते है। इस तरह चौथी काव्य रचना में माता सीताजी को अंगूठी देकर सांत्वना देते है।




5.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की पांचवी काव्य रचना में:-जब लक्ष्मण जी और रावण के पुत्र मेघनाद के बीच युद्ध चल रहा होता है, तब मेघनाद के द्वारा नागपाश के प्रयोग से लक्ष्मणजी मूर्छित हो जाते है, तब विभीषण जी के द्वारा रावण के राज्य वैद्य सुषेन को लाने का कहा जाता है, तब हनुमानजी रावण की लंका से वैद्य सुषेन को लाकर उसने उपचार लक्ष्मणजी का करवाते है, जब उपचार से ठीक नहीं होने पर वैद्य सुषेन के द्वारा पर्वत से संजीवनी बूटी लाने का रास्ता बताया जाता है। तब हनुमानजी अपने पवन वेग से उड़ते हुए सुमेरु पर्वत से अनजान संजीवनी बूटी से उन्होंने पूरे पर्वत को उठाकर ले आये और वैद्य सुषेन के द्वारा लक्ष्मणजी का उपचार कराके उनके प्राणों की रक्षा की इस पांचवी काव्य रचना के पद में बताया गया है।




6.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की छठी काव्य रचना में:-जब भगवान राम और लक्ष्मणजी सहित सभी वानर सेना पर रावण के द्वारा युद्ध में नागपाश बाण के प्रयोग करने से भगवान और लक्ष्मणजी के साथ सभी वानर सेना पर नागपाश बाण के बंधन में फंस जाते है और मूर्च्छित हो जाते है, तब हनुमानजी के द्वारा पवन वेग से उड़ते हुए भगवान विष्णुजी के वाहन गरुड़जी को लेकर आते है और नागपाश के बंधन को कटवाते है। इस छठी काव्य रचना में यह विवरण बताया गया है।




7.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की सातवीं काव्य रचना में:-जब रावण के भाई अहिरावण-महिरावण को रावण के द्वारा आदेश मिलने पर अहिरावण-महिरावण ने विभीषणजी का रूप लेकर भगवान रामजी और लक्ष्मणजी को अपहरण करके अपने पाताल लोक देवी बलि के लिए ले गए तब हनुमानजी ने अहिरावण-महिरावण के पाताल लोक में जाकर उनकी सेना को नष्ट किया और मक्खी का रूप बनाकर अहिरावण-महिरावण को बलि देने से पांच दियों को जलते हुए अपने पंचमुखी रूप को धरकर उन दियो को बुजाकर अहिरावण-महिरावण का अंत करके श्रीरामजी और लक्ष्मणजी को मुक्त करवाके अपनी सैन्य छावनी में वापस सही सलामत लेकर आये। यह विवरण इस सातवें काव्य रचना के पद में मिलता है।




8.संकटमोचन हनुमानाष्टक पाठ की आठवीं काव्य रचना में:-आठवीं काव्य रचना में हनुमानजी की तारीफ करते हुए बताया है, की हे हनुमानजी आपने भगवान रामजी के बहुत ही सारे बड़े-बड़े कामों को पार लगाया है। मैं तो गरीब असहाय हूँ, आपके द्वारा कौन से कष्ट नहीं मिट सकते है। आपके के द्वारा सभी तरह के संकटो का समाधान है और आपसे यही अरदास करता हूँ कि हे हनुमानजी यदि हमारे ऊपर संकटों की छाया है तो उन संकटों की छाया को दूर करके हमें उनसे मुक्त करावे। इस तरह आठवीं काव्य रचना के पद में अरदास की गई बतायी है।




Wednesday, February 3, 2021

February 03, 2021

बजरंग बाण पाठ की रीति के नियम और फायदे(Rules and benefits of the practice of Bajrang Baan)

बजरंग बाण पाठ की रीति के नियम और फायदे (Rules and benefits of the practice of Bajrang Baan):-बजरंगबली जी को पूजा-पाठ करके उनको खुश करके उनकी कृपा को पाने के लिए मनुष्य को बजरंग बाण सटीक तरीका धर्म-शास्त्रों में बताया गया हैं, क्योंकि भगवान रामजी के अनन्य भक्त श्री बजरंगबली जी को माना जाता है। भगवान अजर-अमर बजरंगबलीजी को उत्साह, ताकत और जोश के प्रतीक माना जाता है। बजरंगबली जी को भक्ति, बल और एनर्जी का साधन भी शास्त्रों में बताया गया है।



Rules and benefits of the practice of Bajrang Baan




  ।।अथ श्री बजरंगबली जी का बजरंग बाण।।


                    ।।दोहा।।


निश्चय प्रेम प्रतीत ते, विनय करैं सनमान।


तेहि के कारज सकल,शुभ सिद्ध करैं हनुमान।।


जय हनुमंत संत हितकारी।


सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।


जनके काज बिलम्ब न कीजै।


आतुर दौरि महासुख दीजै।।


जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा।


सुरसा बदन पैठी विस्तारा।।


आगे जाई लंकिनी रोका।


मारेहु लातु गई सुर लोका।।


जाय विभीषण को सुख दीन्हा।


सीता निरखि परम पद लीन्हा।।


बाग उजारि सिन्धु महँ बौरा।


अति आतुर यम कातर तोरा।।


अक्षय कुमार को मारि संहारा।


लूम लपेटि लंक को जारा।।


लाह समान लंक जरि गई।


जय जय धुनि सुर पुर महँ भई।।


अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी।


कृपा करहु उर अन्तरयामी।।


जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता।


आतुर होइ दुख करहु निपाता।।


जय गिरिधर जय जय सुख सागर। 


सुर समूह समरथ भटनागर।।


ऊँ हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले। 


बैरिहि मारू बज्र की कीले।।


गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। 


महाराज प्रभुदास उबारो।।


ऊँ कार हुँकार महाबीर धावो।


बज्र गदा हनु विलंब न लावो।।


ऊँ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीशा।


ऊँ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीशा।।


सत्य होहु हरि सत्य पायके।


राम दूत धरुमारू धायके।।


जय जय जय हनुमन्त अगाधा।


दुख पावत जन केहि अपराधा।।


पूजा जप तप नेम अचारा।


नहिं जानत कछु दास तुम्हारा।।


बन उपवन मग गिरि गृह माहिं। 


तुमरे बल हम डरपत नाहीं।।


पायँ परौं कर जोर मनावौं।


यहि अवसर अब केहि गोहरावों।।


जय अंजनीकुमार बलवन्ता। 


शंकर सुवन वीर हनुमन्ता।।


बदन कराल काल कुल घालक।


राम सहाय सदा प्रतिपालक।।


भूत प्रेत पिशाच निशाचर। 


अग्नि बेताल काल मारीमर।।


इन्हें मारू तोहि सपथ रामकी।


राखु नाथ मरजाद नाम की।।


जनक सुता हरि दास कहावो।


ताकि शपथ विलंब न लावो।।


जय जय जय धुनि होत अकाशा।


सुमिरत होत दुसह दुख नाशा।।


चरण शरण कर जोरि मानवों। 


यहि अवसर अब केहि गोहरावों।।


उठु उठु चल तोहि राम दोहाई।


पायँ परौं कर जोरि मनाई।।


ऊँ चं चं चं चपल चलंता।


ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।


ऊँ हं हाँक देत कपि चंचल।


ऊँ सं सहम पराने खलदल।।


अपने जन को तुरन्त उबारो।


सुमिरत होय आनंद हमारो।।


यहि बजरंगबाण जेहि मारै।


ताहि कहो फिरि कौन उबारे।।


पाठ करै बजरंग बाण की।


हनुमत रक्षा करैं प्राण की।।


यह बजरंग बाण जो जापै।


तेहि ते भूत प्रेत सब काँपे।।


धूप देय अरु जपै हमेशा।


ताके तन नहिं रहे कलेशा।।

                   

                    ।।दोहा।।


प्रेम प्रतीतिहि कपि भजे, सदा धरै उर ध्यान।


तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।



।।इति श्री बजरंगबली जी का बजरंग बाण।।


।।बोलो सियावर रामचन्द्रजी की जय।।



बजरंग बाण में बजरंगबली जी रामजी की कसम देना:-भगवान रामजी की कसम विशेष कर बजरंग बाण में दी गयी है।शास्त्रों में बताया गया है,की जब बजरंगबली जी को भगवान रामजी की कसम दी जाती है, तो वें सबकुछ छोड़कर सहायता करने के लिए हाजिर हो जाते हैं और सहायता भी करके कष्टों से आजादी दिलवाते है।जो कि निम्नांकित छन्दों में रामजी की कसम के रूप बजरंग बाण में बताई गई है, जो इस तरह हैं-भूत प्रेत पिशाच निशाचर। 


अग्नि बेताल काल मारीमर।।


इन्हें मारू तोहि सपथ रामकी।


राखु नाथ मरजाद नाम की।।


जनक सुता हरि दास कहावो।


ताकि शपथ विलंब न लावो।।


उठु उठु चल तोहि राम दोहाई।


पायँ परौं कर जोरि मनाई।।



बजरंगबली के बजरंग बाण के पाठ करने की रीति:-

◆मनुष्य को सबसे पहले सूर्य के उदय होने से पहले मंगलवार या शनिवार के दिन मनुष्य को प्रातःकाल उठकर अपनी दैनिक चर्या को पूरी करनी चाहिए।


◆मनुष्य को स्नानादि कर स्वच्छ लाल रंग के या केशरिया रंग के कपड़ो को पहनना चाहिए।


◆अपने पूजा करने की जगह पर बजरंगबली जी की प्रतिमा या फोटू को प्रतिष्ठित् करना चाहिए।


◆उसके बाद में बजरंगबली जी के स्वरूप का मन में चिंतन करते हुए उनसे अरदास करते हुए अपनी समस्त तरह की कामनाओं को उनके सामने मन में दोहराना चाहिए। उसके बाद में मन में बजरंग बाण के पाठ का इरादा बजरंगबली जी के सामने करते है।


◆मनुष्य को पाठ करने के समय बिछावन के रूप में कुश का बिछावन को प्रयोग में लेना चाहिए।


मनुष्य को पाठ शुरू करने से पहले दीपक को तिल के तेल से परिपूर्ण करके उसमें कच्चे सूत की या मोली को बटकर बनाई गई पांच मुख की बाती को रखकर कर उपासने से पहले जलाना चाहिए।


◆मनुष्य को भोग के रूप एवं  पूजा-पाठ के लिए लाल रंग के फूल, रोली, रक्त चंदन, साफ गूगल धूप, लाल रंग की मिठाई, चूरमा, लड्डू और दूसरे फलों के अलावा केला, अमरूद, मौसमी के फल आदि सामग्री को लेकर उपासना करनी चाहिए और अर्पण करके प्रसाद के रूप में उपयोग में लेना चाहिए।

◆सबसे पहले गणपति जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।


◆उसके बाद मन में माता सीताजी और भगवान रामजी का स्वरूप चिंतन करना चाहिए।


◆मनुष्य को श्री बजरंगबली जी को धूप, दिप और पुष्प को अर्पण करते हुए बजरंगबली जी पूजा-अर्चना करनी चाहिए।


◆मनुष्य को अपने मन में जितनी बार इरादे से बजरंग बाण को शुरू करते है,उतनी बार सोचे हुए इरादे से रुद्राक्ष की माला से बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए या माला नहीं होने पर मन में पाठ गिनती को याद रखते हुए जाप करना चाहिए।


◆मनुष्य को बजरंग बाण का पाठ करते समय शब्दों को सही-सही पढते हुए जाप करना चाहिए और गलत नहीं पढ़ना चाहिए।


◆फिर बजरंग बाण के पाठ का पाठन करना चाहिए।


◆मनुष्य को बजरंग बाण के एक सौ आठ की संख्या में पाठ का पाठन करने से फायदा मिलता है।


◆मनुष्य को बजरंग बाण के पाठ के साथ ही हनुमानजी की हनुमान चालीसा का पाठ भी करना चाहिए।


◆मनुष्य को बजरंग बाण के पाठ के साथ ही पाठ पूरा कर लेने के बाद में श्री राम जी के गुणगान करने के लिए श्री रामस्त्रोत का भी पाठ करने से बुरे और नकारात्मक प्रभाव कम होते है।


◆मनुष्य को सुंदरकांड का पाठ को भी पाठन करने से सभी तरह की जीवन की मुश्किलों से मुक्ति मिल जाती है।


◆सुंदरकांड का पाठ भी सायं काल शनिवार को और प्रातःकाल मंगलवार के दिन आरती करने के बाद ही शुरू करना चाहिए।




सुंदरकांड का पाठ की रीति:-सबसे पहले बजरंगबली जी की फोटू या प्रतिमा की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, उनको धूप, दीपक, फूल और भोग को अर्पण करना चाहिए। 


◆उसके बाद माता सीताजी, श्रीरामजी, लक्ष्मण जी सहित भगवान भोलेनाथ की स्तुति करते हुए सुंदरकांड का पाठ को शुरू करना चाहिए।


◆मनुष्य को शुद्ध गाय के घृत को दीपक में डालकर लगातार जोत जलती रहनी चाहिए।


◆मनुष्य को पाठ के उच्चारण में किसी तरह की गलती और अपने सभी तरह के गलत कर्मो के लिये माफी मांगते हुए अरदास करनी चाहिए और अपनी मन की सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अनुरोध करना चाहिए।




बजरंग बाण के पाठ के पाठन के फायदे:-बजरंग बाण के पाठ के पाठन से मनुष्य जीवन की सभी तरह की मुश्किलों से निजात संभव है-



◆लग्न में भौम ग्रह के कारण विलंब होने पर और दाम्पत्य जीवन में सुख की प्राप्ति के लिए:-जिन मनुष्यों के उम्र के बढ़ते जाने पर भी लग्न नहीं हो पाने और जिन मनुष्यों के दाम्पत्य जीवन में दाम्पत्य सुख नहीं मिलने के हालात में उनको बजरंग बाण के पाठ को केले के वृक्ष के नीचे बैठकर पाठन करने से इन परेशानियों से आजादी मिल जाती है। जिससे भगवान बजरंगबली जी की कृपा मिल जाती है और सुखी जीवन की प्राप्ति होती है।



◆कहीं से उधार लिये ऋण से निजात:-मनुष्य के ऊपर ज्यादा कर्ज होने पर बजरंग बाण का पाठ पूरी आस्था से करने पर उधार लिए ऋण से निजात मिल जाता है।


◆कोर्ट-कचहरी में चल रहे मुकदमे में जीत पाने:-मनुष्य के चल रहे कोर्ट-कचहरी के मुकदमे से निजात पाने के लिए बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए।


◆गुप्त और प्रत्यक्ष दुश्मनों से निजात पाने:-बजरंग बाण के पाठ करने से मनुष्य के गुप्त और प्रत्यक्ष दुश्मनों से निजात मिल जाता है।



◆बार-बार की कुदृष्टि के असर से निजात पाने:-बजरंग बाण के पाठ का पाठन करने से बार-बार लगने वाली कुदृष्टि से मुक्ति मिल जाती है।


◆खून की कमी से निजात पाने:-मनुष्य के शरीर में खून की कमी होने से मनुष्य बजरंग बाण के पाठ से खून की मात्रा ठीक होने लगती है।



◆ऑपेरशन से निजात पाने:-बजरंग बाण के पाठ का पाठन करने से मनुष्य की व्याधि के कारण होने ऑपेरशन से मुक्ति मिल जाती हैं।



◆नवग्रहों में से सम्बंधित खराब ग्रह के होने से उस ग्रह के असर को कम करने के लिए:-जिस मनुष्य की जन्मकुंडली में कोई भी ग्रह कमजोर होकर बुरी स्थिति में होने पर उस ग्रह को मजबूत करने के लिए नियमित रूप से बजरंग बाण का पाठ का पाठन करना चाहिए। बजरंग बाण के पाठ को पाठन से मनुष्य को सूर्य के उगने से पहले उठकर बजरंग बाण के पाठ का पाठन करना चाहिए। बजरंगबली जी के फोटो या प्रतिमा के सामने बैठकर आटे से बना कर दिया का उपयोग करना चाहिए। इस तरह से पाठ का पाठन करने ग्रह से सम्बंधित कमजोरी दूर होकर उस ग्रह को मजबूती मिलेगी जिससे उस ग्रह का दूषित असर कम होगा।



◆असाध्य व्याधियों से आजादी को पाने के लिए:-मनुष्य को असाध्य व्याधियों जैसे:-केंसर, टी.बी., मसा और हृदय विकारों से मुक्ति पाने के लिए बजरंग बाण के पाठ का पाठन करना चाहिए। बजरंग बाण के पाठ का पाठन करते समय बजरंगबली जी की प्रतिमा के सामने बैठकर घृत के दीपक को प्रज्वलित करके राहुकाल के समय में इक्कीस पान के पत्तो की माला बनाकर उस माला को बजरंगबली जी अर्पण करते हुए मन में उस असाध्य व्याधि से मुक्त होने की अरदास करनी चाहिए।



◆काम करने की जगह पर कामयाबी पाने के लिए:-जो कोई भी मनुष्य अपने काम करने की जगह पर बाधाओं के आने पर उन बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को मंगलवार के दिन बजरंगबली जी के सामने बैठकर बजरंग बाण का करते हुए बजरंगबली जी को एक पानी का नारियल अर्पण करके उस नारियल को किसी लाल रंग के वस्त्र में लपेटकर उस बंधे हुए नारियल को अपने घर में किसी जगह पर रखने पर काम की जगह पर आ रही बाधाएं से निजात मिलती है।



◆मंगल ग्रह से होने वाले बुरे योग से मुक्ति:-मंगल ग्रह के बुरे असर को कम करने के लिए मंगलवार के दिन बजरंग बाण के पाठ का पाठन करके बंदरो को गुड़ व चना खिलाने से मंगल ग्रह के बुरे असर कम होते है।



◆शनि ग्रह,राहु और केतु ग्रह के असर को कम करने के लिए:-बजरंग बाण के पाठ का पाठन करने शनि ग्रह,राहु और केतु ग्रह के असर कम होते है।



◆घर में सुख-शांति के लिए:-मनुष्य को अपने घर के बाहर की साइड और अंदर की साइड में पांच मुख के बजरंगबली जी फोटो को लगाने से और बजरंग बाण का पाठ करने से फायदा मिलता है।



बजरंग बाण के पाठ का पाठन कब-कब नहीं करें:-बजरंगबली जी अच्छे नतीजे देने वाले अजर-अमर देवता है। मनुष्य को अपनी मन की इच्छा को पूरा करने के लिए बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए।


◆मनुष्य बुरे और गलत कामों को करने में बजरंग बाण के पाठ का पाठन नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को अपनी मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही बजरंग बाण के पाठ का पाठन करना चाहिए।  किसी को अपने पैरों में झुकाने के लिए और उसका फायदा उठाने के उद्देश्य से नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को गलत और बुरे काम जैसे-चोरी, डकैती और मारपीट आदि में बजरंग बाण का पाठ नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को सामान्य जीवन में होने वाली छोटी-मोटी बाधाओं के लिए भी बजरंग बाण का पाठ नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य बिना पुरुषार्थ के ही रुपयों-पैसों, सम्पन्नता और किसी भी तरह की भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए भी बजरंग बाण के पाठ का पाठन नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को किसी का अहित करने के उद्देश्य से भी और अपने फायदे के लिए भी पाठ नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को बिना पुरुषार्थ के ही अपने किसी भी कामों को पूरा कराने के उद्देश्य के लिए भी बजरंग बाण के पाठ को नहीं करना चाहिए।



बजरंग बाण के पाठ को करते समय सावधानियां:-भारतीय वैदिक धर्म गर्न्थो में बजरंग बाण को सबसे श्रेष्ठ करामाती और सब तरह की कामनाओं को सिद्ध करने वाला बताया गया है। इसलिए बजरंग बाण के पाठ को बिना मतलब के गलत और बुरे कामों के लिए उपयोग में नहीं करके अच्छे और भलाई के कामों को करने के लिए करना चाहिए। बजरंग बाण के पाठ के पाठन को मंगलवार और शनिवार के दिन में करने से ज्यादा फायदा मिलता है।


◆बजरंग बाण के पाठ को मुख्यतौर पर मंगलवार के दिन ही पाठन करना चाहिए और हर कोई भी वार को नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को इकतालीस दिन तक निरन्तर अपने मन में पक्के इरादे से अपने मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए करना चाहिए।


◆मनुष्य को स्वच्छ लाल रंग के कपड़ो को धारण करके पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ही बजरंग बाण के पाठ का पाठन करना चाहिए।


◆मनुष्य को अपने मन में प्रतिज्ञा करते हुए ही बजरंग बाण के पाठ को शुरू करना चाहिए।


◆मनुष्य को बजरंग बाण के पाठ के पाठन की प्रतिज्ञा लेने पर जितने दिन तक कि प्रतिज्ञा हो उतने दिन तक व्यसन और मांस आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।


◆मनुष्य को बजरंग बाण के पाठ के रीति का पालन करना चाहिए।



बजरंग बाण की तपस्या करने की रीति:-कोई भी मनुष्य बजरंग बाण का पाठ कर सकता है, लेकिन जब तक बजरंग बाण के पाठ को करने का तरीका मालूम नहीं होने पर उसका फल नहीं मिलता है। बजरंग बाण की तपस्या को करने के लिए मनुष्य को रीति के उसूलों का पालन करने पर ही सफलता और लक्ष्य की प्राप्ति होती है।



बजरंग बाण की तपस्या करने की रीति:-मनुष्य को मंगलवार के दिन अधोरात्री में पूर्व दिशा में लकड़ी का बाजोट को बिछाकर उसको स्वच्छ पवित्र जगह के जल से साफ करके उस बाजोट पर साफ लाल रंग का वस्त्र या कापड़ बिछाकर उस कापड़ पर बजरंगबलीजी की मूर्ति को स्थापित करके धूप, दिप, पुष्प, भोग के रूप में गुड़ व चना, रोटला, चूरमा,फल और अगरबत्ती आदि प्रक्रिया से पूजन करना चाहिए और एक लाल रंग के कागज पर  "ऊँ हं हनुमते रूद्रात्मकाय हुं फट स्वाहा" मन्त्र को लिखकर उस लिखे हुए लाल रंग के कागज को उस लकड़ी के बाजोट या चौकी पर रख देते है और बाजोट के रूप में रखी हुई चौकी के दायीं तरफ घृत का दीपक को प्रज्वलित कर देना चाहिए। फिर कुश से बना हुआ बिछावन पर बैठकर लगातार पांच मर्तबा बजरंग बाण के पाठ का पाठन करना चाहिए और पाठ का पाठन होने के बाद उस लाल रंग के कागज को अपने मन्दिर में भगवान के द्वार में रख देते है और हमेशा धूप-दीपादि दिखाकर पूजन करना चाहिए। इस तरह रोजाना करने से बजरंग बाण की तपस्या में कामयाबी मिल जाती है और मन की चाहत पूरी होती है।






 











Tuesday, February 2, 2021

February 02, 2021

श्री हनुमानजी की हनुमान चालीसा का परिचय और महत्व(Introduction and importance of Hanuman Chalisa of Shri Hanuman):


श्री हनुमानजी की हनुमान चालीसा का परिचय और महत्व(Introduction and importance of Hanuman Chalisa of Shri Hanuman):-श्री हनुमानजी की चालीसा से हनुमानजी के बारे में पूरा विवरण मिल जाता है, की हनुमानजी ने किस तरह से भगवान रामजी के प्रति श्रद्धा रखते हुए हनुमानजी ने किस तरह से श्री रामजी की सेवा की थी और अपना सबकुछ श्री रामजी के चरणों में अर्पण कर दिया। हनुमानजी के द्वारा किये गए सभी कार्यो का विवरण हनुमान चालीसा में मिल जाता है। 




Introduction and importance of Hanuman Chalisa of Shri Hanuman



रामचरित मानस की तरह हनुमान चालीसा का महत्व है।तुलसीदास जी के द्वारा हनुमान चालीसा की रचना हुई थी जो कि दशरथ जी के पुत्र रामजी के बड़े भक्त थे।तुलसीदास का भरोसा भगवान रामजी पर होने से उनको औरंगजेब ने बन्दी बनाया था और कारागार में रहते हुए उन्होंने हनुमान चालीसा की रचना की थी।हनुमान जी की कृपा से ओरेंगजेब की बुद्धि भ्रमित होने पर तुलसीदास जी को छोड़ना पड़ा था।




चालीसा पाठ का मतलब:-जिस शास्त्र में चालीस छंदों के संग्रह होते है उसे चालीसा कहते है। जो भी चालीस छन्दों के संग्रह को पढ़ते है तो उनको चालीसा पाठ कहा जाता है। आज के युग में मनुष्य के दौड़-धूप के कारण उनके पास में समय का अभाव होने से उनको हनुमान चालीसा को मन में आसानी से दोहरा सकते है और मन में हनुमानजी के प्रति श्रद्धा भाव और विश्वास होना आवश्यक होता है। 




    ।।अथ श्री हनुमान जी की हनुमान चालीसा।।

      

     ।।श्री हनुमान चालीसा का दोहा।।



श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।


बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।


बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरों पवन-कुमार।


बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।।


            

  ।।श्री हनुमान चालीसा की चौपाई।।


जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,


जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।१।।


रामदूत अतुलित बल धामा,


अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।२।।


महावीर बिक्रम बजरंगी,


कुमति निवार सुमति के संगी।।३।।


कंचन बरन बिराज सुबेसा,


कानन कुण्डल कुंचित केसा।।४।।


हाथ बज्र आरु ध्वजा बिराजै,


काँधे मूंज जनेउ साजै।।५।।


शंकर सुवन केसरी नन्दन,


तेज प्रताप महा जग वन्दन।।६।।


विद्यावान गुनी अति चातुर,


राम काज करिबे को आतुर।।७।।


प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया,


राम लखन सीता मन बसिया।।८।।


सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा,


विकट रूप धरि लंक जरावा।।९।।


भीम रूप धरि असुर संहारे,


रामचन्द्र के काज संवारे।।१०।।


लाय सजीवन लखन जियाये,


श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।११।।


रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई,


तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।१२।।


सहस बदन तुम्हरो जस गावै,


अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।१३।।


सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा,


नारद सारद सहित अहीसा।।१४।।


जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,


कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।।१५।।


तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा,


राम मिलाय राज पड़ दीन्हा।।१६।।


तुम्हरो मन्त्र विभीषण माना,


लंकेश्वर भये सब जग जाना।।१७।।


जग सहस्र जोजन पर भानू,


लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।१८।।


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं,


जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।।१९।।


दुर्गम काज जगत के जेते,


सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।२०।।


राम दुआरे तुम रखवारे,


होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।२१।।


सब सुख लहै तुम्हरी सरना,


तुम रक्षक काहू को डर ना।।२२।।


आपन तेज सम्हारो आपै,


तीनों लोक हाँक ते काँपे।।२३।।


भूत पिसाच निकट नहिं आवै,


महावीर जब नाम सुनावै।।२४।।


नासे रोग हरै सब पीरा,


जपत निरंतर हनुमत बीरा।।२५।।


संकट ते हनुमान छुड़ावै,


मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।२६।।


सब पर राम तपस्वी राजा,


तिन के काज सकल तुम साजा।।२७।।


और मनोरथ जो कोई लावै,


सोई अमित जीवन फल पावै।।२८।।


चारों जुग परताप तुम्हारा,


है परसिद्ध जगत उजियारा।।२९।।


साधु सन्त के तुम रखवारे,


असुर निकंदन राम दुलारे।।३०।।


अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,


अस बर दीन जानकी माता।।३१।।


राम रसायन तुम्हरे पासा,


सदा रहो रघुपति के दासा।।३२।।


तुम्हरे भजन राम को पावै,


जनम जनम के दुःख बिसरावै।।३३।।


अन्त काल रघुबर पुर जाई,


जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।३४।।


और देवता चित्त न धरई,


हनुमत सेई सर्व सुख करई।।३५।।


संकट कटै मिटे सब पीरा,


जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।३६।।


जय जय जय हनुमान गोसाई,


कृपा करहु गुरुदेव की नाई।।३७।।


जो सत बार पाठ कर कोई,


छुटहिं बंदी महासुख होई।।३८।।


जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा,


होय सिद्धि साखी गौरीसा।।३९।।


तुलसी दास सदा हरि चेरा,


कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।४०।।



                  ।।दोहा।।


पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।


राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।



।।इति श्री हनुमानजी की हनुमान चालीसा।।


     ।।सियावर रामचन्द्रजी की जय।।


                  ।।दोहा।।


हनुमत को दिखे न जब रत्नों में रघुवीर।


सीताराम दिखा दिया, तब निज उर को चीर।।



श्री हनुमानजी की हनुमान चालीसा का महत्व:-श्री हनुमानजी की हनुमान चालीसा का जो  मनुष्य अपने मन से पूरी श्रद्धा और विश्वास से पाठ करते है, उन पर हनुमानजी की कृपा की बरसा होती है जिससे उनके ऊपर आने वाली सभी मुश्किलें हट जाती है।



1.जब विद्या के अध्ययन में रुचि नहीं होने पर:-जिनको विद्या के अध्ययन में रुचि नहीं होती है, उनको हनुमान चालीसा के छंद-बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार। का पाठ करने से विद्या में रुचि होने लगती है।



2.जब डर लगने पर:-जब किसी को भी बिना मतलब का डर रहता है उनको हनुमान चालीसा का छंद-भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे। का मन में दोहराने से आत्मविश्वास बढ़कर डर निकलता है।



3.काम को सफल करने के लिए:-जब कोई भी काम करते समय बिना मतलब की बाधा आती है, तो उस काम को सफल करने के लिए हनुमान चालीसा के छंद-


भीम रूप धरि असुर सँहारे,


रामचन्द्र के काज सँवारे।


को जपने पर काम मे कामयाबी मिलती है।



4.बार-बार मांदगी होने पर:-जब कोई भी बार-बार बीमार हो जाते है उनको हनुमान चालीसा के छंद-नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरन्तर हनुमत बीरा। को जपने पर बीमारी से मुक्ति मिलती है।



5.जीवन पर कष्ट आने पर:-जिस किसी को अपने जीवन पर कष्ट आये तो उनको हनुमान चालीसा के छंद- संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।या संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै। का जाप करने से जीवन के ऊपर आने वाले कष्टो से मुक्ति मिलती है।



6.बुरे लोगों के साथ ज्यादा मेलमिलाप को दूर करने के लिए:-जिस किसी को बुरे लोगों के साथ ज्यादा मेलमिलाप होने पर उस मेलमिलाप को दूर करने के लिए हनुमान चालीसा का छंद-महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी। को मन में जपने से बुरे लोगों का साथ छूट जाता है।



7.बन्धन से मुक्ति के लिए:-जिस किसी भी तरह के बंधन में फस गये हो उनको उस बन्धन से मुक्त होने के लिए हनुमान चालीसा के छंद-जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बन्दि महा सुख होई। को जपने से बन्धन से मुक्ति मिलती है।




8.बिना मतलब का भय सताने पर:-जिस किसी को मन में बिना मतलब का भय सताता है,उनको हनुमान चालीसा का छंद-सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना। को जपने से बिना मतलब का भय खत्म होता है।



9.मन की सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए:-जिस किसी को अपने मन की सभी इच्छाओं को पूरा करना होता है उनको पूरे विश्वास से हनुमान चालीसा का छंद-और मनोरथ जो कोई लावै, सोई अमित जीवन फल पावै। को मन में जपने से सभी तरह की इच्छाओं की पूर्ति होती हैं।